जनन: जीवन की निरंतरता - Class 9 Science Exploration Hindi CBSE Notes
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CBSE Notes for Class 9 – Chapter-wise Revision Notes
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जनन: जीवन की निरंतरता - Class 9 Science Exploration Hindi CBSE Notes
जनन: जीवन की निरंतरता
Chapter 11. जनन — जीवन की निरंतरता
जनन वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा सजीव अपने जैसे नए जीव उत्पन्न करते हैं। यह प्रक्रिया पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता बनाए रखने के साथ-साथ जीवों में आनुवंशिक समानता और विविधता उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस अध्याय में अलैंगिक एवं लैंगिक जनन, पौधों और जंतुओं में जनन, मानव जनन तथा जनन से संबंधित विभिन्न प्रक्रियाओं का अध्ययन किया गया है।
Chapter Review
- जनन का अर्थ – जनन वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा सजीव अपने जैसे नए जीव उत्पन्न करते हैं।
- जीवन की निरंतरता – जनन के कारण एक जीव के समाप्त हो जाने के बाद भी उसकी संतति के माध्यम से जीवन की निरंतरता बनी रहती है।
- जनन के प्रमुख प्रकार – सजीव मुख्यतः अलैंगिक जनन और लैंगिक जनन द्वारा प्रजनन करते हैं।
- अलैंगिक जनन – इसमें सामान्यतः केवल एक जनक भाग लेता है और उत्पन्न संतति आनुवंशिक रूप से जनक के समान होती है।
- अलैंगिक जनन के उदाहरण – अमीबा, यीस्ट, हाइड्रा तथा अनेक पौधों में अलैंगिक जनन पाया जाता है।
- कायिक प्रवर्धन – पौधे के कायिक भागों जैसे तने, जड़ या पत्ती से नया पौधा बनने की प्रक्रिया कायिक प्रवर्धन कहलाती है।
- कायिक प्रवर्धन के उदाहरण – आलू, अदरक, मनीप्लांट, गन्ना और ब्रायोफिलम इसके उदाहरण हैं।
- कायिक प्रवर्धन की कृषि में उपयोगिता – इससे वांछित गुणों वाले पौधों को कम समय में बड़ी संख्या में तैयार किया जा सकता है।
- कायिक प्रवर्धन की विधियाँ – कटिंग, कलम बाँधना, परतन और ऊतक संवर्धन इसके प्रमुख तरीके हैं।
- कटिंग – पौधे के तने या शाखा के एक भाग को मिट्टी में लगाकर नया पौधा विकसित किया जाता है।
- कलम बाँधना – एक पौधे की स्वस्थ जड़युक्त शाखा या तने पर दूसरे वांछित पौधे की कलम स्थापित करके नया पौधा तैयार किया जाता है।
- परतन – पौधे की एक शाखा को जनक पौधे से जुड़े रहते हुए मिट्टी में दबाया जाता है; जड़ें बनने के बाद उसे अलग करके नया पौधा बनाया जाता है।
- ऊतक संवर्धन – पौधे के ऊतक या विशेष वृद्धि-भागों से प्रयोगशाला में बड़ी संख्या में स्वस्थ पौधे तैयार किए जा सकते हैं।
- यीस्ट में मुकुलन – यीस्ट की जनक कोशिका पर छोटा उभार या मुकुल बनता है, जो विकसित होकर नया जीव बन जाता है।
- हाइड्रा में मुकुलन – हाइड्रा के शरीर पर कोशिका विभाजन से मुकुल बनता है, जो विकसित होकर जनक से अलग स्वतंत्र जीव बन जाता है।
- बीजाणु निर्माण – कवक जैसे जीवों में बड़ी संख्या में बीजाणु बनते हैं, जो अनुकूल परिस्थितियों में अंकुरित होकर नए जीव उत्पन्न करते हैं।
- बीजाणुओं की विशेषता – बीजाणु छोटे, हल्के और सामान्यतः एककोशिकीय होते हैं तथा वायु द्वारा आसानी से फैल सकते हैं।
- समसूत्री विभाजन – अलैंगिक जनन में कोशिका विभाजन से सामान्यतः दो संतति कोशिकाएँ बनती हैं जिनमें जनक कोशिका के समान गुणसूत्र संख्या होती है।
- क्लोन – अलैंगिक जनन से उत्पन्न आनुवंशिक रूप से समान संततियों को क्लोन कहा जाता है।
- लैंगिक जनन – इसमें दो जनकों का आनुवंशिक योगदान होता है और संतति में दोनों जनकों के गुणों का संयोजन होता है।
- लैंगिक जनन में विविधता – दो जनकों के आनुवंशिक पदार्थ के मिश्रण के कारण संतति में विभिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं।
- विविधता का महत्त्व – विभिन्नताएँ जीवों को बदलते पर्यावरण के प्रति अनुकूलन में सहायता कर सकती हैं और दीर्घकाल में विकास में योगदान देती हैं।
- अर्धसूत्री विभाजन – यह विशेष प्रकार का कोशिका विभाजन है जिसमें गुणसूत्रों की संख्या आधी होकर अगुणित युग्मक बनते हैं।
- युग्मक – लैंगिक जनन में भाग लेने वाली अगुणित जनन कोशिकाओं को युग्मक कहते हैं; जंतुओं में नर युग्मक शुक्राणु और मादा युग्मक अंडाणु होते हैं।
- मानव में गुणसूत्र – मनुष्य की कोशिकाओं में 23 जोड़े अर्थात कुल 46 गुणसूत्र होते हैं।
- पुष्पीय पौधों में लैंगिक जनन – पुष्पीय पौधों में फूल जनन अंग के रूप में कार्य करता है और लैंगिक जनन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- पुष्प के चार प्रमुख भाग – बाह्यदल, दल, पुंकेसर और स्त्रीकेसर फूल के प्रमुख भाग हैं।
- पुंकेसर – यह फूल का नर जनन भाग है और इसमें तंतु तथा परागकोश होते हैं; परागकोश में परागकण बनते हैं।
- स्त्रीकेसर – यह फूल का मादा जनन भाग है और इसके मुख्य भाग वर्तिकाग्र, वर्तिका तथा अंडाशय हैं।
- अंडाशय – अंडाशय के भीतर बीजांड पाए जाते हैं और प्रत्येक बीजांड में मादा युग्मक पाया जाता है।
- परागण – परागकणों का परागकोश से वर्तिकाग्र तक स्थानांतरण परागण कहलाता है।
- परागण के माध्यम – वायु, जल, कीट तथा पक्षी जैसे विभिन्न माध्यम परागण में सहायता कर सकते हैं।
- स्व-परागण – जब परागकण उसी फूल या उसी पौधे के उपयुक्त वर्तिकाग्र तक पहुँचते हैं तो इसे स्व-परागण कहते हैं।
- पर-परागण – जब परागकण एक पौधे से उसी प्रजाति के दूसरे पौधे के वर्तिकाग्र तक पहुँचते हैं तो इसे पर-परागण कहते हैं।
- परागण की युक्तियाँ – फूलों का रंग, गंध, आकार और अन्य विशेषताएँ परागणकारियों को आकर्षित करने में सहायता कर सकती हैं।
- निषेचन – नर और मादा युग्मकों के संलयन को निषेचन कहते हैं। इससे युग्मनज का निर्माण होता है।
- युग्मनज – निषेचन के बाद बनने वाली कोशिका युग्मनज कहलाती है, जो आगे भ्रूण में विकसित होती है।
- फल और बीज का निर्माण – पुष्पीय पौधों में निषेचन के बाद अंडाशय फल में और बीजांड बीज में विकसित होते हैं।
- जंतुओं में जनन – जंतुओं में अलैंगिक तथा लैंगिक दोनों प्रकार के जनन पाए जा सकते हैं।
- बाह्य निषेचन – जब नर और मादा युग्मकों का संलयन शरीर के बाहर होता है, तो इसे बाह्य निषेचन कहते हैं।
- आंतरिक निषेचन – जब नर और मादा युग्मकों का संलयन मादा के शरीर के भीतर होता है, तो इसे आंतरिक निषेचन कहते हैं।
- आंतरिक निषेचन का लाभ – इसमें युग्मकों और प्रारंभिक भ्रूण के सुरक्षित रहने की संभावना अधिक होती है।
- जनन परिपक्वता – किशोरावस्था के दौरान शरीर में ऐसे शारीरिक और भावनात्मक परिवर्तन होते हैं जिनसे जनन अंग परिपक्व होते हैं और युग्मक बनने लगते हैं।
- मानव नर जनन तंत्र – इसमें वृषण, शुक्रवाहिनी, मूत्रमार्ग, प्रोस्टेट ग्रंथि, शुक्राशय और शिश्न आदि प्रमुख भाग शामिल हैं।
- वृषण का कार्य – वृषण नर जनन कोशिकाओं अर्थात शुक्राणुओं का निर्माण करते हैं तथा जनन से संबंधित हार्मोन स्रावित करते हैं।
- मानव मादा जनन तंत्र – इसमें अंडाशय, अंडवाहिनी, गर्भाशय, गर्भाशय ग्रीवा और योनि प्रमुख भाग हैं।
- अंडाशय का कार्य – अंडाशय अंडाणु उत्पन्न करते हैं और जनन से संबंधित हार्मोन भी स्रावित करते हैं।
- गर्भाशय – निषेचन के बाद विकसित होने वाला भ्रूण गर्भाशय में आगे विकसित होता है।
- युग्मकजनन – युग्मकों के निर्माण की प्रक्रिया को युग्मकजनन कहते हैं।
- अंडोत्सर्ग – अंडाशय से परिपक्व अंडाणु के निकलने की प्रक्रिया अंडोत्सर्ग कहलाती है।
- रजोधर्म या माहवारी – यदि निषेचन नहीं होता है तो गर्भाशय की आंतरिक परत रक्त के साथ शरीर से बाहर निकलती है; इसे रजोधर्म या माहवारी कहते हैं।
- मासिक चक्र – अंडोत्सर्ग, गर्भाशय की तैयारी और माहवारी से संबंधित घटनाएँ सामान्यतः 21–35 दिनों के चक्र में दोहराती हैं।
- निषेचन और गर्भावस्था – शुक्राणु और अंडाणु के संलयन से युग्मनज बनता है, जो आगे भ्रूण में विकसित होता है और गर्भावस्था आरंभ होती है।
- गर्भावस्था – भ्रूण का गर्भाशय में विकास गर्भावस्था कहलाता है और इसकी सामान्य अवधि लगभग नौ माह होती है।
- गर्भावस्था के दौरान देखभाल – उचित पोषण, नियमित चिकित्सा जाँच, पर्याप्त विश्राम तथा हानिकारक पदार्थों से बचाव माँ और भ्रूण दोनों के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।
- जन्म नियंत्रण – अनचाहे गर्भधारण को रोकने के लिए विभिन्न जन्म नियंत्रण विधियों का उपयोग किया जा सकता है।
- जन्म नियंत्रण की विधियाँ – कंडोम, गोलियाँ और अंतर्गर्भाशयी युक्ति जैसे कॉपर-T अध्याय में दिए गए प्रमुख उदाहरण हैं।
- आई.वी.एफ. (IVF) – निषेचन की ऐसी तकनीक जिसमें अंडाणु और शुक्राणु का संलयन शरीर के बाहर नियंत्रित परिस्थितियों में कराया जाता है; अध्याय में इसके वैज्ञानिक एवं सामाजिक संदर्भ पर भी चर्चा की गई है।
- जनन और कृषि – अलैंगिक जनन से समान गुणों वाले पौधों का तेजी से प्रवर्धन किया जा सकता है, जबकि लैंगिक जनन आनुवंशिक विविधता उत्पन्न करने में उपयोगी है।
- जनन और जीवन की निरंतरता – जनन केवल नए जीवों के निर्माण की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह आनुवंशिक जानकारी के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानांतरण तथा जीवों की निरंतरता का आधार है।
Chapter in One View
जनन → अलैंगिक जनन → कायिक प्रवर्धन → मुकुलन → बीजाणु निर्माण → लैंगिक जनन → अर्धसूत्री विभाजन → युग्मक → पुष्पीय पौधों में परागण → निषेचन → युग्मनज → बीज एवं फल → जंतुओं में जनन → मानव जनन → युग्मकजनन → अंडोत्सर्ग → निषेचन → गर्भावस्था → जन्म नियंत्रण
Exam Focus
- अलैंगिक और लैंगिक जनन में अंतर।
- कायिक प्रवर्धन की विधियाँ और कृषि में उपयोगिता।
- मुकुलन और बीजाणु निर्माण।
- समसूत्री और अर्धसूत्री विभाजन की भूमिका।
- लैंगिक जनन में आनुवंशिक विविधता का महत्त्व।
- पुष्प के भाग और उनके कार्य।
- स्व-परागण और पर-परागण।
- परागण और निषेचन में अंतर।
- निषेचन के बाद फल और बीज का निर्माण।
- बाह्य और आंतरिक निषेचन।
- मानव नर एवं मादा जनन तंत्र के प्रमुख अंग।
- युग्मकजनन, अंडोत्सर्ग और रजोधर्म।
- निषेचन से भ्रूण और गर्भावस्था तक की प्रक्रिया।
- जन्म नियंत्रण की प्रमुख विधियाँ।
- गर्भावस्था के दौरान उचित पोषण, चिकित्सा जाँच और स्वास्थ्य देखभाल।
जनन: जीवन की निरंतरता
अध्याय 11. जनन — जीवन की निरंतरता
सभी सजीव जन्म लेते हैं, वृद्धि करते हैं, परिपक्व होते हैं और अंततः अपने जीवन-काल को पूरा करते हैं। सजीवों की नई पीढ़ी का निर्माण जनन द्वारा होता है। इसलिए जनन पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता बनाए रखने वाली एक महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रिया है।
जनन (Reproduction)
परिभाषा: वह जैविक प्रक्रिया जिसके द्वारा कोई सजीव अपने समान नए सजीव उत्पन्न करता है, जनन (Reproduction) कहलाती है।
जनन के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जीवन और आनुवंशिक जानकारी का स्थानांतरण होता है। किसी जीव का जीवन समाप्त हो जाने पर भी उसकी संतति के माध्यम से उसकी प्रजाति बनी रहती है। इसलिए जनन किसी एक जीव के जीवित रहने के लिए नहीं, बल्कि प्रजाति की निरंतरता के लिए आवश्यक है।
जनन का महत्त्व
- जनन से सजीवों की नई पीढ़ी उत्पन्न होती है।
- यह किसी प्रजाति की निरंतरता बनाए रखता है।
- जनन के द्वारा आनुवंशिक जानकारी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती है।
- लैंगिक जनन के दौरान उत्पन्न विभिन्नताएँ बदलते पर्यावरण में जीवों के अनुकूलन में सहायता कर सकती हैं।
- जनन के कारण पृथ्वी पर जीवन का क्रम लगातार बना रहता है।
जनन के प्रकार
सजीवों में जनन मुख्यतः दो प्रकार का होता है—
- अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction)
- लैंगिक जनन (Sexual Reproduction)
अलैंगिक जनन
परिभाषा: वह जनन जिसमें नए जीव के निर्माण में सामान्यतः केवल एक जनक भाग लेता है और नर तथा मादा युग्मकों के संलयन की आवश्यकता नहीं होती, अलैंगिक जनन कहलाता है।
अलैंगिक जनन में उत्पन्न संतति सामान्यतः अपने जनक के आनुवंशिक रूप से समान होती है। इस कारण ऐसी संततियों को क्लोन (Clone) कहा जाता है।
अलैंगिक जनन अपेक्षाकृत सरल और तेज प्रक्रिया हो सकती है। यीस्ट और हाइड्रा जैसे जीवों में अलैंगिक जनन की विभिन्न विधियाँ पाई जाती हैं। पौधों में भी कायिक प्रवर्धन अलैंगिक जनन का एक प्रमुख उदाहरण है।
लैंगिक जनन
परिभाषा: वह जनन जिसमें नर और मादा जनकों के आनुवंशिक योगदान से नई संतति का निर्माण होता है और नर तथा मादा युग्मकों का संलयन होता है, लैंगिक जनन कहलाता है।
लैंगिक जनन में बनने वाली संतति अपने दोनों जनकों के गुणों का संयोजन प्राप्त करती है। इसलिए संतति सामान्यतः किसी एक जनक की बिल्कुल समान प्रतिलिपि नहीं होती।
लैंगिक जनन के दौरान आनुवंशिक पदार्थ के पुनर्संयोजन के कारण संतति में विभिन्नताएँ (Variations) उत्पन्न हो सकती हैं। यही विभिन्नताएँ बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों में जीवों के अनुकूलन और दीर्घकालीन विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
अलैंगिक और लैंगिक जनन में अंतर
| आधार | अलैंगिक जनन | लैंगिक जनन |
|---|---|---|
| जनकों की संख्या | सामान्यतः एक जनक | दो जनकों का आनुवंशिक योगदान |
| युग्मक | युग्मकों के संलयन की आवश्यकता नहीं | नर और मादा युग्मकों का संलयन होता है |
| संतति | सामान्यतः जनक के आनुवंशिक रूप से समान | दोनों जनकों के गुणों का संयोजन |
| विभिन्नता | बहुत कम या नहीं के बराबर | विभिन्नताएँ उत्पन्न हो सकती हैं |
| गति | सामान्यतः तेज | तुलनात्मक रूप से अधिक जटिल |
| मुख्य महत्त्व | तेजी से संख्या बढ़ाने में उपयोगी | आनुवंशिक विविधता उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण |
Concept Builder
जनन = नए जीवों का निर्माण + प्रजाति की निरंतरता
एक जनक + युग्मक संलयन नहीं = अलैंगिक जनन
दो जनकों का आनुवंशिक योगदान + युग्मक संलयन = लैंगिक जनन
अलैंगिक जनन → समान संतति
लैंगिक जनन → विभिन्नता की संभावना
Exam Booster
- जनन क्या है? — वह जैविक प्रक्रिया जिसके द्वारा सजीव नए सजीव उत्पन्न करते हैं।
- जनन क्यों आवश्यक है? — प्रजाति की निरंतरता बनाए रखने के लिए।
- जनन कितने प्रकार का होता है? — दो प्रकार का: अलैंगिक और लैंगिक जनन।
- अलैंगिक जनन में कितने जनक भाग लेते हैं? — सामान्यतः एक जनक।
- लैंगिक जनन की प्रमुख विशेषता क्या है? — नर और मादा युग्मकों का संलयन तथा दोनों जनकों का आनुवंशिक योगदान।
- अलैंगिक जनन से उत्पन्न आनुवंशिक रूप से समान संततियों को क्या कहते हैं? — क्लोन।
- लैंगिक जनन का प्रमुख महत्त्व क्या है? — आनुवंशिक विभिन्नताएँ उत्पन्न करना, जो बदलते पर्यावरण में अनुकूलन में सहायक हो सकती हैं।
जनन: जीवन की निरंतरता
अध्याय 11. जनन — जीवन की निरंतरता
अलैंगिक जनन जनन की अपेक्षाकृत सरल विधि है। इसमें नए जीव के निर्माण के लिए सामान्यतः केवल एक जनक की आवश्यकता होती है। यह अनेक एककोशिकीय जीवों, सरल बहुकोशिकीय जीवों तथा अनेक पौधों में पाया जाता है।
अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction)
परिभाषा: वह जनन जिसमें नए जीव के निर्माण में केवल एक जनक भाग लेता है और नर तथा मादा युग्मकों के संलयन की आवश्यकता नहीं होती, अलैंगिक जनन कहलाता है।
अलैंगिक जनन में उत्पन्न संतति सामान्यतः अपने जनक के आनुवंशिक रूप से समान होती है। इसलिए इसमें उत्पन्न संततियों में जनक के समान गुण पाए जाते हैं।
अलैंगिक जनन की प्रमुख विशेषताएँ
- इसमें सामान्यतः केवल एक जनक भाग लेता है।
- नर और मादा युग्मकों के संलयन की आवश्यकता नहीं होती।
- उत्पन्न संतति सामान्यतः आनुवंशिक रूप से जनक के समान होती है।
- यह अपेक्षाकृत सरल और तेज जनन विधि है।
- अनुकूल परिस्थितियों में जीवों की संख्या तेजी से बढ़ सकती है।
- यह जीवाणु, अमीबा, यीस्ट, हाइड्रा, स्पंज तथा अनेक पौधों में पाया जाता है।
पौधों में कायिक प्रवर्धन
परिभाषा: जब पौधे के कायिक अर्थात वृद्धि करने वाले भागों से नए पौधे विकसित होते हैं, तो इस प्रकार के अलैंगिक जनन को कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation) कहते हैं।
अनेक पौधे बीज के बिना अपने विद्यमान भागों से नए प्ररोह और जड़ें विकसित कर सकते हैं। आलू और अदरक के भूमिगत तनों से, मनीप्लांट और गन्ने के तने की कटिंग से तथा ब्रायोफिलम की पत्तियों पर बनने वाले छोटे पादपकों से नए पौधे विकसित हो सकते हैं।
कायिक प्रवर्धन के उदाहरण
- आलू – भूमिगत तने से नए पौधे।
- अदरक – भूमिगत तने से नए पौधे।
- मनीप्लांट – तने की कटिंग से।
- गन्ना – तने की कटिंग से।
- ब्रायोफिलम – पत्तियों पर बनने वाले छोटे पादपकों से।
कृषि में कायिक प्रवर्धन का महत्त्व
अलैंगिक जनन से उत्पन्न पौधे आनुवंशिक रूप से समान होते हैं। इसी प्राकृतिक प्रक्रिया को वैज्ञानिकों और बागवानी विशेषज्ञों ने उपयोगी तकनीकों में विकसित किया है। कर्तन, कलम बाँधना, परतन और ऊतक संवर्धन जैसी विधियों से पौधों का प्रभावी तथा बड़े स्तर पर प्रवर्धन किया जा सकता है।
- वांछित गुणों वाले पौधों का बड़े स्तर पर उत्पादन किया जा सकता है।
- एक समान गुणों वाले पौधे तैयार किए जा सकते हैं।
- कृषि और बागवानी की उत्पादन क्षमता बढ़ाने में सहायता मिलती है।
- उच्च उपज वाली पौध किस्मों के प्रवर्धन में उपयोगी है।
कर्तन (Cutting)
परिभाषा: पौधे के तने या प्ररोह के उपयुक्त भाग को काटकर उससे नया पौधा विकसित करने की विधि को कर्तन कहते हैं।
कर्तन के लिए पौधे की उपयुक्त शाखा या प्ररोह लिया जाता है। उसके निचले भाग की पत्तियाँ हटाकर उसे खाद मिली मिट्टी में लगाया जाता है। नियमित पानी और अनुकूल परिस्थितियों में उस कर्तन से नया पौधा विकसित हो सकता है।
कर्तन की सामान्य प्रक्रिया
- स्वस्थ प्ररोह या शाखा की कर्तन तैयार की जाती है।
- कर्तन के निचले भाग की पत्तियाँ हटा दी जाती हैं।
- कर्तन को खाद मिली मिट्टी में लगाया जाता है।
- इसे नियमित रूप से पानी दिया जाता है।
- उपयुक्त परिस्थितियों में नया पौधा विकसित होता है।
कलम बाँधना (Grafting)
परिभाषा: दो उपयुक्त पौधों के भागों को जोड़कर एक पौधे के रूप में विकसित करने की विधि को कलम बाँधना (Grafting) कहते हैं।
इस विधि में एक स्वस्थ आधार पौधा लिया जाता है और किसी अन्य वांछित किस्म के पौधे की स्वस्थ कलम उसके तने पर लगाए गए चीरे में स्थापित की जाती है। जोड़ को तब तक सुरक्षित रखा जाता है जब तक कलम अच्छी तरह स्थापित न हो जाए।
कलम बाँधने की सामान्य प्रक्रिया
- एक स्वस्थ आधार पौधा और वांछित गुणों वाली कलम चुनी जाती है।
- आधार पौधे की टहनी पर चीरा लगाया जाता है।
- दूसरे पौधे की कलम को उस चीरे में स्थापित किया जाता है।
- जोड़ को कपड़े या रैपिंग फिल्म से सुरक्षित किया जाता है।
- नियमित पानी देकर दोनों भागों की वृद्धि का अवलोकन किया जाता है।
कलम बाँधने की आधुनिक तकनीक किसानों को अधिक उपज देने वाले फलदार पौधों के उत्पादन में सहायता कर सकती है।
परतन (Layering)
परिभाषा: पौधे की किसी लचीली शाखा के एक भाग को मिट्टी में दबाकर उसमें जड़ें विकसित करने और बाद में उसे जनक पौधे से अलग करके नया पौधा बनाने की विधि को परतन कहते हैं।
परतन की प्रक्रिया
- किसी पेड़ या झाड़ी की लचीली और पतली शाखा चुनी जाती है।
- शाखा के बीच के भाग को मिट्टी के नीचे दबाया जाता है।
- दबे हुए भाग को नियमित पानी दिया जाता है।
- लगभग 10–15 दिनों बाद उस भाग में जड़ें विकसित हो सकती हैं।
- जड़ें बनने के बाद शाखा को जनक पौधे से अलग कर दिया जाता है।
- अलग किया गया भाग नए पौधे के रूप में विकसित होता है।
नींबू जैसे पौधों में परतन विधि का प्रयोग किया जा सकता है।
ऊतक संवर्धन (Tissue Culture)
परिभाषा: पौधे के उपयुक्त ऊतक या वृद्धि-भाग से नियंत्रित परिस्थितियों में नए पौधे विकसित करने की तकनीक को ऊतक संवर्धन कहते हैं।
ऊतक संवर्धन ने पौधों के प्रवर्धन में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया है। उदाहरण के रूप में केले की खेती में पौधों के प्ररोह शीर्ष से बड़े स्तर पर स्वस्थ पादपक तैयार किए जा सकते हैं। यह तकनीक विषाणु-संक्रमित पौधों को हटाने में सहायता करती है और उच्च उपज सुनिश्चित करने में उपयोगी हो सकती है। यह पौधों में अलैंगिक जनन का एक उदाहरण है।
यीस्ट में मुकुलन
परिभाषा: जनक कोशिका के शरीर पर एक छोटा उभार या मुकुल बनकर उससे नया जीव विकसित होने की प्रक्रिया को मुकुलन (Budding) कहते हैं।
यीस्ट में जनक कोशिका से छोटे गोलाकार मुकुल निकलते हैं। मुकुल बढ़ता है और विकसित होकर नया जीव बन सकता है। इस प्रकार यीस्ट में अलैंगिक जनन मुकुलन द्वारा होता है।
हाइड्रा में मुकुलन
हाइड्रा जैसे सरल बहुकोशिकीय जीव में जनक शरीर के किसी विशेष स्थान पर बार-बार कोशिका विभाजन से एक छोटा उभार बनता है। यह उभार मुकुल कहलाता है। मुकुल बढ़कर विकसित होता है और बाद में जनक से अलग होकर स्वतंत्र रूप से जीवन जी सकता है। हाइड्रा में एक साथ कई मुकुल भी विकसित हो सकते हैं।
कवक में बीजाणु निर्माण
परिभाषा: बीजाणुओं के निर्माण द्वारा नए जीव उत्पन्न करने की अलैंगिक जनन विधि को बीजाणु निर्माण (Spore Formation) कहते हैं।
कवक में बीजाणु थैली जैसी संरचना या कवक तंतुओं की फूली हुई संरचना पर बन सकते हैं। बीजाणु बहुत बड़ी संख्या में बनते हैं। वे हल्के और सामान्यतः एककोशिकीय होते हैं तथा वायु धाराओं के साथ आसानी से फैल सकते हैं। नमी और पोषक तत्व मिलने पर वे शीघ्र अंकुरित होकर नए जीव विकसित कर सकते हैं।
उदाहरण: राइजोपस और ऐस्पर्जिलस जैसे कवकों में बीजाणु निर्माण देखा जा सकता है।
बीजाणु निर्माण का महत्त्व
कवक बीजाणुओं द्वारा तेजी से फैल सकते हैं। कुछ कवक कार्बनिक अपशिष्टों और प्रदूषकों के अपघटन में उपयोगी होते हैं तथा कुछ औद्योगिक प्रक्रियाओं और प्रतिजैविकों के उत्पादन में भी महत्त्वपूर्ण हैं।
अलैंगिक जनन में समसूत्री विभाजन
परिभाषा: वह कोशिका विभाजन जिसमें एक जनक कोशिका से दो संतति कोशिकाएँ बनती हैं और प्रत्येक संतति में जनक कोशिका के समान गुणसूत्र संख्या होती है, समसूत्री विभाजन (Mitosis) कहलाता है।
अध्याय में अध्ययन किए गए अलैंगिक जनन के जीवों में समसूत्री विभाजन प्रमुख प्रक्रिया है। इसके कारण बनने वाली संतति सामान्यतः आनुवंशिक रूप से जनक के समरूप होती है।
क्लोन (Clone)
परिभाषा: अलैंगिक जनन से उत्पन्न ऐसी संततियाँ जो आनुवंशिक रूप से जनक के समान होती हैं, क्लोन कहलाती हैं।
अलैंगिक जनन में गुणसूत्रों की संख्या और आनुवंशिक जानकारी सामान्यतः समान रहने के कारण संतति जनक के समान होती है। यह प्रक्रिया अनुकूल परिस्थितियों में जीवों की संख्या को तेजी से बढ़ाने में सहायक होती है।
अलैंगिक जनन की प्रमुख विधियाँ — एक नजर में
| विधि | उदाहरण | मुख्य विचार |
|---|---|---|
| कायिक प्रवर्धन | आलू, अदरक, मनीप्लांट, गन्ना, ब्रायोफिलम | कायिक भाग से नया पौधा |
| कर्तन | मनीप्लांट, गन्ना | कटिंग से नया पौधा |
| कलम बाँधना | गुलाब आदि | दो पौधों के उपयुक्त भागों को जोड़ना |
| परतन | नींबू आदि | शाखा के दबे भाग में जड़ें विकसित करना |
| ऊतक संवर्धन | केला | ऊतक से नियंत्रित परिस्थितियों में पौधे विकसित करना |
| मुकुलन | यीस्ट, हाइड्रा | मुकुल से नया जीव |
| बीजाणु निर्माण | राइजोपस, ऐस्पर्जिलस | बीजाणुओं से नए जीव |
Concept Builder
एक जनक → युग्मक संलयन नहीं → अलैंगिक जनन
कायिक भाग → नया पौधा = कायिक प्रवर्धन
कटिंग → नया पौधा = कर्तन
शाखा मिट्टी में दबाना → जड़ें → नया पौधा = परतन
उभार → नया जीव = मुकुलन
बीजाणु → अंकुरण → नया जीव = बीजाणु निर्माण
समसूत्री विभाजन → समान गुणसूत्र संख्या → आनुवंशिक रूप से समान संतति → क्लोन
Exam Booster
- अलैंगिक जनन क्या है? — एक जनक द्वारा बिना युग्मक संलयन के नए जीव उत्पन्न करने की प्रक्रिया।
- कायिक प्रवर्धन क्या है? — पौधे के कायिक भागों से नए पौधे बनने की प्रक्रिया।
- कायिक प्रवर्धन के दो उदाहरण दीजिए। — आलू और अदरक।
- कर्तन क्या है? — पौधे के तने या प्ररोह की कटिंग से नया पौधा विकसित करने की विधि।
- कलम बाँधना क्या है? — दो उपयुक्त पौधों के भागों को जोड़कर नया पौधा विकसित करने की विधि।
- परतन क्या है? — शाखा के एक भाग को मिट्टी में दबाकर जड़ें विकसित करने और बाद में नया पौधा बनाने की विधि।
- ऊतक संवर्धन का एक प्रमुख उपयोग क्या है? — बड़े स्तर पर स्वस्थ पौध तैयार करना, जैसे केले की खेती में।
- यीस्ट में अलैंगिक जनन किस विधि से होता है? — मुकुलन।
- हाइड्रा में कौन-सा अलैंगिक जनन पाया जाता है? — मुकुलन।
- कवक में बीजाणु क्यों उपयोगी हैं? — वे हल्के होते हैं, वायु द्वारा फैल सकते हैं और अनुकूल परिस्थितियों में नए जीव बना सकते हैं।
- समसूत्री विभाजन क्या है? — ऐसा कोशिका विभाजन जिसमें दो संतति कोशिकाएँ बनती हैं और उनकी गुणसूत्र संख्या जनक कोशिका के समान रहती है।
- क्लोन क्या है? — अलैंगिक जनन से उत्पन्न आनुवंशिक रूप से समान संतति।
जनन: जीवन की निरंतरता
अध्याय 11. जनन — जीवन की निरंतरता
अलैंगिक जनन की तुलना में लैंगिक जनन अधिक जटिल प्रक्रिया है। इसमें जनन कोशिकाओं का निर्माण, उनका संलयन और नई संतति का विकास शामिल होता है। लैंगिक जनन के कारण संतति में विभिन्नताएँ उत्पन्न हो सकती हैं, जो जीवों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
लैंगिक जनन की आवश्यकता
लैंगिक जनन में दो जनकों का आनुवंशिक योगदान होता है। नर और मादा जनन कोशिकाओं के संलयन से नई संतति का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया के कारण संतति में दोनों जनकों के गुणों का संयोजन होता है।
अलैंगिक जनन में उत्पन्न संतति सामान्यतः जनक के समान होती है, जबकि लैंगिक जनन में आनुवंशिक पदार्थ के पुनर्संयोजन के कारण संतति में विभिन्नताएँ उत्पन्न हो सकती हैं। यही विभिन्नताएँ जीवों को बदलती हुई पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलित होने में सहायता कर सकती हैं।
लैंगिक जनन में विभिन्नता
विभिन्नता (Variation): संतति और उसके जनकों अथवा एक ही प्रजाति के विभिन्न सदस्यों के गुणों में दिखाई देने वाले अंतर को विभिन्नता कहते हैं।
लैंगिक जनन के दौरान दो जनकों की आनुवंशिक सामग्री के संयोजन से नई आनुवंशिक संरचनाएँ बन सकती हैं। इसलिए एक ही माता-पिता से उत्पन्न संतानों में भी कुछ गुणों में अंतर दिखाई दे सकता है।
अर्धसूत्री विभाजन
परिभाषा: वह विशेष प्रकार का कोशिका विभाजन जिसमें गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है और अगुणित जनन कोशिकाएँ बनती हैं, अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) कहलाता है।
लैंगिक जनन में अर्धसूत्री विभाजन का विशेष महत्त्व है। इससे बनने वाली जनन कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या मूल कोशिका की तुलना में आधी रहती है।
निषेचन के समय नर और मादा युग्मकों के संलयन से गुणसूत्रों की संख्या फिर से सामान्य हो जाती है। इस प्रकार पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुणसूत्रों की संख्या बनी रहती है।
अर्धसूत्री विभाजन का महत्त्व
- जनन कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या आधी करता है।
- नर और मादा युग्मकों के संलयन के बाद गुणसूत्रों की सामान्य संख्या पुनः स्थापित होती है।
- लैंगिक जनन के लिए आवश्यक अगुणित युग्मकों के निर्माण में सहायता करता है।
- आनुवंशिक विभिन्नताओं के निर्माण में योगदान देता है।
युग्मक (Gametes)
परिभाषा: लैंगिक जनन में भाग लेने वाली विशेष जनन कोशिकाओं को युग्मक (Gametes) कहते हैं।
- नर युग्मक: शुक्राणु
- मादा युग्मक: अंडाणु
युग्मक अगुणित होते हैं, अर्थात इनमें गुणसूत्रों का एक सेट होता है। निषेचन के समय नर और मादा युग्मक मिलकर द्विगुणित युग्मनज बनाते हैं।
पौधों में लैंगिक जनन
पुष्पीय पौधों में फूल लैंगिक जनन का प्रमुख अंग है। फूल में नर और मादा जनन अंग पाए जाते हैं। नर जनन अंग को पुंकेसर और मादा जनन अंग को स्त्रीकेसर कहते हैं।
पुंकेसर
परिभाषा: फूल का नर जनन अंग पुंकेसर (Stamen) कहलाता है।
पुंकेसर के दो मुख्य भाग होते हैं—
- तंतु (Filament)
- परागकोश (Anther)
परागकोश में परागकण बनते हैं। परागकणों में नर जनन कोशिकाएँ होती हैं।
स्त्रीकेसर
परिभाषा: फूल का मादा जनन अंग स्त्रीकेसर (Pistil/Carpel) कहलाता है।
स्त्रीकेसर के तीन मुख्य भाग होते हैं—
- वर्तिकाग्र (Stigma)
- वर्तिका (Style)
- अंडाशय (Ovary)
अंडाशय के भीतर बीजांड (Ovules) पाए जाते हैं। बीजांड में मादा जनन कोशिका अर्थात अंडाणु पाया जाता है।
परागण
परिभाषा: परागकणों का परागकोश से फूल के वर्तिकाग्र तक पहुँचने की प्रक्रिया को परागण (Pollination) कहते हैं।
परागण लैंगिक जनन की एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक प्रक्रिया है। परागकण अपने आप वर्तिकाग्र तक नहीं पहुँचते; उन्हें वायु, जल, कीट या पक्षियों जैसे विभिन्न माध्यमों की सहायता मिल सकती है।
स्व-परागण
परिभाषा: जब किसी फूल के परागकण उसी फूल या उसी पौधे के उपयुक्त वर्तिकाग्र तक पहुँचते हैं, तो इसे स्व-परागण कहते हैं।
पर-परागण
परिभाषा: जब किसी पौधे के फूल के परागकण उसी प्रजाति के दूसरे पौधे के फूल के वर्तिकाग्र तक पहुँचते हैं, तो इसे पर-परागण कहते हैं।
पर-परागण में दो अलग पौधों के आनुवंशिक पदार्थ के मिलने की संभावना होने के कारण यह विभिन्नता उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण हो सकता है।
परागण के माध्यम
- वायु – हल्के परागकण वायु द्वारा एक फूल से दूसरे फूल तक पहुँच सकते हैं।
- जल – कुछ जलीय पौधों में जल परागण में सहायता करता है।
- कीट – मधुमक्खी और तितली जैसे कीट फूलों से परागकण एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जा सकते हैं।
- पक्षी – कुछ फूलों में पक्षी परागण में सहायता करते हैं।
निषेचन
परिभाषा: नर और मादा युग्मकों के संलयन की प्रक्रिया को निषेचन (Fertilisation) कहते हैं।
पौधों में परागकण वर्तिकाग्र पर पहुँचने के बाद उचित परिस्थितियों में आगे बढ़ते हैं। नर जनन कोशिका अंडाशय में स्थित बीजांड तक पहुँचती है और मादा युग्मक के साथ संलयित होती है।
नर और मादा युग्मक के संलयन से युग्मनज (Zygote) बनता है। यही युग्मनज आगे विभाजित होकर भ्रूण के रूप में विकसित होता है।
निषेचन के बाद परिवर्तन
- निषेचन के बाद युग्मनज बनता है।
- युग्मनज आगे विभाजित होकर भ्रूण का निर्माण करता है।
- बीजांड आगे चलकर बीज में विकसित होता है।
- अंडाशय आगे चलकर फल में विकसित होता है।
- इस प्रकार निषेचन के बाद फूल के विभिन्न भागों में महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं।
Concept Builder
अर्धसूत्री विभाजन → अगुणित युग्मक → परागण → नर युग्मक + मादा युग्मक → निषेचन → युग्मनज → भ्रूण
पुंकेसर → नर जनन अंग → परागकण
स्त्रीकेसर → मादा जनन अंग → बीजांड → अंडाणु
परागण ≠ निषेचन
परागण में परागकण का स्थानांतरण होता है, जबकि निषेचन में नर और मादा युग्मकों का संलयन होता है।
Exam Booster
- लैंगिक जनन में विभिन्नता क्यों उत्पन्न होती है? — दो जनकों की आनुवंशिक सामग्री के संयोजन के कारण।
- अर्धसूत्री विभाजन का मुख्य कार्य क्या है? — गुणसूत्रों की संख्या आधी करके अगुणित युग्मकों का निर्माण करना।
- युग्मक क्या हैं? — लैंगिक जनन में भाग लेने वाली जनन कोशिकाएँ।
- पुंकेसर क्या है? — फूल का नर जनन अंग।
- स्त्रीकेसर क्या है? — फूल का मादा जनन अंग।
- परागण क्या है? — परागकणों का परागकोश से वर्तिकाग्र तक स्थानांतरण।
- स्व-परागण और पर-परागण में मुख्य अंतर क्या है? — स्व-परागण में परागकण उसी फूल या उसी पौधे तक पहुँचते हैं, जबकि पर-परागण में वे उसी प्रजाति के दूसरे पौधे तक पहुँचते हैं।
- निषेचन क्या है? — नर और मादा युग्मकों का संलयन।
- निषेचन के बाद क्या बनता है? — युग्मनज।
- बीजांड और अंडाशय का क्या विकास होता है? — बीजांड से बीज और अंडाशय से फल विकसित होता है।
जनन: जीवन की निरंतरता
अध्याय 11. जनन — जीवन की निरंतरता
लैंगिक जनन केवल पौधों तक सीमित नहीं है। जंतुओं में भी नर और मादा जनन कोशिकाओं के निर्माण तथा उनके संलयन से नई संतति उत्पन्न होती है। जंतुओं में निषेचन शरीर के बाहर या भीतर हो सकता है।
जंतुओं में लैंगिक जनन
परिभाषा: जंतुओं में वह जनन प्रक्रिया जिसमें नर और मादा युग्मकों के संलयन से नई संतति का निर्माण होता है, लैंगिक जनन कहलाती है।
जंतुओं में नर जनन कोशिका को शुक्राणु और मादा जनन कोशिका को अंडाणु कहते हैं। दोनों युग्मकों के मिलने से युग्मनज बनता है, जो आगे विकसित होकर नया जीव बनाता है।
जंतुओं में निषेचन
जंतुओं में निषेचन मुख्यतः दो प्रकार का होता है—
- बाह्य निषेचन (External Fertilisation)
- आंतरिक निषेचन (Internal Fertilisation)
बाह्य निषेचन
परिभाषा: जब नर और मादा युग्मकों का संलयन मादा के शरीर के बाहर होता है, तो इसे बाह्य निषेचन कहते हैं।
इस प्रकार के निषेचन में नर और मादा युग्मक सामान्यतः जल में छोड़े जाते हैं। जल का माध्यम दोनों युग्मकों को मिलने में सहायता करता है।
उदाहरण: मेंढक और कई मछलियों में बाह्य निषेचन पाया जाता है।
बाह्य निषेचन की विशेषताएँ
- निषेचन शरीर के बाहर होता है।
- नर और मादा युग्मक बाहरी वातावरण में मिलते हैं।
- जल इस प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है।
- अंडों और भ्रूण के बाहरी वातावरण के संपर्क में रहने के कारण उनकी सुरक्षा एक चुनौती हो सकती है।
आंतरिक निषेचन
परिभाषा: जब नर और मादा युग्मकों का संलयन मादा के शरीर के भीतर होता है, तो इसे आंतरिक निषेचन कहते हैं।
इसमें नर जनक के शुक्राणु मादा जनक के शरीर में पहुँचते हैं और वहाँ अंडाणु के साथ संलयन करते हैं। निषेचन के बाद बनने वाला युग्मनज मादा के शरीर में आगे विकसित हो सकता है।
उदाहरण: मनुष्य तथा अनेक स्थलीय जंतुओं में आंतरिक निषेचन पाया जाता है।
आंतरिक निषेचन की विशेषताएँ
- निषेचन मादा के शरीर के भीतर होता है।
- शुक्राणु और अंडाणु के मिलने की संभावना अधिक प्रभावी ढंग से बनी रहती है।
- प्रारंभिक भ्रूण को बाहरी परिस्थितियों से अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षा मिल सकती है।
- यह स्थलीय जीवन जीने वाले अनेक जंतुओं में पाया जाता है।
बाह्य और आंतरिक निषेचन में अंतर
| आधार | बाह्य निषेचन | आंतरिक निषेचन |
|---|---|---|
| निषेचन का स्थान | मादा के शरीर के बाहर | मादा के शरीर के भीतर |
| माध्यम | जल महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है | मादा का जनन तंत्र |
| उदाहरण | मेंढक, कई मछलियाँ | मनुष्य तथा अनेक स्थलीय जंतु |
| युग्मकों की सुरक्षा | बाहरी वातावरण के संपर्क में अधिक | शरीर के भीतर अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षा |
निषेचन के बाद विकास
निषेचन के बाद नर और मादा युग्मकों के संलयन से युग्मनज बनता है। युग्मनज लगातार विभाजित होकर कोशिकाओं की संख्या बढ़ाता है और धीरे-धीरे एक विकसित भ्रूण का रूप लेने लगता है।
भ्रूण के विकास का तरीका अलग-अलग जंतुओं में अलग हो सकता है। कुछ जंतु अंडे देते हैं, जबकि कुछ जंतु अपने शरीर के भीतर भ्रूण का विकास होने के बाद बच्चे को जन्म देते हैं।
अंडज जंतु
परिभाषा: वे जंतु जो अंडे देते हैं और जिनमें भ्रूण का प्रारंभिक विकास अंडे के भीतर होता है, अंडज जंतु (Oviparous Animals) कहलाते हैं।
अंडज जंतुओं में निषेचन आंतरिक या बाह्य हो सकता है, लेकिन भ्रूण का आगे का विकास अंडे के भीतर होता है।
उदाहरण: मुर्गी और अनेक अन्य पक्षी।
जरायुज जंतु
परिभाषा: वे जंतु जिनमें भ्रूण का विकास मादा के शरीर के भीतर होता है और जो सामान्यतः बच्चे को जन्म देते हैं, जरायुज जंतु (Viviparous Animals) कहलाते हैं।
इन जंतुओं में भ्रूण को मादा के शरीर के भीतर आवश्यक पोषण और सुरक्षा मिलती है।
उदाहरण: मनुष्य तथा अधिकांश स्तनधारी।
अंडज और जरायुज जंतुओं में अंतर
| आधार | अंडज जंतु | जरायुज जंतु |
|---|---|---|
| संतान का जन्म | अंडे दिए जाते हैं | बच्चे को जन्म दिया जाता है |
| भ्रूण का विकास | अंडे के भीतर | मादा के शरीर के भीतर |
| उदाहरण | मुर्गी | मनुष्य |
जंतुओं में अलैंगिक जनन
यद्यपि जंतुओं में लैंगिक जनन सामान्य रूप से अधिक पाया जाता है, कुछ सरल जंतुओं में अलैंगिक जनन भी होता है। हाइड्रा इसका एक उदाहरण है, जिसमें मुकुलन द्वारा नया जीव विकसित होता है।
हाइड्रा में शरीर की सतह पर कोशिका विभाजन के कारण एक छोटा उभार बनता है। यह उभार बढ़कर नया हाइड्रा बन जाता है और बाद में जनक से अलग होकर स्वतंत्र जीवन जी सकता है।
जंतुओं में जनन की मुख्य प्रक्रिया
नर जनक → शुक्राणु → मादा जनक → अंडाणु → निषेचन → युग्मनज → भ्रूण → नया जीव
यदि निषेचन शरीर के बाहर होता है, तो उसे बाह्य निषेचन और यदि मादा के शरीर के भीतर होता है, तो उसे आंतरिक निषेचन कहते हैं।
Concept Builder
शुक्राणु + अंडाणु → निषेचन → युग्मनज → भ्रूण → नया जीव
शरीर के बाहर निषेचन = बाह्य निषेचन
मादा के शरीर के भीतर निषेचन = आंतरिक निषेचन
अंडे देने वाला जंतु = अंडज
बच्चे को जन्म देने वाला जंतु = जरायुज
Exam Booster
- जंतुओं में लैंगिक जनन क्या है? — नर और मादा युग्मकों के संलयन द्वारा नई संतति का निर्माण।
- बाह्य निषेचन क्या है? — शरीर के बाहर नर और मादा युग्मकों का संलयन।
- बाह्य निषेचन का एक उदाहरण दीजिए। — मेंढक।
- आंतरिक निषेचन क्या है? — मादा के शरीर के भीतर नर और मादा युग्मकों का संलयन।
- आंतरिक निषेचन का एक उदाहरण दीजिए। — मनुष्य।
- निषेचन के बाद सबसे पहले क्या बनता है? — युग्मनज।
- अंडज जंतु किसे कहते हैं? — वे जंतु जो अंडे देते हैं और जिनमें भ्रूण का विकास अंडे के भीतर होता है।
- जरायुज जंतु किसे कहते हैं? — वे जंतु जिनमें भ्रूण का विकास मादा के शरीर के भीतर होता है और जो सामान्यतः बच्चे को जन्म देते हैं।
- हाइड्रा में कौन-सा अलैंगिक जनन पाया जाता है? — मुकुलन।
- बाह्य और आंतरिक निषेचन में मुख्य अंतर क्या है? — बाह्य निषेचन शरीर के बाहर और आंतरिक निषेचन मादा के शरीर के भीतर होता है।
जनन: जीवन की निरंतरता
अध्याय 11. जनन — जीवन की निरंतरता
मानवों में जनन लैंगिक जनन द्वारा होता है। इसमें नर और मादा युग्मकों का निर्माण, उनका संलयन तथा युग्मनज से नए जीव का विकास शामिल है।
मानवों में लैंगिक जनन
परिभाषा: मनुष्यों में नर युग्मक (शुक्राणु) और मादा युग्मक (अंडाणु) के संलयन द्वारा नई संतान के निर्माण की प्रक्रिया को मानवों में लैंगिक जनन कहते हैं।
मानवों में नर और मादा अलग-अलग जनन तंत्र रखते हैं। नर जनन तंत्र शुक्राणुओं का निर्माण करता है, जबकि मादा जनन तंत्र अंडाणुओं के निर्माण तथा भ्रूण के विकास में सहायता करता है।
मानव जनन तंत्र
नर जनन तंत्र
- वृषण (Testes): शुक्राणुओं तथा नर हार्मोन का निर्माण करते हैं।
- शुक्रवाहिनी: शुक्राणुओं को आगे ले जाने वाली नलिका है।
- शुक्राशय: जनन द्रव के निर्माण में सहायता करता है।
- प्रोस्टेट ग्रंथि: जनन द्रव के निर्माण में योगदान देती है।
- शुक्राणु: नर के सूक्ष्म और गतिशील युग्मक हैं।
मादा जनन तंत्र
- अंडाशय (Ovaries): अंडाणु तथा मादा हार्मोन का निर्माण करते हैं।
- डिंबवाहिनी (Oviduct): अंडाशय को गर्भाशय से जोड़ती है।
- गर्भाशय (Uterus): भ्रूण के विकास का प्रमुख स्थान है।
- गर्भाशय ग्रीवा (Cervix): गर्भाशय को योनि से जोड़ने वाला संकरा मार्ग है।
- योनि: जनन मार्ग का बाहरी भाग है।
युग्मकजनन (Gametogenesis)
परिभाषा: नर और मादा युग्मकों के निर्माण की प्रक्रिया को युग्मकजनन कहते हैं।
मानवों में युग्मकजनन वृषण और अंडाशय में होता है। युग्मक अर्धसूत्री विभाजन द्वारा बनते हैं, इसलिए उनमें गुणसूत्रों की संख्या सामान्य शरीर कोशिकाओं की आधी होती है।
- मानव शरीर की सामान्य कोशिका में 46 गुणसूत्र होते हैं।
- शुक्राणु में 23 गुणसूत्र होते हैं।
- अंडाणु में 23 गुणसूत्र होते हैं।
- निषेचन के बाद युग्मनज में फिर से 46 गुणसूत्र हो जाते हैं।
शुक्राणु और अंडाणु
| आधार | शुक्राणु | अंडाणु |
|---|---|---|
| आकार | बहुत छोटा | बड़ा |
| संख्या | लाखों में | कम |
| गतिशीलता | गतिशील | अचल |
| पोषक पदार्थ | अनुपस्थित | उपस्थित |
| निर्माण स्थान | वृषण | अंडाशय |
निषेचन (Fertilisation)
परिभाषा: शुक्राणु और अंडाणु के संलयन को निषेचन कहते हैं।
मानवों में निषेचन के दौरान शुक्राणु अंडाणु तक पहुँचता है। एक शुक्राणु के अंडाणु से संलयन के बाद युग्मनज बनता है। युग्मनज विभाजित होकर भ्रूण में विकसित होता है।
शुक्राणु + अंडाणु → निषेचन → युग्मनज → भ्रूण
अंडोत्सर्ग (Ovulation)
परिभाषा: अंडाशय से परिपक्व अंडाणु के निकलने की प्रक्रिया को अंडोत्सर्ग कहते हैं।
यौवनारंभ के बाद सामान्यतः प्रत्येक माह एक परिपक्व अंडाणु किसी एक अंडाशय से निकलता है। यह अंडाणु डिंबवाहिनी में पहुँचता है।
युग्मनज से भ्रूण तक
निषेचन के बाद बना युग्मनज लगातार समसूत्री विभाजन करता है। विभाजित होते हुए यह गर्भाशय की ओर बढ़ता है और गर्भाशय की आंतरिक परत में आरोपित हो जाता है। इसी आरोपण से गर्भावस्था का आरंभ होता है।
युग्मनज → विभाजन → भ्रूण → गर्भाशय में आरोपण → गर्भावस्था
यदि निषेचन न हो
यदि अंडाणु का निषेचन नहीं होता है, तो वह लगभग एक दिन तक जीवनक्षम रहता है और बाद में नष्ट हो जाता है। गर्भाशय की वह मोटी आंतरिक परत जिसकी भ्रूण के लिए आवश्यकता थी, रक्त के साथ शरीर से बाहर निकल जाती है।
मासिक धर्म (Menstruation)
परिभाषा: निषेचन न होने पर गर्भाशय की आंतरिक परत के रक्त के साथ शरीर से बाहर निकलने की प्रक्रिया को मासिक धर्म या रजोधर्म कहते हैं।
मासिक धर्म सामान्यतः 3 से 7 दिनों तक चल सकता है। यह प्रक्रिया सामान्यतः लगभग 21–35 दिनों के अंतराल में दोहराती है, जिसमें लगभग 28 दिन का चक्र एक सामान्य उदाहरण है।
मासिक धर्म चक्र
- दिन 1–5: गर्भाशय की आंतरिक परत का निष्कासन होता है।
- दिन 6–14: गर्भाशय की परत का पुनर्निर्माण होता है और अंडाणु परिपक्व होने लगता है।
- लगभग दिन 14: अंडोत्सर्ग हो सकता है।
- दिन 15–28: गर्भाशय की परत और मोटी तथा रक्तवाहिकाओं से समृद्ध होती है।
- निषेचन न होने पर: परत टूटती है और नया मासिक धर्म चक्र शुरू होता है।
शिशु के जैविक लिंग का निर्धारण
मानवों में महिलाओं में सामान्यतः XX और पुरुषों में XY लिंग गुणसूत्र होते हैं। माँ का अंडाणु हमेशा X गुणसूत्र देता है, जबकि पिता का शुक्राणु X या Y गुणसूत्र दे सकता है।
- X + X = XX
- X + Y = XY
इस प्रकार पिता से आने वाले शुक्राणु का X या Y गुणसूत्र शिशु के जैविक लिंग निर्धारण में निर्णायक होता है।
गर्भावस्था (Pregnancy)
परिभाषा: निषेचन के बाद भ्रूण के गर्भाशय में विकसित होने की अवस्था को गर्भावस्था कहते हैं।
मानवों में गर्भावस्था सामान्यतः लगभग नौ महीने चलती है। इसे तीन त्रिमासों में बाँटा जाता है।
- पहला त्रिमास: भ्रूण का विकास और प्रमुख अंगों का निर्माण शुरू होता है।
- दूसरा त्रिमास: गर्भ का आकार बढ़ता है और उसकी गतिविधियाँ महसूस हो सकती हैं।
- तीसरा त्रिमास: शिशु तेजी से बढ़ता है और जन्म के लिए तैयार होता है।
प्रसव (Childbirth)
परिभाषा: गर्भावस्था के अंत में विकसित शिशु के गर्भाशय से बाहर आने की प्रक्रिया को प्रसव कहते हैं।
प्रसव के समय गर्भाशय की मांसपेशियों में तीव्र संकुचन होते हैं। ये संकुचन शिशु को जनन मार्ग से बाहर आने में सहायता करते हैं। कुछ परिस्थितियों में माँ या शिशु की सुरक्षा के लिए चिकित्सकीय या शल्य प्रक्रिया की आवश्यकता हो सकती है।
जन्म के बाद शिशु की देखभाल
- माँ का दूध शिशु को आवश्यक पोषण देता है।
- नवजात शिशु के शरीर का तापमान उचित रखना आवश्यक है।
- शिशु का समय पर टीकाकरण कराया जाना चाहिए।
- माँ और शिशु दोनों के स्वास्थ्य पर ध्यान देना आवश्यक है।
लैंगिक परिपक्वता
परिभाषा: वह अवस्था जिसमें शरीर जनन के योग्य होने लगता है, लैंगिक परिपक्वता कहलाती है।
यह अवस्था किशोरावस्था के दौरान धीरे-धीरे विकसित होती है। लड़कों में शुक्राणु उत्पादन और लड़कियों में मासिक धर्म का आरंभ लैंगिक परिपक्वता के प्रमुख संकेत हैं।
महत्त्वपूर्ण: लैंगिक परिपक्वता का अर्थ केवल शरीर का जनन योग्य होना है। इसका अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति वयस्क जीवन की सभी जिम्मेदारियों के लिए पूरी तरह तैयार हो गया है।
IVF — पात्रे निषेचन
परिभाषा: शरीर के बाहर प्रयोगशाला में शुक्राणु और अंडाणु के संलयन द्वारा निषेचन कराने की चिकित्सकीय तकनीक को IVF (In Vitro Fertilisation) कहते हैं।
IVF में अंडाणु और शुक्राणु को प्रयोगशाला में मिलाया जाता है। निषेचन के बाद बने भ्रूण को गर्भाशय में आरोपित किया जा सकता है। सामान्य भाषा में इससे जन्मे बच्चे को “टेस्ट-ट्यूब बेबी” कहा जाता है।
Concept Builder
वृषण → शुक्राणु
अंडाशय → अंडाणु
शुक्राणु + अंडाणु → निषेचन → युग्मनज
युग्मनज → समसूत्री विभाजन → भ्रूण → आरोपण → गर्भावस्था
निषेचन नहीं → अंडाणु नष्ट → गर्भाशय की परत का निष्कासन → मासिक धर्म
Exam Booster
- मानवों में लैंगिक जनन में कौन-से युग्मक भाग लेते हैं? — शुक्राणु और अंडाणु।
- युग्मकजनन क्या है? — युग्मकों के निर्माण की प्रक्रिया।
- मानव युग्मक में कितने गुणसूत्र होते हैं? — 23।
- निषेचन के बाद क्या बनता है? — युग्मनज।
- अंडोत्सर्ग क्या है? — अंडाशय से परिपक्व अंडाणु का निकलना।
- निषेचन न होने पर क्या होता है? — अंडाणु नष्ट हो जाता है और गर्भाशय की आंतरिक परत मासिक धर्म के रूप में बाहर निकलती है।
- मासिक धर्म क्या है? — गर्भाशय की आंतरिक परत के रक्त के साथ बाहर निकलने की प्रक्रिया।
- गर्भावस्था सामान्यतः कितने समय की होती है? — लगभग नौ महीने।
- लैंगिक परिपक्वता क्या है? — वह अवस्था जब शरीर जनन के योग्य होने लगता है।
- IVF क्या है? — शरीर के बाहर प्रयोगशाला में शुक्राणु और अंडाणु के निषेचन की तकनीक।
जनन: जीवन की निरंतरता
अध्याय 11. जनन — जीवन की निरंतरता
जनन से संबंधित स्वास्थ्य केवल शरीर के जनन योग्य होने तक सीमित नहीं है। इसमें लैंगिक परिपक्वता, जिम्मेदार निर्णय, अनचाही गर्भावस्था से बचाव, यौन संचारित संक्रमणों से सुरक्षा तथा उचित स्वास्थ्य देखभाल भी शामिल है।
जनन स्वास्थ्य
परिभाषा: जनन से संबंधित शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य को बनाए रखने की स्थिति को जनन स्वास्थ्य कहा जा सकता है।
किशोरावस्था में शरीर जनन के योग्य होने लगता है, लेकिन भावनात्मक और सामाजिक परिपक्वता धीरे-धीरे विकसित होती है। इसलिए जनन से संबंधित निर्णय सोच-समझकर और जिम्मेदारी से लेना आवश्यक है।
लैंगिक परिपक्वता
परिभाषा: वह अवस्था जिसमें शरीर जनन के योग्य होने लगता है, लैंगिक परिपक्वता कहलाती है।
लैंगिक परिपक्वता किशोरावस्था के दौरान क्रमिक रूप से विकसित होती है और यह समग्र शारीरिक विकास का एक भाग है।
- लड़कों में: शुक्राणुओं का उत्पादन शुरू होना लैंगिक परिपक्वता का प्रमुख संकेत है।
- लड़कियों में: मासिक धर्म अर्थात रजोधर्म का आरंभ प्रमुख संकेत है।
- शारीरिक रूप से जनन योग्य होना और भावनात्मक रूप से पूरी तरह परिपक्व होना एक ही बात नहीं है।
- भावनात्मक परिपक्वता में भावनाओं पर नियंत्रण, स्पष्ट संवाद और सुविचारित निर्णय लेना शामिल है।
अनचाही गर्भावस्था और संक्रमण से बचाव
किशोरावस्था में शरीर जनन के योग्य हो जाता है, लेकिन केवल शारीरिक परिवर्तन किसी व्यक्ति को वयस्क जीवन से जुड़ी सभी जिम्मेदारियों के लिए तैयार नहीं करते। विवेकपूर्ण निर्णय अनियोजित गर्भावस्था तथा यौन संचारित संक्रमणों से बचाव में सहायता करते हैं।
यौन संचारित संक्रमण (STI)
परिभाषा: ऐसे संक्रमण जो यौन संपर्क के माध्यम से एक संक्रमित व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँच सकते हैं, यौन संचारित संक्रमण (Sexually Transmitted Infections – STI) कहलाते हैं।
अध्याय में STI के उदाहरण के रूप में गोनोरिया, हर्पीज, सिफिलिस, जननिक मस्से और HIV संक्रमण दिए गए हैं। HIV संक्रमण आगे चलकर AIDS से संबंधित हो सकता है।
STI से बचाव
कंडोम का उपयोग यौन संचारित संक्रमणों के संक्रमण को रोकने में सहायता कर सकता है। यह अनचाही गर्भावस्था को रोकने में भी सहायक होता है।
गर्भनिरोध (Contraception)
परिभाषा: गर्भधारण को रोकने के लिए अपनाई जाने वाली विधियों को गर्भनिरोध कहा जाता है।
अनचाही गर्भावस्था को रोकने के लिए विभिन्न गर्भनिरोधक विधियों का उपयोग किया जा सकता है। कुछ विधियाँ शुक्राणु को अंडाणु तक पहुँचने से रोकती हैं, जबकि कुछ विधियाँ अंडाणु के मोचन को प्रभावित करती हैं।
गर्भनिरोधक विधियाँ
कंडोम
परिभाषा: कंडोम एक अवरोधक गर्भनिरोधक साधन है जो शुक्राणुओं को अंडाणु तक पहुँचने से रोकने में सहायता करता है।
कंडोम अनचाही गर्भावस्था को रोकने के साथ कुछ यौन संचारित संक्रमणों के प्रसार को कम करने में भी सहायता करता है।
गर्भनिरोधक गोलियाँ
परिभाषा: मुँह से ली जाने वाली ऐसी गर्भनिरोधक दवाएँ जो हार्मोन में परिवर्तन करके अंडाणु के मोचन को प्रभावित करती हैं, गर्भनिरोधक गोलियाँ कहलाती हैं।
अध्याय के अनुसार इन गोलियों के कुछ दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं।
अंतर्गर्भाशयी युक्ति — कॉपर-T
परिभाषा: गर्भधारण को रोकने के लिए गर्भाशय में रखी जाने वाली अंतर्गर्भाशयी युक्ति को कॉपर-T कहते हैं।
यह गर्भनिरोध की एक विधि है। अध्याय में यह भी बताया गया है कि इसके उपयोग से कभी-कभी गर्भाशय में जलन हो सकती है।
शल्य-चिकित्सा द्वारा गर्भनिरोध
अनचाही गर्भावस्था को रोकने के लिए शल्य-चिकित्सा की विधियों का भी उपयोग किया जाता है। पुरुषों में शुक्रवाहिनी और महिलाओं में डिंबवाहिनी को अवरुद्ध किया जा सकता है, जिससे शुक्राणु और अंडाणु का संलयन न हो सके।
गर्भपात
परिभाषा: गर्भावस्था के दौरान भ्रूण को शल्य-चिकित्सा द्वारा हटाने की प्रक्रिया को गर्भपात कहा जाता है।
अध्याय में बताया गया है कि अवांछित गर्भावस्था के कुछ मामलों में, विशेष परिस्थितियों में और गर्भावस्था के प्रारंभिक चरण में, जब भ्रूण बहुत छोटा होता है, उसे शल्य क्रिया द्वारा हटाया जा सकता है।
लिंग चयन और सामाजिक जिम्मेदारी
अध्याय में विशेष रूप से बताया गया है कि किसी विशेष लिंग को प्राथमिकता देने के कारण किया जाने वाला स्वैच्छिक गर्भपात समाज में गंभीर लिंग असंतुलन पैदा कर सकता है। भारत में प्रसव-पूर्व लिंग निर्धारण कानूनी रूप से प्रतिबंधित है।
माँ और शिशु का स्वास्थ्य
गर्भावस्था के दौरान माँ के स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। उचित पोषण, नियमित चिकित्सकीय जाँच और पर्याप्त विश्राम माँ तथा विकासशील शिशु दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं। हानिकारक पदार्थों के सेवन से बचना भी आवश्यक है।
आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका
अध्याय में बताया गया है कि आशा (ASHA) कार्यकर्ता विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता, टीकाकरण, परिवार नियोजन, मातृ देखभाल, सुरक्षित प्रसव और गर्भनिरोधक विधियों के बारे में समुदाय को जागरूक करती हैं।
प्रसव पश्चात अवसाद
परिभाषा: शिशु के जन्म के बाद कुछ माताओं में दिखाई देने वाली उदासी, बेचैनी और अत्यधिक थकान की स्थिति को प्रसव पश्चात अवसाद कहा जाता है।
यह एक मान्य स्वास्थ्य स्थिति है जिसका उपचार किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर, नर्स या आशा कार्यकर्ता जैसे स्वास्थ्यकर्मी से सहायता लेना उचित है।
विज्ञान एवं समाज
अध्याय में केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा विकसित गैर-स्टेरॉयड और गैर-हार्मोनल, मुँह से ली जाने वाली गर्भनिरोधक गोली का उदाहरण दिया गया है। यह सप्ताह में एक बार लेने वाली गोली के रूप में वर्णित है और राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम के माध्यम से उपलब्ध कराई जाती है।
Concept Builder
लैंगिक परिपक्वता → शरीर जनन योग्य
जिम्मेदार निर्णय → अनियोजित गर्भावस्था और STI से बचाव
कंडोम → अवरोध → शुक्राणु का अंडाणु तक पहुँचना कम
गर्भनिरोधक गोली → हार्मोन में परिवर्तन → अंडाणु के मोचन को प्रभावित करना
कॉपर-T → गर्भाशय में स्थापित अंतर्गर्भाशयी युक्ति
शल्य विधि → शुक्रवाहिनी/डिंबवाहिनी को अवरुद्ध करना → निषेचन रोकना
Exam Booster
- लैंगिक परिपक्वता क्या है? — वह अवस्था जब शरीर जनन के योग्य होने लगता है।
- STI का पूरा नाम क्या है? — Sexually Transmitted Infection.
- दो यौन संचारित संक्रमणों के नाम लिखिए। — गोनोरिया और सिफिलिस।
- कंडोम का दोहरा महत्त्व क्या है? — यह अनचाही गर्भावस्था को रोकने तथा कुछ STI के संक्रमण को कम करने में सहायता करता है।
- गर्भनिरोधक गोलियाँ कैसे कार्य करती हैं? — हार्मोन में परिवर्तन करके अंडाणु के मोचन को प्रभावित करती हैं।
- कॉपर-T क्या है? — गर्भाशय में रखी जाने वाली अंतर्गर्भाशयी गर्भनिरोधक युक्ति।
- शल्य-चिकित्सा द्वारा गर्भनिरोध कैसे किया जाता है? — पुरुषों में शुक्रवाहिनी और महिलाओं में डिंबवाहिनी को अवरुद्ध करके।
- गर्भावस्था के दौरान माँ के लिए क्या आवश्यक है? — उचित पोषण, नियमित चिकित्सकीय जाँच, पर्याप्त विश्राम और हानिकारक पदार्थों से बचाव।
- आशा कार्यकर्ता किन कार्यों में सहायता करती हैं? — स्वच्छता, टीकाकरण, परिवार नियोजन, मातृ देखभाल, सुरक्षित प्रसव और गर्भनिरोधक संबंधी जागरूकता में।
- प्रसव पश्चात अवसाद क्या है? — शिशु के जन्म के बाद कुछ माताओं में होने वाली उदासी, बेचैनी और थकान की मान्य स्वास्थ्य स्थिति।
जनन: जीवन की निरंतरता
अध्याय 11. जनन — जीवन की निरंतरता
पौधों में लैंगिक जनन मुख्यतः पुष्पों में होता है। पुष्प के नर और मादा जनन अंग युग्मकों के निर्माण, परागण और निषेचन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। निषेचन के बाद बीज और फल का निर्माण होता है।
पुष्पीय पादपों में लैंगिक जनन
परिभाषा: पौधों में नर और मादा युग्मकों के संलयन द्वारा नई संतति उत्पन्न होने की प्रक्रिया को लैंगिक जनन कहते हैं।
पुष्प पौधे का प्रमुख जनन अंग है। एक पूर्ण पुष्प के चार प्रमुख भाग होते हैं— बाह्यदल, दल, पुंकेसर और स्त्रीकेसर। इनमें पुंकेसर नर जनन भाग तथा स्त्रीकेसर मादा जनन भाग है।
पुष्प के जनन अंग
पुंकेसर (Stamen)
परिभाषा: पुष्प के नर जनन अंग को पुंकेसर कहते हैं।
पुंकेसर में तंतु और परागकोश होते हैं। परागकोश में परागकण बनते हैं और इन्हीं में नर युग्मक पाए जाते हैं।
स्त्रीकेसर (Pistil)
परिभाषा: पुष्प के मादा जनन अंग को स्त्रीकेसर कहते हैं।
स्त्रीकेसर के तीन प्रमुख भाग होते हैं— वर्तिकाग्र, वर्तिका और अंडाशय। अंडाशय में बीजांड होते हैं और प्रत्येक बीजांड में एक अंड कोशिका अर्थात मादा युग्मक होता है।
| जनन अंग | मुख्य भाग | मुख्य कार्य |
|---|---|---|
| पुंकेसर | तंतु, परागकोश | परागकण और नर युग्मक से संबंधित |
| स्त्रीकेसर | वर्तिकाग्र, वर्तिका, अंडाशय | मादा युग्मक और बीजांड से संबंधित |
परागण (Pollination)
परिभाषा: परागकोश से पुष्प के वर्तिकाग्र तक परागकणों के स्थानांतरण को परागण कहते हैं।
परागण पौधों में फल और बीज के निर्माण के लिए आवश्यक प्रक्रिया है। परागकण वर्तिकाग्र तक पहुँचने के बाद आगे की जनन प्रक्रिया शुरू होती है।
परागण के प्रकार
स्व-परागण (Self-pollination)
परिभाषा: जब परागकण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र या उसी पौधे के किसी दूसरे पुष्प के वर्तिकाग्र तक पहुँचते हैं, तो इसे स्व-परागण कहते हैं।
पर-परागण (Cross-pollination)
परिभाषा: जब एक पौधे के पुष्प के परागकोश से परागकण उसी प्रकार के दूसरे पौधे के पुष्प के वर्तिकाग्र तक पहुँचते हैं, तो इसे पर-परागण कहते हैं।
| स्व-परागण | पर-परागण |
|---|---|
| उसी पुष्प या उसी पौधे के पुष्प में परागण | एक पौधे से दूसरे पौधे के पुष्प तक परागण |
| परागकणों का स्रोत और प्राप्तकर्ता निकट होते हैं | परागकणों को दूसरे पौधे तक पहुँचना पड़ता है |
परागण के माध्यम
परागकणों को एक पुष्प से दूसरे पुष्प तक पहुँचाने के लिए विभिन्न बाहरी माध्यम सहायता करते हैं। इन्हें परागणकारी कहा जाता है। प्रमुख परागणकारी हैं— वायु, जल, कीट और पक्षी।
- वायु: गेहूँ, मक्का और चावल जैसे पौधों में वायु द्वारा परागण होता है। इनके परागकण सामान्यतः हल्के और बड़ी संख्या में बनते हैं।
- जल: वैलिसनेरिया और हाइड्रिला जैसे जलीय पौधों में जल परागकणों को एक पुष्प से दूसरे पुष्प तक पहुँचा सकता है।
- कीट: मधुमक्खियाँ और तितलियाँ अनेक पौधों में परागण में सहायता करती हैं। इनके पुष्प प्रायः रंगीन, सुगंधित और मकरंद वाले होते हैं।
- पक्षी: कुछ पुष्पों में पक्षी परागणकारी का कार्य करते हैं।
परागण और जननीय सफलता
पौधों ने परागण की सफलता बढ़ाने के लिए विभिन्न अनुकूलन विकसित किए हैं। कीट-परागित पौधों में रंग, सुगंध और मकरंद परागणकारियों को आकर्षित करते हैं। इनके परागकण चिपचिपे या काँटेदार हो सकते हैं, जिससे वे कीटों के शरीर से चिपक जाते हैं।
वायु-परागित पौधे बहुत बड़ी संख्या में हल्के परागकण बनाते हैं, जिससे उनमें से कुछ परागकण वर्तिकाग्र तक पहुँच सकें।
पराग नलिका का निर्माण
परिभाषा: वर्तिकाग्र पर पहुँचने के बाद परागकण द्वारा बनाई गई नली को पराग नलिका कहते हैं।
परागकण के वर्तिकाग्र पर पहुँचने के बाद उससे पराग नलिका निकलती है। यह वर्तिका से होकर नीचे अंडाशय की ओर बढ़ती है और नर युग्मक को बीजांड तक पहुँचाने में सहायता करती है।
निषेचन (Fertilisation)
परिभाषा: नर और मादा युग्मकों के संलयन को निषेचन कहते हैं।
पराग नलिका के माध्यम से नर युग्मक बीजांड तक पहुँचता है। वहाँ नर युग्मक और अंड कोशिका का संलयन होता है। इससे निषेचित अंडाणु अर्थात युग्मनज बनता है।
परागकण → पराग नलिका → नर युग्मक → अंड कोशिका → निषेचन → युग्मनज
बीज और फल का निर्माण
निषेचन के बाद युग्मनज आगे चलकर भ्रूण में विकसित होता है। अंडाशय बढ़कर फल में विकसित होता है, जबकि अंडाशय के भीतर स्थित बीजांड बीज में विकसित होते हैं।
- निषेचित अंडाणु → युग्मनज → भ्रूण
- बीजांड → बीज
- अंडाशय → फल
बीज का अंकुरण
परिभाषा: अनुकूल परिस्थितियों में बीज से नए पौधे का विकसित होना बीज का अंकुरण कहलाता है।
जब जल, वायु और तापमान जैसी परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं, तो बीज अंकुरित होकर नए पौधे में विकसित हो जाता है।
पौधों में लैंगिक जनन का महत्त्व
लैंगिक जनन केवल नए पौधों का निर्माण ही नहीं करता, बल्कि संततियों में आनुवंशिक विभिन्नताएँ भी उत्पन्न करता है। ये विभिन्नताएँ बदलते परिवेश में पौधों के अनुकूलन और उत्तरजीविता में सहायता कर सकती हैं।
Concept Builder
पुंकेसर → परागकण → नर युग्मक
स्त्रीकेसर → अंडाशय → बीजांड → अंड कोशिका
परागकोश → वर्तिकाग्र = परागण
वर्तिकाग्र → वर्तिका → अंडाशय/बीजांड = पराग नलिका का मार्ग
नर युग्मक + अंड कोशिका → निषेचन → युग्मनज
बीजांड → बीज
अंडाशय → फल
बीज → अनुकूल परिस्थितियाँ → अंकुरण → नया पौधा
Exam Booster
- पुष्प का नर जनन अंग कौन-सा है? — पुंकेसर।
- पुष्प का मादा जनन अंग कौन-सा है? — स्त्रीकेसर।
- पुंकेसर के दो मुख्य भाग कौन-से हैं? — तंतु और परागकोश।
- स्त्रीकेसर के तीन भाग कौन-से हैं? — वर्तिकाग्र, वर्तिका और अंडाशय।
- परागण क्या है? — परागकोश से वर्तिकाग्र तक परागकणों का स्थानांतरण।
- स्व-परागण क्या है? — उसी पुष्प या उसी पौधे के पुष्प के वर्तिकाग्र तक परागकणों का पहुँचना।
- पर-परागण क्या है? — एक पौधे के पुष्प से उसी प्रकार के दूसरे पौधे के पुष्प तक परागकणों का स्थानांतरण।
- परागण के प्रमुख माध्यम कौन-से हैं? — वायु, जल, कीट और पक्षी।
- पराग नलिका का क्या कार्य है? — नर युग्मक को बीजांड तक पहुँचाने में सहायता करना।
- निषेचन के बाद क्या बनता है? — युग्मनज।
- बीजांड किसमें विकसित होता है? — बीज में।
- अंडाशय किसमें विकसित होता है? — फल में।
- बीज अंकुरण के लिए किन परिस्थितियों की आवश्यकता होती है? — अनुकूल जल, वायु और तापमान।
- पौधों में लैंगिक जनन का एक महत्त्व क्या है? — यह आनुवंशिक विभिन्नता उत्पन्न करता है, जो बदलते परिवेश में अनुकूलन और उत्तरजीविता में सहायक हो सकती है।
जनन: जीवन की निरंतरता
अध्याय 11. जनन — जीवन की निरंतरता
पौधों में लैंगिक जनन केवल नए पौधों के निर्माण तक सीमित नहीं है। इससे उत्पन्न आनुवंशिक विभिन्नताओं का उपयोग कृषि में उपयोगी गुणों वाली नई और बेहतर पौध किस्में विकसित करने के लिए किया जाता है।
पादप प्रजनन में लैंगिक जनन का महत्त्व
परिभाषा: पौधों में वांछित गुणों वाली नई और बेहतर किस्में विकसित करने के लिए जनन की प्रक्रिया का वैज्ञानिक उपयोग पादप प्रजनन कहलाता है।
लैंगिक जनन से उत्पन्न आनुवंशिक विभिन्नताएँ पौधों में नए गुणों के विकास का आधार बनती हैं। वैज्ञानिक और कृषक इन विभिन्नताओं का उपयोग अधिक उपज, रोग-प्रतिरोध तथा अन्य उपयोगी गुणों वाली किस्में विकसित करने में करते हैं।
पादप प्रजनन की प्रमुख विधियाँ
- वरणात्मक प्रजनन
- कृत्रिम संकरण
- आनुवंशिक अभियांत्रिकी
वरणात्मक प्रजनन (Selective Breeding)
परिभाषा: वांछित विशेषताओं वाले पौधों का चयन करके उनके द्वारा अगली पीढ़ी प्राप्त करने की प्रक्रिया को वरणात्मक प्रजनन कहते हैं।
इस विधि में किसान या पादप प्रजनक ऐसे पौधों का चयन करते हैं जिनमें उपयोगी और वांछित गुण पाए जाते हैं। चयनित पौधों का जनन कराया जाता है ताकि उन गुणों को अगली पीढ़ी में प्राप्त किया जा सके।
वांछित गुणों के उदाहरण
- अधिक उत्पादन
- रोगों के प्रति प्रतिरोध
- अन्य उपयोगी कृषि गुण
कृत्रिम संकरण (Artificial Hybridisation)
परिभाषा: मनुष्य द्वारा चुने हुए पौधों के बीच नियंत्रित रूप से परागण कराकर नई संतति प्राप्त करने की प्रक्रिया को कृत्रिम संकरण कहते हैं।
कृत्रिम संकरण में इच्छित गुणों वाले पौधों का चयन किया जाता है और उनके बीच नियंत्रित परागण कराया जाता है। इससे दोनों पौधों के वांछित गुणों को एक ही संतति में प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है।
कृत्रिम संकरण की मुख्य प्रक्रिया
- वांछित गुणों वाले पौधों का चयन किया जाता है।
- चयनित पुष्पों से पुंकेसर हटाए जा सकते हैं।
- स्व-परागण रोकने के लिए पुष्प को थैली से ढका जाता है।
- वांछित गुणों वाले पौधे से प्राप्त परागकणों को हाथ से वर्तिकाग्र पर स्थानांतरित किया जाता है।
- इस नियंत्रित परागण से वांछित गुणों वाली संतति प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है।
आनुवंशिक अभियांत्रिकी (Genetic Engineering)
परिभाषा: किसी जीव के DNA में इच्छित आनुवंशिक पदार्थ को शामिल करके उसके गुणों में वांछित परिवर्तन उत्पन्न करने की तकनीक को आनुवंशिक अभियांत्रिकी कहते हैं।
पादप प्रजनन में आनुवंशिक अभियांत्रिकी का उपयोग चुनी हुई किस्मों के DNA में वांछित विशेषताओं से संबंधित आनुवंशिक पदार्थ को शामिल करने के लिए किया जाता है। इससे नई और उपयोगी पौध किस्में विकसित की जा सकती हैं।
कृषि में आनुवंशिक अभियांत्रिकी का महत्त्व
आनुवंशिक अभियांत्रिकी की सहायता से पौधों में उपयोगी गुणों को विकसित किया जा सकता है। इसके माध्यम से कृषि के लिए अधिक उपयोगी किस्मों के विकास में सहायता मिली है।
- उच्च उत्पादक किस्में: अधिक फसल उत्पादन प्राप्त करने में सहायक।
- रोग-प्रतिरोधी किस्में: कुछ रोगों के प्रति बेहतर प्रतिरोध वाली पौध किस्में।
- नई किस्मों का विकास: वांछित विशेषताओं वाले पौधों के विकास में सहायता।
- कृषि उत्पादन: फसल उत्पादन में महत्वपूर्ण सुधार लाने में उपयोगी।
लैंगिक जनन और आनुवंशिक विभिन्नता
परिभाषा: एक ही प्रजाति के जीवों में पाए जाने वाले आनुवंशिक गुणों के अंतर को आनुवंशिक विभिन्नता कहा जाता है।
लैंगिक जनन विभिन्नताओं के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यही विभिन्नताएँ पादप प्रजनकों को उपयोगी गुणों वाले पौधों के चयन और नई किस्मों के विकास का अवसर देती हैं।
लैंगिक जनन → आनुवंशिक विभिन्नता → चयन → नई किस्मों का विकास
पौधों में लैंगिक जनन का कृषि संबंध
कृषि में पौधों के जनन का वैज्ञानिक उपयोग करके ऐसी किस्में विकसित की जाती हैं जो किसानों के लिए अधिक उपयोगी हों। वांछित गुणों का चयन, नियंत्रित संकरण और आनुवंशिक अभियांत्रिकी इस दिशा में महत्वपूर्ण साधन हैं।
Concept Builder
वांछित गुण वाला पौधा → चयन → वरणात्मक प्रजनन
चयनित पौधे → नियंत्रित परागण → कृत्रिम संकरण → नई संतति
वांछित आनुवंशिक पदार्थ → DNA में शामिल करना → आनुवंशिक अभियांत्रिकी
आनुवंशिक विभिन्नता → उपयोगी गुणों का चयन → बेहतर पौध किस्म
Exam Booster
- पादप प्रजनन क्या है? — वांछित गुणों वाली नई और बेहतर पौध किस्में विकसित करने के लिए जनन का वैज्ञानिक उपयोग।
- वरणात्मक प्रजनन क्या है? — वांछित विशेषताओं वाले पौधों का चयन करके उनकी संतति प्राप्त करने की प्रक्रिया।
- कृत्रिम संकरण क्या है? — चुने हुए पौधों के बीच मनुष्य द्वारा नियंत्रित परागण कराकर संतति प्राप्त करना।
- कृत्रिम संकरण में स्व-परागण कैसे रोका जाता है? — पुष्प के पुंकेसर हटाकर और पुष्प को थैली से ढककर।
- कृत्रिम संकरण में परागकण कैसे पहुँचाए जाते हैं? — वांछित पौधे के परागकणों को हाथ से वर्तिकाग्र पर स्थानांतरित किया जाता है।
- आनुवंशिक अभियांत्रिकी क्या है? — वांछित आनुवंशिक पदार्थ को DNA में शामिल करके उपयोगी गुण विकसित करने की तकनीक।
- आनुवंशिक अभियांत्रिकी से किस प्रकार की पौध किस्में विकसित की जा सकती हैं? — उच्च उत्पादक और रोग-प्रतिरोधी जैसी उपयोगी किस्में।
- लैंगिक जनन का पादप प्रजनन में क्या महत्त्व है? — इससे उत्पन्न आनुवंशिक विभिन्नताओं का उपयोग उपयोगी गुणों वाली नई किस्में विकसित करने में किया जा सकता है।
जनन: जीवन की निरंतरता
अध्याय 11. जनन — जीवन की निरंतरता
जन्तुओं में लैंगिक जनन की विधि उनके आवास, निषेचन के स्थान, अंडों की संख्या तथा भ्रूण के विकास के तरीके के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। इन अंतर का सीधा संबंध संतति की उत्तरजीविता से भी है।
जन्तुओं में निषेचन की विधियाँ
बाह्य निषेचन (External Fertilisation)
परिभाषा: जब नर और मादा युग्मकों का संलयन मादा के शरीर के बाहर होता है, तो इसे बाह्य निषेचन कहते हैं।
बाह्य निषेचन सामान्यतः जल में रहने वाले अनेक जन्तुओं में पाया जाता है। मादा जल में अंडे देती है और नर उन अंडों पर शुक्राणु छोड़ता है। जल के माध्यम से शुक्राणु अंडों तक पहुँचते हैं और निषेचन होता है।
उदाहरण: मेंढक और अनेक मछलियाँ।
आंतरिक निषेचन (Internal Fertilisation)
परिभाषा: जब नर और मादा युग्मकों का संलयन मादा के शरीर के अंदर होता है, तो इसे आंतरिक निषेचन कहते हैं।
सरीसृपों, पक्षियों और स्तनधारियों में निषेचन सामान्यतः मादा के शरीर के अंदर होता है। इसमें निषेचित अंडा या विकसित होता भ्रूण बाहरी वातावरण से अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित रहता है।
बाह्य और आंतरिक निषेचन में अंतर
| आधार | बाह्य निषेचन | आंतरिक निषेचन |
|---|---|---|
| निषेचन का स्थान | मादा के शरीर के बाहर | मादा के शरीर के अंदर |
| सामान्य उदाहरण | मछली, मेंढक | सरीसृप, पक्षी, स्तनधारी |
| युग्मकों की सुरक्षा | कम | अधिक |
| अंडों की संख्या | सामान्यतः अधिक | सामान्यतः कम |
| संतति की उत्तरजीविता | सामान्यतः कम | सामान्यतः अधिक |
अंडों की संख्या और उत्तरजीविता
बाह्य निषेचन करने वाले जन्तु सामान्यतः बड़ी संख्या में अंडे देते हैं। इसका एक कारण यह है कि बहुत-से अंडे जलधाराओं द्वारा नष्ट हो सकते हैं या अन्य जन्तुओं द्वारा खाए जा सकते हैं। इसलिए बड़ी संख्या में अंडे देने से कुछ संततियों के जीवित रहने की संभावना बढ़ जाती है।
आंतरिक निषेचन में निषेचित अंडा या भ्रूण मादा के शरीर के अंदर अधिक सुरक्षित रहता है। इसलिए ऐसे जन्तुओं में सामान्यतः कम संख्या में अंडे या संतति उत्पन्न होती है, लेकिन उनके जीवित रहने की संभावना अधिक होती है।
विभिन्न जन्तुओं में जनन की तुलना
| जन्तु | आवास | निषेचन | अंडों की संख्या | संतति की उत्तरजीविता |
|---|---|---|---|---|
| मछली | जल | बाह्य | लगभग 100–1,000 | कम |
| मेंढक | जल/भूमि | बाह्य | लगभग 5,000–50,000 | कम |
| छिपकली | भूमि | आंतरिक | लगभग 2–20 | मध्यम |
| पक्षी | जल/भूमि | आंतरिक | लगभग 1–15 | मध्यम से उच्च |
इस तुलना से स्पष्ट होता है कि निषेचन की विधि, अंडों की संख्या और संतति की उत्तरजीविता के बीच संबंध होता है।
अंडे में पीतक (Yolk) का महत्त्व
परिभाषा: अंडे में उपस्थित वह पोषक पदार्थ जो विकासशील भ्रूण को भोजन प्रदान करता है, पीतक (Yolk) कहलाता है।
मछली, उभयचर और अनेक कीट बड़ी संख्या में पीतकयुक्त अंडे देते हैं। इन अंडों में उपस्थित पीतक विकासशील भ्रूण को प्रारंभिक पोषण देता है।
सरीसृपों और पक्षियों के अंडों में भ्रूण के विकास के लिए पर्याप्त पीतक होता है। इससे भ्रूण अंडे के अंदर तब तक पोषण प्राप्त करता है जब तक अंडे से बच्चा बाहर नहीं निकल आता।
लार्वा और कायांतरण
परिभाषा: अंडे से निकलने के बाद विकास की ऐसी अवस्था जिसमें जन्तु वयस्क से अलग दिखाई देता है, लार्वा कहलाती है।
कुछ जन्तुओं में अंडे से निकलने वाला लार्वा स्वयं भोजन प्राप्त करके बढ़ता है। पर्याप्त पोषक पदार्थ जमा होने के बाद उसका रूपांतरण होता है और वह वयस्क जन्तु में विकसित होता है।
उदाहरण
- तितली: अंडा → लार्वा → प्यूपा → वयस्क
- मेंढक: अंडा → लार्वा (टैडपोल) → वयस्क
भ्रूण का विकास
भ्रूण का विकास अलग-अलग जन्तुओं में अलग तरीके से होता है। कुछ जन्तुओं में भ्रूण अंडे के अंदर विकसित होता है, जबकि स्तनधारियों में युग्मनज मादा के शरीर के अंदर विकसित होकर भ्रूण और फिर शिशु का रूप लेता है।
- मछली और मेंढक: भ्रूण का विकास अंडे में होता है।
- सरीसृप और पक्षी: भ्रूण अंडे के अंदर विकसित होता है और पीतक से पोषण प्राप्त करता है।
- स्तनधारी: युग्मनज मादा के शरीर के अंदर विकसित होता है।
जन्तुओं में जनन की मूल चुनौती
सभी जन्तुओं के सामने दो प्रमुख चुनौतियाँ होती हैं—नर और मादा युग्मकों का सफल मिलन तथा उत्पन्न संतति का इतना समय तक जीवित रहना कि वह बड़ी होकर स्वयं जनन कर सके। अलग-अलग जन्तुओं ने अपने आवास और जीवन-शैली के अनुसार इन चुनौतियों से निपटने के अलग-अलग तरीके विकसित किए हैं।
Concept Builder
बाह्य निषेचन → शरीर के बाहर → अधिक अंडे → कम सुरक्षा → सामान्यतः कम उत्तरजीविता
आंतरिक निषेचन → शरीर के अंदर → कम अंडे/संतति → अधिक सुरक्षा → सामान्यतः अधिक उत्तरजीविता
पीतक → भ्रूण का पोषण
अंडा → लार्वा → कायांतरण → वयस्क
Exam Booster
- बाह्य निषेचन क्या है? — मादा के शरीर के बाहर नर और मादा युग्मकों का संलयन।
- आंतरिक निषेचन क्या है? — मादा के शरीर के अंदर नर और मादा युग्मकों का संलयन।
- बाह्य निषेचन वाले जन्तु अधिक अंडे क्यों देते हैं? — क्योंकि अनेक अंडे नष्ट हो सकते हैं या अन्य जन्तुओं द्वारा खाए जा सकते हैं।
- आंतरिक निषेचन में संतति के जीवित रहने की संभावना अधिक क्यों होती है? — क्योंकि निषेचित अंडा या भ्रूण अधिक सुरक्षित रहता है।
- पीतक का क्या कार्य है? — यह विकासशील भ्रूण को पोषण देता है।
- लार्वा क्या है? — अंडे से निकलने के बाद विकास की ऐसी अवस्था जो वयस्क से अलग दिखाई देती है।
- तितली के जीवन-चक्र का क्रम लिखिए। — अंडा → लार्वा → प्यूपा → वयस्क।
- मछली और मेंढक में कौन-सा निषेचन होता है? — सामान्यतः बाह्य निषेचन।
- पक्षियों में कौन-सा निषेचन होता है? — आंतरिक निषेचन।
- जन्तुओं में जनन की दो मूल चुनौतियाँ क्या हैं? — युग्मकों का सफल मिलन और संतति का जीवित रहकर वयस्क होना।
जनन: जीवन की निरंतरता
अध्याय 11. जनन — जीवन की निरंतरता
जनन स्वास्थ्य में केवल जनन की प्रक्रिया को समझना ही नहीं, बल्कि अनियोजित गर्भावस्था से बचाव, सुरक्षित और जिम्मेदार निर्णय, मातृ स्वास्थ्य तथा समाज में समानता और जागरूकता बनाए रखना भी शामिल है।
शल्य-चिकित्सा द्वारा गर्भनिरोध
परिभाषा: शल्य-चिकित्सा द्वारा जनन मार्ग की ऐसी नलिकाओं को अवरुद्ध करना, जिससे शुक्राणु और अंडाणु का संलयन न हो सके, शल्य-चिकित्सीय गर्भनिरोध कहलाता है।
अनियोजित गर्भावस्था को रोकने के लिए पुरुषों में शुक्रवाहिनी और महिलाओं में डिंबवाहिनी को अवरुद्ध किया जा सकता है। इससे शुक्राणु और अंडाणु के मिलने की संभावना समाप्त या बहुत कम हो जाती है।
पुरुषों में
पुरुषों में शुक्रवाहिनी को अवरुद्ध किया जाता है, जिससे शुक्राणु आगे नहीं पहुँच पाते।
महिलाओं में
महिलाओं में डिंबवाहिनी को अवरुद्ध किया जाता है, जिससे अंडाणु और शुक्राणु के मिलने की संभावना नहीं रहती।
गर्भपात
परिभाषा: गर्भावस्था के दौरान भ्रूण को चिकित्सकीय या शल्य प्रक्रिया द्वारा गर्भाशय से हटाने की प्रक्रिया को गर्भपात कहा जाता है।
अध्याय के अनुसार, अनियोजित गर्भावस्था के कुछ मामलों में गर्भावस्था के पहले त्रिमास में, जब भ्रूण बहुत छोटा होता है, उसे शल्य क्रिया द्वारा हटाया जा सकता है।
लिंग चयन और सामाजिक जिम्मेदारी
परिभाषा: संतान के किसी विशेष लिंग को प्राथमिकता देकर गर्भावस्था या जन्म से संबंधित निर्णय लेना लिंग चयन कहलाता है।
किसी विशेष लिंग को प्राथमिकता देने के कारण किया गया स्वैच्छिक गर्भपात समाज में लिंगानुपात का असंतुलन पैदा कर सकता है। इसलिए समाज में लड़के और लड़कियों को समान महत्त्व देना आवश्यक है।
प्रसव-पूर्व लिंग निर्धारण
भारत में प्रसव-पूर्व लिंग निर्धारण कानूनी रूप से प्रतिबंधित है। इसका उद्देश्य लिंग आधारित भेदभाव और असंतुलन को रोकना है।
जनन स्वास्थ्य और जिम्मेदार निर्णय
किशोरावस्था में शरीर जनन के योग्य हो सकता है, लेकिन भावनात्मक और सामाजिक परिपक्वता विकसित होने में अधिक समय लगता है। इसलिए जनन और यौन स्वास्थ्य से जुड़े निर्णय विवेकपूर्ण तथा जिम्मेदारी से लेना आवश्यक है।
- अनियोजित गर्भावस्था से बचाव के लिए उचित गर्भनिरोधक विधियों की जानकारी आवश्यक है।
- यौन संचारित संक्रमणों से बचाव के लिए सुरक्षित व्यवहार आवश्यक है।
- जनन स्वास्थ्य के विषय में सही और वैज्ञानिक जानकारी महत्वपूर्ण है।
- स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर उचित स्वास्थ्यकर्मी से सलाह लेनी चाहिए।
मासिक धर्म स्वच्छता
परिभाषा: मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता, सुरक्षित मासिक धर्म उत्पादों के उपयोग और उनके उचित निपटान से संबंधित सावधानियों को मासिक धर्म स्वच्छता कहा जाता है।
- मासिक धर्म के लिए उपयुक्त उत्पादों का उपयोग करना चाहिए।
- जननांग क्षेत्र की नियमित सफाई करनी चाहिए।
- मासिक धर्म उत्पाद बदलने से पहले और बाद में हाथ धोने चाहिए।
- प्रयुक्त उत्पादों का उचित तरीके से निपटान करना चाहिए।
- पुनः उपयोग किए जाने वाले उत्पादों को अच्छी तरह साफ और पूरी तरह सुखाकर ही दोबारा उपयोग करना चाहिए।
- सैनिटरी पैड को सामान्यतः 4–6 घंटे में या अधिक रक्तस्राव होने पर उससे पहले बदलना चाहिए।
माँ और शिशु का स्वास्थ्य
गर्भावस्था के दौरान माँ का स्वास्थ्य शिशु के विकास और सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। माँ को संतुलित आहार, पर्याप्त प्रोटीन, विटामिन और खनिज प्राप्त करने चाहिए। नियमित चिकित्सकीय जाँच, पर्याप्त विश्राम और चिकित्सक की सलाह के अनुसार हल्का व्यायाम उपयोगी है।
जन्म के बाद शिशु की देखभाल
- माँ का दूध शिशु को आवश्यक पोषण और अनेक रोगों से सुरक्षा प्रदान करता है।
- नवजात शिशु के शरीर का तापमान उचित रखना आवश्यक है।
- शिशु का समय पर टीकाकरण कराया जाना चाहिए।
- माँ के स्वास्थ्य और पोषण का भी ध्यान रखना आवश्यक है।
आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका
परिभाषा: आशा (ASHA) कार्यकर्ता समुदाय में स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी प्रशिक्षित महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता होती हैं।
विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में आशा कार्यकर्ता स्वच्छता, टीकाकरण, परिवार नियोजन, मातृ देखभाल, सुरक्षित प्रसव और गर्भनिरोधक विधियों के संबंध में लोगों को जागरूक करती हैं।
परिभाषा: शिशु के जन्म के बाद कुछ माताओं में होने वाली बेचैनी, उदासी और थकान की स्थिति को प्रसव पश्चात अवसाद कहा जाता है।
यह एक मान्य स्वास्थ्य स्थिति है और इसका उपचार संभव है। यदि माँ लंबे समय तक उदासी या बेचैनी महसूस करे, तो डॉक्टर, नर्स या आशा कार्यकर्ता जैसे स्वास्थ्यकर्मी से सहायता लेनी चाहिए।
जनन और समाज
जनन केवल जैविक प्रक्रिया नहीं है। इससे जुड़े स्वास्थ्य, परिवार, सामाजिक समानता और जिम्मेदार निर्णय भी महत्वपूर्ण हैं। वैज्ञानिक जानकारी और सही स्वास्थ्य सेवाएँ व्यक्ति तथा समाज दोनों के लिए लाभदायक होती हैं।
भारतीय वैज्ञानिकों का योगदान
अध्याय में केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा विकसित गैर-स्टेरॉयड और गैर-हार्मोनल, मुँह से ली जाने वाली गर्भनिरोधक गोली का उल्लेख किया गया है। यह सप्ताह में एक बार ली जाने वाली गोली के रूप में वर्णित है और राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम के माध्यम से उपलब्ध कराई जाती है।
Concept Builder
शुक्रवाहिनी को अवरुद्ध करना → शुक्राणु का मार्ग रोकना → निषेचन रोकना
डिंबवाहिनी को अवरुद्ध करना → अंडाणु और शुक्राणु का मिलन रोकना → गर्भधारण रोकना
मासिक धर्म → गर्भाशय की परत का निष्कासन
गर्भावस्था → भ्रूण का विकास → शिशु का जन्म
जनन स्वास्थ्य → वैज्ञानिक जानकारी + स्वच्छता + सुरक्षित व्यवहार + जिम्मेदार निर्णय
Exam Booster
- शल्य-चिकित्सीय गर्भनिरोध क्या है? — जनन मार्ग की नलिकाओं को अवरुद्ध करके निषेचन रोकने की विधि।
- पुरुषों में किस नली को अवरुद्ध किया जाता है? — शुक्रवाहिनी।
- महिलाओं में किस नली को अवरुद्ध किया जाता है? — डिंबवाहिनी।
- गर्भपात क्या है? — गर्भावस्था के दौरान भ्रूण को चिकित्सकीय या शल्य प्रक्रिया द्वारा हटाना।
- प्रसव-पूर्व लिंग निर्धारण भारत में कैसा है? — कानूनी रूप से प्रतिबंधित।
- मासिक धर्म के समय हाथ धोना क्यों आवश्यक है? — स्वच्छता बनाए रखने और संक्रमण के जोखिम को कम करने के लिए।
- गर्भावस्था के दौरान माँ के स्वास्थ्य के लिए क्या आवश्यक है? — संतुलित पोषण, नियमित चिकित्सकीय जाँच, पर्याप्त विश्राम और चिकित्सकीय सलाह का पालन।
- आशा कार्यकर्ता की एक प्रमुख भूमिका लिखिए। — मातृ देखभाल, सुरक्षित प्रसव, परिवार नियोजन और स्वास्थ्य जागरूकता में सहायता करना।
- प्रसव पश्चात अवसाद क्या है? — शिशु के जन्म के बाद कुछ माताओं में होने वाली बेचैनी, उदासी और थकान की स्वास्थ्य स्थिति।
- जनन स्वास्थ्य के लिए वैज्ञानिक जानकारी क्यों आवश्यक है? — इससे व्यक्ति सुरक्षित और जिम्मेदार स्वास्थ्य संबंधी निर्णय ले सकता है।
जनन: जीवन की निरंतरता
अध्याय 11. जनन — जीवन की निरंतरता
इस असाइनमेंट के प्रश्न अध्याय के प्रमुख विषयों—अलैंगिक एवं लैंगिक जनन, पौधों और जंतुओं में जनन, मानव जनन, परागण, निषेचन, गर्भावस्था तथा जनन स्वास्थ्य—की आपकी समझ को जाँचने और मजबूत करने में सहायता करेंगे।
Assignment – What Have You Learned?
A. रिक्त स्थान भरिए
- अपने जैसे नए जीव उत्पन्न करने की जैविक प्रक्रिया को ________ कहते हैं।
- अलैंगिक जनन में सामान्यतः ________ जनक भाग लेता है।
- यीस्ट और हाइड्रा में ________ द्वारा अलैंगिक जनन होता है।
- पौधे के कायिक भागों से नया पौधा बनने की प्रक्रिया ________ कहलाती है।
- पुष्प का नर जनन अंग ________ कहलाता है।
- परागकोश से वर्तिकाग्र तक परागकणों के स्थानांतरण को ________ कहते हैं।
- नर और मादा युग्मकों के संलयन को ________ कहते हैं।
- निषेचन के बाद बनने वाली पहली कोशिका ________ कहलाती है।
- मानव में शुक्राणुओं का निर्माण ________ में होता है।
- अंडाशय से परिपक्व अंडाणु के निकलने की प्रक्रिया ________ कहलाती है।
B. सही या गलत बताइए
- अलैंगिक जनन में दो जनकों का होना आवश्यक है।
- अलैंगिक जनन से बनी संततियाँ सामान्यतः जनक के आनुवंशिक रूप से समान होती हैं।
- परागकोश स्त्रीकेसर का भाग है।
- स्व-परागण एक ही पुष्प या उसी पौधे के पुष्पों के बीच हो सकता है।
- निषेचन के बाद बीजांड बीज में विकसित होता है।
- निषेचन के बाद अंडाशय फल में विकसित हो सकता है।
- मानव शुक्राणु में 46 गुणसूत्र होते हैं।
- मानव में निषेचन मादा के शरीर के भीतर होता है।
- मासिक धर्म केवल निषेचन होने पर होता है।
- कंडोम कुछ यौन संचारित संक्रमणों के जोखिम को कम करने में सहायता कर सकता है।
C. एक शब्द या एक वाक्य में उत्तर दीजिए
- जनन के दो मुख्य प्रकार कौन-से हैं?
- कवक में अलैंगिक जनन की एक विधि का नाम लिखिए।
- क्लोन किसे कहते हैं?
- पुष्प का मादा जनन अंग कौन-सा है?
- परागकण कहाँ बनते हैं?
- बीजांड कहाँ पाए जाते हैं?
- मानव का नर युग्मक क्या कहलाता है?
- मानव का मादा युग्मक क्या कहलाता है?
- भ्रूण का विकास मानव शरीर के किस अंग में होता है?
- STI का पूरा नाम लिखिए।
D. अति लघु उत्तरीय प्रश्न
- अलैंगिक जनन की परिभाषा लिखिए।
- कायिक प्रवर्धन क्या है?
- कर्तन द्वारा पौधे का प्रवर्धन कैसे किया जाता है?
- मुकुलन क्या है?
- समसूत्री विभाजन का अलैंगिक जनन में क्या महत्त्व है?
- परागण की परिभाषा लिखिए।
- स्व-परागण और पर-परागण क्या हैं?
- पराग नलिका का क्या कार्य है?
- अंडोत्सर्ग क्या है?
- मासिक धर्म क्या है?
E. लघु उत्तरीय प्रश्न
- अलैंगिक जनन की चार प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
- कर्तन, कलम बाँधना और परतन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
- ऊतक संवर्धन क्या है? कृषि में इसका क्या महत्त्व है?
- यीस्ट और हाइड्रा में मुकुलन की प्रक्रिया समझाइए।
- बीजाणु निर्माण द्वारा कवक किस प्रकार जनन करते हैं?
- पुष्प के पुंकेसर और स्त्रीकेसर की संरचना तथा कार्य लिखिए।
- परागण के विभिन्न माध्यमों को उदाहरण सहित समझाइए।
- परागण और निषेचन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
- निषेचन के बाद पुष्प के अंडाशय और बीजांड में क्या परिवर्तन होते हैं?
- मानव नर और मादा जनन तंत्र के प्रमुख अंगों के नाम और कार्य लिखिए।
F. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
- अलैंगिक जनन क्या है? पौधों तथा अन्य जीवों में अलैंगिक जनन की विभिन्न विधियों को उदाहरण सहित समझाइए।
- पुष्पीय पादपों में लैंगिक जनन की पूरी प्रक्रिया को परागण से बीज और फल के निर्माण तक समझाइए।
- मानवों में लैंगिक जनन की प्रक्रिया को युग्मक निर्माण, निषेचन, युग्मनज, भ्रूण और गर्भावस्था के संदर्भ में समझाइए।
- बाह्य और आंतरिक निषेचन में अंतर स्पष्ट कीजिए। प्रत्येक के उदाहरण तथा संतति की उत्तरजीविता से उसका संबंध बताइए।
- मासिक धर्म चक्र क्या है? अंडोत्सर्ग, निषेचन और मासिक धर्म के बीच संबंध समझाइए।
- जनन स्वास्थ्य से आप क्या समझते हैं? गर्भनिरोध और यौन संचारित संक्रमणों से बचाव के प्रमुख उपायों का वर्णन कीजिए।
G. कारण बताइए
- अलैंगिक जनन से उत्पन्न संततियाँ सामान्यतः अपने जनक के समान होती हैं।
- लैंगिक जनन से आनुवंशिक विभिन्नता उत्पन्न होती है।
- बाह्य निषेचन करने वाले अनेक जंतु बहुत अधिक संख्या में अंडे देते हैं।
- पर-परागण आनुवंशिक विविधता बढ़ाने में सहायक होता है।
- निषेचन होने पर मासिक धर्म रुक जाता है।
- रात में खिलने वाले अनेक पुष्प सफेद या हल्के रंग के होते हैं।
- कायिक रूप से प्रवर्धित पौधों में किसी रोग के प्रति समान संवेदनशीलता हो सकती है।
- पौधों के लिए परागणकारी महत्वपूर्ण होते हैं।
H. अंतर स्पष्ट कीजिए
- अलैंगिक जनन और लैंगिक जनन
- स्व-परागण और पर-परागण
- परागण और निषेचन
- पुंकेसर और स्त्रीकेसर
- शुक्राणु और अंडाणु
- बाह्य निषेचन और आंतरिक निषेचन
- कर्तन और परतन
I. क्रम को सही कीजिए
- निषेचन, परागण, युग्मनज निर्माण, वर्तिकाग्र पर परागकण का अंकुरण
- भ्रूण, निषेचन, युग्मनज, शुक्राणु एवं अंडाणु
- फल, परागण, निषेचन, बीज निर्माण
- वयस्क तितली, अंडा, प्यूपा, लार्वा
J. Concept-Based Questions
- एक पौधे के परागकोश को परिपक्व होने से पहले हटा दिया गया। बाद में उसी प्रजाति के दूसरे पौधे के परागकण उसके वर्तिकाग्र पर डाले गए। बताइए—
- यह कौन-सा परागण है?
- परागकोश को पहले क्यों हटाया गया?
- इस प्रक्रिया से आनुवंशिक विविधता पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?
- यदि किसी पौधे के सभी पुष्प कई पीढ़ियों तक केवल स्व-परागण करें, तो उसकी आनुवंशिक विविधता पर क्या प्रभाव पड़ सकता है? कारण सहित समझाइए।
- एक किसान कम समय में बड़ी संख्या में आनुवंशिक रूप से समान पौधे तैयार करना चाहता है। आप उसे कौन-सी जनन विधियाँ सुझाएँगे? कारण भी बताइए।
- यदि किसी क्षेत्र में मधुमक्खियों और अन्य परागणकारियों की संख्या बहुत कम हो जाए, तो फल देने वाली फसलों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?
- एक विद्यार्थी कहता है कि “मानव में अंडोत्सर्ग हमेशा मासिक धर्म चक्र के ठीक 14वें दिन ही होता है।” इस कथन का वैज्ञानिक रूप से मूल्यांकन कीजिए।
K. प्रयोग एवं वैज्ञानिक चिंतन
- एक विद्यार्थी परागकणों के अंकुरण का अध्ययन करने के लिए 0%, 2.5%, 5%, 7.5% और 10% शर्करा सांद्रता वाले विलयनों का उपयोग करता है।
- इस प्रयोग का उद्देश्य क्या हो सकता है?
- स्वतंत्र चर क्या है?
- आश्रित चर क्या होगा?
- किन परिस्थितियों को समान रखना चाहिए?
- दो सेब के बगीचों में से एक में केवल प्राकृतिक परागणकारी हैं, जबकि दूसरे में मधुमक्खी की कॉलोनियाँ भी रखी गई हैं।
- दोनों बगीचों में फल लगने की तुलना कैसे करेंगे?
- मधुमक्खियों से उपज पर क्या प्रभाव पड़ने की संभावना है?
- इस प्रयोग से परागणकारियों के महत्त्व के बारे में क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है?
L. Diagram-Based Assignment
- एक पुष्प का नामांकित चित्र बनाकर पुंकेसर, परागकोश, वर्तिकाग्र, वर्तिका, अंडाशय और बीजांड दर्शाइए।
- नर जनन तंत्र का नामांकित चित्र बनाइए।
- मादा जनन तंत्र का नामांकित चित्र बनाइए।
- परागकण से पराग नलिका बनने और बीजांड तक पहुँचने की प्रक्रिया का चित्र बनाइए।
- अंडा → लार्वा → प्यूपा → वयस्क के रूप में तितली का जीवन-चक्र दर्शाइए।
M. Activity / Project Work
- देशी बीजों का संरक्षण: भारत सरकार की 'बीज ग्राम योजना' के बारे में जानकारी एकत्र कीजिए और लिखिए कि देशी बीजों का संरक्षण क्यों महत्वपूर्ण है।
- IVF पर रिपोर्ट: IVF क्या है, इसका उपयोग क्यों किया जाता है तथा इसकी प्रमुख सीमाएँ क्या हैं—इस विषय पर संक्षिप्त रिपोर्ट तैयार कीजिए।
- खेत का सर्वेक्षण: अपने आसपास के किसानों से पता कीजिए कि कौन-सी फसलें कायिक प्रवर्धन द्वारा और कौन-सी बीजों द्वारा उगाई जाती हैं।
- परागणकारी सर्वेक्षण: विद्यालय के उद्यान या आसपास के क्षेत्र में कम-से-कम पाँच प्रकार के परागणकारियों का अवलोकन कीजिए और उन पौधों के नाम लिखिए जिन पर वे जाते हैं।
- फल और बीज का अध्ययन: टमाटर, भिंडी, बैंगन, शिमला मिर्च, पपीता या संतरे जैसे फलों की अनुदैर्ध्य और अनुप्रस्थ काट का अवलोकन करके बीजों की स्थिति का चित्र बनाइए।
Challenge Yourself
प्रश्न: अमीबा या यीस्ट जैसे एककोशिकीय जीव जब विभाजित होकर लगभग दो समान संतति कोशिकाएँ बनाते हैं, तो उनमें “वृद्धावस्था” या ageing की अवधारणा को किस प्रकार समझा जा सकता है? अपने विचार वैज्ञानिक तर्क के साथ लिखिए।
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