एक यात्रा: परमाणु के भीतर - Class 9 Science Exploration Hindi CBSE Notes
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CBSE Notes for Class 9 – Chapter-wise Revision Notes
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एक यात्रा: परमाणु के भीतर - Class 9 Science Exploration Hindi CBSE Notes
एक यात्रा: परमाणु के भीतर
अध्याय 8. परमाणु के भीतर एक यात्रा
हमारे चारों ओर दिखाई देने वाली प्रत्येक वस्तु अत्यंत सूक्ष्म कणों से बनी होती है जिन्हें परमाणु (Atom) कहा जाता है। लंबे समय तक परमाणु को पदार्थ की सबसे छोटी एवं अविभाज्य इकाई माना जाता था, लेकिन वैज्ञानिक अनुसंधानों ने सिद्ध किया कि परमाणु स्वयं भी इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन जैसे अवपरमाण्विक कणों से मिलकर बना होता है। इस अध्याय में परमाणु सिद्धांत के विकास, विभिन्न परमाणु मॉडलों, परमाणु की संरचना, नाभिक तथा अवपरमाण्विक कणों के गुणों का अध्ययन किया जाएगा। साथ ही यह भी समझेंगे कि समय-समय पर वैज्ञानिकों ने नए प्रयोगों के आधार पर परमाणु के बारे में अपनी अवधारणाओं में कैसे परिवर्तन किया। :
Chapter Review
परिचय (Introduction)
- सभी पदार्थ अत्यंत सूक्ष्म कणों से बने होते हैं जिन्हें परमाणु कहा जाता है।
- परमाणु की संरचना को समझने के लिए अनेक वैज्ञानिकों ने समय-समय पर विभिन्न मॉडल प्रस्तुत किए।
- नए प्रयोगों एवं प्रमाणों के आधार पर परमाणु के मॉडल में लगातार सुधार किया गया।
महत्वपूर्ण परिभाषाएँ (Definitions)
| शब्द | संक्षिप्त परिभाषा |
|---|---|
| परमाणु (Atom) | द्रव्य की मूलभूत सूक्ष्म इकाई। |
| अवपरमाण्विक कण (Subatomic Particle) | परमाणु के भीतर पाए जाने वाले कण। |
| इलेक्ट्रॉन (Electron) | ऋणावेशित अवपरमाण्विक कण। |
| प्रोटॉन (Proton) | धनावेशित अवपरमाण्विक कण। |
| न्यूट्रॉन (Neutron) | आवेश रहित अवपरमाण्विक कण। |
| नाभिक (Nucleus) | परमाणु का केंद्रीय एवं सघन भाग। |
| ऊर्जा स्तर (Energy Level) | इलेक्ट्रॉनों की निश्चित कक्षाएँ। |
| समस्थानिक (Isotope) | समान परमाणु क्रमांक लेकिन भिन्न द्रव्यमान संख्या वाले परमाणु। |
महत्वपूर्ण शब्द (Important Terms)
- परमाणु (Atom)
- परमाणु सिद्धांत (Atomic Theory)
- डाल्टन का सिद्धांत (Dalton's Atomic Theory)
- टॉमसन मॉडल (Thomson Model)
- रदरफोर्ड मॉडल (Rutherford Model)
- बोर मॉडल (Bohr Model)
- इलेक्ट्रॉन (Electron)
- प्रोटॉन (Proton)
- न्यूट्रॉन (Neutron)
- नाभिक (Nucleus)
- ऊर्जा स्तर (Energy Level)
- समस्थानिक (Isotopes)
- समभारिक (Isobars)
- परमाणु क्रमांक (Atomic Number)
- द्रव्यमान संख्या (Mass Number)
मुख्य अवधारणाएँ (Important Concepts)
- परमाणु की अवधारणा प्राचीन भारत एवं यूनान के दार्शनिकों से प्रारम्भ हुई।
- डाल्टन ने परमाणु सिद्धांत का प्रथम वैज्ञानिक स्वरूप प्रस्तुत किया।
- जे. जे. टॉमसन ने इलेक्ट्रॉन की खोज की और प्लम पुडिंग मॉडल दिया।
- रदरफोर्ड के स्वर्ण पर्णिका प्रयोग से नाभिक की खोज हुई।
- बोर ने निश्चित ऊर्जा स्तरों (Shells) की अवधारणा प्रस्तुत की।
- प्रोटॉन एवं न्यूट्रॉन नाभिक में स्थित होते हैं।
- परमाणु क्रमांक प्रोटॉनों की संख्या के बराबर होता है।
- द्रव्यमान संख्या = प्रोटॉन + न्यूट्रॉन।
- समस्थानिकों में परमाणु क्रमांक समान लेकिन द्रव्यमान संख्या भिन्न होती है।
- समभारिकों में द्रव्यमान संख्या समान लेकिन परमाणु क्रमांक भिन्न होता है।
5 मिनट रिवीजन (Quick Revision)
- ✔ परमाणु = द्रव्य की मूलभूत इकाई
- ✔ इलेक्ट्रॉन = ऋणावेशित कण
- ✔ प्रोटॉन = धनावेशित कण
- ✔ न्यूट्रॉन = उदासीन कण
- ✔ नाभिक में प्रोटॉन एवं न्यूट्रॉन होते हैं।
- ✔ परमाणु क्रमांक = प्रोटॉनों की संख्या
- ✔ द्रव्यमान संख्या = प्रोटॉन + न्यूट्रॉन
- ✔ बोर मॉडल में इलेक्ट्रॉन निश्चित कोशों में रहते हैं।
- ✔ समस्थानिक → Z समान, A भिन्न
- ✔ समभारिक → A समान, Z भिन्न
परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण तथ्य (Exam Booster)
- डाल्टन, टॉमसन, रदरफोर्ड एवं बोर के परमाणु मॉडलों की विशेषताएँ एवं सीमाएँ अवश्य याद रखें।
- स्वर्ण पर्णिका (Gold Foil) प्रयोग के निष्कर्ष परीक्षा में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
- इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन एवं न्यूट्रॉन के आवेश तथा स्थिति याद रखें।
- परमाणु क्रमांक एवं द्रव्यमान संख्या के सूत्र आधारित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
- समस्थानिक एवं समभारिक में अंतर महत्वपूर्ण है।
- परमाणु संरचना एवं बोर मॉडल पर आधारित संख्यात्मक एवं वैचारिक प्रश्न CBSE परीक्षा में विशेष महत्व रखते हैं।
एक यात्रा: परमाणु के भीतर
अध्याय 8. एक यात्रा: परमाणु के भीतर
इस अध्याय की शुरुआत परमाणु (Atom) की अवधारणा से होती है। प्राचीन समय से ही वैज्ञानिक और दार्शनिक यह जानने का प्रयास करते रहे कि सभी पदार्थ किन सूक्ष्म कणों से बने हैं। इस भाग में परमाणु सिद्धांत की उत्पत्ति, प्राचीन भारतीय एवं यूनानी विचारों तथा जॉन डाल्टन (John Dalton) द्वारा प्रस्तुत प्रथम वैज्ञानिक परमाणु सिद्धांत का अध्ययन करेंगे।
परमाणु सिद्धांत की उत्पत्ति
परमाणु की अवधारणा (Concept of Atom)
हमारे चारों ओर दिखाई देने वाली प्रत्येक वस्तु अत्यंत सूक्ष्म कणों से बनी होती है जिन्हें परमाणु (Atom) कहा जाता है। प्रारंभ में यह माना जाता था कि परमाणु द्रव्य की सबसे छोटी एवं अविभाज्य इकाई है। बाद में वैज्ञानिक प्रयोगों से यह स्पष्ट हुआ कि परमाणु स्वयं भी छोटे कणों से मिलकर बना होता है।
- सभी पदार्थ परमाणुओं से बने होते हैं।
- परमाणु अत्यंत सूक्ष्म होते हैं और नग्न आँखों से दिखाई नहीं देते।
- प्रत्येक तत्व के परमाणुओं के अपने विशिष्ट गुण होते हैं।
- आधुनिक विज्ञान के अनुसार परमाणु अविभाज्य नहीं है।
- परमाणु पदार्थ की मूलभूत इकाई है।
प्राचीन भारतीय एवं यूनानी विचार
परमाणु की अवधारणा का उल्लेख सबसे पहले प्राचीन भारतीय दार्शनिक आचार्य कणाद (Acharya Kanad) ने किया। उन्होंने बताया कि प्रत्येक पदार्थ अत्यंत सूक्ष्म एवं अविभाज्य कणों से बना है, जिन्हें उन्होंने परमाणु कहा। लगभग इसी समय यूनान के दार्शनिक ल्यूसिपस (Leucippus) तथा डेमोक्रिटस (Democritus) ने भी इसी प्रकार की अवधारणा प्रस्तुत की और इन सूक्ष्म कणों को एटोमॉस (Atomos) नाम दिया, जिसका अर्थ है—"जिसे और विभाजित न किया जा सके।" उस समय इन विचारों के समर्थन में कोई प्रयोगात्मक प्रमाण उपलब्ध नहीं थे।
| दार्शनिक / वैज्ञानिक | योगदान |
|---|---|
| आचार्य कणाद | द्रव्य के सूक्ष्म अविभाज्य कणों (परमाणुओं) की अवधारणा प्रस्तुत की। |
| ल्यूसिपस | परमाणु संबंधी यूनानी विचारधारा का प्रारम्भ किया। |
| डेमोक्रिटस | सूक्ष्म अविभाज्य कणों को "एटोमॉस" नाम दिया। |
जॉन डाल्टन का परमाणु सिद्धांत (John Dalton's Atomic Theory)
वर्ष 1808 में अंग्रेज़ वैज्ञानिक जॉन डाल्टन (John Dalton) ने अनेक रासायनिक प्रयोगों के आधार पर परमाणु सिद्धांत प्रस्तुत किया। यह परमाणु की संरचना को समझाने वाला पहला वैज्ञानिक सिद्धांत था। डाल्टन ने बताया कि सभी पदार्थ सूक्ष्म परमाणुओं से बने होते हैं तथा रासायनिक अभिक्रियाओं के दौरान परमाणु केवल पुनर्व्यवस्थित होते हैं, उनका निर्माण या विनाश नहीं होता। यद्यपि बाद में इस सिद्धांत में कुछ संशोधन किए गए, फिर भी आधुनिक परमाणु सिद्धांत का आधार यही माना जाता है।
डाल्टन के परमाणु सिद्धांत के मुख्य बिंदु
- सभी पदार्थ अत्यंत सूक्ष्म कणों अर्थात् परमाणुओं से बने होते हैं।
- एक ही तत्व के सभी परमाणु द्रव्यमान एवं गुणों में समान होते हैं।
- भिन्न-भिन्न तत्वों के परमाणु द्रव्यमान एवं गुणों में भिन्न होते हैं।
- रासायनिक अभिक्रियाओं में परमाणु न तो उत्पन्न होते हैं और न ही नष्ट होते हैं।
- यौगिक विभिन्न तत्वों के परमाणुओं के निश्चित अनुपात में संयोजन से बनते हैं।
परमाणु की संरचना को लेकर नए प्रश्न
डाल्टन के सिद्धांत के बाद वैज्ञानिकों के सामने अनेक नए प्रश्न उत्पन्न हुए। क्या परमाणु वास्तव में अविभाज्य है? यदि नहीं, तो इसके भीतर कौन-कौन से कण उपस्थित हैं? परमाणु के भीतर धनावेश एवं ऋणावेश की व्यवस्था कैसी होती है? इन प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए अनेक वैज्ञानिकों ने प्रयोग किए, जिनसे आधुनिक परमाणु मॉडल का विकास हुआ।
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कल्पना कीजिए कि आपके पास चॉक का एक टुकड़ा है। यदि उसे बार-बार छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ा जाए, तो एक समय ऐसा आएगा जब हम अत्यंत सूक्ष्म कण की कल्पना करेंगे जिसे और विभाजित करना संभव नहीं होगा। प्राचीन दार्शनिकों ने इसी विचार के आधार पर परमाणु की अवधारणा प्रस्तुत की। बाद में वैज्ञानिक प्रयोगों ने सिद्ध किया कि यह सूक्ष्म कण भी अपने भीतर और छोटे कणों को समाहित किए होता है।
Exam Booster
- आचार्य कणाद ने भारत में परमाणु की अवधारणा प्रस्तुत की।
- डेमोक्रिटस ने अविभाज्य कणों को "एटोमॉस" कहा।
- 1808 में जॉन डाल्टन ने प्रथम वैज्ञानिक परमाणु सिद्धांत प्रस्तुत किया।
- डाल्टन के अनुसार रासायनिक अभिक्रियाओं में परमाणुओं का निर्माण या विनाश नहीं होता।
- आधुनिक परमाणु सिद्धांत का आधार डाल्टन का सिद्धांत माना जाता है।
- परमाणु की आंतरिक संरचना को समझने के लिए आगे चलकर टॉमसन, रदरफोर्ड और बोर ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
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यदि किसी ईंट को बार-बार छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ा जाए, तो अंत में ऐसे सूक्ष्म कणों की कल्पना की जा सकती है जिन्हें और विभाजित करना संभव न हो। प्राचीन दार्शनिकों ने इन्हीं काल्पनिक सूक्ष्म कणों को परमाणु माना। बाद में वैज्ञानिक प्रयोगों ने इस विचार को और अधिक स्पष्ट एवं वैज्ञानिक आधार प्रदान किया।
Exam Booster
- आचार्य कणाद ने भारत में परमाणु की अवधारणा प्रस्तुत की।
- डेमोक्रिटस ने अविभाज्य कणों को "एटोमॉस" कहा।
- जॉन डाल्टन ने 1808 में प्रथम वैज्ञानिक परमाणु सिद्धांत प्रस्तुत किया।
- डाल्टन का सिद्धांत आधुनिक परमाणु संरचना का प्रारम्भिक आधार माना जाता है।
- परमाणु सिद्धांत की उत्पत्ति एवं डाल्टन का योगदान CBSE परीक्षा में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
एक यात्रा: परमाणु के भीतर
अध्याय 8. एक यात्रा: परमाणु के भीतर
पिछले भाग में आपने परमाणु सिद्धांत की उत्पत्ति तथा जॉन डाल्टन के परमाणु सिद्धांत का अध्ययन किया। इसके बाद वैज्ञानिकों ने यह जानने का प्रयास किया कि क्या परमाणु वास्तव में अविभाज्य है अथवा इसके भीतर भी छोटे-छोटे कण उपस्थित हैं। अनेक प्रयोगों के परिणामस्वरूप इलेक्ट्रॉन की खोज हुई तथा परमाणु के प्रथम वैज्ञानिक मॉडल प्रस्तुत किए गए। इस भाग में हम विकिरण (Radioactivity), इलेक्ट्रॉन की खोज, कैथोड किरण नलिका (Cathode Ray Discharge Tube), जे. जे. टॉमसन (J. J. Thomson) के प्रयोग तथा टॉमसन के परमाणु मॉडल का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
इलेक्ट्रॉन की खोज एवं टॉमसन का परमाणु मॉडल
विकिरण (Radioactivity)
विकिरण (Radioactivity) वह प्रक्रिया है जिसमें कुछ तत्व स्वतः अदृश्य ऊर्जा अथवा सूक्ष्म कणों का उत्सर्जन करते हैं। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक वैज्ञानिक परमाणु को पदार्थ की सबसे छोटी एवं अविभाज्य इकाई मानते थे, लेकिन रेडियोधर्मिता से संबंधित खोजों ने इस धारणा को बदल दिया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि परमाणु के भीतर भी सूक्ष्म कण उपस्थित होते हैं और परमाणु को पूर्णतः अविभाज्य नहीं माना जा सकता।
- कुछ तत्व स्वतः ऊर्जा एवं कणों का उत्सर्जन करते हैं।
- इस घटना को विकिरण या रेडियोधर्मिता कहा जाता है।
- इससे सिद्ध हुआ कि परमाणु अविभाज्य नहीं है।
- परमाणु के भीतर अवपरमाण्विक कण (Subatomic Particles) उपस्थित होते हैं।
- इससे वैज्ञानिकों ने परमाणु की आंतरिक संरचना का अध्ययन प्रारम्भ किया।
- इसी के बाद इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन एवं न्यूट्रॉन की खोज का मार्ग खुला।
कैथोड किरण प्रयोग (Cathode Ray Experiment)
इलेक्ट्रॉन की खोज कैथोड किरण नलिका (Cathode Ray Discharge Tube) के प्रयोग द्वारा की गई। इस प्रयोग में कम दाब वाली काँच की नली में दो इलेक्ट्रोड—कैथोड (Cathode) तथा ऐनोड (Anode)—लगाए गए। जब इनके बीच उच्च विभव (High Voltage) लगाया गया, तब कैथोड से अदृश्य किरणें निकलकर ऐनोड की ओर जाने लगीं। इन्हें कैथोड किरणें (Cathode Rays) कहा गया।
टॉमसन ने इन किरणों पर विद्युत एवं चुंबकीय क्षेत्रों का प्रभाव देखा। उन्होंने पाया कि ये किरणें धनात्मक प्लेट की ओर मुड़ जाती हैं, जिससे यह सिद्ध हुआ कि इनमें उपस्थित कणों पर ऋणावेश होता है। इन्हीं कणों को बाद में इलेक्ट्रॉन नाम दिया गया।
| वैज्ञानिक | योगदान |
|---|---|
| जे. जे. टॉमसन | 1897 में इलेक्ट्रॉन की खोज की। |
| खोजा गया कण | इलेक्ट्रॉन (Electron) |
| आवेश | ऋणावेशित (Negative Charge) |
कैथोड किरण प्रयोग से प्राप्त प्रमुख निष्कर्ष
- कैथोड किरणें ऋणावेशित कणों से बनी होती हैं।
- इन कणों को इलेक्ट्रॉन कहा गया।
- इलेक्ट्रॉन सभी प्रकार के परमाणुओं में पाए जाते हैं।
- परमाणु अविभाज्य नहीं है, बल्कि उसकी आंतरिक संरचना होती है।
- इलेक्ट्रॉन की खोज के आधार पर टॉमसन ने अपना परमाणु मॉडल प्रस्तुत किया।
इलेक्ट्रॉन की खोज (Discovery of Electron)
वर्ष 1897 में जे. जे. टॉमसन (J. J. Thomson) ने अत्यंत निम्न दाब पर गैसों में विद्युत धारा के चालन का अध्ययन किया। उन्होंने एक विशेष काँच की निर्वात नलिका (Discharge Tube) में उच्च वोल्टता प्रवाहित की। प्रयोग के दौरान उन्होंने देखा कि कैथोड (ऋणावेशित इलेक्ट्रोड) से कुछ अदृश्य किरणें निकलकर ऐनोड (धनावेशित इलेक्ट्रोड) की ओर जाती हैं। इन्हें कैथोड किरणें (Cathode Rays) कहा गया।
विद्युत एवं चुंबकीय क्षेत्रों में इन किरणों का अध्ययन करने के बाद टॉमसन इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि ये किरणें अत्यंत सूक्ष्म ऋणावेशित कणों की धाराएँ हैं। बाद में इन कणों को इलेक्ट्रॉन (Electron) नाम दिया गया। यह परमाणु के भीतर खोजा गया पहला अवपरमाण्विक कण था।
कैथोड किरण नलिका (Cathode Ray Discharge Tube)
कैथोड किरण नलिका एक विशेष काँच की निर्वात नली होती है, जिसमें दो इलेक्ट्रोड—कैथोड एवं ऐनोड—लगे होते हैं। जब इसमें उच्च वोल्टता प्रवाहित की जाती है, तब कैथोड से अदृश्य किरणें निकलती हैं और ऐनोड की ओर गति करती हैं। इन्हीं किरणों के अध्ययन से इलेक्ट्रॉन की खोज संभव हुई।
| भाग | कार्य |
|---|---|
| कैथोड (Cathode) | ऋणावेशित इलेक्ट्रोड, जहाँ से कैथोड किरणें निकलती हैं। |
| ऐनोड (Anode) | धनावेशित इलेक्ट्रोड, जिसकी ओर किरणें जाती हैं। |
| निर्वात नलिका | कम दाब वाली काँच की नली, जिसमें प्रयोग किया जाता है। |
| उच्च वोल्टता | कैथोड किरणों के निर्माण हेतु आवश्यक विद्युत विभव। |
कैथोड किरणों से प्राप्त निष्कर्ष
टॉमसन ने पाया कि कैथोड किरणों का स्वभाव कैथोड के पदार्थ तथा नली में भरी गैस पर निर्भर नहीं करता। इसका अर्थ यह था कि ये कण सभी तत्वों के परमाणुओं में समान रूप से उपस्थित होते हैं। इस प्रकार वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि इलेक्ट्रॉन सभी परमाणुओं के मूल घटक हैं। एक इलेक्ट्रॉन पर लगभग –1.602 × 10–19 C आवेश होता है, जिसे सुविधा के लिए –1 माना जाता है।
- कैथोड किरणें सभी गैसों में समान गुण प्रदर्शित करती हैं।
- ये कैथोड के पदार्थ पर निर्भर नहीं करतीं।
- इलेक्ट्रॉन सभी परमाणुओं में उपस्थित होते हैं।
- इलेक्ट्रॉन ऋणावेशित कण है।
टॉमसन का परमाणु मॉडल (Thomson's Atomic Model)
इलेक्ट्रॉन की खोज के बाद सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि यदि परमाणु विद्युत रूप से उदासीन (Neutral) है, तो उसमें धनावेश कहाँ स्थित है। इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए टॉमसन ने अपना प्रसिद्ध परमाणु मॉडल प्रस्तुत किया।
टॉमसन के अनुसार परमाणु धनावेशित पदार्थ का एक ठोस गोला है, जिसके भीतर ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन समान रूप से वितरित रहते हैं। उन्होंने इसकी तुलना सूखे मेवों से भरी पुडिंग (Plum Pudding) अथवा तरबूज में फैले बीजों से की। इसमें लाल गूदा धनावेश तथा बीज इलेक्ट्रॉनों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए इसे प्लम पुडिंग मॉडल (Plum Pudding Model) कहा जाता है।
टॉमसन मॉडल की प्रमुख विशेषताएँ
- परमाणु धनावेशित गोले के समान होता है।
- इलेक्ट्रॉन पूरे परमाणु में समान रूप से वितरित रहते हैं।
- धनावेश एवं ऋणावेश का संतुलन परमाणु को विद्युत उदासीन बनाता है।
- यह परमाणु की आंतरिक संरचना को समझाने का पहला वैज्ञानिक मॉडल था।
टॉमसन मॉडल की सीमाएँ
यद्यपि टॉमसन का मॉडल परमाणु की संरचना को समझाने का पहला वैज्ञानिक प्रयास था, फिर भी यह सभी प्रयोगात्मक परिणामों की व्याख्या नहीं कर सका। विशेष रूप से बाद में किए गए स्वर्ण पर्णिका (Gold Foil) प्रयोग के परिणाम इस मॉडल से मेल नहीं खाते थे। इसी कारण आगे चलकर रदरफोर्ड ने नया परमाणु मॉडल प्रस्तुत किया।
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कल्पना कीजिए कि आपके पास एक तरबूज है। यदि आप उसके लाल गूदे को धनावेश तथा उसके भीतर फैले बीजों को इलेक्ट्रॉन मानें, तो आपको टॉमसन के परमाणु मॉडल की मूल अवधारणा समझ में आ जाएगी। इस मॉडल के अनुसार धनावेश पूरे परमाणु में फैला रहता है, जबकि इलेक्ट्रॉन उसके भीतर समान रूप से वितरित होते हैं। यद्यपि बाद में यह मॉडल पूर्णतः सही सिद्ध नहीं हुआ, फिर भी इसने पहली बार यह स्पष्ट किया कि परमाणु के भीतर ऋणावेशित कण अवश्य उपस्थित हैं।
Exam Booster
- वर्ष 1897 में जे. जे. टॉमसन ने इलेक्ट्रॉन की खोज की।
- इलेक्ट्रॉन परमाणु का प्रथम खोजा गया अवपरमाण्विक कण है।
- कैथोड किरणें कैथोड से ऐनोड की ओर गति करती हैं।
- इलेक्ट्रॉन का आपेक्षिक आवेश –1 माना जाता है।
- टॉमसन के मॉडल को प्लम पुडिंग मॉडल कहा जाता है।
- इस मॉडल में धनावेश पूरे गोले में समान रूप से फैला माना गया है।
- स्वर्ण पर्णिका प्रयोग ने टॉमसन मॉडल की सीमाओं को स्पष्ट किया।
एक यात्रा: परमाणु के भीतर
अध्याय 8. एक यात्रा: परमाणु के भीतर
पिछले भाग में आपने विकिरण (Radioactivity), इलेक्ट्रॉन की खोज तथा जे. जे. टॉमसन के परमाणु मॉडल का अध्ययन किया। यद्यपि टॉमसन का मॉडल परमाणु की संरचना को समझाने का पहला वैज्ञानिक प्रयास था, फिर भी वह सभी प्रयोगात्मक परिणामों की व्याख्या नहीं कर सका। इस समस्या का समाधान खोजने के लिए अर्नेस्ट रदरफोर्ड (Ernest Rutherford) ने प्रसिद्ध स्वर्ण पर्णिका प्रयोग (Gold Foil Experiment) किया। इस प्रयोग ने परमाणु की वास्तविक संरचना को समझने की दिशा में एक नया अध्याय प्रारम्भ किया।
रदरफोर्ड का स्वर्ण पर्णिका प्रयोग एवं परमाणु मॉडल
स्वर्ण पर्णिका प्रयोग (Gold Foil Experiment)
स्वर्ण पर्णिका प्रयोग (Gold Foil Experiment) परमाणु की आंतरिक संरचना का अध्ययन करने के लिए किया गया एक महत्वपूर्ण प्रयोग था। इस प्रयोग को अर्नेस्ट रदरफोर्ड (Ernest Rutherford) ने अपने सहयोगियों हैंस गीगर (Hans Geiger) और अर्नेस्ट मार्सडेन (Ernest Marsden) के साथ किया। इस प्रयोग का उद्देश्य यह जाँचना था कि परमाणु के भीतर धनावेश किस प्रकार वितरित है तथा टॉमसन का परमाणु मॉडल कितना सही है।
प्रयोग की व्यवस्था (Experimental Setup)
इस प्रयोग में एक रेडियोधर्मी स्रोत (Radioactive Source) से निकलने वाले तीव्र गति के अल्फा (α) कणों को अत्यंत पतली स्वर्ण पर्णिका (Thin Gold Foil) पर डाला गया। स्वर्ण पर्णिका के चारों ओर जिंक सल्फाइड (Zinc Sulphide) की प्रतिदीप्त (Fluorescent) स्क्रीन लगाई गई थी, जो α-कणों के टकराने पर चमक उत्पन्न करती थी। इस चमक के आधार पर वैज्ञानिकों ने α-कणों की दिशा एवं विचलन (Deflection) का अध्ययन किया।
| उपकरण | कार्य |
|---|---|
| रेडियोधर्मी स्रोत | α-कणों का उत्सर्जन करता है। |
| पतली स्वर्ण पर्णिका | α-कणों के प्रकीर्णन के लिए लक्ष्य। |
| जिंक सल्फाइड स्क्रीन | α-कणों के टकराने पर चमक उत्पन्न करती है। |
प्रयोग के प्रेक्षण (Observations)
रदरफोर्ड ने इस प्रयोग के दौरान तीन अत्यंत महत्वपूर्ण प्रेक्षण किए। अधिकांश α-कण बिना किसी विचलन के सीधे स्वर्ण पर्णिका को पार कर गए। कुछ α-कण थोड़े कोण से मुड़ गए, जबकि बहुत कम α-कण बड़े कोण से मुड़े अथवा वापस लौट गए। यही परिणाम टॉमसन के मॉडल के विपरीत थे।
- अधिकांश α-कण बिना विचलन के सीधे निकल गए।
- कुछ α-कण छोटे कोण से विक्षेपित हुए।
- बहुत कम α-कण बड़े कोण से मुड़े या वापस लौट गए।
प्रयोग से प्राप्त निष्कर्ष (Conclusions)
इन प्रेक्षणों के आधार पर रदरफोर्ड ने निष्कर्ष निकाला कि परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त (Empty Space) होता है। परमाणु का लगभग पूरा धनावेश तथा अधिकांश द्रव्यमान उसके अत्यंत छोटे एवं सघन केंद्रीय भाग में केंद्रित रहता है, जिसे नाभिक (Nucleus) कहा जाता है। इलेक्ट्रॉन इस नाभिक के चारों ओर परिक्रमा करते हैं।
- परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त होता है।
- धनावेश नाभिक में केंद्रित रहता है।
- नाभिक अत्यंत छोटा तथा सघन होता है।
- इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर गति करते हैं।
रदरफोर्ड का परमाणु मॉडल (Rutherford's Atomic Model)
रदरफोर्ड ने अपने निष्कर्षों के आधार पर एक नया परमाणु मॉडल प्रस्तुत किया, जिसे नाभिकीय मॉडल (Nuclear Model) अथवा ग्रहीय मॉडल (Planetary Model) कहा जाता है। इस मॉडल के अनुसार परमाणु के केंद्र में नाभिक होता है तथा उसके चारों ओर इलेक्ट्रॉन उसी प्रकार परिक्रमा करते हैं जैसे ग्रह सूर्य के चारों ओर घूमते हैं।
रदरफोर्ड मॉडल की प्रमुख विशेषताएँ
- परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त स्थान है।
- नाभिक अत्यंत छोटा, सघन एवं धनावेशित होता है।
- परमाणु का अधिकांश द्रव्यमान नाभिक में केंद्रित रहता है।
- इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर परिक्रमा करते हैं।
- नाभिक परमाणु की तुलना में लगभग 105 गुना छोटा होता है।
टॉमसन एवं रदरफोर्ड मॉडल में अंतर
| टॉमसन मॉडल | रदरफोर्ड मॉडल |
|---|---|
| धनावेश पूरे परमाणु में फैला होता है। | धनावेश नाभिक में केंद्रित होता है। |
| इलेक्ट्रॉन धनावेशित गोले में समाहित रहते हैं। | इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर परिक्रमा करते हैं। |
| परमाणु में रिक्त स्थान की व्याख्या नहीं करता। | परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त बताता है। |
Our Concept Builder
कल्पना कीजिए कि एक विशाल क्रिकेट मैदान परमाणु है और उसके ठीक मध्य में रखी एक छोटी-सी काली मिर्च का दाना नाभिक है। मैदान का लगभग पूरा भाग खाली है और केवल बीच का छोटा-सा भाग अत्यधिक सघन है। इसी प्रकार परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त होता है तथा उसका लगभग पूरा द्रव्यमान अत्यंत छोटे नाभिक में केंद्रित रहता है।
Exam Booster
- रदरफोर्ड ने स्वर्ण पर्णिका (Gold Foil) प्रयोग किया।
- α-कणों का उपयोग परमाणु की संरचना के अध्ययन के लिए किया गया।
- परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त स्थान होता है।
- धनावेश एवं अधिकांश द्रव्यमान नाभिक में केंद्रित रहते हैं।
- रदरफोर्ड के मॉडल को नाभिकीय या ग्रहीय मॉडल कहा जाता है।
- स्वर्ण पर्णिका प्रयोग ने टॉमसन के प्लम पुडिंग मॉडल को अस्वीकार कर दिया।
एक यात्रा: परमाणु के भीतर
अध्याय 8. एक यात्रा: परमाणु के भीतर
पिछले भाग में आपने रदरफोर्ड के स्वर्ण पर्णिका प्रयोग तथा नाभिकीय मॉडल का अध्ययन किया। रदरफोर्ड का मॉडल परमाणु की संरचना को समझाने में टॉमसन के मॉडल से अधिक सफल था, लेकिन यह परमाणु के स्थायित्व (Stability of Atom) की व्याख्या नहीं कर सका। इस समस्या के समाधान की खोज के दौरान प्रोटॉन की खोज हुई तथा बाद में नील्स बोर (Niels Bohr) ने ऐसा परमाणु मॉडल प्रस्तुत किया जिसने इलेक्ट्रॉनों की स्थिरता को स्पष्ट किया।
रदरफोर्ड मॉडल की सीमाएँ एवं बोर का परमाणु मॉडल
रदरफोर्ड मॉडल की सीमाएँ (Limitations of Rutherford's Model)
रदरफोर्ड के अनुसार इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर ग्रहों की भाँति निरंतर परिक्रमा करते हैं। भौतिकी के सिद्धांतों के अनुसार कोई भी आवेशित कण यदि वृत्ताकार पथ में गति करता है, तो उसकी ऊर्जा लगातार कम होती रहती है। यदि ऐसा वास्तव में होता, तो इलेक्ट्रॉन धीरे-धीरे अपनी ऊर्जा खोकर नाभिक में गिर जाता और परमाणु नष्ट हो जाता। लेकिन वास्तविकता में परमाणु स्थायी होते हैं। इसलिए रदरफोर्ड का मॉडल परमाणु के स्थायित्व की संतोषजनक व्याख्या नहीं कर सका।
- इलेक्ट्रॉन की स्थिरता को नहीं समझा सका।
- परमाणु के स्थायित्व की व्याख्या नहीं कर पाया।
- ऊर्जा ह्रास (Loss of Energy) की समस्या का समाधान नहीं दिया।
- एक नए परमाणु मॉडल की आवश्यकता महसूस हुई।
प्रोटॉन की खोज (Discovery of Proton)
प्रोटॉन (Proton) परमाणु के नाभिक में स्थित धनावेशित अवपरमाण्विक कण है। रदरफोर्ड ने यह स्पष्ट किया कि नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों के कारण ही परमाणु के केंद्र पर धनावेश होता है। प्रोटॉन का द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन की तुलना में बहुत अधिक होता है तथा इसका आवेश इलेक्ट्रॉन के बराबर लेकिन विपरीत (+1) होता है।
| अवपरमाण्विक कण | आवेश | स्थिति |
|---|---|---|
| इलेक्ट्रॉन (Electron) | -1 | नाभिक के बाहर |
| प्रोटॉन (Proton) | +1 | नाभिक के भीतर |
किसी भी परमाणु के विद्युत उदासीन (Electrically Neutral) होने के लिए उसमें उपस्थित प्रोटॉनों एवं इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है। उदाहरण के लिए, हीलियम परमाणु में 2 प्रोटॉन एवं 2 इलेक्ट्रॉन होते हैं, जबकि सोडियम परमाणु में 11 प्रोटॉन एवं 11 इलेक्ट्रॉन होते हैं। इसी कारण परमाणु का कुल धनावेश एवं कुल ऋणावेश बराबर हो जाता है।
बोर का परमाणु मॉडल (Bohr's Atomic Model)
वर्ष 1913 में डेनमार्क के वैज्ञानिक नील्स बोर (Niels Bohr) ने परमाणु का नया मॉडल प्रस्तुत किया। इस मॉडल ने पहली बार यह समझाया कि इलेक्ट्रॉन नाभिक में क्यों नहीं गिरते। बोर के अनुसार इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर किसी भी पथ में नहीं घूमते, बल्कि वे केवल कुछ निश्चित वृत्ताकार कक्षाओं (Shells or Energy Levels) में ही गति कर सकते हैं। इन कक्षाओं में गति करते समय इलेक्ट्रॉन ऊर्जा का उत्सर्जन नहीं करते, इसलिए परमाणु स्थायी बना रहता है।
बोर मॉडल की मुख्य विशेषताएँ
- इलेक्ट्रॉन केवल निश्चित कक्षाओं (Shells) में ही गति करते हैं।
- प्रत्येक कक्षा की ऊर्जा निश्चित होती है।
- इन कक्षाओं को K, L, M, N आदि नाम दिए गए हैं।
- नाभिक के सबसे निकट K-कोश (n = 1) होता है।
- नाभिक से दूरी बढ़ने पर ऊर्जा स्तर भी बढ़ते जाते हैं।
- स्थिर कक्षा में इलेक्ट्रॉन ऊर्जा का उत्सर्जन नहीं करते।
| कोश (Shell) | क्वांटम संख्या (n) | स्थिति |
|---|---|---|
| K | 1 | नाभिक के सबसे निकट |
| L | 2 | K के बाहर |
| M | 3 | L के बाहर |
| N | 4 | M के बाहर |
ऊर्जा स्तरों के बीच इलेक्ट्रॉनों का संक्रमण
बोर के अनुसार यदि कोई इलेक्ट्रॉन निम्न ऊर्जा स्तर से उच्च ऊर्जा स्तर पर जाता है, तो वह निश्चित मात्रा में ऊर्जा का अवशोषण करता है। इसी प्रकार जब इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर से निम्न ऊर्जा स्तर पर लौटता है, तो उतनी ही निश्चित मात्रा में ऊर्जा का उत्सर्जन करता है। यही सिद्धांत परमाणुओं के उत्सर्जन एवं अवशोषण स्पेक्ट्रम की व्याख्या करता है।
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कल्पना कीजिए कि किसी बहुमंज़िला इमारत में केवल कुछ निश्चित मंज़िलों पर ही खड़ा हुआ जा सकता है। बीच की हवा में खड़ा होना संभव नहीं है। इसी प्रकार इलेक्ट्रॉन भी परमाणु में केवल निश्चित ऊर्जा स्तरों (K, L, M, N) में ही रह सकते हैं। एक स्तर से दूसरे स्तर पर जाने के लिए उन्हें निश्चित मात्रा में ऊर्जा ग्रहण या त्यागनी पड़ती है।
Exam Booster
- रदरफोर्ड मॉडल परमाणु के स्थायित्व की व्याख्या नहीं कर सका।
- प्रोटॉन नाभिक में स्थित धनावेशित कण है।
- परमाणु में प्रोटॉनों एवं इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होने पर वह विद्युत उदासीन होता है।
- 1913 में नील्स बोर ने नया परमाणु मॉडल प्रस्तुत किया।
- इलेक्ट्रॉन केवल निश्चित ऊर्जा स्तरों (K, L, M, N) में ही गति करते हैं।
- K-कोश नाभिक के सबसे निकट तथा सबसे कम ऊर्जा वाला स्तर है।
- ऊर्जा स्तरों के बीच संक्रमण के समय इलेक्ट्रॉन ऊर्जा का अवशोषण या उत्सर्जन करते हैं।
एक यात्रा: परमाणु के भीतर
अध्याय 8. एक यात्रा: परमाणु के भीतर
पिछले भाग में आपने बोर के परमाणु मॉडल का अध्ययन किया, जिसने परमाणु के स्थायित्व की सफल व्याख्या की। अब प्रश्न यह था कि परमाणु का अधिकांश द्रव्यमान किसके कारण होता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि केवल प्रोटॉन परमाणु के द्रव्यमान की व्याख्या नहीं कर सकते। इस समस्या के समाधान के लिए न्यूट्रॉन (Neutron) की खोज हुई। इस भाग में हम न्यूट्रॉन की खोज, परमाणु के द्रव्यमान में प्रोटॉन एवं न्यूट्रॉन के योगदान तथा अवपरमाण्विक कणों के गुणों का अध्ययन करेंगे।
न्यूट्रॉन की खोज एवं परमाणु का द्रव्यमान
परमाणु के द्रव्यमान का रहस्य
रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल से यह स्पष्ट हो गया था कि परमाणु का अधिकांश द्रव्यमान उसके नाभिक (Nucleus) में केंद्रित होता है। वैज्ञानिक जानते थे कि नाभिक में प्रोटॉन उपस्थित होते हैं, परन्तु केवल प्रोटॉनों के आधार पर सभी परमाणुओं के द्रव्यमान की व्याख्या संभव नहीं थी। उदाहरण के लिए, हाइड्रोजन परमाणु में एक प्रोटॉन होता है, जबकि हीलियम परमाणु में दो प्रोटॉन होते हैं, फिर भी हीलियम का द्रव्यमान हाइड्रोजन से लगभग चार गुना अधिक होता है। इससे वैज्ञानिकों को यह संदेह हुआ कि नाभिक में प्रोटॉन के अतिरिक्त भी कोई अन्य कण उपस्थित है।
- परमाणु का अधिकांश द्रव्यमान नाभिक में होता है।
- केवल प्रोटॉन सभी परमाणुओं के द्रव्यमान की व्याख्या नहीं कर सकते थे।
- हीलियम के द्रव्यमान ने वैज्ञानिकों को नए कण की खोज के लिए प्रेरित किया।
न्यूट्रॉन की खोज (Discovery of Neutron)
वर्ष 1932 में ब्रिटिश वैज्ञानिक जेम्स चैडविक (James Chadwick) ने न्यूट्रॉन (Neutron) की खोज की। न्यूट्रॉन एक ऐसा अवपरमाण्विक कण है जिसका द्रव्यमान लगभग प्रोटॉन के बराबर होता है, लेकिन इस पर कोई विद्युत आवेश नहीं होता। इसलिए इसे उदासीन कण (Neutral Particle) कहा जाता है तथा इसका प्रतीक n⁰ होता है।
- न्यूट्रॉन की खोज जेम्स चैडविक ने 1932 में की।
- न्यूट्रॉन का आवेश शून्य होता है।
- इसका द्रव्यमान प्रोटॉन के लगभग बराबर होता है।
- हाइड्रोजन को छोड़कर लगभग सभी परमाणुओं के नाभिक में न्यूट्रॉन पाए जाते हैं।
परमाणु के द्रव्यमान में प्रोटॉन एवं न्यूट्रॉन का योगदान
न्यूट्रॉन की खोज के बाद यह स्पष्ट हो गया कि किसी परमाणु का अधिकांश द्रव्यमान उसके नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों (Protons) तथा न्यूट्रॉनों (Neutrons) के कारण होता है। इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान बहुत कम होने के कारण परमाणु के कुल द्रव्यमान में उसका योगदान नगण्य माना जाता है।
| अवपरमाण्विक कण | द्रव्यमान में योगदान |
|---|---|
| प्रोटॉन (Proton) | मुख्य योगदान |
| न्यूट्रॉन (Neutron) | मुख्य योगदान |
| इलेक्ट्रॉन (Electron) | बहुत कम (लगभग नगण्य) |
अवपरमाण्विक कणों के प्रतीक एवं आपेक्षिक आवेश
परमाणु की संरचना को समझने के लिए इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन के प्रतीक एवं उनके आपेक्षिक आवेशों को जानना आवश्यक है। NCERT में इनका विवरण निम्न प्रकार दिया गया है।
| अवपरमाण्विक कण | प्रतीक | आपेक्षिक आवेश |
|---|---|---|
| इलेक्ट्रॉन | e⁻ | -1 |
| प्रोटॉन | p⁺ | +1 |
| न्यूट्रॉन | n⁰ | 0 |
प्रोटॉन एवं न्यूट्रॉन की संख्या
हल्के तत्वों के परमाणुओं में सामान्यतः प्रोटॉनों एवं न्यूट्रॉनों की संख्या लगभग समान होती है। उदाहरण के लिए, कार्बन परमाणु में 6 प्रोटॉन एवं 6 न्यूट्रॉन होते हैं तथा ऑक्सीजन परमाणु में 8 प्रोटॉन एवं 8 न्यूट्रॉन पाए जाते हैं। जैसे-जैसे परमाणु भारी होते जाते हैं, उनके नाभिक में न्यूट्रॉनों की संख्या प्रोटॉनों की अपेक्षा अधिक होती जाती है। उदाहरण के लिए, लोहा (Iron) में 26 प्रोटॉन एवं 30 न्यूट्रॉन तथा यूरेनियम (Uranium) में 92 प्रोटॉन एवं 146 न्यूट्रॉन होते हैं।
| तत्व | प्रोटॉन | न्यूट्रॉन |
|---|---|---|
| कार्बन (Carbon) | 6 | 6 |
| ऑक्सीजन (Oxygen) | 8 | 8 |
| लोहा (Iron) | 26 | 30 |
| यूरेनियम (Uranium) | 92 | 146 |
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कल्पना कीजिए कि परमाणु का नाभिक एक छोटे से डिब्बे के समान है। इस डिब्बे में दो प्रकार के कण रखे हैं—प्रोटॉन और न्यूट्रॉन। दोनों का द्रव्यमान लगभग समान है, इसलिए परमाणु के कुल द्रव्यमान का लगभग पूरा भाग इन्हीं दोनों से बनता है। इलेक्ट्रॉन नाभिक के बाहर गति करते हैं और उनका द्रव्यमान इतना कम होता है कि कुल द्रव्यमान में उनका योगदान लगभग नगण्य माना जाता है।
Exam Booster
- 1932 में जेम्स चैडविक ने न्यूट्रॉन की खोज की।
- न्यूट्रॉन का आवेश शून्य तथा द्रव्यमान प्रोटॉन के लगभग बराबर होता है।
- परमाणु का अधिकांश द्रव्यमान प्रोटॉन एवं न्यूट्रॉन के कारण होता है।
- इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान बहुत कम होने के कारण उसका योगदान नगण्य माना जाता है।
- इलेक्ट्रॉन (e⁻), प्रोटॉन (p⁺) एवं न्यूट्रॉन (n⁰) के प्रतीक एवं आवेश परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
- भारी तत्वों में न्यूट्रॉनों की संख्या प्रोटॉनों से अधिक होती है।
एक यात्रा: परमाणु के भीतर
अध्याय 8. एक यात्रा: परमाणु के भीतर
रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल ने यह सिद्ध कर दिया कि परमाणु के केंद्र में एक छोटा एवं सघन नाभिक (Nucleus) होता है। इसके बाद वैज्ञानिकों ने परमाणु की संरचना को और अधिक स्पष्ट करने के लिए प्रोटॉन की खोज की तथा नील्स बोर (Niels Bohr) ने ऐसा परमाणु मॉडल प्रस्तुत किया जिसने इलेक्ट्रॉनों की स्थिरता तथा ऊर्जा स्तरों की वैज्ञानिक व्याख्या की। इस भाग में हम प्रोटॉन, परमाणु की विद्युत उदासीनता, बोर मॉडल, K, L, M, N कोश, ऊर्जा स्तर तथा इलेक्ट्रॉनों के संक्रमण का अध्ययन करेंगे।
प्रोटॉन एवं बोर का परमाणु मॉडल
प्रोटॉन की खोज (Discovery of Proton)
प्रोटॉन (Proton) परमाणु के नाभिक में पाया जाने वाला धनावेशित अवपरमाण्विक कण है। इलेक्ट्रॉन की खोज के बाद वैज्ञानिकों ने यह समझने का प्रयास किया कि परमाणु में धनावेश कहाँ स्थित है। रदरफोर्ड के प्रयोगों से यह स्पष्ट हुआ कि परमाणु के नाभिक में धनावेशित कण उपस्थित होते हैं, जिन्हें बाद में प्रोटॉन कहा गया।
- प्रोटॉन नाभिक में स्थित होता है।
- इस पर +1 आपेक्षिक आवेश होता है।
- प्रोटॉन परमाणु के धनावेश का प्रतिनिधित्व करता है।
- परमाणु क्रमांक प्रोटॉनों की संख्या के बराबर होता है।
प्रोटॉन के गुण (Properties of Proton)
| गुण | विवरण |
|---|---|
| प्रतीक | p⁺ |
| आवेश | +1 |
| स्थिति | नाभिक (Nucleus) |
| द्रव्यमान | लगभग 1 amu |
प्रोटॉन परमाणु की पहचान निर्धारित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण कण है। किसी तत्व के प्रोटॉनों की संख्या बदलने पर वह तत्व बदल जाता है।
परमाणु की विद्युत उदासीनता (Electrical Neutrality of Atom)
सामान्य अवस्था में प्रत्येक परमाणु विद्युत रूप से उदासीन (Electrically Neutral) होता है। इसका कारण यह है कि परमाणु में उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या इलेक्ट्रॉनों की संख्या के बराबर होती है। प्रोटॉन का धनावेश तथा इलेक्ट्रॉन का ऋणावेश एक-दूसरे को संतुलित कर देते हैं।
- प्रोटॉनों की संख्या = इलेक्ट्रॉनों की संख्या
- कुल धनावेश = कुल ऋणावेश
- परमाणु का कुल आवेश = शून्य
बोर का परमाणु मॉडल (Bohr's Atomic Model)
1913 में डेनमार्क के वैज्ञानिक नील्स बोर (Niels Bohr) ने परमाणु का नया मॉडल प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर किसी भी कक्षा में नहीं घूमते, बल्कि केवल निश्चित ऊर्जा स्तरों (Energy Levels) अथवा कोशों (Shells) में ही गति करते हैं।
- इलेक्ट्रॉन निश्चित कक्षाओं में ही रहते हैं।
- प्रत्येक कक्षा की ऊर्जा निश्चित होती है।
- स्थिर कक्षा में इलेक्ट्रॉन ऊर्जा का उत्सर्जन नहीं करते।
- इलेक्ट्रॉन केवल ऊर्जा ग्रहण या उत्सर्जित करके एक कोश से दूसरे कोश में जाते हैं।
K, L, M, N कोश (Shells)
बोर ने इलेक्ट्रॉनों के लिए विभिन्न ऊर्जा स्तरों को K, L, M तथा N नाम दिए। K-कोश नाभिक के सबसे निकट तथा सबसे कम ऊर्जा वाला स्तर होता है। जैसे-जैसे नाभिक से दूरी बढ़ती है, ऊर्जा स्तर भी बढ़ते जाते हैं।
| कोश | ऊर्जा स्तर (n) |
|---|---|
| K | 1 |
| L | 2 |
| M | 3 |
| N | 4 |
ऊर्जा स्तर (Energy Levels)
बोर मॉडल के अनुसार प्रत्येक कोश की ऊर्जा निश्चित होती है। K-कोश की ऊर्जा सबसे कम तथा बाहरी कोशों की ऊर्जा क्रमशः अधिक होती जाती है। इलेक्ट्रॉन सामान्यतः निम्न ऊर्जा स्तर में रहना पसंद करते हैं।
- K सबसे कम ऊर्जा स्तर है।
- ऊर्जा स्तर बाहर की ओर बढ़ते जाते हैं।
- प्रत्येक कोश की ऊर्जा निश्चित होती है।
इलेक्ट्रॉनों का संक्रमण (Electronic Transition)
जब कोई इलेक्ट्रॉन बाहरी ऊर्जा स्रोत से ऊर्जा प्राप्त करता है, तो वह निम्न ऊर्जा स्तर से उच्च ऊर्जा स्तर पर चला जाता है। इसे उत्तेजित अवस्था (Excited State) कहते हैं। कुछ समय बाद इलेक्ट्रॉन पुनः निम्न ऊर्जा स्तर पर लौट आता है तथा अतिरिक्त ऊर्जा प्रकाश या विकिरण के रूप में उत्सर्जित करता है।
- ऊर्जा ग्रहण करने पर इलेक्ट्रॉन उच्च कोश में जाता है।
- ऊर्जा उत्सर्जित करने पर इलेक्ट्रॉन निम्न कोश में लौट आता है।
- इसी प्रक्रिया से परमाणुओं का वर्णक्रम (Atomic Spectrum) प्राप्त होता है।
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किसी बहुमंज़िला इमारत की कल्पना कीजिए। प्रत्येक मंज़िल एक ऊर्जा स्तर (Energy Level) है। यदि किसी व्यक्ति को ऊपरी मंज़िल पर जाना है, तो उसे अतिरिक्त ऊर्जा खर्च करनी होगी। उसी प्रकार इलेक्ट्रॉन भी ऊर्जा ग्रहण करके ऊपरी कोश में जाता है और वापस नीचे आने पर ऊर्जा छोड़ देता है।
Exam Booster
- प्रोटॉन नाभिक में स्थित धनावेशित कण है।
- परमाणु क्रमांक = प्रोटॉनों की संख्या।
- परमाणु विद्युत रूप से उदासीन होता है क्योंकि प्रोटॉन एवं इलेक्ट्रॉन की संख्या समान होती है।
- 1913 में नील्स बोर ने परमाणु मॉडल प्रस्तुत किया।
- K, L, M, N इलेक्ट्रॉनों के ऊर्जा स्तर हैं।
- इलेक्ट्रॉन ऊर्जा ग्रहण करके उच्च कोश तथा ऊर्जा उत्सर्जित करके निम्न कोश में आते हैं।
- बोर मॉडल CBSE परीक्षा का अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।
एक यात्रा: परमाणु के भीतर
परमाणु संख्या, द्रव्यमान संख्या एवं इलेक्ट्रॉनों का वितरण
परमाणु संख्या (Atomic Number)
परमाणु संख्या (Atomic Number) किसी परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों (Protons) की कुल संख्या को कहते हैं। इसे Z से प्रदर्शित किया जाता है। प्रत्येक तत्व की परमाणु संख्या निश्चित होती है तथा इसी के आधार पर तत्व की पहचान की जाती है। यदि किसी परमाणु में प्रोटॉनों की संख्या बदल जाए, तो वह किसी दूसरे तत्व में परिवर्तित हो जाता है।
एक सामान्य (विद्युत उदासीन) परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की संख्या भी प्रोटॉनों के बराबर होती है। इसलिए परमाणु संख्या से किसी तत्व में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या का भी पता लगाया जा सकता है। आधुनिक आवर्त सारणी (Modern Periodic Table) में तत्वों को बढ़ती हुई परमाणु संख्या के क्रम में व्यवस्थित किया गया है।
| तत्व | प्रोटॉन | परमाणु संख्या (Z) |
|---|---|---|
| हाइड्रोजन (H) | 1 | 1 |
| हीलियम (He) | 2 | 2 |
| कार्बन (C) | 6 | 6 |
| ऑक्सीजन (O) | 8 | 8 |
| सोडियम (Na) | 11 | 11 |
- परमाणु संख्या = प्रोटॉनों की संख्या
- विद्युत उदासीन परमाणु में परमाणु संख्या = इलेक्ट्रॉनों की संख्या
- इसी संख्या से तत्व की पहचान होती है।
द्रव्यमान संख्या (Mass Number)
द्रव्यमान संख्या (Mass Number) किसी परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों (Protons) तथा न्यूट्रॉनों (Neutrons) की कुल संख्या होती है। इसे A से प्रदर्शित किया जाता है। परमाणु का लगभग सम्पूर्ण द्रव्यमान नाभिक में केंद्रित रहता है क्योंकि इलेक्ट्रॉनों का द्रव्यमान अत्यंत कम होता है।
द्रव्यमान संख्या ज्ञात करने के लिए नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों एवं न्यूट्रॉनों की संख्या को जोड़ा जाता है। इसी कारण द्रव्यमान संख्या सदैव परमाणु संख्या से बराबर या अधिक होती है।
द्रव्यमान संख्या = प्रोटॉन + न्यूट्रॉन
| तत्व | प्रोटॉन | न्यूट्रॉन | द्रव्यमान संख्या (A) |
|---|---|---|---|
| हाइड्रोजन | 1 | 0 | 1 |
| कार्बन | 6 | 6 | 12 |
| ऑक्सीजन | 8 | 8 | 16 |
| सोडियम | 11 | 12 | 23 |
- द्रव्यमान संख्या = प्रोटॉन + न्यूट्रॉन
- इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान नगण्य माना जाता है।
- द्रव्यमान संख्या को A द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
इलेक्ट्रॉनों का वितरण (Distribution of Electrons)
इलेक्ट्रॉनों का वितरण (Distribution of Electrons) वह व्यवस्था है जिसमें इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर विभिन्न ऊर्जा स्तरों अथवा कोशों (Shells) में व्यवस्थित रहते हैं। नील्स बोर के अनुसार इलेक्ट्रॉन किसी भी स्थान पर नहीं रह सकते, बल्कि वे केवल निश्चित ऊर्जा स्तरों में ही पाए जाते हैं। इन ऊर्जा स्तरों को K, L, M, N आदि नाम दिए गए हैं।
प्रत्येक कोश में इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम संख्या निश्चित होती है। सबसे पहले इलेक्ट्रॉन निकटतम कोश (K) को भरते हैं, उसके बाद L, M और N कोश में प्रवेश करते हैं। इस क्रम से परमाणु की इलेक्ट्रॉनिक संरचना बनती है, जो किसी तत्व के रासायनिक गुणों को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
| कोश (Shell) | अधिकतम इलेक्ट्रॉन |
|---|---|
| K | 2 |
| L | 8 |
| M | 18 |
| N | 32 |
इलेक्ट्रॉनों के वितरण के मुख्य नियम
- इलेक्ट्रॉन सबसे पहले सबसे कम ऊर्जा वाले K-कोश में प्रवेश करते हैं।
- किसी कोश की अधिकतम क्षमता निश्चित होती है।
- भीतरी कोश पहले भरते हैं, उसके बाद बाहरी कोश भरते हैं।
- इलेक्ट्रॉनों का वितरण किसी तत्व के रासायनिक व्यवहार को प्रभावित करता है।
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मान लीजिए कि एक बहुमंज़िला भवन है। सबसे पहले लोग पहली मंज़िल (K-कोश) को भरते हैं। जब पहली मंज़िल पूरी भर जाती है, तभी दूसरी मंज़िल (L-कोश) पर लोग जाते हैं। इसी प्रकार क्रमशः M और N कोश भरते हैं। परमाणु में इलेक्ट्रॉनों का वितरण भी इसी क्रम का पालन करता है।
Exam Booster
- परमाणु संख्या (Z) = प्रोटॉनों की संख्या।
- विद्युत उदासीन परमाणु में प्रोटॉन = इलेक्ट्रॉन।
- द्रव्यमान संख्या (A) = प्रोटॉन + न्यूट्रॉन।
- परमाणु का अधिकांश द्रव्यमान नाभिक में केंद्रित होता है।
- इलेक्ट्रॉन K, L, M, N कोशों में वितरित होते हैं।
- K-कोश की अधिकतम क्षमता 2 तथा L-कोश की 8 इलेक्ट्रॉन होती है।
- भीतरी कोश पहले भरते हैं, उसके बाद बाहरी कोश भरते हैं।
एक यात्रा: परमाणु के भीतर
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, तत्वों के संकेत चिन्ह एवं संयोजकता
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic Configuration)
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic Configuration) से आशय किसी परमाणु में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों के विभिन्न ऊर्जा स्तरों (Shells) में व्यवस्थित होने की प्रक्रिया से है। प्रत्येक तत्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास उसकी परमाणु संख्या पर निर्भर करता है। इलेक्ट्रॉन सदैव सबसे कम ऊर्जा वाले कोश (K-कोश) से भरना प्रारम्भ करते हैं तथा क्रमशः L, M, N आदि कोशों में प्रवेश करते हैं।
बोर के परमाणु मॉडल के अनुसार प्रत्येक कोश में इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम संख्या निश्चित होती है। सामान्यतः K-कोश में अधिकतम 2 तथा L-कोश में अधिकतम 8 इलेक्ट्रॉन रखे जा सकते हैं। परमाणु के रासायनिक गुण मुख्यतः सबसे बाहरी कोश (Valence Shell) में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करते हैं।
| तत्व | परमाणु संख्या | इलेक्ट्रॉनिक विन्यास |
|---|---|---|
| हाइड्रोजन (H) | 1 | 1 |
| हीलियम (He) | 2 | 2 |
| लिथियम (Li) | 3 | 2,1 |
| कार्बन (C) | 6 | 2,4 |
| ऑक्सीजन (O) | 8 | 2,6 |
| सोडियम (Na) | 11 | 2,8,1 |
| क्लोरीन (Cl) | 17 | 2,8,7 |
संयोजक इलेक्ट्रॉन (Valence Electrons)
किसी परमाणु के सबसे बाहरी कोश (Outermost Shell) में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों को संयोजक इलेक्ट्रॉन (Valence Electrons) कहा जाता है। यही इलेक्ट्रॉन रासायनिक अभिक्रियाओं तथा रासायनिक बंध (Chemical Bond) के निर्माण में भाग लेते हैं। किसी तत्व की रासायनिक सक्रियता उसके संयोजक इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करती है।
- सबसे बाहरी कोश को संयोजक कोश (Valence Shell) कहते हैं।
- इसी कोश के इलेक्ट्रॉन रासायनिक अभिक्रियाओं में भाग लेते हैं।
- संयोजक इलेक्ट्रॉनों की संख्या तत्व के रासायनिक गुण निर्धारित करती है।
तत्वों के संकेत चिन्ह (Symbols of Elements)
प्रत्येक तत्व को पहचानने के लिए उसका एक संक्षिप्त संकेत (Symbol) निर्धारित किया गया है। सामान्यतः संकेत चिन्ह तत्व के अंग्रेज़ी या लैटिन नाम के एक या दो अक्षरों से बनाए जाते हैं। पहला अक्षर सदैव बड़ा (Capital Letter) तथा दूसरा अक्षर (यदि हो) छोटा (Small Letter) लिखा जाता है।
| तत्व | संकेत चिन्ह |
|---|---|
| हाइड्रोजन | H |
| हीलियम | He |
| कार्बन | C |
| नाइट्रोजन | N |
| ऑक्सीजन | O |
| सोडियम | Na |
| पोटैशियम | K |
| लोहा | Fe |
| ताँबा | Cu |
| चाँदी | Ag |
संकेत चिन्ह लिखने के नियम
- पहला अक्षर हमेशा अंग्रेज़ी का बड़ा (Capital) अक्षर होता है।
- यदि दूसरा अक्षर हो, तो वह छोटा (Small) अक्षर लिखा जाता है।
- कुछ संकेत चिन्ह लैटिन नामों से लिए गए हैं, जैसे Na (Natrium), K (Kalium), Fe (Ferrum)।
संयोजकता (Valency)
संयोजकता (Valency) किसी परमाणु की वह क्षमता है जिसके द्वारा वह दूसरे परमाणुओं के साथ रासायनिक बंध बनाता है। यह सामान्यतः सबसे बाहरी कोश में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करती है। स्थिर इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Stable Electronic Configuration) प्राप्त करने के लिए परमाणु इलेक्ट्रॉनों का त्याग, ग्रहण अथवा साझाकरण करते हैं।
यदि किसी परमाणु के बाहरी कोश में 1, 2, 3 या 4 इलेक्ट्रॉन हों, तो उसकी संयोजकता उतनी ही होती है। यदि बाहरी कोश में 5, 6 या 7 इलेक्ट्रॉन हों, तो संयोजकता = 8 − संयोजक इलेक्ट्रॉन होती है। जिन तत्वों के बाहरी कोश में 8 इलेक्ट्रॉन (या हीलियम में 2) होते हैं, उनकी संयोजकता शून्य होती है।
| तत्व | इलेक्ट्रॉनिक विन्यास | संयोजक इलेक्ट्रॉन | संयोजकता |
|---|---|---|---|
| हाइड्रोजन | 1 | 1 | 1 |
| लिथियम | 2,1 | 1 | 1 |
| कार्बन | 2,4 | 4 | 4 |
| ऑक्सीजन | 2,6 | 6 | 2 |
| क्लोरीन | 2,8,7 | 7 | 1 |
| निऑन | 2,8 | 8 | 0 |
Our Concept Builder
कल्पना कीजिए कि प्रत्येक कोश एक कक्षा (Classroom) है। विद्यार्थी (इलेक्ट्रॉन) सबसे पहले पहली कक्षा (K-कोश) को भरते हैं। जब वह पूरी भर जाती है, तभी अगली कक्षा (L-कोश) में जाते हैं। सबसे बाहरी कक्षा के विद्यार्थी ही दूसरे विद्यालय (दूसरे परमाणु) के विद्यार्थियों से मिलकर नई टीम (रासायनिक बंध) बनाते हैं। इन्हीं बाहरी विद्यार्थियों को संयोजक इलेक्ट्रॉन कहते हैं और उनकी संख्या ही संयोजकता निर्धारित करती है।
Exam Booster
- इलेक्ट्रॉनिक विन्यास इलेक्ट्रॉनों के कोशों में वितरण को दर्शाता है।
- सबसे बाहरी कोश के इलेक्ट्रॉन संयोजक इलेक्ट्रॉन कहलाते हैं।
- तत्व का संकेत चिन्ह उसके अंग्रेज़ी या लैटिन नाम से लिया जाता है।
- पहला अक्षर सदैव बड़ा तथा दूसरा अक्षर छोटा लिखा जाता है।
- संयोजकता किसी तत्व की रासायनिक संयोजन क्षमता है।
- यदि संयोजक इलेक्ट्रॉन 5, 6 या 7 हों, तो संयोजकता = 8 – संयोजक इलेक्ट्रॉन होती है।
- निष्क्रिय गैसों (Noble Gases) की संयोजकता सामान्यतः शून्य होती है।
एक यात्रा: परमाणु के भीतर
समस्थानिक, समभारिक एवं औसत परमाणु द्रव्यमान
समस्थानिक (Isotopes)
समस्थानिक (Isotopes) ऐसे परमाणु होते हैं जिनकी परमाणु संख्या (Atomic Number) समान होती है, लेकिन द्रव्यमान संख्या (Mass Number) भिन्न-भिन्न होती है। दूसरे शब्दों में, समस्थानिकों में प्रोटॉनों की संख्या समान होती है, जबकि न्यूट्रॉनों की संख्या अलग-अलग होती है। चूँकि प्रोटॉनों की संख्या समान रहती है, इसलिए सभी समस्थानिक एक ही तत्व के होते हैं और उनके रासायनिक गुण लगभग समान होते हैं।
प्राकृतिक रूप से अनेक तत्व समस्थानिकों के रूप में पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक—प्रोटियम, ड्यूटेरियम तथा ट्रिटियम—प्रसिद्ध हैं। इसी प्रकार क्लोरीन के दो प्रमुख समस्थानिक 35Cl तथा 37Cl पाए जाते हैं।
| समस्थानिक | परमाणु संख्या | द्रव्यमान संख्या | न्यूट्रॉन |
|---|---|---|---|
| ¹H (प्रोटियम) | 1 | 1 | 0 |
| ²H (ड्यूटेरियम) | 1 | 2 | 1 |
| ³H (ट्रिटियम) | 1 | 3 | 2 |
समस्थानिकों के प्रमुख गुण
- परमाणु संख्या समान होती है।
- द्रव्यमान संख्या अलग-अलग होती है।
- प्रोटॉनों की संख्या समान रहती है।
- न्यूट्रॉनों की संख्या भिन्न होती है।
- रासायनिक गुण लगभग समान होते हैं।
- भौतिक गुणों में अंतर हो सकता है।
समभारिक (Isobars)
समभारिक (Isobars) ऐसे परमाणु होते हैं जिनकी द्रव्यमान संख्या (Mass Number) समान होती है, लेकिन परमाणु संख्या (Atomic Number) भिन्न होती है। इसका अर्थ है कि समभारिक विभिन्न तत्वों के परमाणु होते हैं जिनमें प्रोटॉनों की संख्या अलग-अलग होती है, इसलिए उनके रासायनिक गुण भी भिन्न होते हैं।
उदाहरण के लिए, कैल्शियम-40 (²⁰Ca⁴⁰) तथा आर्गन-40 (¹⁸Ar⁴⁰) समभारिक हैं। दोनों की द्रव्यमान संख्या 40 है, लेकिन परमाणु संख्या अलग-अलग होने के कारण ये अलग-अलग तत्व हैं।
| समभारिक | परमाणु संख्या | द्रव्यमान संख्या |
|---|---|---|
| ⁴⁰Ar | 18 | 40 |
| ⁴⁰Ca | 20 | 40 |
समस्थानिक एवं समभारिक में अंतर
| समस्थानिक (Isotopes) | समभारिक (Isobars) |
|---|---|
| परमाणु संख्या समान होती है। | द्रव्यमान संख्या समान होती है। |
| द्रव्यमान संख्या भिन्न होती है। | परमाणु संख्या भिन्न होती है। |
| एक ही तत्व के परमाणु होते हैं। | भिन्न-भिन्न तत्वों के परमाणु होते हैं। |
| रासायनिक गुण लगभग समान होते हैं। | रासायनिक गुण भिन्न होते हैं। |
औसत परमाणु द्रव्यमान (Average Atomic Mass)
प्रकृति में अधिकांश तत्व एक से अधिक समस्थानिकों के मिश्रण के रूप में पाए जाते हैं। इसलिए किसी तत्व का परमाणु द्रव्यमान उसके किसी एक समस्थानिक के द्रव्यमान के बराबर नहीं होता। विभिन्न समस्थानिकों की प्राकृतिक प्रचुरता (Natural Abundance) को ध्यान में रखते हुए जो मान प्राप्त होता है, उसे औसत परमाणु द्रव्यमान (Average Atomic Mass) कहते हैं।
उदाहरण के लिए, क्लोरीन मुख्य रूप से दो समस्थानिकों 35Cl तथा 37Cl के मिश्रण के रूप में पाया जाता है। इनकी प्राकृतिक प्रचुरता अलग-अलग होने के कारण क्लोरीन का औसत परमाणु द्रव्यमान लगभग 35.5 u माना जाता है।
| तत्व | मुख्य समस्थानिक | औसत परमाणु द्रव्यमान |
|---|---|---|
| क्लोरीन (Cl) | ³⁵Cl एवं ³⁷Cl | 35.5 u |
| ताँबा (Cu) | ⁶³Cu एवं ⁶⁵Cu | 63.5 u (लगभग) |
औसत परमाणु द्रव्यमान का महत्व
- यह किसी तत्व के सभी प्राकृतिक समस्थानिकों का प्रतिनिधित्व करता है।
- आवर्त सारणी में दिए गए परमाणु द्रव्यमान सामान्यतः औसत परमाणु द्रव्यमान होते हैं।
- रासायनिक गणनाओं एवं मोल (Mole) संबंधी प्रश्नों में इसी मान का उपयोग किया जाता है।
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मान लीजिए किसी विद्यालय की कक्षा में छात्रों की आयु 13 वर्ष, 14 वर्ष और 15 वर्ष है। यदि पूरी कक्षा की औसत आयु निकालनी हो, तो केवल किसी एक छात्र की आयु नहीं ली जाती, बल्कि सभी छात्रों की आयु एवं उनकी संख्या को ध्यान में रखकर औसत निकाला जाता है। इसी प्रकार किसी तत्व का औसत परमाणु द्रव्यमान उसके सभी समस्थानिकों की प्राकृतिक प्रचुरता को ध्यान में रखकर निर्धारित किया जाता है।
Exam Booster
- समस्थानिकों की परमाणु संख्या समान तथा द्रव्यमान संख्या भिन्न होती है।
- समभारिकों की द्रव्यमान संख्या समान तथा परमाणु संख्या भिन्न होती है।
- समस्थानिकों के रासायनिक गुण लगभग समान होते हैं।
- समभारिक विभिन्न तत्वों के परमाणु होते हैं।
- क्लोरीन के प्रमुख समस्थानिक ³⁵Cl एवं ³⁷Cl हैं।
- औसत परमाणु द्रव्यमान प्राकृतिक प्रचुरता के आधार पर निर्धारित किया जाता है।
- आवर्त सारणी में दिए गए अधिकांश परमाणु द्रव्यमान औसत परमाणु द्रव्यमान होते हैं।
एक यात्रा: परमाणु के भीतर
अध्याय 8. एक यात्रा: परमाणु के भीतर
इस अध्याय में आपने परमाणु सिद्धांत के विकास, अवपरमाण्विक कणों, परमाणु मॉडल, परमाणु संख्या, द्रव्यमान संख्या, इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, संयोजकता, समस्थानिक एवं समभारिक जैसी महत्वपूर्ण अवधारणाओं का अध्ययन किया। नीचे दिए गए अभ्यास प्रश्न आपके वैचारिक ज्ञान, तथ्यों की समझ तथा परीक्षा की तैयारी को मजबूत बनाने में सहायक होंगे।
Assignments – What Have You Learned?
भाग A : रिक्त स्थान भरिए (Fill in the Blanks)
- परमाणु संख्या को ________ से प्रदर्शित किया जाता है।
- द्रव्यमान संख्या = ________ + ________।
- इलेक्ट्रॉन की खोज ________ ने की थी।
- रदरफोर्ड ने ________ प्रयोग किया था।
- नाभिक में उपस्थित धनावेशित कण को ________ कहते हैं।
- न्यूट्रॉन की खोज ________ ने की थी।
- बोर मॉडल के अनुसार इलेक्ट्रॉन ________ ऊर्जा स्तरों में गति करते हैं।
- सबसे पहला ऊर्जा स्तर ________ कोश कहलाता है।
- सबसे बाहरी कोश के इलेक्ट्रॉनों को ________ इलेक्ट्रॉन कहते हैं।
- समस्थानिकों की परमाणु संख्या ________ होती है।
भाग B : सही या गलत लिखिए (True / False)
- परमाणु संख्या प्रोटॉनों की संख्या के बराबर होती है।
- इलेक्ट्रॉन नाभिक के भीतर पाए जाते हैं।
- प्रोटॉन पर धनावेश होता है।
- न्यूट्रॉन का आवेश शून्य होता है।
- समभारिकों की परमाणु संख्या समान होती है।
- समस्थानिकों के रासायनिक गुण लगभग समान होते हैं।
- K-कोश में अधिकतम 8 इलेक्ट्रॉन आ सकते हैं।
- हीलियम की संयोजकता शून्य होती है।
- द्रव्यमान संख्या में इलेक्ट्रॉनों का द्रव्यमान भी जोड़ा जाता है।
- बोर मॉडल ने इलेक्ट्रॉनों की स्थिरता की व्याख्या की।
भाग C : एक शब्द / एक वाक्य में उत्तर दीजिए
- परमाणु संख्या क्या है?
- द्रव्यमान संख्या किसे कहते हैं?
- प्रोटॉन कहाँ पाया जाता है?
- इलेक्ट्रॉन का आवेश क्या होता है?
- न्यूट्रॉन का आवेश कितना होता है?
- समस्थानिक किसे कहते हैं?
- समभारिक किसे कहते हैं?
- संयोजक इलेक्ट्रॉन क्या होते हैं?
- संयोजकता किसे कहते हैं?
- औसत परमाणु द्रव्यमान क्या है?
भाग D : लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
- डाल्टन के परमाणु सिद्धांत के मुख्य बिंदु लिखिए।
- कैथोड किरण प्रयोग से क्या निष्कर्ष प्राप्त हुए?
- रदरफोर्ड के स्वर्ण पर्णिका प्रयोग का वर्णन कीजिए।
- रदरफोर्ड मॉडल की दो सीमाएँ लिखिए।
- बोर मॉडल की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
- परमाणु संख्या एवं द्रव्यमान संख्या में अंतर स्पष्ट कीजिए।
- प्रोटॉन, न्यूट्रॉन एवं इलेक्ट्रॉन में अंतर लिखिए।
- इलेक्ट्रॉनिक विन्यास क्या है? उदाहरण सहित समझाइए।
- संयोजकता किस प्रकार निर्धारित की जाती है?
- समस्थानिक एवं समभारिक में अंतर लिखिए।
भाग E : दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
- परमाणु मॉडल के विकास की यात्रा का क्रमबद्ध वर्णन कीजिए।
- रदरफोर्ड के स्वर्ण पर्णिका प्रयोग की सहायता से परमाणु की संरचना समझाइए।
- बोर के परमाणु मॉडल की मुख्य विशेषताओं का विस्तार से वर्णन कीजिए।
- परमाणु संख्या, द्रव्यमान संख्या एवं इलेक्ट्रॉनिक विन्यास का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
- समस्थानिक एवं समभारिक की परिभाषा, विशेषताएँ तथा उदाहरण सहित अंतर स्पष्ट कीजिए।
भाग F : उच्च स्तरीय चिंतन प्रश्न (Competency Based Questions)
- यदि किसी तत्व की परमाणु संख्या 17 है, तो उसके इलेक्ट्रॉनों का वितरण लिखिए तथा उसकी संभावित संयोजकता बताइए।
- किसी परमाणु में 12 प्रोटॉन तथा 12 न्यूट्रॉन हैं। उसकी परमाणु संख्या एवं द्रव्यमान संख्या ज्ञात कीजिए।
- यदि किसी परमाणु के बाहरी कोश में 7 इलेक्ट्रॉन हैं, तो उसकी संयोजकता क्या होगी? कारण सहित उत्तर दीजिए।
- क्लोरीन के दो समस्थानिक होने पर भी उसका औसत परमाणु द्रव्यमान पूर्णांक क्यों नहीं होता?
- यदि किसी परमाणु में प्रोटॉनों की संख्या बदल दी जाए, तो उसके गुणों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? स्पष्ट कीजिए।
भाग G : परियोजना कार्य (Project Work)
- डाल्टन, जे. जे. टॉमसन, रदरफोर्ड, बोर एवं चैडविक के योगदान का समयरेखा (Timeline) तैयार कीजिए।
- पहले 20 तत्वों के संकेत चिन्ह, परमाणु संख्या तथा इलेक्ट्रॉनिक विन्यास की सारणी बनाइए।
- हाइड्रोजन एवं क्लोरीन के समस्थानिकों का चार्ट तैयार कीजिए।
- K, L, M तथा N कोशों में इलेक्ट्रॉनों के वितरण का मॉडल बनाइए।
- अपने आसपास उपयोग होने वाले ऐसे पदार्थों की सूची बनाइए जिनमें समस्थानिकों का उपयोग होता है।
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