जीवजगत का स्वरूप: विविधता एवं वर्गीकरण - Class 9 Science Exploration Hindi CBSE Notes

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जीवजगत का स्वरूप: विविधता एवं वर्गीकरण - Class 9 Science Exploration Hindi CBSE Notes

जीवजगत का स्वरूप: विविधता एवं वर्गीकरण

Class 9 Science Exploration Hindi Updated : 15 August 2026

अध्याय 12. जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण

पृथ्वी पर सूक्ष्म जीवों से लेकर विशाल वृक्षों और जटिल जन्तुओं तक जीवन अनेक रूपों में पाया जाता है। जीवों की इस व्यापक विविधता को समझने के लिए वैज्ञानिक उनके समान गुणों, भिन्नताओं और विकासात्मक संबंधों के आधार पर उनका वर्गीकरण करते हैं।

Chapter Review

  • जैव विविधता: पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीवों की असीम विविधता को जैव विविधता कहते हैं।
  • जैव विविधता का महत्त्व: प्रत्येक जीव पारिस्थितिक तंत्र में कोई न कोई भूमिका निभाता है और पृथ्वी पर जीवन के संतुलन में योगदान देता है।
  • पौधों की भूमिका: पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाते हैं और अनेक जीवों को ऊर्जा तथा भोजन प्रदान करते हैं।
  • अपघटक: कवक और जीवाणु मृत जैव पदार्थों का अपघटन करके पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में सहायता करते हैं।
  • परागणकारी: पक्षी, मधुमक्खियाँ और चमगादड़ जैसे जीव अनेक पुष्पीय पौधों के परागण में सहायता करते हैं।
  • मानव और जैव विविधता: मनुष्य भोजन, औषधि, आवास और आजीविका के लिए जैव विविधता पर निर्भर हैं।
  • फसल विविधता: फसलों की विभिन्न किस्मों का संरक्षण खाद्य सुरक्षा को मजबूत करता है और फसल के पूर्ण नष्ट होने के जोखिम को कम करता है।
  • स्थानिक जातियाँ: जो जातियाँ प्राकृतिक रूप से विश्व के किसी विशेष क्षेत्र में ही पाई जाती हैं, उन्हें स्थानिक जातियाँ कहते हैं।
  • जैव विविधता हॉटस्पॉट: ऐसे क्षेत्र जहाँ बड़ी संख्या में स्थानिक जातियाँ पाई जाती हैं और जहाँ आवासीय क्षति अधिक हुई है, जैव विविधता हॉटस्पॉट कहलाते हैं।
  • भारत के हॉटस्पॉट: पश्चिमी घाट, इंडो-बर्मा, हिमालय और सुंडालैंड भारत से संबंधित प्रमुख वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट हैं।
  • जैव विविधता का विकास: वर्तमान जैव विविधता लंबे समय तक होते रहे परिवर्तनों, अनुकूलन और जीवों तथा उनके परिवेश के बीच पारस्परिक क्रियाओं का परिणाम है।
  • वर्गीकरण: जीवों को उनकी समानताओं, भिन्नताओं और विकासात्मक संबंधों के आधार पर व्यवस्थित समूहों में बाँटने की प्रक्रिया वर्गीकरण कहलाती है।
  • वर्गीकरण की आवश्यकता: वर्गीकरण से जीवों की पहचान, अध्ययन, उनके पारस्परिक संबंधों और जीवन के इतिहास को समझना आसान होता है।
  • वर्गीकरण के प्रमुख आधार: बाह्य संरचना, पोषण की विधि, आंतरिक संरचना, कोशिका संरचना, पारिस्थितिकीय भूमिका, जनन और आनुवंशिक समानता आदि।
  • कोशिका के आधार पर: जीव एककोशिकीय या बहुकोशिकीय तथा प्रोकैरियोटिक या यूकैरियोटिक हो सकते हैं।
  • पोषण के आधार पर: जीव स्वपोषी या विषमपोषी हो सकते हैं।
  • पाँच-जगत वर्गीकरण: रॉबर्ट एच. व्हिटेकर की पाँच-जगत प्रणाली में मोनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी और एनिमेलिया शामिल हैं।
  • मोनेरा: इसमें मुख्यतः एककोशिकीय प्रोकैरियोटिक जीव शामिल होते हैं।
  • प्रोटिस्टा: इसमें मुख्यतः एककोशिकीय यूकैरियोटिक जीव शामिल होते हैं। इनमें कुछ स्वपोषी और कुछ विषमपोषी होते हैं।
  • फंजाई: कवक सामान्यतः बहुकोशिकीय यूकैरियोटिक और विषमपोषी जीव होते हैं। उनकी कोशिका भित्ति काइटिन की बनी होती है।
  • प्लांटी: पादप सामान्यतः बहुकोशिकीय, स्वपोषी यूकैरियोटिक जीव होते हैं और उनकी कोशिका भित्ति मुख्यतः सेलुलोज की बनी होती है।
  • प्लांटी के प्रमुख वर्ग: थैलोफाइटा, ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म।
  • एंजियोस्पर्म: पुष्पीय पौधे बीजों का निर्माण करते हैं तथा फल और पुष्प बनाते हैं। ये पृथ्वी पर सबसे अधिक विविध पादप समूह हैं।
  • एनिमेलिया: जन्तु बहुकोशिकीय, विषमपोषी और यूकैरियोटिक जीव होते हैं।
  • नॉन-कॉर्डेटा: जिन जन्तुओं में पृष्ठरज्जु नहीं होती, उन्हें अकशेरुकी या नॉन-कॉर्डेटा समूह में रखा जाता है।
  • कॉर्डेटा: जिन जन्तुओं में पृष्ठरज्जु से संबंधित विशेषताएँ पाई जाती हैं, उन्हें कॉर्डेटा में रखा जाता है।
  • कशेरुकी: कशेरुकी जन्तुओं में मत्स्य, उभयचर, सरीसृप, पक्षी और स्तनधारी प्रमुख वर्ग हैं।
  • अनुकूलन: बदलते पर्यावरण में जीवित रहने और जनन करने में सहायता करने वाले संरचनात्मक या अन्य परिवर्तन अनुकूलन से संबंधित होते हैं।
  • वर्गीकरण की पदानुक्रम: वर्गीकरण बड़े और व्यापक समूहों से छोटे तथा अधिक विशिष्ट समूहों की ओर क्रमबद्ध होता है।
  • जाति: वर्गीकरण की पदानुक्रम में जाति सबसे अधिक विशिष्ट प्रमुख इकाई है। एक ही जाति के सदस्य अधिक समान विशेषताएँ साझा करते हैं।
  • वैज्ञानिक नामकरण: जीवों को वैज्ञानिक रूप से नाम देने से अलग-अलग भाषाओं और क्षेत्रों के कारण उत्पन्न भ्रम को दूर किया जा सकता है।
  • द्विनाम पद्धति: वैज्ञानिक नाम सामान्यतः दो भागों से मिलकर बना होता है—पहला वंश का नाम और दूसरा जाति का नाम।
  • वर्गीकरण का व्यापक महत्त्व: वर्गीकरण केवल जीवों के नामकरण तक सीमित नहीं है। यह जीवों के पारस्परिक संबंध, पृथ्वी पर जीवन के इतिहास और जैव विविधता के संरक्षण को समझने में सहायता करता है।

एक नज़र में पूरा अध्याय

जैव विविधता → जीवों की विविधता → वर्गीकरण की आवश्यकता → वर्गीकरण के आधार → पाँच-जगत वर्गीकरण → मोनेरा → प्रोटिस्टा → फंजाई → प्लांटी → एनिमेलिया → अनुकूलन → वर्गीकरण की पदानुक्रम → वैज्ञानिक नामकरण

जीवजगत का स्वरूप: विविधता एवं वर्गीकरण

Class 9 Science Exploration Hindi Updated : 15 August 2026

अध्याय 12. जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण

पृथ्वी पर सूक्ष्म जीवों से लेकर विशाल वृक्षों और जटिल जन्तुओं तक जीवन अनेक रूपों में पाया जाता है। जीवों की इस विविधता को समझना और उसका संरक्षण करना पृथ्वी के संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक है।

जैव विविधता (Biodiversity)

परिभाषा: पृथ्वी पर पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के जीवों और उनके बीच पाई जाने वाली विविधता को जैव विविधता कहते हैं।

पृथ्वी पर जीवों की संख्या, उनके आकार, संरचना, जीवन-शैली, आवास और कार्यों में बहुत अधिक विविधता पाई जाती है। प्रत्येक जीव पारिस्थितिक तंत्र में अपनी विशेष भूमिका निभाता है।

समुद्रों में पाए जाने वाले सूक्ष्मदर्शीय शैवाल ऑक्सीजन के निर्माण में योगदान देते हैं। कवक और जीवाणु मृत पत्तियों तथा अन्य जैव पदार्थों का अपघटन करके पोषक तत्वों को मिट्टी में वापस पहुँचाते हैं। पक्षी, मधुमक्खियाँ और चमगादड़ पुष्पों के परागण में सहायता करते हैं। पौधे सूर्य के प्रकाश की सहायता से भोजन बनाते हैं।

जैव विविधता का महत्त्व

जैव विविधता पारिस्थितिक तंत्र को संतुलित बनाए रखने और पृथ्वी को जीवों के लिए अनुकूल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विभिन्न जीवों के बीच पारस्परिक संबंध पारिस्थितिक तंत्र के सुचारु संचालन में सहायता करते हैं।

  • ऑक्सीजन: सूक्ष्मदर्शीय शैवाल और पौधे ऑक्सीजन के निर्माण में योगदान देते हैं।
  • अपघटन: कवक और जीवाणु मृत जैव पदार्थों का अपघटन करते हैं और पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में सहायता करते हैं।
  • परागण: पक्षी, मधुमक्खियाँ और चमगादड़ अनेक पुष्पीय पौधों के परागण में सहायता करते हैं।
  • भोजन: पौधे अनेक जीवों के लिए भोजन और ऊर्जा का प्रमुख स्रोत हैं।
  • पारिस्थितिक संतुलन: जीवों के बीच पारस्परिक संबंध पारिस्थितिक तंत्र को संतुलित बनाए रखने में सहायता करते हैं।
  • मानव जीवन: मनुष्य भोजन, आवास, औषधि और आजीविका के लिए जैव विविधता पर निर्भर हैं।

फसल विविधता और खाद्य सुरक्षा

कृषक लंबे समय से विभिन्न उपयोगी गुणों वाली फसलों की अनेक किस्मों को संरक्षित करते रहे हैं। इनमें सूखा सहन करने, कीटों का प्रतिरोध करने और कम पोषक तत्वों वाली मिट्टी में भी उगने जैसे गुण हो सकते हैं।

फसलों में विविधता होने से किसी एक रोग, कीट या प्रतिकूल परिस्थिति के कारण पूरी फसल के नष्ट होने का जोखिम कम होता है। इसलिए फसल विविधता खाद्य सुरक्षा को मजबूत करती है।

फसल विविधता → जोखिम में कमी → खाद्य सुरक्षा में वृद्धि

भारत की जैव विविधता

परिभाषा: भारत के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में पाए जाने वाले जीवों, पौधों और उनके आवासों की विविधता को भारत की जैव विविधता कहा जा सकता है।

भारत के प्राकृतिक परिदृश्य में बहुत अधिक विविधता है। उत्तर में पर्वत, पश्चिम में मरुस्थल, पूर्वोत्तर में वर्षावन, दक्षिण में पठार तथा अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की लंबी तटरेखाएँ पाई जाती हैं।

इन क्षेत्रों की मिट्टी, तापमान और वर्षा की परिस्थितियाँ अलग-अलग हैं। इसलिए यहाँ विभिन्न प्रकार के आवास विकसित हुए हैं, जो अनेक प्रकार की जीव जातियों को आश्रय देते हैं। 

स्थानिक जातियाँ (Endemic Species)

परिभाषा: ऐसी जीव जातियाँ जो प्राकृतिक रूप से विश्व के किसी विशेष क्षेत्र में ही पाई जाती हैं और अन्य स्थानों पर स्वाभाविक रूप से नहीं मिलतीं, स्थानिक जातियाँ कहलाती हैं।

भारत में कई ऐसी जातियाँ पाई जाती हैं जो विशेष क्षेत्रों तक सीमित हैं। उदाहरण के रूप में नीलगिरि तहर, सिंहपुच्छी वानर, नेपेन्थीस खासियाना और नीलकुरिंजी का उल्लेख किया गया है। 

जैव विविधता हॉटस्पॉट

परिभाषा: ऐसे क्षेत्र जहाँ बड़ी संख्या में स्थानिक जातियाँ पाई जाती हैं और जहाँ आवासों की अत्यधिक क्षति हुई है, जैव विविधता हॉटस्पॉट कहलाते हैं।

हॉटस्पॉट क्षेत्र जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध होते हैं। इनका संरक्षण महत्वपूर्ण है क्योंकि ये अनेक जीवों को आश्रय देते हैं और पारिस्थितिक तंत्र तथा आहार जाल को बनाए रखने में सहायता करते हैं।

भारत से संबंधित प्रमुख वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट में पश्चिमी घाट, इंडो-बर्मा, हिमालय और सुंडालैंड शामिल हैं। सुंडालैंड में निकोबार द्वीप समूह भी शामिल है। 

जैव विविधता और मानव जीवन

मानव जीवन प्रकृति और जैव विविधता से गहराई से जुड़ा हुआ है। भोजन, औषधियाँ, आवास और आजीविका जैसी अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति जैव विविधता से होती है।

जैव विविधता का संरक्षण केवल वन्य जीवों की रक्षा करना नहीं है, बल्कि उन पारिस्थितिक तंत्रों और संसाधनों की रक्षा करना भी है जिन पर मानव समाज निर्भर करता है।

Concept Builder

जीवों की विविधता → जैव विविधता

जैव विविधता → पारिस्थितिक संतुलन + भोजन + औषधि + आजीविका

विभिन्न आवास → विभिन्न जीव जातियाँ

विशेष क्षेत्र में सीमित जाति → स्थानिक जाति

स्थानिक जातियाँ + अत्यधिक आवासीय क्षति → जैव विविधता हॉटस्पॉट

फसल विविधता → फसल नष्ट होने का जोखिम कम → खाद्य सुरक्षा मजबूत

Exam Booster

  • जैव विविधता क्या है? — पृथ्वी पर पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के जीवों और उनके बीच की विविधता को जैव विविधता कहते हैं।
  • जैव विविधता क्यों महत्वपूर्ण है? — यह पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और मानव सहित अनेक जीवों की आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायता करती है।
  • कवक और जीवाणु जैव विविधता में क्या भूमिका निभाते हैं? — वे मृत जैव पदार्थों का अपघटन करके पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में सहायता करते हैं।
  • परागणकारी जीवों के दो उदाहरण दीजिए। — मधुमक्खी और चमगादड़।
  • मनुष्य जैव विविधता पर किन आवश्यकताओं के लिए निर्भर हैं? — भोजन, आवास, औषधि और आजीविका के लिए।
  • स्थानिक जाति क्या है? — जो जाति प्राकृतिक रूप से किसी विशेष क्षेत्र में ही पाई जाती है।
  • जैव विविधता हॉटस्पॉट क्या है? — स्थानिक जातियों से समृद्ध और अत्यधिक आवासीय क्षति वाले क्षेत्र को जैव विविधता हॉटस्पॉट कहते हैं।
  • भारत से संबंधित चार जैव विविधता हॉटस्पॉट लिखिए। — पश्चिमी घाट, इंडो-बर्मा, हिमालय और सुंडालैंड।
  • फसल विविधता खाद्य सुरक्षा में कैसे सहायक है? — विभिन्न किस्मों के कारण किसी एक रोग या प्रतिकूल परिस्थिति से पूरी फसल के नष्ट होने का जोखिम कम होता है।
  • भारत में जैव विविधता अधिक होने का एक कारण क्या है? — भारत में पर्वत, मरुस्थल, वर्षावन, पठार और लंबी तटरेखाओं जैसे विविध आवास पाए जाते हैं।

जीवजगत का स्वरूप: विविधता एवं वर्गीकरण

Class 9 Science Exploration Hindi Updated : 15 August 2026

अध्याय 12. जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण

पृथ्वी पर वर्तमान जैव विविधता लंबे समय में हुए परिवर्तनों और जीवों तथा उनके परिवेश के बीच हुई पारस्परिक क्रियाओं का परिणाम है। इतनी विशाल विविधता को व्यवस्थित रूप से समझने के लिए वैज्ञानिक वर्गीकरण का उपयोग करते हैं।

जैव विविधता का विकास

परिभाषा: जीवों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी होने वाले छोटे-छोटे परिवर्तन, जो उनकी उत्तरजीविता और जनन को प्रभावित करते हैं, लंबे समय में जैव विविधता के विकास में योगदान देते हैं।

परिस्थितियाँ समय के साथ बदलती रहती हैं। जीवों में पाए जाने वाले कुछ छोटे अंतर उन्हें बदलती परिस्थितियों के अनुकूल होने में सहायता कर सकते हैं। ऐसे अंतर अनेक पीढ़ियों में संचित होते जाते हैं और जीवन के नए रूपों के विकास में योगदान देते हैं।

इस प्रकार आज दिखाई देने वाली जैव विविधता लंबे समय तक लगातार होते रहे परिवर्तनों का परिणाम है। जीवों और उनके परिवेश के बीच पारस्परिक क्रियाएँ भी इस विविधता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। 

जीवों का वर्गीकरण

परिभाषा: जीवों को उनकी समानताओं, भिन्नताओं और अन्य वैज्ञानिक विशेषताओं के आधार पर व्यवस्थित समूहों में बाँटने की प्रक्रिया को जैविक वर्गीकरण कहते हैं।

पृथ्वी पर करोड़ों जीव पाए जाते हैं। यदि प्रत्येक जीव का अलग-अलग अध्ययन किया जाए तो यह कार्य बहुत कठिन होगा। इसलिए वैज्ञानिक समान विशेषताओं वाले जीवों को समूहों में रखते हैं। इससे जीवों की विशाल विविधता का अध्ययन व्यवस्थित और सरल हो जाता है। 

जीवों का वर्गीकरण कैसे करें?

किसी जीव को किसी समूह में रखने के लिए उसकी विभिन्न विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है। वैज्ञानिक पहले व्यापक और आसानी से दिखाई देने वाली विशेषताओं को देखते हैं और फिर अधिक विस्तृत विशेषताओं का अध्ययन करते हैं।

एक ही जीव को अलग-अलग मानदंडों के आधार पर अलग-अलग समूहों में रखा जा सकता है। उदाहरण के लिए, किसी जीव को उसके भोजन, रहने के स्थान या सक्रिय रहने के समय के आधार पर अलग-अलग समूहों में रखा जा सकता है। 

वर्गीकरण के प्रमुख मानदंड

बाह्य विशेषताएँ

परिभाषा: जीव के शरीर की दिखाई देने वाली विशेषताओं को बाह्य विशेषताएँ कहते हैं।

इनमें शरीर का आकार, आमाप और बाहरी शारीरिक संगठन जैसी विशेषताएँ शामिल होती हैं।

पोषण की विधि

परिभाषा: जीव द्वारा भोजन प्राप्त करने के तरीके को उसकी पोषण की विधि कहते हैं।

पोषण के आधार पर जीव स्वपोषी या विषमपोषी हो सकते हैं।

आंतरिक संरचना

परिभाषा: जीव के शरीर के अंदर पाए जाने वाले अंगों, ऊतकों और अन्य संरचनाओं की बनावट को आंतरिक संरचना कहते हैं।

इसमें कंकाल का प्रतिरूप, अंगों की उपस्थिति या अनुपस्थिति तथा विभिन्न प्रकार के ऊतक जैसी विशेषताएँ शामिल होती हैं।

कोशिका संरचना

परिभाषा: जीव की कोशिकाओं की संख्या और उनकी संरचना से संबंधित विशेषताओं को कोशिका संरचना कहते हैं।

  • एककोशिकीय या बहुकोशिकीय
  • प्रोकैरियोटिक या यूकैरियोटिक
  • कोशिका भित्ति की उपस्थिति या अनुपस्थिति

पारिस्थितिकीय भूमिका

परिभाषा: पारिस्थितिक तंत्र में जीव द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका को उसकी पारिस्थितिकीय भूमिका कहते हैं।

जीव पारिस्थितिक तंत्र में उत्पादक, उपभोक्ता या अपघटक की भूमिका निभा सकते हैं।

जनन

परिभाषा: नई संतति उत्पन्न करने की जैविक प्रक्रिया को जनन कहते हैं।

जीवों के वर्गीकरण में उनकी जनन विधियों को भी ध्यान में रखा जा सकता है। इसमें अलैंगिक और लैंगिक जनन जैसी विशेषताएँ शामिल हैं।

आनुवंशिक समानता

परिभाषा: जीवों में पाए जाने वाले वंशागत गुणों की समानता को आनुवंशिक समानता कहा जाता है।

वैज्ञानिक DNA का अध्ययन करके जीवों के बीच आनुवंशिक समानताओं और संबंधों को अधिक विस्तार से समझ सकते हैं। 

समानताएँ और विकासात्मक संबंध

जीवों में पाई जाने वाली समान विशेषताएँ उनके विकासात्मक संबंधों के बारे में जानकारी दे सकती हैं। जिन जीवों में कई समान विशेषताएँ होती हैं, उनके किसी समान पूर्वज से विकसित होने की संभावना का अध्ययन किया जा सकता है। 

वर्गीकरण की आवश्यकता

परिभाषा: जीवों की विशाल विविधता को व्यवस्थित करके उनके अध्ययन, पहचान और पारस्परिक संबंधों को समझने के लिए जीवों को समूहों में बाँटना वर्गीकरण की आवश्यकता को स्पष्ट करता है।

जिस प्रकार हजारों पुस्तकों वाले पुस्तकालय में पुस्तकों को विषय, लेखक या अलग-अलग अनुभागों के आधार पर व्यवस्थित करने से किसी पुस्तक को ढूँढना आसान होता है, उसी प्रकार जीवों का क्रमबद्ध वर्गीकरण उनके अध्ययन को सरल बनाता है। 

जैविक वर्गीकरण के लाभ

  • व्यवस्थित अध्ययन: जीवों के अध्ययन को क्रमबद्ध और सरल बनाता है।
  • समानता और भिन्नता: विभिन्न जीवों के बीच समानताओं और असमानताओं को समझने में सहायता करता है।
  • पारस्परिक संबंध: जीव एक-दूसरे से किस प्रकार संबंधित हैं, यह समझने में सहायता करता है।
  • पहचान और नामकरण: नए खोजे गए जीवों की पहचान और नामकरण में सहायता करता है।
  • संरक्षण: विलुप्त होने के खतरे वाले जीवों की पहचान करके जैव विविधता संरक्षण में सहायता करता है।
  • वैज्ञानिक संचार: पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों के लिए जीवों के बारे में एक समान प्रणाली में चर्चा करना संभव बनाता है। 

Concept Builder

पर्यावरण में परिवर्तन → जीवों में छोटे अंतर → अनुकूलन में सहायता → पीढ़ियों में परिवर्तन → जैव विविधता

जीवों की विशाल विविधता → समानता/भिन्नता का अध्ययन → समूह बनाना → वर्गीकरण

वर्गीकरण के आधार → बाह्य विशेषताएँ + पोषण + आंतरिक संरचना + कोशिका संरचना + पारिस्थितिकीय भूमिका + जनन + आनुवंशिक समानता

वर्गीकरण → पहचान + अध्ययन + संबंधों की समझ + संरक्षण

Exam Booster

  • जैव विविधता का विकास किस प्रकार हुआ? — लंबे समय में हुए परिवर्तनों तथा जीवों और उनके परिवेश के बीच पारस्परिक क्रियाओं के कारण जैव विविधता विकसित हुई।
  • जैविक वर्गीकरण क्या है? — समानताओं और भिन्नताओं के आधार पर जीवों को व्यवस्थित समूहों में बाँटना जैविक वर्गीकरण है।
  • वर्गीकरण के कोई चार आधार लिखिए। — बाह्य विशेषताएँ, पोषण की विधि, कोशिका संरचना और जनन।
  • कोशिका संरचना वर्गीकरण में क्यों महत्वपूर्ण है? — इससे एककोशिकीय/बहुकोशिकीय तथा प्रोकैरियोटिक/यूकैरियोटिक जैसे महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट होते हैं।
  • आनुवंशिक समानता कैसे ज्ञात की जाती है? — DNA में पाए जाने वाले वंशागत गुणों का अध्ययन करके।
  • वर्गीकरण की आवश्यकता क्यों है? — पृथ्वी पर पाए जाने वाले करोड़ों जीवों के व्यवस्थित और सरल अध्ययन के लिए।
  • वर्गीकरण से संरक्षण में कैसे सहायता मिलती है? — इससे विलुप्त होने के खतरे वाले जीवों की पहचान करने और उनके संरक्षण में सहायता मिलती है।
  • क्या एक जीव को एक से अधिक समूहों में रखा जा सकता है? — हाँ, अलग-अलग वर्गीकरण मानदंडों का उपयोग करने पर एक ही जीव अलग-अलग समूहों में रखा जा सकता है।

जीवजगत का स्वरूप: विविधता एवं वर्गीकरण

Class 9 Science Exploration Hindi Updated : 16 August 2026

अध्याय 12. जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण

जीवों की विशाल विविधता को व्यवस्थित करने के लिए वैज्ञानिकों ने समय-समय पर अलग-अलग वर्गीकरण प्रणालियाँ विकसित कीं। नई वैज्ञानिक जानकारी और सूक्ष्मदर्शी तकनीक में सुधार के साथ इन प्रणालियों में भी परिवर्तन होता गया।

जैविक वर्गीकरण प्रणालियों का विकास

जीवों के वर्गीकरण की प्रारंभिक प्रणालियाँ मुख्यतः उनके बाहरी रूप, आवास और दिखाई देने वाले गुणों पर आधारित थीं। बाद में कोशिका संरचना, पोषण तथा अन्य वैज्ञानिक विशेषताओं को भी वर्गीकरण का आधार बनाया गया।

अरस्तू की वर्गीकरण प्रणाली

परिभाषा: जीवों को उनके आवास और बाहरी स्वरूप के आधार पर समूहों में बाँटने वाली प्रारंभिक प्रणाली को अरस्तू की वर्गीकरण प्रणाली कहा जाता है।

लगभग चौथी शताब्दी सामान्य संवत् पूर्व में अरस्तू ने जीवों को मुख्यतः उनके आवास के आधार पर स्थल, जल और वायु के समूहों में बाँटा। उन्होंने जीवों के बाहरी स्वरूप को भी ध्यान में रखा।

इस प्रणाली की मुख्य सीमा यह थी कि यह मुख्यतः आसानी से दिखाई देने वाली बाहरी विशेषताओं पर आधारित थी। इसलिए यह जीवों की वास्तविक जैविक समानताओं और अंतर को पूरी तरह स्पष्ट नहीं कर पाती थी। 

द्विजगत प्रणाली (Two-Kingdom Classification)

परिभाषा: सभी जीवों को प्लांटी और एनिमेलिया दो जगतों में बाँटने वाली वर्गीकरण प्रणाली को द्विजगत प्रणाली कहते हैं।

18वीं शताब्दी में जीवों को दो प्रमुख समूहों में बाँटने की प्रणाली प्रस्तुत की गई। इसमें सभी जीवों को प्लांटी (पादप जगत) और एनिमेलिया (जंतु जगत) में रखा गया।

प्लांटी

इस समूह में ऐसे जीव रखे गए जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर सामान्यतः गमन नहीं करते और अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।

एनिमेलिया

इस समूह में ऐसे जीव रखे गए जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर गमन करते हैं और भोजन के लिए अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं। 

द्विजगत प्रणाली की सीमाएँ

द्विजगत प्रणाली के सामने कई समस्याएँ थीं। अमीबा, पैरामीशियम और जीवाणु जैसे जीवों को केवल पौधे या जन्तु के रूप में रखना कठिन था।

अमीबा और पैरामीशियम गतिशील होते हैं, लेकिन वे एककोशिकीय और विषमपोषी होते हैं। दूसरी ओर पौधे और अधिकांश जन्तु बहुकोशिकीय होते हैं। इसलिए केवल गमन और पोषण के आधार पर इन सभी जीवों का सही वर्गीकरण संभव नहीं था। 

प्रोटिस्टा जगत का समावेश

परिभाषा: मुख्यतः एककोशिकीय सूक्ष्मजीवों को रखने के लिए जोड़ा गया तीसरा जगत प्रोटिस्टा कहलाया।

द्विजगत प्रणाली की सीमाओं को दूर करने के लिए एक नया जगत प्रोटिस्टा जोड़ा गया। इसमें मुख्यतः एककोशिकीय सूक्ष्मजीवों को रखा गया। इससे अमीबा और पैरामीशियम जैसे जीवों को पौधों और जन्तुओं से अलग समूह में रखने की सुविधा मिली। 

मोनेरा जगत का समावेश

परिभाषा: ऐसे एककोशिकीय जीव जिनमें झिल्ली से घिरा वास्तविक केंद्रक नहीं होता, उन्हें मोनेरा जगत में रखा गया।

सूक्ष्मदर्शी तकनीक में सुधार होने पर वैज्ञानिकों ने पाया कि अमीबा जैसे जीवों में झिल्ली से घिरा वास्तविक केंद्रक होता है, जबकि जीवाणुओं में ऐसा केंद्रक नहीं होता। इसलिए दोनों प्रकार के एककोशिकीय जीवों में महत्वपूर्ण अंतर पाया गया।

इस अंतर के आधार पर जीवाणुओं को मोनेरा नामक अलग जगत में रखा गया। इससे चार-जगत वर्गीकरण प्रणाली अस्तित्व में आई—मोनेरा, प्रोटिस्टा, प्लांटी और एनिमेलिया। 

फंजाई को अलग जगत का दर्जा

परिभाषा: कवक जैसे विषमपोषी जीवों को अलग समूह में रखने वाली वर्गीकरण व्यवस्था में फंजाई एक स्वतंत्र जगत है।

मशरूम जैसे कवक पौधों की तरह सामान्यतः एक स्थान पर रहते हैं, लेकिन वे पौधों की तरह अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते। वे विषमपोषी होते हैं और अवशोषण द्वारा पोषक पदार्थ प्राप्त करते हैं। कुछ कवक मृत और सड़े-गले पदार्थों से पोषण प्राप्त करते हैं, जबकि कुछ सहजीवी या परजीवी होते हैं।

इन विशेषताओं के कारण कवकों को पौधों से अलग करके एक स्वतंत्र जगत फंजाई में रखा गया। 

पाँच-जगत वर्गीकरण प्रणाली

परिभाषा: जीवों को मोनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी और एनिमेलिया पाँच जगतों में बाँटने वाली प्रणाली को पाँच-जगत वर्गीकरण प्रणाली कहते हैं।

कवकों को अलग जगत में रखने के बाद पाँच-जगत वर्गीकरण प्रणाली अस्तित्व में आई। इसमें जीवों को उनकी कोशिका संरचना, पोषण और अन्य विशेषताओं के आधार पर पाँच प्रमुख जगतों में व्यवस्थित किया गया।

  • मोनेरा — मुख्यतः एककोशिकीय प्रोकैरियोटिक जीव।
  • प्रोटिस्टा — मुख्यतः एककोशिकीय यूकैरियोटिक जीव।
  • फंजाई — मुख्यतः विषमपोषी कवक।
  • प्लांटी — मुख्यतः स्वपोषी पादप।
  • एनिमेलिया — मुख्यतः बहुकोशिकीय विषमपोषी जन्तु।

अध्याय के अनुसार रॉबर्ट एच. व्हिटेकर ने वर्ष 1969 में पाँच-जगत प्रणाली में जीवों को मोनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी और एनिमेलिया में समूहित किया। 

वर्गीकरण प्रणालियों का क्रम

वर्गीकरण प्रणाली मुख्य विशेषता वर्ष
अरस्तू की प्रणाली आवास और बाहरी स्वरूप के आधार पर वर्गीकरण लगभग चौथी शताब्दी सामान्य संवत् पूर्व
द्विजगत प्रणाली प्लांटी और एनिमेलिया 1758
तीन-जगत प्रणाली प्रोटिस्टा को शामिल किया गया 1866
चार-जगत प्रणाली मोनेरा, प्रोटिस्टा, प्लांटी और एनिमेलिया 1938
पाँच-जगत प्रणाली मोनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी और एनिमेलिया 1969

वर्गीकरण प्रणालियों का यह विकास दर्शाता है कि नई वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त होने पर जीवों को समझने और वर्गीकृत करने के तरीके भी अधिक विकसित होते गए। 

Concept Builder

अरस्तू → आवास और बाहरी स्वरूप

द्विजगत → प्लांटी + एनिमेलिया

तीन जगत → प्लांटी + एनिमेलिया + प्रोटिस्टा

चार जगत → मोनेरा + प्रोटिस्टा + प्लांटी + एनिमेलिया

पाँच जगत → मोनेरा + प्रोटिस्टा + फंजाई + प्लांटी + एनिमेलिया

Exam Booster

  • अरस्तू ने जीवों का वर्गीकरण किस आधार पर किया? — मुख्यतः आवास और बाहरी स्वरूप के आधार पर।
  • द्विजगत प्रणाली में कौन-कौन से जगत थे? — प्लांटी और एनिमेलिया।
  • द्विजगत प्रणाली की एक प्रमुख सीमा क्या थी? — अमीबा, पैरामीशियम और जीवाणु जैसे एककोशिकीय जीवों को उचित समूह में रखना कठिन था।
  • प्रोटिस्टा जगत क्यों जोड़ा गया? — मुख्यतः एककोशिकीय सूक्ष्मजीवों को अलग समूह में रखने के लिए।
  • जीवाणुओं को मोनेरा में क्यों रखा गया? — उनमें झिल्ली से घिरा वास्तविक केंद्रक नहीं पाया जाता।
  • कवकों को अलग जगत क्यों बनाया गया? — वे पौधों की तरह अचल हो सकते हैं, लेकिन विषमपोषी होते हैं और अवशोषण द्वारा पोषण प्राप्त करते हैं।
  • पाँच-जगत वर्गीकरण प्रणाली में कितने जगत हैं? — पाँच।
  • पाँच-जगत के नाम लिखिए। — मोनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी और एनिमेलिया।
  • पाँच-जगत वर्गीकरण प्रणाली किसने और कब प्रस्तुत की? — रॉबर्ट एच. व्हिटेकर ने 1969 में।
  • वर्गीकरण प्रणालियों में समय के साथ परिवर्तन क्यों हुए? — नई वैज्ञानिक जानकारी और जीवों की कोशिका संरचना तथा अन्य विशेषताओं की बेहतर समझ विकसित होने के कारण।

जीवजगत का स्वरूप: विविधता एवं वर्गीकरण

Class 9 Science Exploration Hindi Updated : 16 August 2026

अध्याय 12. जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण

पाँच-जगत वर्गीकरण में जीवों को उनकी कोशिका संरचना, संगठन के स्तर, पोषण की विधि और पारिस्थितिकीय भूमिका जैसी विशेषताओं के आधार पर पाँच प्रमुख जगतों में बाँटा जाता है। इस page में मोनेरा, प्रोटिस्टा और फंजाई का अध्ययन करेंगे।

पाँच-जगत वर्गीकरण

परिभाषा: जीवों को मोनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी और एनिमेलिया पाँच प्रमुख जगतों में बाँटने वाली वर्गीकरण प्रणाली को पाँच-जगत वर्गीकरण कहते हैं।

पाँच-जगत वर्गीकरण में कोशिका का प्रकार, कोशिका संरचना, संगठन का स्तर, पोषण की विधि और पारिस्थितिकीय भूमिका जैसे मानदंडों का उपयोग किया जाता है।

  • कोशिका का प्रकार: प्रोकैरियोटिक या यूकैरियोटिक।
  • संगठन का स्तर: एककोशिकीय या बहुकोशिकीय।
  • कोशिका संरचना: कोशिका भित्ति उपस्थित है या अनुपस्थित तथा कोशिका भित्ति की प्रकृति।
  • पोषण की विधि: स्वपोषी या विषमपोषी।
  • पारिस्थितिकीय भूमिका: उत्पादक, उपभोक्ता या अपघटक।

जगत मोनेरा (Monera)

परिभाषा: मुख्यतः एककोशिकीय प्रोकैरियोटिक जीवों के समूह को मोनेरा जगत कहते हैं।

मोनेरा के जीवों में झिल्ली से घिरा वास्तविक केंद्रक नहीं होता। जीवाणु, आर्किया और सायनोबैक्टीरिया इस समूह में शामिल किए जाते हैं।

मोनेरा की प्रमुख विशेषताएँ

  • मुख्यतः एककोशिकीय होते हैं।
  • इनमें प्रोकैरियोटिक कोशिका होती है।
  • इनमें झिल्ली से घिरा वास्तविक केंद्रक नहीं होता।
  • ये विभिन्न प्रकार के वातावरण में पाए जा सकते हैं।
  • कुछ मोनेरन जीव स्वपोषी होते हैं और कुछ विषमपोषी।
  • कुछ जीवाणु लाभदायक होते हैं, जबकि कुछ रोगजनक भी हो सकते हैं।

मोनेरा के उदाहरण

जीवाणु, आर्किया और सायनोबैक्टीरिया (नील-हरित शैवाल) मोनेरा के प्रमुख उदाहरण हैं।

मोनेरा का महत्त्व

  • लाभदायक जीवाणु: लैक्टोबैसिलस और राइजोबियम जैसे जीवाणु उपयोगी कार्य करते हैं।
  • अपघटन: कुछ जीवाणु जैव पदार्थों के अपघटन में सहायता करते हैं।
  • पोषक चक्रण: जीवाणु पोषक तत्वों के चक्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • प्रदूषक अपघटन: कुछ जीवाणु तेल, कीटनाशक और वाहित मल जैसे प्रदूषकों को विघटित कर सकते हैं।
  • हानिकारक जीवाणु: कुछ जीवाणु रोग उत्पन्न करते हैं। 

सायनोबैक्टीरिया का महत्त्व

सायनोबैक्टीरिया प्रकाश संश्लेषण द्वारा ऑक्सीजन के उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। इनके प्राचीन जीवाश्म स्ट्रोमेटोलाइट्स में पाए गए हैं, जो पृथ्वी पर जीवन के प्राचीन प्रमाणों में शामिल हैं। 

जगत प्रोटिस्टा (Protista)

परिभाषा: मुख्यतः एककोशिकीय यूकैरियोटिक जीवों के समूह को प्रोटिस्टा जगत कहते हैं।

प्रोटिस्टा के जीवों में झिल्ली से घिरा वास्तविक केंद्रक होता है। ये सामान्यतः सूक्ष्मदर्शीय और अत्यंत विविध होते हैं तथा मुख्यतः जल या नम स्थानों में पाए जाते हैं।

प्रोटिस्टा की प्रमुख विशेषताएँ

  • मुख्यतः एककोशिकीय होते हैं।
  • इनमें यूकैरियोटिक कोशिका होती है।
  • इनमें झिल्ली से घिरा वास्तविक केंद्रक होता है।
  • कुछ प्रोटिस्ट स्वपोषी होते हैं।
  • कुछ प्रोटिस्ट विषमपोषी होते हैं।
  • ये सामान्यतः जल या नम स्थानों में पाए जाते हैं।
  • कुछ प्रोटिस्ट अपघटक के रूप में कार्य करते हैं और पोषक तत्वों के चक्रण में सहायता करते हैं।

प्रोटिस्टा के उदाहरण

अमीबा, पैरामीशियम, यूग्लीना और क्लैमाइडोमोनास प्रोटिस्टा के उदाहरण हैं। 

प्रोटिस्टा का पारिस्थितिक महत्त्व

प्रोटिस्ट जलीय आहार श्रृंखलाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कुछ प्रोटिस्ट ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं, जबकि कुछ छोटे जीवों के भोजन का स्रोत बनते हैं। कुछ अपघटक के रूप में कार्य करके पोषक तत्वों के चक्रण में सहायता करते हैं। 

जगत फंजाई (Fungi)

परिभाषा: मुख्यतः बहुकोशिकीय, यूकैरियोटिक, विषमपोषी और काइटिन की कोशिका भित्ति वाले जीवों के समूह को फंजाई जगत कहते हैं।

कवक अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते। वे मृत या सड़ रहे पदार्थों से पोषक तत्वों को महीन तंतुओं के माध्यम से अवशोषित करते हैं। ये तंतु मिलकर कवक जाल (Mycelium) बनाते हैं। 

फंजाई की प्रमुख विशेषताएँ

  • अधिकांश कवक बहुकोशिकीय होते हैं।
  • इनकी कोशिकाएँ यूकैरियोटिक होती हैं।
  • इनकी कोशिका भित्ति काइटिन की बनी होती है।
  • ये विषमपोषी होते हैं।
  • ये अवशोषण द्वारा पोषक पदार्थ प्राप्त करते हैं।
  • अधिकांश कवक मृत और सड़े-गले पदार्थों से पोषण प्राप्त करते हैं।
  • कुछ कवक सहजीवी होते हैं और कुछ परजीवी।
  • कुछ कवक पौधों और जन्तुओं में रोग उत्पन्न कर सकते हैं।
  • कवक सामान्यतः गर्म और नम परिस्थितियों में अच्छी तरह वृद्धि करते हैं।
  • कवक लैंगिक और अलैंगिक दोनों प्रकार से जनन कर सकते हैं।

कवक का पारिस्थितिक महत्त्व

कवक महत्वपूर्ण अपघटक हैं। वे जटिल कार्बनिक पदार्थों को सरल पदार्थों में बदलते हैं और पोषक तत्वों को मिट्टी में वापस उपलब्ध कराने में सहायता करते हैं। इससे पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण होता है। 

कवक के उदाहरण

  • यीस्ट: एककोशिकीय कवक है, लेकिन इसकी कोशिका भित्ति काइटिन की होने के कारण इसे फंजाई में रखा जाता है।
  • ब्रेड मोल्ड: सामान्य कवक का उदाहरण है।
  • मशरूम: स्थूलदर्शीय कवक है और बीजाणुओं द्वारा जनन करता है।
  • एस्पर्जिलस: कुछ प्रजातियों का उपयोग एंजाइम और प्रतिजैविक दवाएँ बनाने में किया जाता है।
  • पेनिसिलियम: कुछ प्रजातियाँ प्रतिजैविक दवाओं के निर्माण में उपयोगी हैं। 

मोनेरा, प्रोटिस्टा और फंजाई में अंतर

आधार मोनेरा प्रोटिस्टा फंजाई
कोशिका प्रकार प्रोकैरियोटिक यूकैरियोटिक यूकैरियोटिक
कोशिकाओं की संख्या मुख्यतः एककोशिकीय मुख्यतः एककोशिकीय मुख्यतः बहुकोशिकीय
केंद्रक वास्तविक केंद्रक अनुपस्थित वास्तविक केंद्रक उपस्थित वास्तविक केंद्रक उपस्थित
पोषण स्वपोषी या विषमपोषी स्वपोषी या विषमपोषी विषमपोषी
कोशिका भित्ति उपस्थित या अन्य प्रकार कुछ में अनुपस्थित/कुछ में सेलुलोज काइटिन

Concept Builder

पाँच-जगत → मोनेरा + प्रोटिस्टा + फंजाई + प्लांटी + एनिमेलिया

मोनेरा → एककोशिकीय + प्रोकैरियोटिक + वास्तविक केंद्रक अनुपस्थित

प्रोटिस्टा → मुख्यतः एककोशिकीय + यूकैरियोटिक + वास्तविक केंद्रक उपस्थित

फंजाई → मुख्यतः बहुकोशिकीय + यूकैरियोटिक + विषमपोषी + काइटिन कोशिका भित्ति

कवक → अपघटन → पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण

Exam Booster

  • पाँच-जगत वर्गीकरण के प्रमुख आधार क्या हैं? — कोशिका का प्रकार, कोशिका संरचना, संगठन का स्तर, पोषण की विधि और पारिस्थितिकीय भूमिका।
  • मोनेरा के जीव किस प्रकार की कोशिका वाले होते हैं? — प्रोकैरियोटिक कोशिका वाले।
  • मोनेरा के दो उदाहरण लिखिए। — जीवाणु और सायनोबैक्टीरिया।
  • प्रोटिस्टा के जीवों की प्रमुख विशेषता क्या है? — वे मुख्यतः एककोशिकीय यूकैरियोटिक जीव होते हैं।
  • प्रोटिस्टा के चार उदाहरण लिखिए। — अमीबा, पैरामीशियम, यूग्लीना और क्लैमाइडोमोनास।
  • फंजाई की कोशिका भित्ति किसकी बनी होती है? — काइटिन की।
  • कवक अपना भोजन कैसे प्राप्त करते हैं? — पोषक पदार्थों को अवशोषित करके।
  • कवक पारिस्थितिक तंत्र में किस भूमिका के लिए महत्त्वपूर्ण हैं? — अपघटक के रूप में।
  • यीस्ट को फंजाई में क्यों रखा जाता है? — क्योंकि इसकी कोशिका भित्ति काइटिन की बनी होती है।
  • पाँच-जगत में फंजाई को अलग क्यों रखा गया? — क्योंकि कवक पौधों की तरह अचल हो सकते हैं, लेकिन अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते और विषमपोषी पोषण द्वारा भोजन प्राप्त करते हैं।

जीवजगत का स्वरूप: विविधता एवं वर्गीकरण

Class 9 Science Exploration Hindi Updated : 16 August 2026

अध्याय 12. जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण

पादप जगत में मुख्यतः बहुकोशिकीय, स्वपोषी और यूकैरियोटिक जीव शामिल होते हैं। पादप प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन बनाते हैं और पृथ्वी के अधिकांश आहार जालों का आधार तैयार करते हैं। पादप जगत को थैलोफाइटा, ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म पाँच प्रमुख वर्गों में बाँटा गया है।

जगत प्लांटी (Plantae)

परिभाषा: मुख्यतः बहुकोशिकीय, स्वपोषी और यूकैरियोटिक जीवों के समूह को प्लांटी या पादप जगत कहते हैं।

  • पादप बहुकोशिकीय होते हैं।
  • इनकी कोशिकाएँ यूकैरियोटिक होती हैं।
  • इनकी कोशिका भित्ति मुख्यतः सेलुलोज की बनी होती है।
  • ये सामान्यतः प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।
  • पादप अधिकांश आहार श्रृंखलाओं का आधार होते हैं।
  • ये प्रकाश संश्लेषण के दौरान ऑक्सीजन छोड़ते हैं।

पादप जगत के पाँच वर्ग

प्लांटी → थैलोफाइटा → ब्रायोफाइटा → टेरिडोफाइटा → जिम्नोस्पर्म → एंजियोस्पर्म

थैलोफाइटा (Thallophyta) — आद्य पौधे

परिभाषा: सरल शरीर-संरचना वाले आद्य पादप, जिनका शरीर स्पष्ट जड़, तना और पत्तियों में विभेदित नहीं होता, थैलोफाइटा कहलाते हैं।

थैलोफाइट को सामान्यतः शैवाल के रूप में जाना जाता है। ये अधिकतर जल या नम वातावरण में पाए जाते हैं। इनके शरीर को थैलस कहा जाता है। थैलस एक सरल संरचना है, जिसके माध्यम से जल, पोषक तत्वों और गैसों का आदान-प्रदान होता है।

उदाहरण: स्पाइरोगाइरा।

  • शरीर सरल और थैलस जैसा होता है।
  • स्पष्ट जड़, तना और पत्तियाँ नहीं होतीं।
  • अधिकांश जल या नम स्थानों में पाए जाते हैं।
  • जल इनके जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • सरल शरीर-संरचना इन्हें जलीय पर्यावरण में रहने में सहायता करती है।

लाइकेन

लाइकेन दो जीवों के बीच सहजीवी संबंध का उदाहरण है। इसमें एक भागीदार स्वपोषी शैवाल और दूसरा विषमपोषी कवक होता है। शैवाल प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन प्रदान करता है, जबकि कवक सुरक्षा प्रदान करता है।

लाइकेन का उपयोग वायु की गुणवत्ता के प्राकृतिक जैव संकेतक के रूप में भी किया जा सकता है क्योंकि कुछ लाइकेन वायु प्रदूषकों के अनुसार अपना रंग बदलते हैं। कुछ लाइकेन मसाले, औषधि और रंग बनाने में भी उपयोग किए जाते हैं। 

ब्रायोफाइटा (Bryophyta) — पादप जगत के उभयचर

परिभाषा: ऐसे सरल स्थलीय पादप जो भूमि पर रहते हैं लेकिन जनन के लिए जल पर निर्भर रहते हैं, ब्रायोफाइटा कहलाते हैं।

ब्रायोफाइट जल से स्थल पर पादपों के संक्रमण को दर्शाते हैं। इनमें थैलोफाइटा की तुलना में शरीर अधिक विभेदित होता है। इनमें जड़ों जैसी संरचनाएँ मूलाभास (Rhizoids) कहलाती हैं। कुछ में तने और पत्तियों जैसी सरल संरचनाएँ भी पाई जाती हैं।

उदाहरण: मॉस और मार्केंशिया।

  • नम और छायादार स्थानों में पाए जाते हैं।
  • इनका शरीर थैलोफाइटा की तुलना में अधिक विभेदित होता है।
  • वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ स्पष्ट रूप से विकसित नहीं होतीं।
  • मूलाभास जैसी संरचनाएँ पाई जाती हैं।
  • इनमें जल और भोजन के परिवहन के लिए विकसित संवहनी ऊतक नहीं होते।
  • जनन के लिए जल आवश्यक होता है।

उभयचर क्यों कहलाते हैं? ब्रायोफाइट भूमि पर रहते हैं, लेकिन जनन के लिए जल पर निर्भर रहते हैं। इसलिए इन्हें पादप जगत का उभयचर कहा जाता है। 

टेरिडोफाइटा (Pteridophyta) — संवहनी ऊतक वाले पौधे

परिभाषा: ऐसे पादप जिनमें वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ तथा जल और भोजन के परिवहन के लिए संवहनी ऊतक पाए जाते हैं, टेरिडोफाइटा कहलाते हैं।

फर्न टेरिडोफाइट का सामान्य उदाहरण है। इन पौधों में शरीर का संगठन ब्रायोफाइटा की तुलना में अधिक विकसित होता है। इनमें जाइलम और फ्लोएम जैसे संवहनी ऊतक पाए जाते हैं।

  • वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ होती हैं।
  • जाइलम और फ्लोएम उपस्थित होते हैं।
  • जाइलम जल का परिवहन करता है।
  • फ्लोएम भोजन का परिवहन करता है।
  • ये स्थल पर रहते हैं।
  • जनन के लिए अभी भी जल की आवश्यकता होती है।
  • ये बीज उत्पन्न नहीं करते।

उदाहरण: फर्न। 

जिम्नोस्पर्म (Gymnosperms) — अनावृत बीजी पौधे

परिभाषा: ऐसे बीजधारी पादप जिनके बीज फल के अंदर बंद नहीं होते बल्कि सामान्यतः शंकुओं पर खुले रूप में पाए जाते हैं, जिम्नोस्पर्म कहलाते हैं।

जिम्नोस्पर्म ठंडे और शुष्क क्षेत्रों के लिए अनुकूलित होते हैं। इनकी सुई या शल्क जैसी पत्तियाँ जल की हानि को कम करती हैं। इनके बीज विकसित होते हुए भ्रूण की रक्षा करते हैं और उनमें भोजन संचित रहता है।

उदाहरण: चीड़ (Pine) और साइकैड।

  • स्थलीय पादप होते हैं।
  • इनकी पत्तियाँ प्रायः सुई जैसी होती हैं।
  • पत्तियाँ जल की हानि को कम करने में सहायता करती हैं।
  • बीज बनाते हैं।
  • बीज फल के अंदर बंद नहीं होते।
  • बीज सामान्यतः शंकुओं पर अनावृत रहते हैं।
  • निषेचन के लिए जल की आवश्यकता नहीं होती।
  • शुष्क परिस्थितियों के प्रति अनुकूलन पाया जाता है।

मुख्य विकासात्मक महत्त्व: जिम्नोस्पर्म में जनन के लिए जल पर निर्भरता कम हो गई और बीजों ने विकसित होते भ्रूण की सुरक्षा तथा भोजन के भंडारण में सहायता की। 

एंजियोस्पर्म (Angiosperms) — आवृतबीजी एवं पुष्पीय पौधे

परिभाषा: ऐसे पादप जो पुष्प और फल बनाते हैं तथा जिनके बीज फल के अंदर आवरित रहते हैं, एंजियोस्पर्म कहलाते हैं।

एंजियोस्पर्म सबसे अधिक विविधता वाला पादप समूह है। इनमें जड़, तना और पत्तियाँ सुविकसित होती हैं। ये पुष्पों के माध्यम से लैंगिक जनन करते हैं। इनके फल बीजों को सुरक्षा प्रदान करते हैं और बीजों को नए स्थानों तक फैलाने में सहायता करते हैं।

  • जड़, तना और पत्तियाँ सुविकसित होती हैं।
  • पुष्प बनाते हैं।
  • पुष्पों के माध्यम से लैंगिक जनन करते हैं।
  • फल और बीज उत्पन्न करते हैं।
  • बीज फल के अंदर आवरित रहते हैं।
  • बीजों का प्रकीर्णन कीटों, पक्षियों, जन्तुओं, वायु या जल द्वारा हो सकता है।
  • इनमें पादप शरीर और जनन तंत्र अधिक विकसित होता है।
  • ये विभिन्न प्रकार के पर्यावरणों में सफलतापूर्वक रह सकते हैं।

उदाहरण: गुलमोहर और अन्य पुष्पीय पौधे। 

पादप वर्गों में क्रमिक विकास

थैलोफाइटा से एंजियोस्पर्म तक पादपों की संरचना और जनन में क्रमिक परिवर्तन दिखाई देते हैं। प्रारंभिक पादप जल पर अधिक निर्भर थे। बाद के पादपों में संवहनी ऊतक, बीज और पुष्प जैसे अनुकूलन विकसित हुए, जिससे वे विभिन्न स्थलीय परिस्थितियों में अधिक सफलतापूर्वक रह सके। 

वर्ग मुख्य विशेषता जल पर निर्भरता बीज
थैलोफाइटा सरल थैलस शरीर अधिक नहीं
ब्रायोफाइटा मूलाभास; सरल शरीर जनन के लिए आवश्यक नहीं
टेरिडोफाइटा जड़, तना, पत्ती और संवहनी ऊतक जनन के लिए आवश्यक नहीं
जिम्नोस्पर्म अनावृत बीज निषेचन के लिए आवश्यक नहीं हाँ
एंजियोस्पर्म पुष्प, फल और आवृत बीज निषेचन के लिए आवश्यक नहीं हाँ

Concept Builder

थैलोफाइटा → सरल थैलस शरीर → मुख्यतः जल/नम वातावरण

ब्रायोफाइटा → भूमि पर जीवन + जनन के लिए जल → पादप जगत के उभयचर

टेरिडोफाइटा → वास्तविक जड़, तना, पत्ती + जाइलम/फ्लोएम → बीज नहीं

जिम्नोस्पर्म → बीज + बीज अनावृत + निषेचन के लिए जल आवश्यक नहीं

एंजियोस्पर्म → पुष्प + फल + आवृत बीज → सबसे अधिक विविध पादप समूह

Exam Booster

  • प्लांटी की मुख्य विशेषता क्या है? — बहुकोशिकीय, स्वपोषी, यूकैरियोटिक जीव तथा मुख्यतः सेलुलोज की कोशिका भित्ति।
  • पादप जगत के पाँच वर्ग कौन-से हैं? — थैलोफाइटा, ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म।
  • थैलोफाइटा का शरीर क्या कहलाता है? — थैलस।
  • ब्रायोफाइटा को पादप जगत का उभयचर क्यों कहते हैं? — क्योंकि वे भूमि पर रहते हैं लेकिन जनन के लिए जल पर निर्भर रहते हैं।
  • टेरिडोफाइटा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता क्या है? — इनमें वास्तविक जड़, तना, पत्तियाँ तथा जाइलम और फ्लोएम जैसे संवहनी ऊतक होते हैं।
  • टेरिडोफाइटा बीज क्यों नहीं बनाते? — इस वर्ग में बीज निर्माण नहीं होता; ये जनन के लिए जल पर निर्भर रहते हैं।
  • जिम्नोस्पर्म को अनावृत बीजी क्यों कहते हैं? — क्योंकि इनके बीज फल के अंदर बंद नहीं होते और सामान्यतः शंकुओं पर खुले रहते हैं।
  • जिम्नोस्पर्म की पत्तियाँ कैसी होती हैं? — प्रायः सुई या शल्क जैसी, जो जल की हानि कम करने में सहायता करती हैं।
  • एंजियोस्पर्म को आवृतबीजी क्यों कहते हैं? — क्योंकि इनके बीज फल के अंदर आवरित रहते हैं।
  • एंजियोस्पर्म की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए। — पुष्प और फल का निर्माण तथा फल के अंदर आवरित बीज।
  • पादपों के विकास में सबसे बड़ा परिवर्तन क्या दिखाई देता है? — जल पर निर्भरता में कमी, संवहनी ऊतकों का विकास, बीज का विकास और अंततः पुष्प तथा फल का विकास।

जीवजगत का स्वरूप: विविधता एवं वर्गीकरण

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अध्याय 12. जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण

जन्तु जगत में बहुकोशिकीय, विषमपोषी और यूकैरियोटिक जीव शामिल होते हैं। जन्तुओं का वर्गीकरण मुख्यतः उनकी शरीर संरचना और पृष्ठरज्जु की उपस्थिति या अनुपस्थिति जैसे आधारों पर किया जाता है। पृष्ठरज्जु के आधार पर जन्तुओं को नॉन-कॉर्डेटा और कॉर्डेटा में बाँटा जाता है।

जगत एनिमेलिया (Animalia)

परिभाषा: बहुकोशिकीय, विषमपोषी और यूकैरियोटिक जन्तुओं के समूह को एनिमेलिया या जन्तु जगत कहते हैं।

  • जन्तु बहुकोशिकीय होते हैं।
  • इनकी कोशिकाएँ यूकैरियोटिक होती हैं।
  • ये विषमपोषी होते हैं और भोजन के लिए अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं।
  • अधिकांश जन्तुओं में गति करने की क्षमता होती है।
  • अधिकांश जन्तु उद्दीपन के प्रति तीव्र प्रतिक्रिया करते हैं।
  • इनमें भोजन की खोज, शिकारी से बचने और पर्यावरण के साथ सक्रिय संपर्क बनाए रखने की क्षमता होती है।

पृष्ठरज्जु के आधार पर जन्तुओं का वर्गीकरण

परिभाषा: पृष्ठरज्जु एक लचीली छड़ाकार संरचना है, जो जन्तुओं के शरीर को आंतरिक सहारा प्रदान करती है।

पृष्ठरज्जु की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर जन्तुओं को दो प्रमुख समूहों में बाँटा जाता है।

  • नॉन-कॉर्डेटा: जिनमें पृष्ठरज्जु नहीं होती।
  • कॉर्डेटा: जिनमें जीवन की किसी अवस्था में पृष्ठरज्जु पाई जाती है।

कॉर्डेटा को आगे प्रोटोकॉर्डेटा और वर्टिब्रेटा में विभाजित किया जाता है। 

नॉन-कॉर्डेटा (Non-Chordata)

परिभाषा: ऐसे जन्तु जिनमें पृष्ठरज्जु नहीं होती, नॉन-कॉर्डेटा या अकशेरुकी जन्तु कहलाते हैं।

अकशेरुकी जन्तुओं में शरीर संरचना की बहुत अधिक विविधता पाई जाती है। सरल कोशिकीय संगठन से लेकर जटिल अंग-तंत्र तक इनके शरीर संगठन में क्रमिक विकास दिखाई देता है।

पोरीफेरा (Porifera) — छिद्रधारी जीव

परिभाषा: ऐसे सरल बहुकोशिकीय जलीय जन्तु जिनके शरीर में अनेक छोटे-छोटे छिद्र और नाल पाए जाते हैं, पोरीफेरा कहलाते हैं।

स्पंज पोरीफेरा का प्रमुख उदाहरण है। इनके शरीर में अनेक छिद्र होते हैं जिनसे जल लगातार अंदर आता है। यह जल भोजन के कण और ऑक्सीजन कोशिकाओं तक पहुँचाता है तथा अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने में सहायता करता है।

  • बहुकोशिकीय होते हैं।
  • इनमें ऊतक और अंगों का स्पष्ट संगठन नहीं होता।
  • शरीर में अनेक छोटे-छोटे छिद्र और नाल होते हैं।
  • मुख्यतः जलीय वातावरण में पाए जाते हैं।
  • एक ही स्थान पर स्थिर रहते हैं।

उदाहरण: स्पंज। 

नाइडेरिया (Cnidaria) — वास्तविक ऊतक वाले जन्तु

परिभाषा: ऐसे जलीय जन्तु जिनमें ऊतक-स्तरीय संगठन तथा शिकार पकड़ने के लिए विशेष कोशिकाएँ पाई जाती हैं, नाइडेरिया कहलाते हैं।

हाइड्रा, जेलीफिश और कोरल नाइडेरिया के उदाहरण हैं। इनमें पोरीफेरा की तुलना में शरीर संगठन अधिक विकसित होता है। ये केवल जल के प्रवाह पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि स्पर्श द्वारा शिकार पकड़ सकते हैं।

  • ऊतक-स्तरीय संगठन पाया जाता है।
  • विशेषीकृत कोशिकाएँ विशेष कार्य करती हैं।
  • शिकार को सक्रिय रूप से पकड़ सकते हैं।
  • शरीर में एक ही छिद्र होता है।
  • यही छिद्र भोजन के अंतर्ग्रहण और अपशिष्ट निष्कासन दोनों का कार्य करता है।

उदाहरण: हाइड्रा, जेलीफिश और कोरल। 

प्लैटीहेल्मिन्थीस (Platyhelminthes) — चपटे कृमि

परिभाषा: चपटे शरीर वाले ऐसे जन्तु जिनमें द्विपार्श्व सममिति और दिशात्मक गति की क्षमता दिखाई देती है, प्लैटीहेल्मिन्थीस कहलाते हैं।

इनका शरीर एक तल द्वारा दो समान भागों में बाँटा जा सकता है। शरीर में सिर और पूँछ तथा आगे और पीछे के भाग स्पष्ट होते हैं। यह शरीर संगठन दिशात्मक गति के बेहतर समन्वय में सहायता करता है।

  • शरीर चपटा होता है।
  • द्विपार्श्व सममिति पाई जाती है।
  • सिर और पूँछ का विभेदन दिखाई देता है।
  • विशेषीकृत श्वसन अंग नहीं होते।
  • गैसों का आदान-प्रदान शरीर की सतह से हो सकता है।
  • कुछ चपटे कृमि परजीवी जीवन-शैली अपनाते हैं।
  • परजीवी रूपों में हुक और चूषक पाए जा सकते हैं।

परजीवी कृमियों से बचाव: स्वच्छता बनाए रखना, हाथ अच्छी तरह धोना, भोजन को अच्छी तरह पकाना और स्वच्छ जल का सेवन करना आवश्यक है। 

नेमाटोडा (Nematoda) — गोल कृमि

परिभाषा: लंबे और बेलनाकार शरीर वाले ऐसे कृमि जिनके शरीर में दो छिद्र—मुख और गुदा—होते हैं, नेमाटोडा कहलाते हैं।

गोल कृमियों का बेलनाकार शरीर उन्हें मिट्टी, जल या परपोषी के ऊतकों में आसानी से गति करने में सहायता करता है। इनके शरीर में भोजन के प्रवेश और अपशिष्ट के निष्कासन के लिए अलग-अलग छिद्र होते हैं।

  • शरीर लंबा और बेलनाकार होता है।
  • विभिन्न वातावरणों में पाए जा सकते हैं।
  • मिट्टी, जल या परपोषी के शरीर में रह सकते हैं।
  • शरीर में दो छिद्र होते हैं—मुख और गुदा।
  • कुछ प्रजातियाँ परजीवी होती हैं।

अलग-अलग वातावरण में गति करने के लिए इनका बेलनाकार शरीर उपयोगी होता है। 

ऐनेलिडा (Annelida) — खंडित कृमि

परिभाषा: ऐसे जन्तु जिनका बेलनाकार शरीर स्पष्ट खंडों में विभाजित होता है, ऐनेलिडा कहलाते हैं।

केंचुआ ऐनेलिडा का प्रमुख उदाहरण है। इनके शरीर में खंडीभवन पाया जाता है। यह शरीर को अधिक लचीला बनाता है और गति पर बेहतर नियंत्रण प्रदान करता है। इनमें अंग-तंत्र स्तर का संगठन और देहगुहा भी पाई जाती है।

  • शरीर बेलनाकार होता है।
  • शरीर अनेक खंडों में विभाजित होता है।
  • खंडीभवन गति में सहायता करता है।
  • पेशियाँ गति करने में सहायता करती हैं।
  • तंत्रिका रज्जु नियंत्रण और समन्वय में सहायता करती है।
  • देहगुहा उपस्थित होती है।

उदाहरण: केंचुआ। 

आर्थ्रोपोडा (Arthropoda) — संधिपाद जीव

परिभाषा: ऐसे जन्तु जिनके शरीर में खंडित उपांग और कठोर बाह्यकंकाल पाए जाते हैं, आर्थ्रोपोडा कहलाते हैं।

कीट, केकड़े और मकड़ियाँ आर्थ्रोपोडा के उदाहरण हैं। इनके शरीर के विभिन्न खंड अलग-अलग कार्यों के लिए विशिष्ट हो सकते हैं।

  • शरीर खंडित होता है।
  • संधित उपांग पाए जाते हैं।
  • कठोर बाह्यकंकाल उपस्थित होता है।
  • बाह्यकंकाल शरीर को सुरक्षा देता है।
  • यह जल की हानि को कम करता है।
  • यह मांसपेशियों को सहारा प्रदान करता है।
  • इससे ये अपेक्षाकृत शुष्क और कठिन वातावरण में भी जीवित रह सकते हैं।

उदाहरण: कीट, केकड़े और मकड़ियाँ। 

मोलस्का (Mollusca) — कोमल शरीर वाले जीव

परिभाषा: ऐसे जन्तु जिनका शरीर मुख्यतः कोमल होता है और जिनमें अंग-तंत्र स्तर का संगठन पाया जाता है, मोलस्का कहलाते हैं।

घोंघा, स्क्विड और ऑक्टोपस इस समूह के उदाहरण हैं। कई मोलस्क में कवच विकसित होता है, जो उनके कोमल शरीर को सुरक्षा प्रदान करता है।

  • शरीर कोमल होता है।
  • अंग-तंत्र स्तर का संगठन पाया जाता है।
  • कई सदस्यों में कवच पाया जाता है।
  • शरीर में स्पष्ट सिर और पेशीय पाद पाए जा सकते हैं।
  • पर्यावरण के अनुसार शरीर की मूल संरचना में विविध रूपांतरण दिखाई देते हैं।

उदाहरण: घोंघा, स्क्विड और ऑक्टोपस। 

एकाइनोडर्मेटा (Echinodermata) — शूलचर्मी जीव

परिभाषा: ऐसे समुद्री जन्तु जिनमें कैल्शियम कार्बोनेट से बना कठोर आंतरिक कंकाल पाया जाता है, एकाइनोडर्मेटा कहलाते हैं।

स्टारफिश और समुद्री अर्चिन इस समूह के उदाहरण हैं। इनमें पृष्ठरज्जु नहीं होती, लेकिन कठोर अंतःकंकाल शरीर को सहारा, सुरक्षा और नियंत्रित गति प्रदान करता है।

  • मुख्यतः समुद्री जल में पाए जाते हैं।
  • पृष्ठरज्जु अनुपस्थित होती है।
  • कैल्शियम कार्बोनेट का कठोर अंतःकंकाल होता है।
  • अंतःकंकाल शरीर को सहारा और सुरक्षा देता है।
  • यह नियंत्रित गति में भी सहायता करता है।

उदाहरण: स्टारफिश और समुद्री अर्चिन। 

अकशेरुकी जन्तुओं में शरीर संगठन का विकास

पोरीफेरा से एकाइनोडर्मेटा तक जाते हुए शरीर संगठन की जटिलता बढ़ती दिखाई देती है। सरल कोशिकीय संगठन से ऊतक, अंग और अंग-तंत्र स्तर तक विकास हुआ। नई संरचनाएँ भोजन ग्रहण करने, गति करने, सुरक्षा प्राप्त करने और विभिन्न पर्यावरणों में जीवित रहने में सहायता करती हैं। 

Concept Builder

पोरीफेरा → छिद्र + सरल शरीर संगठन

नाइडेरिया → ऊतक + विशेषीकृत कोशिकाएँ

प्लैटीहेल्मिन्थीस → द्विपार्श्व सममिति + दिशात्मक गति

नेमाटोडा → बेलनाकार शरीर + दो छिद्र

ऐनेलिडा → खंडीभवन + देहगुहा

आर्थ्रोपोडा → संधित उपांग + कठोर बाह्यकंकाल

मोलस्का → कोमल शरीर + अंग-तंत्र संगठन

एकाइनोडर्मेटा → समुद्री जीवन + कठोर अंतःकंकाल

Exam Booster

  • एनिमेलिया की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं? — बहुकोशिकीय, यूकैरियोटिक और विषमपोषी जन्तु।
  • पृष्ठरज्जु के आधार पर जन्तुओं को कितने समूहों में बाँटा जाता है? — नॉन-कॉर्डेटा और कॉर्डेटा।
  • पोरीफेरा का प्रमुख उदाहरण क्या है? — स्पंज।
  • नाइडेरिया के तीन उदाहरण लिखिए। — हाइड्रा, जेलीफिश और कोरल।
  • ब्रायोफाइटा नहीं, बल्कि प्लैटीहेल्मिन्थीस में कौन-सी सममिति पाई जाती है? — द्विपार्श्व सममिति।
  • नेमाटोडा में कितने प्रमुख छिद्र होते हैं? — दो—मुख और गुदा।
  • ऐनेलिडा की प्रमुख विशेषता क्या है? — शरीर का खंडों में विभाजन या खंडीभवन।
  • आर्थ्रोपोडा की पहचान किससे होती है? — संधित उपांग और कठोर बाह्यकंकाल से।
  • मोलस्का का एक प्रमुख उदाहरण लिखिए। — घोंघा।
  • एकाइनोडर्मेटा में किस प्रकार का कंकाल पाया जाता है? — कैल्शियम कार्बोनेट से बना कठोर अंतःकंकाल।
  • अकशेरुकी जन्तुओं में शरीर संगठन किस प्रकार विकसित हुआ? — सरल कोशिकीय संगठन से ऊतक, अंग और फिर अधिक जटिल अंग-तंत्र स्तर तक।

जीवजगत का स्वरूप: विविधता एवं वर्गीकरण

Class 9 Science Exploration Hindi Updated : 16 August 2026

अध्याय 12. जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण

कशेरुकी जन्तुओं में कशेरुक दंड अर्थात रीढ़ की हड्डी पाई जाती है। यह शरीर को आंतरिक सहारा देती है और मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु जैसे महत्वपूर्ण अंगों की रक्षा करती है। कशेरुकी जन्तुओं को उनके आवास, देहावरण और जनन के व्यापक प्रतिरूपों के आधार पर पाँच प्रमुख वर्गों में बाँटा जाता है।

कशेरुकी (Vertebrates)

परिभाषा: ऐसे कॉर्डेट जन्तु जिनमें कशेरुक दंड या रीढ़ की हड्डी पाई जाती है, कशेरुकी कहलाते हैं।

कशेरुक दंड एक आंतरिक कंकालीय संरचना है। यह शरीर को सहारा देती है तथा मस्तिष्क और मेरुरज्जु जैसे महत्वपूर्ण अंगों की रक्षा करती है। इसके कारण शरीर का आकार अधिक बड़ा हो सकता है और प्रभावी गति तथा जटिल अंग-तंत्रों का विकास संभव होता है।

कशेरुकी जन्तुओं में उन्नत संवेदना और समन्वित व्यवहार जैसी विशेषताएँ भी दिखाई देती हैं।

कशेरुकियों के पाँच प्रमुख वर्ग

कशेरुकी → मत्स्य (Pisces) → उभयचर (Amphibia) → सरीसृप (Reptilia) → पक्षी (Aves) → स्तनधारी (Mammalia)

इन पाँच समूहों का वर्गीकरण उनके पर्यावास, देहावरण और जनन के व्यापक प्रतिरूपों के आधार पर किया जाता है।

मत्स्य (Pisces) — जलीय कशेरुकी

परिभाषा: जल में रहने वाले कशेरुकी जन्तुओं को सामान्यतः मत्स्य या मछलियों के समूह में रखा जाता है।

मछलियों के शरीर की संरचना जलीय जीवन के अनुकूल होती है। इनके पंख जल में तैरने और दिशा बदलने में सहायता करते हैं, जबकि गलफड़े जल से ऑक्सीजन प्राप्त करने में सहायता करते हैं।

  • मुख्यतः जलीय वातावरण में रहती हैं।
  • पंख तैरने और गति करने में सहायता करते हैं।
  • गलफड़े श्वसन में सहायता करते हैं।
  • शरीर की संरचना जल में गति के लिए अनुकूलित होती है।

उभयचर (Amphibia)

परिभाषा: ऐसे कशेरुकी जन्तु जो अपने जीवन-चक्र में जल और स्थल दोनों वातावरणों से जुड़े होते हैं, उभयचर कहलाते हैं।

उभयचर जल और स्थल के बीच जीवन की विशेष अनुकूलता प्रदर्शित करते हैं। इनके जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में पर्यावरण और श्वसन की आवश्यकताएँ बदल सकती हैं।

मुख्य विचार: उभयचर जल और स्थल दोनों वातावरणों से संबंधित जीवन-शैली का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

सरीसृप (Reptilia)

परिभाषा: मुख्यतः स्थलीय जीवन के लिए अनुकूलित कशेरुकी जन्तुओं के समूह को सरीसृप कहते हैं।

सरीसृप स्थलीय वातावरण में जीवन के लिए विभिन्न संरचनात्मक अनुकूलन प्रदर्शित करते हैं। इनके शरीर की विशेषताएँ उन्हें अपेक्षाकृत शुष्क वातावरण में रहने में सहायता करती हैं।

उदाहरण: साँप, छिपकली और मगरमच्छ जैसे जन्तु सरीसृप समूह से संबंधित हैं।

पक्षी (Aves)

परिभाषा: पंखों और उड़ान के लिए अनुकूलित शरीर संरचना वाले कशेरुकी जन्तुओं को पक्षी कहते हैं।

पक्षियों में पंख और हल्की, खोखली हड्डियाँ उड़ान में सहायता करती हैं। इनके शरीर की संरचना उड़ान और विभिन्न पर्यावरणों में जीवन के लिए विशेष रूप से अनुकूलित होती है।

  • पंख उड़ने में सहायता करते हैं।
  • खोखली हड्डियाँ शरीर को अपेक्षाकृत हल्का बनाने में सहायता करती हैं।
  • शरीर उड़ान के लिए विशेष रूप से अनुकूलित होता है।

स्तनधारी (Mammalia)

परिभाषा: ऐसे कशेरुकी जन्तुओं के समूह को स्तनधारी कहते हैं जिनमें मादा के शरीर में स्तन ग्रंथियाँ पाई जाती हैं, जो शिशुओं के पोषण में सहायता करती हैं।

स्तनधारियों में विभिन्न प्रकार के संरचनात्मक और कार्यात्मक अनुकूलन पाए जाते हैं। स्तन ग्रंथियाँ शिशुओं की उत्तरजीविता को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

मुख्य विशेषता: मादा स्तनधारियों की स्तन ग्रंथियाँ शिशुओं के पोषण में सहायता करती हैं।

कशेरुकी जन्तुओं में अनुकूलन

परिभाषा: पर्यावरण की परिस्थितियों में जीवित रहने और अपनी जीवन-प्रक्रियाएँ सफलतापूर्वक चलाने में सहायता करने वाली संरचनात्मक विशेषताओं को अनुकूलन कहा जाता है।

वर्तमान जन्तु विविधता लंबे समय में शरीर की संरचना में हुए परिवर्तनों का परिणाम है। अलग-अलग वातावरण में रहने वाले जन्तुओं में ऐसी विशेषताएँ विकसित हुई हैं जो उन्हें विशेष परिस्थितियों में जीवित रहने में सहायता करती हैं।

मछलियों का अनुकूलन

पंख: जल में तैरने और गति करने में सहायता करते हैं।

गलफड़े: जल से ऑक्सीजन प्राप्त करने में सहायता करते हैं।

पक्षियों का अनुकूलन

पंख: उड़ान में सहायता करते हैं।

खोखली हड्डियाँ: शरीर को हल्का बनाने में सहायता करती हैं और उड़ान के लिए उपयोगी होती हैं।

ऊँट का अनुकूलन

वसा का संचय: ऊँट के शरीर में वसा का संचय उसके मरुस्थलीय वातावरण में उत्तरजीविता से संबंधित एक विशेष संरचनात्मक/शारीरिक अनुकूलन को दर्शाता है।

ध्रुवीय भालू का अनुकूलन

मोटा फर: ध्रुवीय भालू का मोटा फर ठंडे वातावरण में शरीर को अनुकूल बनाए रखने में सहायता करता है।

स्तनधारियों का अनुकूलन

स्तन ग्रंथियाँ: मादा स्तनधारियों में स्तन ग्रंथियाँ शिशुओं के पोषण में सहायता करती हैं और उनकी उत्तरजीविता को बेहतर बनाती हैं। 

अनुकूलन और पर्यावरण

अलग-अलग पर्यावरणीय परिस्थितियाँ जीवों की संरचना पर अलग-अलग चुनौतियाँ उत्पन्न करती हैं। जल में रहने वाली मछली, उड़ने वाले पक्षी, मरुस्थल में रहने वाला ऊँट और ठंडे प्रदेश का ध्रुवीय भालू अपने-अपने वातावरण के अनुसार अलग-अलग विशेषताएँ प्रदर्शित करते हैं।

इससे स्पष्ट होता है कि जन्तुओं की विविधता केवल उनके आकार या रूप में अंतर नहीं है, बल्कि विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में उत्तरजीविता से जुड़ी संरचनात्मक और कार्यात्मक विशेषताओं की विविधता भी है।

कशेरुकी वर्गों का त्वरित तुलनात्मक अध्ययन

वर्ग मुख्य पर्यावरण प्रमुख विशेषता
मत्स्य जल पंख और गलफड़े
उभयचर जल एवं स्थल दोनों वातावरणों से संबंधित जीवन
सरीसृप मुख्यतः स्थल स्थलीय जीवन के लिए अनुकूलन
पक्षी स्थल/वायु पंख और खोखली हड्डियाँ
स्तनधारी विभिन्न वातावरण स्तन ग्रंथियाँ

Concept Builder

कॉर्डेटा → पृष्ठरज्जु

कशेरुकी → कशेरुक दंड/रीढ़ की हड्डी

मत्स्य → जल → पंख + गलफड़े

उभयचर → जल + स्थल

सरीसृप → मुख्यतः स्थल → स्थलीय अनुकूलन

पक्षी → पंख + खोखली हड्डियाँ → उड़ान

स्तनधारी → स्तन ग्रंथियाँ → शिशु पोषण

पर्यावरणीय चुनौती → संरचनात्मक/कार्यात्मक विशेषता → अनुकूलन → उत्तरजीविता

Exam Booster

  • कशेरुकी किसे कहते हैं? — जिन जन्तुओं में कशेरुक दंड या रीढ़ की हड्डी होती है, उन्हें कशेरुकी कहते हैं।
  • कशेरुक दंड का क्या महत्त्व है? — यह शरीर को आंतरिक सहारा देती है और मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु जैसे महत्वपूर्ण अंगों की रक्षा करती है।
  • कशेरुकी जन्तुओं के पाँच प्रमुख वर्ग लिखिए। — मत्स्य, उभयचर, सरीसृप, पक्षी और स्तनधारी।
  • मछलियों के पंख किस कार्य में सहायता करते हैं? — जल में तैरने और गति करने में।
  • मछलियाँ जल में श्वसन कैसे करती हैं? — गलफड़ों की सहायता से।
  • उभयचर किस प्रकार के वातावरण से जुड़े होते हैं? — जल और स्थल दोनों से।
  • पक्षियों की खोखली हड्डियाँ किस प्रकार उपयोगी हैं? — वे शरीर को हल्का बनाने और उड़ान में सहायता करती हैं।
  • पक्षियों के पंख किस कार्य में सहायता करते हैं? — उड़ान में।
  • ऊँट में पाया जाने वाला कौन-सा अनुकूलन मरुस्थलीय जीवन से संबंधित है? — शरीर में वसा का संचय।
  • ध्रुवीय भालू का मोटा फर किस प्रकार उपयोगी है? — यह ठंडे वातावरण में उत्तरजीविता में सहायता करता है।
  • स्तनधारियों की प्रमुख विशेषता क्या है? — मादा स्तनधारियों में स्तन ग्रंथियाँ पाई जाती हैं, जो शिशुओं के पोषण में सहायता करती हैं।
  • अनुकूलन क्या है? — ऐसी संरचनात्मक या कार्यात्मक विशेषता जो किसी जीव को अपने पर्यावरण में जीवित रहने में सहायता करती है।

जीवजगत का स्वरूप: विविधता एवं वर्गीकरण

Class 9 Science Exploration Hindi Updated : 16 August 2026

अध्याय 12. जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण

जीवों का वर्गीकरण केवल उन्हें अलग-अलग समूहों में बाँटने तक सीमित नहीं है। यह एक क्रमबद्ध व्यवस्था है, जिसमें बड़े समूहों से छोटे और अधिक विशिष्ट समूहों की ओर बढ़ा जाता है। वैज्ञानिक नामकरण इस व्यवस्था को विश्वभर में समान रूप से समझने और जीवों की सही पहचान करने में सहायता करता है।

वर्गीकरण की पदानुक्रमिक प्रकृति

परिभाषा: जीवों को बड़े और व्यापक समूहों से क्रमशः छोटे तथा अधिक विशिष्ट समूहों में व्यवस्थित करने की प्रक्रिया को वर्गीकरण की पदानुक्रमिक प्रकृति कहते हैं।

वर्गीकरण में सबसे बड़े समूह से शुरुआत करके धीरे-धीरे अधिक छोटे समूहों की ओर बढ़ा जाता है। प्रत्येक छोटे समूह में शामिल जीवों में आपस में अधिक समान विशेषताएँ होती हैं। इस प्रकार नीचे की ओर जाते-जाते समूह अधिक विशिष्ट होता जाता है।

वर्गीकरण के प्रमुख स्तर

जगत → संघ → वर्ग → गण → कुल → वंश → जाति

  • जगत (Kingdom): व्यापक स्तर का वर्गीकरण समूह।
  • संघ (Phylum): समान प्रमुख संरचनात्मक विशेषताओं वाले जीवों का समूह।
  • वर्ग (Class): संघ के अंतर्गत अधिक समान विशेषताओं वाले जीवों का समूह।
  • गण (Order): समानताओं के आधार पर वर्ग के भीतर बनाया गया समूह।
  • कुल (Family): निकट संबंध रखने वाले वंशों का समूह।
  • वंश (Genus): निकट रूप से संबंधित जातियों का समूह।
  • जाति (Species): वर्गीकरण की अधिक विशिष्ट इकाई, जिसमें समान प्रकार के जीव शामिल होते हैं।

वर्गीकरण एक पते की तरह

वर्गीकरण की पदानुक्रमिक व्यवस्था को किसी पते की तरह समझा जा सकता है। जिस प्रकार किसी व्यक्ति का पूरा पता किसी निश्चित स्थान को पहचानने में सहायता करता है, उसी प्रकार वर्गीकरण के विभिन्न स्तर किसी जीव की पहचान और उसके संबंधों को समझने में सहायता करते हैं।

जैसे-जैसे हम जगत से जाति की ओर बढ़ते हैं, समूह का आकार छोटा और जीवों के बीच समानता अधिक होती जाती है।

उदाहरण — बाघ का वर्गीकरण

बाघ का वैज्ञानिक वर्गीकरण निम्न प्रकार है:

  • जगत: एनिमेलिया
  • संघ: कॉर्डेटा
  • उपसंघ: वर्टिब्रेटा
  • वर्ग: मैमेलिया
  • गण: कार्निवोरा
  • कुल: फेलिडी
  • वंश: पेंथेरा
  • जाति: पेंथेरा टाइग्रिस

इस उदाहरण से स्पष्ट है कि किसी जीव को बड़े समूह से अधिक विशिष्ट समूह की ओर क्रमशः वर्गीकृत किया जाता है। 

वैज्ञानिक नामकरण

परिभाषा: जीवों को एक सार्वभौमिक वैज्ञानिक नाम देने की प्रक्रिया को वैज्ञानिक नामकरण कहते हैं।

विभिन्न क्षेत्रों और भाषाओं में एक ही जीव के अलग-अलग सामान्य नाम हो सकते हैं। इससे वैज्ञानिक संचार में भ्रम उत्पन्न हो सकता है। इस समस्या को दूर करने के लिए वैज्ञानिक नामकरण की एक सार्वभौमिक प्रणाली का उपयोग किया जाता है।

द्विनाम पद्धति (Binomial Nomenclature)

परिभाषा: ऐसी वैज्ञानिक नामकरण प्रणाली जिसमें प्रत्येक जीव का वैज्ञानिक नाम दो शब्दों से मिलकर बना होता है, द्विनाम पद्धति कहलाती है।

द्विनाम पद्धति कैरोलस लिनियस द्वारा 18वीं शताब्दी में प्रस्तुत की गई थी। इसके अनुसार प्रत्येक जीव के वैज्ञानिक नाम में दो भाग होते हैं। वैज्ञानिक नाम लैटिन भाषा या उसके लैटिनकृत रूप में लिखे जाते हैं। 

वैज्ञानिक नाम के दो भाग

पहला भाग — वंश (Genus)

वैज्ञानिक नाम का पहला शब्द वंश का नाम होता है। यह उन निकट संबंधी जातियों के समूह को दर्शाता है जिनमें कई समान विशेषताएँ पाई जाती हैं।

दूसरा भाग — जाति (Species)

वैज्ञानिक नाम का दूसरा शब्द जाति का नाम होता है। यह जीव की विशिष्ट पहचान बताता है।

उदाहरण — बाघ का वैज्ञानिक नाम

Panthera tigris

  • Panthera — वंश का नाम।
  • tigris — जाति का नाम।

सिंह का वैज्ञानिक नाम Panthera leo है। बाघ और सिंह दोनों Panthera वंश के अंतर्गत आते हैं और उनमें कई समान विशेषताएँ पाई जाती हैं। 

जाति (Species) की अवधारणा

परिभाषा: ऐसे समान प्रकार के जीवों का समूह जो आपस में जनन करके संतति उत्पन्न करने में सक्षम होते हैं, जाति कहलाता है।

जाति वर्गीकरण की अत्यंत विशिष्ट इकाई है। एक ही जाति के जीवों में कई समान विशेषताएँ पाई जाती हैं और वे सामान्यतः आपस में प्रजनन करके संतति उत्पन्न कर सकते हैं।

वैज्ञानिक नाम लिखने के नियम

  • प्रत्येक वैज्ञानिक नाम के दो भाग होते हैं—वंश और जाति।
  • वंश का नाम पहले लिखा जाता है।
  • वंश के नाम का पहला अक्षर Capital Letter में लिखा जाता है।
  • जाति का नाम Small Letters में लिखा जाता है।
  • वैज्ञानिक नाम सामान्यतः Italic अक्षरों में लिखा जाता है।
  • यदि वैज्ञानिक नाम हाथ से लिखा जाए तो दोनों शब्दों को अलग-अलग रेखांकित किया जाता है।

सामान्य नाम और वैज्ञानिक नाम में अंतर

आधार सामान्य नाम वैज्ञानिक नाम
भाषा अलग-अलग भाषाओं में अलग हो सकता है लैटिन या लैटिनकृत रूप
क्षेत्र क्षेत्र के अनुसार बदल सकता है विश्वभर में समान
शब्दों की संख्या निश्चित नहीं दो भाग
उद्देश्य सामान्य पहचान वैज्ञानिक और सार्वभौमिक पहचान

वैज्ञानिक नामकरण का महत्त्व

  • भ्रम समाप्त करता है: अलग-अलग भाषाओं में अलग नाम होने से उत्पन्न भ्रम को दूर करता है।
  • सार्वभौमिक पहचान: किसी जीव की पहचान पूरी दुनिया में एक समान रहती है।
  • वैज्ञानिक संचार: विभिन्न देशों के वैज्ञानिक एक ही नाम का उपयोग कर सकते हैं।
  • वर्गीकरण से संबंध: वैज्ञानिक नाम जीव के वंश और जाति की पहचान में सहायता करता है।
  • संबंध समझने में सहायता: समान वंश के जीवों के बीच निकट संबंधों को समझने में सहायता मिलती है।

Concept Builder

बड़ा समूह → छोटा समूह → अधिक समानता → अधिक विशिष्ट पहचान

जगत → संघ → वर्ग → गण → कुल → वंश → जाति

द्विनाम पद्धति → वंश + जाति

Panthera → वंश

tigris → जाति

Panthera tigris → बाघ का वैज्ञानिक नाम

Exam Booster

  • वर्गीकरण की पदानुक्रमिक प्रकृति क्या है? — बड़े समूहों से छोटे और अधिक विशिष्ट समूहों की ओर क्रमबद्ध रूप से जाने की व्यवस्था।
  • वर्गीकरण के प्रमुख स्तरों का क्रम लिखिए। — जगत → संघ → वर्ग → गण → कुल → वंश → जाति।
  • वर्गीकरण को पते के समान क्यों कहा जाता है? — क्योंकि यह किसी जीव की सही पहचान, तुलना और उसके संबंधों को समझने में सहायता करता है।
  • द्विनाम पद्धति क्या है? — ऐसी वैज्ञानिक नामकरण प्रणाली जिसमें प्रत्येक जीव का नाम दो शब्दों से बना होता है।
  • द्विनाम पद्धति किसने प्रस्तुत की? — कैरोलस लिनियस ने।
  • वैज्ञानिक नाम के दो भाग कौन-से हैं? — वंश और जाति।
  • Panthera tigris में Panthera क्या है? — वंश का नाम।
  • Panthera tigris में tigris क्या है? — जाति का नाम।
  • वैज्ञानिक नाम में वंश का पहला अक्षर कैसा लिखा जाता है? — Capital Letter में।
  • वैज्ञानिक नाम में जाति का नाम कैसे लिखा जाता है? — Small Letters में।
  • वैज्ञानिक नाम Italic में क्यों लिखा जाता है? — वैज्ञानिक नाम को सामान्य पाठ से अलग और मानकीकृत रूप में प्रदर्शित करने के लिए।
  • वैज्ञानिक नामकरण की आवश्यकता क्यों है? — अलग-अलग भाषाओं और क्षेत्रों में जीवों के अलग-अलग सामान्य नाम होने से उत्पन्न भ्रम को दूर करने के लिए।

जीवजगत का स्वरूप: विविधता एवं वर्गीकरण

Class 9 Science Exploration Hindi Updated : 16 August 2026

अध्याय 12. जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण

जीवों का वर्गीकरण लगातार विकसित होने वाली वैज्ञानिक प्रक्रिया है। नई खोजों और जीवों की संरचना, कोशिकीय संगठन तथा आनुवंशिक विशेषताओं की बेहतर समझ के साथ वर्गीकरण प्रणालियों में भी परिवर्तन हो सकता है।

प्रोटोकॉर्डेटा (Protochordata)

परिभाषा: ऐसे कॉर्डेट जीव जिनमें जीवन की कम-से-कम किसी एक अवस्था में पृष्ठरज्जु पाई जाती है, लेकिन वे पूर्ण विकसित कशेरुकियों की तुलना में सरल संगठन प्रदर्शित करते हैं, प्रोटोकॉर्डेटा कहलाते हैं।

प्रोटोकॉर्डेटा अकशेरुकी जीवों से कशेरुकी जीवों की ओर होने वाले संक्रमण को समझने में महत्वपूर्ण हैं। इनके जीवन की किसी अवस्था में पृष्ठरज्जु की उपस्थिति कॉर्डेटा से इनके संबंध को दर्शाती है।

इस प्रकार प्रोटोकॉर्डेटा में ऐसी विशेषताएँ दिखाई देती हैं जो सरल कॉर्डेट संगठन और अधिक विकसित कशेरुकी संगठन के बीच संबंध को समझने में सहायता करती हैं। 

कशेरुकी वर्गों का पुनरावलोकन

कशेरुकी जन्तुओं को पाँच प्रमुख वर्गों में बाँटा जाता है—

  • मत्स्य: मुख्यतः जलीय जीवन के लिए अनुकूलित।
  • उभयचर: जल और स्थल दोनों वातावरणों से संबंधित।
  • सरीसृप: मुख्यतः स्थलीय जीवन के लिए अनुकूलित।
  • पक्षी: उड़ान के लिए विशेष रूप से अनुकूलित।
  • स्तनधारी: मादा में स्तन ग्रंथियाँ पाई जाती हैं, जो शिशुओं के पोषण में सहायता करती हैं।

वर्गीकरण केवल नामकरण नहीं है

परिभाषा: जीवों को नाम देने के साथ-साथ उनके बीच के संबंध, पृथ्वी पर जीवन के इतिहास और जैव विविधता के संरक्षण को समझने में सहायता करने वाली वैज्ञानिक व्यवस्था को वर्गीकरण कहा जाता है।

वर्गीकरण का उद्देश्य केवल यह बताना नहीं है कि कोई जीव किस नाम से जाना जाता है। इसके माध्यम से वैज्ञानिक जीवों के बीच समानताओं और भिन्नताओं को समझते हैं तथा उनके पारस्परिक संबंधों का अध्ययन करते हैं।

  • जीवों के बीच संबंधों को समझने में सहायता करता है।
  • पृथ्वी पर जीवन के इतिहास को समझने में सहायता करता है।
  • जैव विविधता को व्यवस्थित रूप से समझने में सहायता करता है।
  • जैव विविधता के संरक्षण की योजना बनाने में उपयोगी है।
  • नए जीवों की पहचान और वर्गीकरण को व्यवस्थित करता है।

विषाणु (Viruses)

परिभाषा: विषाणु अकोशिकीय संरचनाएँ हैं जिनमें आनुवंशिक पदार्थ पाया जाता है, लेकिन उनमें स्वतंत्र कोशिकीय संगठन नहीं होता।

विषाणुओं में जीवों की तरह आनुवंशिक पदार्थ पाया जाता है, लेकिन उनमें कोशिकीय संरचना नहीं होती। वे परपोषी कोशिका के बाहर निष्क्रिय रह सकते हैं और जीवित कोशिका के अंदर ही अपनी प्रतिकृति बनाने में सक्षम होते हैं।

विषाणु पाँच-जगत में क्यों नहीं रखे जाते?

  • उनमें स्वतंत्र कोशिकीय संगठन नहीं होता।
  • वे स्वतंत्र रूप से जीवन की सभी आवश्यक प्रक्रियाएँ नहीं कर सकते।
  • परपोषी कोशिका के बाहर वे निष्क्रिय रह सकते हैं।
  • उनकी प्रतिकृति के लिए जीवित कोशिका आवश्यक होती है।

इसी कारण विषाणुओं को पाँच-जगत वर्गीकरण के किसी भी जगत में रखना उचित नहीं माना जाता। 

वर्गीकरण प्रणालियों की सीमाएँ

परिभाषा: जब किसी वर्गीकरण प्रणाली की निर्धारित विशेषताएँ सभी जीवों की विविधता को पूरी तरह स्पष्ट नहीं कर पातीं, तो यह उस प्रणाली की सीमा को दर्शाता है।

जीवों की वास्तविक विविधता बहुत अधिक जटिल है। इसलिए कोई भी वर्गीकरण प्रणाली सभी जीवों को हर परिस्थिति में पूरी तरह स्पष्ट रूप से वर्गीकृत नहीं कर सकती। नई वैज्ञानिक जानकारी मिलने पर पुराने वर्गीकरण में संशोधन की आवश्यकता हो सकती है।

एककोशिकीय जीवों की समस्या

सभी एककोशिकीय जीवों को केवल एक ही समूह में रखना उचित नहीं है, क्योंकि उनकी कोशिका संरचना, पोषण और अन्य विशेषताओं में महत्वपूर्ण अंतर हो सकते हैं।

उदाहरण के लिए, मोनेरा के जीव प्रोकैरियोटिक होते हैं, जबकि प्रोटिस्टा के जीव मुख्यतः यूकैरियोटिक होते हैं। इसलिए केवल “एककोशिकीय” होना वर्गीकरण का पर्याप्त आधार नहीं है। 

केवल पोषण के आधार की सीमा

दो जीवों में पोषण की समान विधि हो सकती है, लेकिन उनकी कोशिका संरचना और अन्य विशेषताएँ अलग हो सकती हैं। इसलिए किसी जीव का वर्गीकरण केवल उसके पोषण की विधि के आधार पर नहीं किया जा सकता।

केवल आवास के आधार की सीमा

यदि वर्गीकरण केवल आवास के आधार पर किया जाए, तो अलग-अलग विकासात्मक और संरचनात्मक विशेषताओं वाले जीव एक ही समूह में आ सकते हैं। इसलिए वैज्ञानिक वर्गीकरण में अनेक विशेषताओं को एक साथ ध्यान में रखना आवश्यक है।

टेरिडोफाइटा और ब्रायोफाइटा में अंतर

दोनों समूहों में पुष्प और बीज नहीं होते, फिर भी उन्हें अलग-अलग वर्गों में रखा जाता है क्योंकि उनकी संरचना और संवहनी तंत्र में महत्वपूर्ण अंतर है।

आधार ब्रायोफाइटा टेरिडोफाइटा
शरीर संगठन सरल अधिक विकसित
वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ स्पष्ट रूप से विकसित नहीं उपस्थित
संवहनी ऊतक अनुपस्थित जाइलम और फ्लोएम उपस्थित
बीज नहीं नहीं
जनन में जल आवश्यक आवश्यक

इससे स्पष्ट होता है कि केवल एक विशेषता के आधार पर वर्गीकरण नहीं किया जाता। कई संरचनात्मक और कार्यात्मक विशेषताओं को एक साथ ध्यान में रखा जाता है। 

वर्गीकरण की विकासशील प्रकृति

वर्गीकरण प्रणालियाँ स्थिर नहीं हैं। जैसे-जैसे वैज्ञानिकों को कोशिकीय संरचना, आनुवंशिक विशेषताओं और जीवों के विकासात्मक संबंधों के बारे में नई जानकारी प्राप्त होती है, वर्गीकरण की प्रणालियों में भी सुधार किया जा सकता है।

इसलिए वैज्ञानिक वर्गीकरण को एक विकासशील वैज्ञानिक व्यवस्था के रूप में समझना चाहिए।

फुमडिस और संगाई हिरण

फुमडिस: मणिपुर की लोकटक झील में पाए जाने वाले तैरते हुए घास के मैदानों को स्थानीय भाषा में फुमडिस कहा जाता है। ये मिट्टी की तैरती हुई परतें होती हैं जिन पर मूलबद्ध वनस्पतियाँ उगती हैं।

फुमडिस एक विशिष्ट पर्यावास का निर्माण करते हैं और अनेक विशेष वनस्पतियों तथा जीवों को आश्रय देते हैं। इनका संरक्षण स्थानीय जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण है। 

संगाई हिरण

परिभाषा: संगाई हिरण मणिपुर में पाए जाने वाली एक स्थानिक हिरण जाति है, जो मुख्यतः फुमडिस पर अपना जीवन व्यतीत करती है।

संगाई हिरण को उसके विशेष खुरों और लंबे पैरों की बनावट के आधार पर पहचाना जा सकता है। इसका विशेष पर्यावास इसे फुमडिस से अत्यधिक जुड़ा हुआ बनाता है।

वर्ष 1951 में संगाई हिरण को विलुप्त घोषित कर दिया गया था, लेकिन वर्ष 1953 में इसे पुनः खोजा गया। वर्तमान में इसका संरक्षण किया जा रहा है और इसे IUCN की रेड डेटा सूची में शामिल किया गया है। 

पर्यावास और जैव विविधता संरक्षण

किसी जीव का संरक्षण केवल उस जीव की रक्षा करने से पूरा नहीं होता। उसके प्राकृतिक पर्यावास की रक्षा करना भी आवश्यक है। यदि किसी जीव का विशिष्ट पर्यावास नष्ट होता है, तो उस पर निर्भर जीवों की संख्या और पारिस्थितिक संतुलन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

संगाई हिरण का उदाहरण यह स्पष्ट करता है कि किसी स्थानिक जीव के संरक्षण के लिए उसके विशिष्ट पर्यावास का संरक्षण भी आवश्यक है।

Concept Builder

प्रोटोकॉर्डेटा → जीवन की किसी अवस्था में पृष्ठरज्जु → कॉर्डेटा से संबंध

विषाणु → अकोशिकीय + आनुवंशिक पदार्थ + परपोषी कोशिका पर निर्भर

वर्गीकरण की सीमा → जीवों की अत्यधिक विविधता → एक ही आधार पर्याप्त नहीं

सही वर्गीकरण → कोशिका संरचना + संगठन + पोषण + संरचना + अन्य विशेषताएँ

फुमडिस → लोकटक झील → मणिपुर → विशिष्ट पर्यावास → संगाई हिरण

पर्यावास का विनाश → जैव विविधता में कमी → जीवों की उत्तरजीविता पर खतरा

Exam Booster

  • प्रोटोकॉर्डेटा क्या है? — ऐसे कॉर्डेट जीव जिनमें जीवन की कम-से-कम किसी एक अवस्था में पृष्ठरज्जु पाई जाती है।
  • विषाणु पाँच-जगत में क्यों नहीं रखे जाते? — क्योंकि उनमें स्वतंत्र कोशिकीय संगठन नहीं होता और वे परपोषी कोशिका पर निर्भर रहते हैं।
  • क्या सभी एककोशिकीय जीवों को एक ही जगत में रखा जा सकता है? — नहीं, क्योंकि उनकी कोशिका संरचना और अन्य विशेषताएँ अलग हो सकती हैं।
  • वर्गीकरण केवल पोषण के आधार पर क्यों नहीं किया जा सकता? — क्योंकि अलग-अलग जीवों की पोषण विधि समान हो सकती है, जबकि उनकी कोशिकीय और संरचनात्मक विशेषताएँ अलग होती हैं।
  • वर्गीकरण केवल आवास के आधार पर क्यों नहीं करना चाहिए? — इससे अलग-अलग विकासात्मक और संरचनात्मक विशेषताओं वाले जीव एक ही समूह में आ सकते हैं।
  • ब्रायोफाइटा और टेरिडोफाइटा में मुख्य अंतर क्या है? — टेरिडोफाइटा में जाइलम और फ्लोएम जैसे संवहनी ऊतक तथा वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ होती हैं, जबकि ब्रायोफाइटा में ये विकसित नहीं होते।
  • वर्गीकरण को विकासशील वैज्ञानिक व्यवस्था क्यों कहते हैं? — क्योंकि नई वैज्ञानिक जानकारी मिलने पर वर्गीकरण प्रणालियों में संशोधन किया जा सकता है।
  • फुमडिस कहाँ पाए जाते हैं? — मणिपुर की लोकटक झील में।
  • संगाई हिरण की विशेषता क्या है? — यह मणिपुर में पाया जाने वाला स्थानिक हिरण है और फुमडिस से संबंधित विशिष्ट पर्यावास में रहता है।
  • संगाई हिरण के संरक्षण के लिए उसके पर्यावास की रक्षा क्यों आवश्यक है? — क्योंकि उसका जीवन विशिष्ट फुमडिस पर्यावास से जुड़ा हुआ है और पर्यावास के नष्ट होने से उसकी संख्या प्रभावित हो सकती है।

जीवजगत का स्वरूप: विविधता एवं वर्गीकरण

Class 9 Science Exploration Hindi Updated : 16 August 2026

अध्याय 12. जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण

इस अध्याय में हमने जीवों की विविधता, उनके वर्गीकरण के आधार, पाँच-जगत वर्गीकरण, पादप और जन्तु जगत के प्रमुख समूह, वर्गीकरण की पदानुक्रमिक व्यवस्था तथा वैज्ञानिक नामकरण का अध्ययन किया। अब इन सभी अवधारणाओं को एक साथ जोड़कर समझते हैं कि किसी अज्ञात जीव की पहचान और वर्गीकरण किस प्रकार किया जा सकता है।

किसी अज्ञात जीव का वर्गीकरण कैसे करें?

परिभाषा: किसी अज्ञात जीव की कोशिका संरचना, संगठन, पोषण, शरीर की बनावट और अन्य विशेषताओं का क्रमबद्ध अध्ययन करके उसे उचित वर्ग में रखना वैज्ञानिक वर्गीकरण कहलाता है।

किसी नए जीव को केवल उसके आकार, रंग या आवास के आधार पर वर्गीकृत नहीं किया जाना चाहिए। वैज्ञानिक कई महत्वपूर्ण विशेषताओं को एक साथ देखते हैं।

पहला चरण — कोशिका का प्रकार

सबसे पहले यह देखा जाता है कि जीव की कोशिका प्रोकैरियोटिक है या यूकैरियोटिक

  • वास्तविक केंद्रक अनुपस्थित: जीव को मोनेरा की दिशा में रखा जा सकता है।
  • वास्तविक केंद्रक उपस्थित: जीव यूकैरियोटिक समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

दूसरा चरण — कोशिकाओं की संख्या

इसके बाद देखा जाता है कि जीव एककोशिकीय है या बहुकोशिकीय

  • मुख्यतः एककोशिकीय: मोनेरा या प्रोटिस्टा जैसे समूहों की संभावना हो सकती है।
  • बहुकोशिकीय: फंजाई, प्लांटी या एनिमेलिया जैसे समूहों की विशेषताओं की जाँच की जाती है।

तीसरा चरण — पोषण की विधि

यह देखा जाता है कि जीव अपना भोजन स्वयं बनाता है या किसी अन्य स्रोत से प्राप्त करता है।

  • स्वपोषी: प्रकाश संश्लेषण या अन्य प्रक्रियाओं द्वारा अपना भोजन बनाता है।
  • विषमपोषी: भोजन के लिए अन्य जीवों या कार्बनिक पदार्थों पर निर्भर रहता है।

केवल पोषण के आधार पर वर्गीकरण करना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि अलग-अलग समूहों के जीवों में समान पोषण विधि पाई जा सकती है। 

चौथा चरण — कोशिका भित्ति

यूकैरियोटिक जीवों में कोशिका भित्ति की उपस्थिति और उसकी प्रकृति भी महत्वपूर्ण संकेत देती है। उदाहरण के लिए पादपों में मुख्यतः सेलुलोज की कोशिका भित्ति होती है, जबकि कवकों में काइटिन की कोशिका भित्ति पाई जाती है।

पाँचवाँ चरण — शरीर संगठन

बहुकोशिकीय जीवों में यह देखा जाता है कि उनका शरीर किस स्तर तक संगठित है।

कोशिकीय संगठन → ऊतक संगठन → अंग संगठन → अंग-तंत्र संगठन

जैसे-जैसे संगठन अधिक जटिल होता है, जीव की संरचना और कार्यों में अधिक विशिष्टीकरण दिखाई देता है।

पादप की पहचान कैसे करें?

यदि कोई जीव बहुकोशिकीय, यूकैरियोटिक और मुख्यतः स्वपोषी है, तो उसके पादप जगत से संबंधित होने की संभावना होती है। इसके बाद उसकी जड़, तना, पत्ती, संवहनी ऊतक, बीज, पुष्प और फल जैसी विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है।

  • थैलस जैसा सरल शरीर: थैलोफाइटा।
  • सरल स्थलीय शरीर + जनन के लिए जल: ब्रायोफाइटा।
  • वास्तविक जड़, तना, पत्ती + संवहनी ऊतक: टेरिडोफाइटा।
  • बीज लेकिन फल के अंदर आवरित नहीं: जिम्नोस्पर्म।
  • पुष्प + फल + आवृत बीज: एंजियोस्पर्म।

जन्तु की पहचान कैसे करें?

यदि कोई जीव बहुकोशिकीय, यूकैरियोटिक और विषमपोषी है तथा उसमें जन्तु-जगत की विशेषताएँ पाई जाती हैं, तो उसके शरीर संगठन और पृष्ठरज्जु की उपस्थिति या अनुपस्थिति का अध्ययन किया जाता है।

पृष्ठरज्जु नहीं है

यदि पृष्ठरज्जु अनुपस्थित है, तो जीव नॉन-कॉर्डेटा के विभिन्न समूहों में रखा जा सकता है।

पोरीफेरा → नाइडेरिया → प्लैटीहेल्मिन्थीस → नेमाटोडा → ऐनेलिडा → आर्थ्रोपोडा → मोलस्का → एकाइनोडर्मेटा

पृष्ठरज्जु है

यदि जीवन की किसी अवस्था में पृष्ठरज्जु पाई जाती है, तो जीव कॉर्डेटा से संबंधित हो सकता है। पूर्ण विकसित कशेरुकियों में कशेरुक दंड या रीढ़ की हड्डी पाई जाती है।

मत्स्य → उभयचर → सरीसृप → पक्षी → स्तनधारी

वर्गीकरण के लिए एक से अधिक विशेषताएँ क्यों आवश्यक हैं?

किसी जीव की केवल एक विशेषता उसके वास्तविक संबंधों को स्पष्ट नहीं कर सकती। उदाहरण के लिए, दो जीव दोनों एककोशिकीय हो सकते हैं, लेकिन एक प्रोकैरियोटिक और दूसरा यूकैरियोटिक हो सकता है। इसी प्रकार दो जीव समान पोषण विधि रखते हुए भी उनकी कोशिका संरचना पूरी तरह अलग हो सकती है।

इसलिए वैज्ञानिक वर्गीकरण में कोशिका संरचना, कोशिकाओं की संख्या, पोषण, शरीर संगठन, कोशिका भित्ति, जनन, पारिस्थितिकीय भूमिका और अन्य विशेषताओं को एक साथ देखा जाता है। 

वर्गीकरण और विकास के बीच संबंध

वर्गीकरण जीवों के बीच समानताओं और भिन्नताओं को समझने में सहायता करता है। अधिक समान विशेषताएँ रखने वाले जीवों के बीच निकट संबंध हो सकते हैं। इस प्रकार वर्गीकरण पृथ्वी पर जीवन के इतिहास और जीवों के विकास को समझने में सहायता करता है।

नई वैज्ञानिक जानकारी मिलने पर वर्गीकरण प्रणालियों में संशोधन किया जा सकता है। इसलिए वैज्ञानिक वर्गीकरण एक विकासशील प्रक्रिया है।

जीवों की विविधता और पारिस्थितिक संतुलन

किसी पारिस्थितिक तंत्र में अलग-अलग जीव अलग-अलग भूमिकाएँ निभाते हैं। पौधे उत्पादक के रूप में भोजन और ऊर्जा उपलब्ध कराते हैं। जन्तु उपभोक्ता के रूप में आहार जाल का हिस्सा बनते हैं। कवक और कुछ जीवाणु अपघटक के रूप में मृत पदार्थों को विघटित करके पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में सहायता करते हैं।

इस प्रकार जीवों की विविधता पारिस्थितिक तंत्र के संतुलन और स्थायित्व में योगदान देती है। 

जैव विविधता संरक्षण और वर्गीकरण

वर्गीकरण से विभिन्न जीवों की पहचान और उनके पारिस्थितिक संबंधों को समझने में सहायता मिलती है। इससे संकटग्रस्त और स्थानिक जातियों की पहचान करके उनके संरक्षण की योजना बनाने में भी सहायता मिलती है।

संगाई हिरण और फुमडिस का उदाहरण दिखाता है कि किसी जीव के संरक्षण के लिए उसके विशिष्ट पर्यावास का संरक्षण भी आवश्यक है। पर्यावास के नष्ट होने से उससे संबंधित जीवों की संख्या और पारिस्थितिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। 

पूरे अध्याय का वर्गीकरण मानचित्र

जीवजगत

पाँच-जगत वर्गीकरण

मोनेरा → प्रोटिस्टा → फंजाई → प्लांटी → एनिमेलिया

प्लांटी

थैलोफाइटा → ब्रायोफाइटा → टेरिडोफाइटा → जिम्नोस्पर्म → एंजियोस्पर्म

एनिमेलिया

नॉन-कॉर्डेटा → पोरीफेरा → नाइडेरिया → प्लैटीहेल्मिन्थीस → नेमाटोडा → ऐनेलिडा → आर्थ्रोपोडा → मोलस्का → एकाइनोडर्मेटा

कॉर्डेटा → प्रोटोकॉर्डेटा + वर्टिब्रेटा

वर्टिब्रेटा → मत्स्य → उभयचर → सरीसृप → पक्षी → स्तनधारी

Concept Builder

जीवों की विविधता → पहचान की आवश्यकता → वर्गीकरण

वर्गीकरण → कोशिका संरचना + संगठन + पोषण + अन्य विशेषताएँ

प्रोकैरियोटिक → मोनेरा

मुख्यतः एककोशिकीय यूकैरियोटिक → प्रोटिस्टा

विषमपोषी + काइटिन कोशिका भित्ति → फंजाई

मुख्यतः स्वपोषी + सेलुलोज कोशिका भित्ति → प्लांटी

बहुकोशिकीय + विषमपोषी → एनिमेलिया

पृष्ठरज्जु → कॉर्डेटा

कशेरुक दंड → वर्टिब्रेटा

वर्गीकरण → पहचान + संबंध + जीवन का इतिहास + संरक्षण

Exam Booster

  • किसी अज्ञात जीव का वर्गीकरण करते समय सबसे पहले किन बातों का अध्ययन करना चाहिए? — उसकी कोशिका संरचना, कोशिकाओं की संख्या, पोषण की विधि और अन्य प्रमुख संरचनात्मक विशेषताओं का।
  • क्या केवल आवास के आधार पर वैज्ञानिक वर्गीकरण किया जा सकता है? — नहीं, क्योंकि अलग-अलग संरचना और विकासात्मक संबंध वाले जीव एक ही आवास में रह सकते हैं।
  • क्या केवल पोषण के आधार पर वर्गीकरण पर्याप्त है? — नहीं, क्योंकि अलग-अलग जीवों में समान पोषण विधि हो सकती है।
  • पादपों को थैलोफाइटा से एंजियोस्पर्म तक अलग करने में कौन-सी विशेषताएँ महत्वपूर्ण हैं? — शरीर संगठन, संवहनी ऊतक, बीज, पुष्प और फल जैसी विशेषताएँ।
  • जन्तुओं को नॉन-कॉर्डेटा और कॉर्डेटा में बाँटने का मुख्य आधार क्या है? — पृष्ठरज्जु की उपस्थिति या अनुपस्थिति।
  • कशेरुकियों की पहचान किस आधार पर की जाती है? — कशेरुक दंड या रीढ़ की हड्डी की उपस्थिति से।
  • वर्गीकरण जैव विविधता संरक्षण में कैसे सहायक है? — यह जीवों की पहचान, उनके संबंधों और संकटग्रस्त या विशेष पर्यावास से जुड़े जीवों को समझने में सहायता करता है।
  • वर्गीकरण प्रणालियों में परिवर्तन क्यों हो सकते हैं? — नई वैज्ञानिक खोजों और जीवों के बारे में प्राप्त नई संरचनात्मक तथा आनुवंशिक जानकारी के कारण।
  • संगाई हिरण का उदाहरण क्या बताता है? — किसी जीव के संरक्षण के लिए उसके विशिष्ट प्राकृतिक पर्यावास का संरक्षण भी आवश्यक है।
  • पाँच-जगत वर्गीकरण की सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है? — इसमें जीवों को केवल बाहरी रूप के आधार पर नहीं, बल्कि कोशिका संरचना, संगठन, पोषण और पारिस्थितिकीय भूमिका जैसे कई आधारों पर समझा जाता है।

जीवजगत का स्वरूप: विविधता एवं वर्गीकरण

Class 9 Science Exploration Hindi Updated : 16 August 2026

अध्याय 12. जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण

इस assignment में अध्याय के प्रमुख concepts—जैव विविधता, वर्गीकरण के आधार, पाँच-जगत वर्गीकरण, पादप एवं जन्तु वर्गीकरण, वैज्ञानिक नामकरण और वर्गीकरण की सीमाओं—पर आधारित अभ्यास दिए गए हैं।

Assignment – What Have You Learned?

खंड A — Very Short Answer Questions

  1. जैव विविधता क्या है?
  2. जैविक वर्गीकरण किसे कहते हैं?
  3. पाँच-जगत वर्गीकरण में कितने जगत होते हैं?
  4. मोनेरा के जीव किस प्रकार की कोशिका वाले होते हैं?
  5. प्रोटिस्टा के जीव मुख्यतः किस प्रकार के होते हैं?
  6. कवकों की कोशिका भित्ति किस पदार्थ की बनी होती है?
  7. ब्रायोफाइटा को पादप जगत का उभयचर क्यों कहा जाता है?
  8. जिम्नोस्पर्म के बीज किस प्रकार के होते हैं?
  9. एंजियोस्पर्म की प्रमुख विशेषता क्या है?
  10. पृष्ठरज्जु किसे कहते हैं?
  11. कशेरुकी जन्तु किसे कहते हैं?
  12. द्विनाम पद्धति क्या है?
  13. वैज्ञानिक नाम के दो भाग कौन-से हैं?
  14. विषाणु पाँच-जगत में क्यों नहीं रखे जाते?
  15. संगाई हिरण किस विशिष्ट पर्यावास से संबंधित है?

खंड B — Short Answer Questions

  1. जीवों का वर्गीकरण करना क्यों आवश्यक है?
  2. अरस्तू की वर्गीकरण प्रणाली की प्रमुख विशेषता और सीमा बताइए।
  3. द्विजगत वर्गीकरण की प्रमुख सीमाएँ क्या थीं?
  4. मोनेरा और प्रोटिस्टा में कोई तीन अंतर लिखिए।
  5. फंजाई को प्लांटी से अलग क्यों रखा गया?
  6. थैलोफाइटा और ब्रायोफाइटा में अंतर स्पष्ट कीजिए।
  7. ब्रायोफाइटा और टेरिडोफाइटा में संवहनी ऊतकों के आधार पर अंतर बताइए।
  8. जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म में अंतर लिखिए।
  9. नॉन-कॉर्डेटा और कॉर्डेटा में अंतर स्पष्ट कीजिए।
  10. कशेरुकी जन्तुओं के पाँच प्रमुख वर्गों के नाम लिखिए और प्रत्येक की एक प्रमुख विशेषता बताइए।
  11. वर्गीकरण की पदानुक्रमिक प्रकृति से क्या तात्पर्य है?
  12. द्विनाम पद्धति वैज्ञानिक संचार में किस प्रकार उपयोगी है?
  13. वैज्ञानिक नाम लिखने के प्रमुख नियम बताइए।
  14. विषाणुओं को जीवों के पाँच-जगत वर्गीकरण में रखना कठिन क्यों है?
  15. वर्गीकरण प्रणालियों को विकासशील वैज्ञानिक व्यवस्था क्यों माना जाता है?

खंड C — Long Answer Questions

  1. पाँच-जगत वर्गीकरण प्रणाली का वर्णन कीजिए। इसके प्रमुख आधारों को समझाइए।
  2. पादप जगत के पाँच प्रमुख वर्गों का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।
  3. पोरीफेरा से एकाइनोडर्मेटा तक अकशेरुकी जन्तुओं में शरीर संगठन के विकास को समझाइए।
  4. कशेरुकी जन्तुओं के पाँच वर्गों का वर्णन करते हुए उनके प्रमुख अनुकूलनों को समझाइए।
  5. वर्गीकरण की पदानुक्रमिक व्यवस्था को उदाहरण सहित समझाइए।
  6. द्विनाम पद्धति क्या है? इसके नियम और महत्त्व को उदाहरण सहित समझाइए।
  7. वर्गीकरण के लिए केवल एक विशेषता पर्याप्त क्यों नहीं होती? उदाहरण सहित समझाइए।
  8. विषाणुओं के उदाहरण से पाँच-जगत वर्गीकरण की सीमाओं को समझाइए।

खंड D — Application Based Questions

  1. एक जीव एककोशिकीय है और उसकी कोशिका में झिल्ली से घिरा वास्तविक केंद्रक पाया जाता है। उसे मोनेरा या प्रोटिस्टा में से किसमें रखने की संभावना अधिक है? कारण दीजिए।
  2. एक नए जीव की कोशिका यूकैरियोटिक है। वह बहुकोशिकीय है, क्लोरोफिल नहीं रखता और बाहर से किसी परपोषी से पोषक पदार्थों को अवशोषित करता है। उसे फंजाई या एनिमेलिया में से किस जगत में रखना अधिक उचित होगा? अपने तर्क को वर्गीकरण के मानदंडों के आधार पर स्पष्ट कीजिए। :contentReference[oaicite:2]{index=2}
  3. यदि वर्गीकरण केवल पर्यावास के आधार पर किया जाए, तो कौन-सी समस्या उत्पन्न हो सकती है? उदाहरण देकर समझाइए। :contentReference[oaicite:3]{index=3}
  4. एक पौधे में वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ तथा जाइलम और फ्लोएम पाए जाते हैं, लेकिन बीज नहीं बनते। यह किस वर्ग से संबंधित हो सकता है? कारण बताइए।
  5. एक पौधे में पुष्प और फल बनते हैं तथा उसके बीज फल के अंदर पाए जाते हैं। उसे किस वर्ग में रखा जाएगा?

खंड E — Classification Practice

नीचे दिए गए जीवों को उचित समूह में वर्गीकृत कीजिए:

जीव जगत / वर्ग आधार
जीवाणु __________ __________
अमीबा __________ __________
मशरूम __________ __________
मॉस __________ __________
फर्न __________ __________
चीड़ __________ __________
गुलमोहर __________ __________
स्पंज __________ __________
केंचुआ __________ __________
स्टारफिश __________ __________

खंड F — Scientific Name Practice

  1. द्विनाम पद्धति में वैज्ञानिक नाम के पहले भाग को क्या कहते हैं?
  2. वैज्ञानिक नाम के दूसरे भाग को क्या कहते हैं?
  3. Panthera tigris में Panthera और tigris की पहचान कीजिए।
  4. वैज्ञानिक नाम लिखते समय वंश के नाम का पहला अक्षर किस प्रकार लिखा जाता है?
  5. वैज्ञानिक नामों को सार्वभौमिक रूप से उपयोग करने का क्या लाभ है?

खंड G — Project Work

  1. स्थानीय जैव विविधता सर्वेक्षण: अपने आसपास के किसी उद्यान या जलाशय का निरीक्षण कीजिए। वहाँ पाए जाने वाले कम-से-कम दस जीवों की पहचान कीजिए और उन्हें अलग-अलग जगतों में वर्गीकृत कीजिए। :contentReference[oaicite:4]{index=4}
  2. पारंपरिक पहचान विधियों का अध्ययन: किसी माली या वनकर्मी का साक्षात्कार कीजिए। उनसे पूछिए कि वे पादप जातियों की पहचान किस प्रकार करते हैं। उनकी पारंपरिक पहचान विधियों की वैज्ञानिक वर्गीकरण पद्धति से तुलना कीजिए। :contentReference[oaicite:5]{index=5}
  3. पक्षी विविधता का अध्ययन: अपने क्षेत्र के किसी पक्षी अभयारण्य या प्राकृतिक क्षेत्र में पाए जाने वाले पक्षियों की सूची तैयार कीजिए। उनकी जानकारी को वर्गीकरण के आधार पर व्यवस्थित कीजिए। :contentReference[oaicite:6]{index=6}
  4. मशरूम सर्वेक्षण: किसी ग्रामीण या वन क्षेत्र में स्थानीय जानकार लोगों की सहायता से खाद्य और विषैले मशरूमों की पहचान का अध्ययन कीजिए। सुरक्षा के लिए अज्ञात मशरूम को स्वयं सेवन न करें। :contentReference[oaicite:7]{index=7}
  5. जैव विविधता डाक टिकट परियोजना: भारत और विश्व में प्रकाशित वनस्पतियों तथा प्राणियों से संबंधित डाक टिकटों का संग्रह कीजिए। अपने बनाए हुए वर्गीकरण मानदंडों के आधार पर उनका वर्गीकरण कीजिए और विद्यालय में प्रदर्शनी आयोजित कीजिए। :contentReference[oaicite:8]{index=8}
  6. विलुप्त जाति का अध्ययन: किसी विलुप्त जाति के बारे में जानकारी एकत्र कीजिए और विश्लेषण कीजिए कि उसके विलुप्त होने से उस पर निर्भर जीवों तथा पारिस्थितिक तंत्र के संतुलन पर क्या प्रभाव पड़ा। :contentReference[oaicite:9]{index=9}
  7. भारतीय पशुधन विविधता: देश के अलग-अलग क्षेत्रों में कृषि में उपयोग होने वाली पशुधन की विभिन्न जातियों का अध्ययन कीजिए और उनके स्थानीय अनुकूलनों की तुलना कीजिए। :contentReference[oaicite:10]{index=10}

खंड H — Think and Explore

  1. कल्पना कीजिए कि भविष्य में वैज्ञानिकों को जीवों की आनुवंशिक संरचना के बारे में नई जानकारी प्राप्त होती है। इससे वर्तमान वर्गीकरण प्रणाली में किस प्रकार के परिवर्तन हो सकते हैं? :contentReference[oaicite:11]{index=11}
  2. क्या भविष्य में केवल बाहरी संरचना के बजाय आनुवंशिक समानता को वर्गीकरण में अधिक महत्त्व दिया जा सकता है? अपने विचार तर्क सहित लिखिए।
  3. क्या किसी जीव का सही वर्गीकरण उसके संरक्षण में सहायता कर सकता है? उदाहरण सहित समझाइए।

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