ध्वनि तरंगें अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग - Class 9 Science Exploration Hindi CBSE Notes
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CBSE Notes for Class 9 – Chapter-wise Revision Notes
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ध्वनि तरंगें अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग - Class 9 Science Exploration Hindi CBSE Notes
ध्वनि तरंगें अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
अध्याय 10. ध्वनि तरंगें—अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
इस अध्याय में हम समझेंगे कि ध्वनि कैसे उत्पन्न होती है, किस प्रकार किसी माध्यम में संचरित होती है, ध्वनि तरंगों की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं, मानव कान ध्वनि को कैसे सुनता है तथा ध्वनि के परावर्तन और पराश्रव्य तरंगों के विभिन्न अनुप्रयोग क्या हैं।
Chapter Review
- ध्वनि: ध्वनि हमारे दैनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण संवेदी अनुभव है और यह हमें अपने परिवेश के प्रति जागरूक करती है।
- ध्वनि ऊर्जा: ध्वनि ऊर्जा का एक रूप है और ऊर्जा एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित हो सकती है।
- ध्वनि का उत्पादन: ध्वनि कंपन करने वाली वस्तुओं द्वारा उत्पन्न होती है।
- कंपन: किसी वस्तु की आगे-पीछे होने वाली आवर्ती गति को कंपन या दोलन कहते हैं।
- ध्वनि का स्रोत: जो वस्तु ध्वनि उत्पन्न करती है, उसे ध्वनि का स्रोत कहते हैं।
- कंपन और ध्वनि का संबंध: जब तक कोई वस्तु कंपन करती रहती है, तब तक उससे ध्वनि उत्पन्न हो सकती है; कंपन रुकने पर ध्वनि भी रुक जाती है।
- ध्वनि उत्पन्न करने वाली वस्तुएँ: कंपन करने वाले तार, पतले पटल, वायु-स्तंभ और अन्य कंपनशील वस्तुएँ ध्वनि उत्पन्न कर सकती हैं।
- मानव में ध्वनि उत्पादन: मनुष्य में ध्वनि मुख्यतः वाक्-तंतु (vocal cords) के कंपन से उत्पन्न होती है।
- स्वरित्र द्विभुज: स्वरित्र द्विभुज (tuning fork) U-आकार की धात्विक छड़ होती है, जिसका प्रयोग ध्वनि से जुड़े प्रयोगों में किया जाता है।
- ध्वनि के संचरण के लिए माध्यम: ध्वनि को संचरण के लिए भौतिक माध्यम की आवश्यकता होती है।
- माध्यम: वह पदार्थ जिसके माध्यम से ध्वनि संचरित होती है, माध्यम कहलाता है।
- ध्वनि का संचरण: ध्वनि ठोस, द्रव और गैसों से होकर संचरित हो सकती है।
- निर्वात: ऐसा स्थान जहाँ कोई भौतिक माध्यम उपस्थित नहीं होता, निर्वात कहलाता है।
- निर्वात में ध्वनि: ध्वनि निर्वात में संचरित नहीं हो सकती क्योंकि वहाँ ध्वनि के संचरण के लिए कोई माध्यम नहीं होता।
- अंतरिक्ष में ध्वनि: बाह्य अंतरिक्ष लगभग निर्वात है, इसलिए अंतरिक्ष में सामान्य रूप से ध्वनि संचरित नहीं हो सकती।
- ध्वनि तरंग: माध्यम के कणों के वास्तविक स्थानांतरण के बिना क्रमिक संपीडनों और विरलनों के रूप में संचरित होने वाली तरंग ध्वनि तरंग कहलाती है।
- संपीडन: माध्यम का वह क्षेत्र जहाँ कण अधिक पास-पास होते हैं और घनत्व अधिक होता है, संपीडन कहलाता है।
- विरलन: माध्यम का वह क्षेत्र जहाँ कण अपेक्षाकृत दूर-दूर होते हैं और घनत्व कम होता है, विरलन कहलाता है।
- माध्यम के कणों की गति: माध्यम के कण तरंग के साथ आगे नहीं बढ़ते, बल्कि अपनी माध्य स्थिति के इधर-उधर कंपन करते हैं।
- अनुदैर्ध्य तरंग: जिस तरंग में माध्यम के कणों का कंपन तरंग के संचरण की दिशा के समानांतर होता है, उसे अनुदैर्ध्य तरंग कहते हैं।
- ध्वनि तरंग का प्रकार: ध्वनि एक अनुदैर्ध्य तरंग है।
- यांत्रिक तरंग: जिस तरंग को संचरण के लिए भौतिक माध्यम की आवश्यकता होती है, उसे यांत्रिक तरंग कहते हैं। ध्वनि एक यांत्रिक तरंग है।
- अनुप्रस्थ तरंग: जिस तरंग में माध्यम के कणों का कंपन तरंग के संचरण की दिशा के लंबवत होता है, उसे अनुप्रस्थ तरंग कहते हैं।
- ध्वनि तरंग की ऊर्जा: ध्वनि तरंग माध्यम में ऊर्जा का स्थानांतरण करती है, जबकि माध्यम के कण स्वयं तरंग के साथ आगे नहीं बढ़ते।
- तरंगदैर्ध्य: दो क्रमागत संपीडनों या दो क्रमागत विरलनों के बीच की दूरी तरंगदैर्ध्य कहलाती है। इसे λ से प्रदर्शित किया जाता है और इसका SI मात्रक मीटर है।
- आवृत्ति: किसी बिंदु पर एक सेकंड में होने वाले पूर्ण दोलनों की संख्या आवृत्ति कहलाती है। इसका SI मात्रक हर्ट्ज (Hz) है।
- आवर्तकाल: किसी बिंदु पर एक पूर्ण दोलन करने में लगने वाले समय को आवर्तकाल कहते हैं। इसका SI मात्रक सेकंड है।
- आवृत्ति और आवर्तकाल: आवृत्ति और आवर्तकाल एक-दूसरे के व्युत्क्रम होते हैं।
- ध्वनि की चाल: ध्वनि की चाल माध्यम की प्रकृति तथा परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
- आवृत्ति–तरंगदैर्ध्य संबंध: ध्वनि की चाल, आवृत्ति और तरंगदैर्ध्य के बीच संबंध का उपयोग ध्वनि तरंग से संबंधित संख्यात्मक प्रश्नों को हल करने में किया जाता है।
- आयाम: ध्वनि तरंग का आयाम माध्यम के औसत घनत्व की तुलना में संपीडन या विरलन में घनत्व के अधिकतम परिवर्तन को दर्शाता है।
- आयाम और ऊर्जा: अधिक आयाम वाली ध्वनि तरंग अधिक ऊर्जा वहन करती है।
- प्रबलता: ध्वनि के आयाम का हमारे कानों द्वारा अनुभव किया जाने वाला प्रभाव प्रबलता कहलाता है। अधिक आयाम वाली ध्वनि अधिक प्रबल सुनाई देती है।
- तीव्रता और प्रबलता: तीव्रता एक मापनीय भौतिक राशि है, जबकि प्रबलता श्रोता की श्रवण क्षमता पर निर्भर करती है।
- डेसिबेल: ध्वनि की प्रबलता को सामान्यतः डेसिबेल (dB) में व्यक्त किया जाता है।
- आवृत्ति और तारत्व: ध्वनि की आवृत्ति उसके तारत्व से संबंधित होती है। अधिक आवृत्ति वाली ध्वनि अधिक तीखी या ऊँची प्रतीत होती है।
- स्वर: लगभग एकल आवृत्ति वाली ध्वनि को स्वर कहा जाता है।
- मूल आवृत्ति: किसी संगीत स्वर में उपस्थित सबसे कम आवृत्ति को मूल आवृत्ति कहते हैं।
- अधिस्वरक: मूल आवृत्ति से अधिक आवृत्तियों वाले घटकों को अधिस्वरक कहा जाता है। ये मिलकर ध्वनि को समृद्ध बनाते हैं।
- ध्वनि गुणता: समान प्रबलता और समान स्वर वाली ध्वनियों को अलग पहचानने वाला गुण ध्वनि गुणता (Timbre) कहलाता है। यह वाद्य के आकार, पदार्थ और संरचना पर निर्भर करती है।
- अष्टक: ऐसे दो समान स्वरों के बीच का अंतर जिनकी मूल आवृत्तियों में 2 : 1 का संबंध हो, अष्टक कहलाता है।
- श्रव्यता परिसर: सामान्य मानव कान लगभग 20 Hz से 20 kHz तक की ध्वनियों को सुन सकता है। यह परिसर व्यक्ति की आयु आदि के अनुसार बदल सकता है।
- अवश्रव्य तरंगें: 20 Hz से कम आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों को अवश्रव्य तरंगें कहते हैं।
- पराश्रव्य तरंगें: 20 kHz से अधिक आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों को पराश्रव्य तरंगें कहते हैं।
- पराश्रव्य सुनने वाले जीव: कुत्ते, बिल्लियाँ, चमगादड़ और डॉल्फिन जैसे कुछ जीव पराश्रव्य तरंगों को सुन सकते हैं।
- ध्वनि प्रदूषण: अवांछित या हानिकारक ध्वनि को शोर कहा जाता है और अत्यधिक शोर ध्वनि प्रदूषण उत्पन्न करता है।
- ध्वनि प्रदूषण के प्रभाव: लंबे समय तक अत्यधिक प्रबल ध्वनि के संपर्क में रहने से नींद, स्वास्थ्य और श्रवण क्षमता प्रभावित हो सकती है।
- मानव कान: ध्वनि कान में प्रवेश करके कर्णपटल में कंपन उत्पन्न करती है। कान की छोटी अस्थियाँ इन कंपनों को प्रवर्धित करती हैं और कर्णावर्त (cochlea) इन्हें विद्युत संकेतों में बदलता है।
- ध्वनि का अनुभव: विद्युत संकेत मस्तिष्क तक पहुँचते हैं और मस्तिष्क उन्हें ध्वनि के रूप में अनुभव करता है।
- दोनों कानों का महत्त्व: दोनों कानों से प्राप्त ध्वनियों के समय में सूक्ष्म अंतर के आधार पर मस्तिष्क ध्वनि के स्रोत की दिशा का अनुमान लगा सकता है।
- ध्वनि का परावर्तन: ध्वनि तरंगों का किसी ठोस या द्रव जैसी बाधा से टकराकर वापस लौटना ध्वनि का परावर्तन कहलाता है।
- परावर्तन के नियम: ध्वनि का परावर्तन भी आपतन और परावर्तन के नियमों का पालन करता है।
- प्रतिध्वनि: परावर्तित ध्वनि के स्पष्ट रूप से दोबारा सुनाई देने की घटना को प्रतिध्वनि कहते हैं।
- अनुरणन: परावर्तित ध्वनि के बार-बार बने रहने के कारण ध्वनि की अवधि बढ़ने की घटना अनुरणन से संबंधित है।
- प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण: किसी वस्तु से परावर्तित ध्वनि के आधार पर उसके स्थान का पता लगाने की प्रक्रिया प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण (echolocation) कहलाती है।
- चमगादड़: चमगादड़ पराश्रव्य तरंगें उत्पन्न करके उनसे प्राप्त प्रतिध्वनियों के आधार पर बाधाओं और शिकार का पता लगाते हैं।
- अन्य जीवों में echolocation: डॉल्फिन और व्हेल जैसे कुछ जीव भी दिशा निर्धारण तथा शिकार खोजने में प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण का उपयोग करते हैं।
- सोनार: SONAR में पराश्रव्य तरंगों को जल में भेजकर उनसे प्राप्त परावर्तित तरंगों के आधार पर जल के भीतर स्थित वस्तुओं का पता लगाया जाता है।
- सोनार के उपयोग: पनडुब्बियों, जहाजों के अवशेषों तथा अन्य जलमग्न वस्तुओं की दूरी, दिशा और स्थिति का पता लगाने में सोनार उपयोगी है।
- समुद्र की गहराई: सोनार से भेजी गई तरंग के लौटने में लगे समय और जल में ध्वनि की चाल का उपयोग करके समुद्र की गहराई ज्ञात की जा सकती है।
- पराश्रव्य तरंगों के औद्योगिक उपयोग: पराश्रव्य तरंगों का उपयोग अल्ट्रासोनिक वेल्डिंग, संवेदनशील मशीन भागों की सफाई तथा धातुओं के भीतर दोषों का पता लगाने में किया जाता है।
- चिकित्सा एवं अन्य अनुप्रयोग: ध्वनि और विशेषकर पराश्रव्य तरंगों के अनेक वैज्ञानिक एवं तकनीकी अनुप्रयोग हैं, जिनसे मानव शरीर, पदार्थों और दूरस्थ वस्तुओं के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
- ध्वनि आधारित चौकसी: ड्रोन और विमान जैसे स्रोतों की विशिष्ट ध्वनियों को ध्वनि संवेदकों द्वारा पहचानकर निगरानी एवं बचाव कार्यों में सहायता ली जा सकती है।
- ध्वनि का वैज्ञानिक उपयोग: आधुनिक विज्ञान में ध्वनि का उपयोग दूरस्थ भूकंपों, महासागर के तापमान में सूक्ष्म परिवर्तनों, मच्छरों की पहचान और मिट्टी के स्वास्थ्य जैसे विषयों के अध्ययन में भी किया जा रहा है।
Chapter का मूल विचार: ध्वनि कंपन से उत्पन्न होती है, संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है और माध्यम में यह मुख्यतः संपीडन तथा विरलन के रूप में अनुदैर्ध्य यांत्रिक तरंग के रूप में संचरित होती है। इसकी आवृत्ति, तरंगदैर्ध्य और आयाम इसके विभिन्न अभिलक्षणों को समझने में सहायता करते हैं, जबकि परावर्तन और पराश्रव्य तरंगों के सिद्धांत से सोनार, echolocation तथा अनेक वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुप्रयोग संभव होते हैं।
ध्वनि तरंगें अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
अध्याय 10. ध्वनि तरंगें—अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
ध्वनि हमारे दैनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण संवेदी अनुभव है। हम मनुष्य की वाणी, पक्षियों की चहचहाहट, वाहनों के हॉर्न, संगीत, पत्तियों की सरसराहट और बादलों की गड़गड़ाहट जैसी अनेक ध्वनियाँ सुनते हैं। इस अध्याय में हम समझेंगे कि ध्वनि उत्पन्न कैसे होती है और इसके पीछे कंपन की क्या भूमिका है।
ध्वनि का उत्पादन
हमारे आसपास अनेक प्रकार की ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। इनके स्रोत अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन ध्वनि उत्पन्न करने वाली वस्तुओं में एक सामान्य विशेषता होती है—वे कंपन करती हैं। किसी वस्तु के कंपन करने पर उससे ध्वनि उत्पन्न हो सकती है।
ध्वनि और कंपन
परिभाषा:
किसी वस्तु की आगे-पीछे होने वाली आवर्ती गति या दोलन को कंपन (Vibration) कहते हैं।
व्याख्या:
जब कोई वस्तु अपनी माध्य या सामान्य स्थिति के आसपास बार-बार आगे-पीछे गति करती है, तो वह कंपन कर रही होती है। ध्वनि उत्पन्न करने वाली वस्तु में इस प्रकार का कंपन ध्वनि के उत्पादन का कारण बनता है।
कंपन से ध्वनि का उत्पादन
परिभाषा:
किसी कंपन करने वाली वस्तु से उत्पन्न ऊर्जा के कारण सुनाई देने वाली संवेदना को ध्वनि कहते हैं।
व्याख्या:
जब कोई वस्तु कंपन करती है तो उससे ध्वनि उत्पन्न होती है। जैसे ही उस वस्तु का कंपन रुक जाता है, उससे उत्पन्न ध्वनि भी बंद हो जाती है। इस प्रकार ध्वनि और कंपन के बीच सीधा संबंध है।
मुख्य निष्कर्ष: कंपन करने वाली वस्तु → ध्वनि उत्पन्न करती है। कंपन समाप्त → ध्वनि समाप्त।
ध्वनि के विभिन्न स्रोत
ध्वनि विभिन्न प्रकार की कंपन करने वाली वस्तुओं से उत्पन्न हो सकती है। किसी तनी हुई डोरी को खींचकर छोड़ने पर उसमें कंपन उत्पन्न होते हैं और ध्वनि सुनाई देती है। किसी धातु की वस्तु पर प्रहार करने से उसमें कंपन उत्पन्न होकर ध्वनि पैदा होती है। बाँसुरी में फूँक मारने पर उसके भीतर की वायु कंपन करती है और ध्वनि उत्पन्न होती है।
ध्वनि उत्पन्न करने वाले कंपनशील भाग अलग-अलग हो सकते हैं। इनमें मुख्यतः तार, पतले पटल, वायु-स्तंभ तथा अन्य कंपन करने वाली वस्तुएँ शामिल हैं। कई संगीत वाद्ययंत्रों में ध्वनि उत्पन्न करने के लिए एक से अधिक कंपन करने वाले भाग भी होते हैं।
ध्वनि का स्रोत
परिभाषा:
जो वस्तु ध्वनि उत्पन्न करती है, उसे ध्वनि का स्रोत कहते हैं।
उदाहरण:
- कंपन करता हुआ तार — ध्वनि का स्रोत।
- कंपन करता हुआ धातु का भाग — ध्वनि का स्रोत।
- बाँसुरी में कंपन करती वायु — ध्वनि उत्पन्न करने वाला स्रोत।
- स्वरित्र द्विभुज की कंपन करती भुजाएँ — ध्वनि का स्रोत।
क्रियाकलाप — कंपन करती रबड़ बैंड से ध्वनि
क्रियाकलाप: एक तरफ से खुले गत्ते के डिब्बे और रबड़ बैंड को लीजिए। रबड़ बैंड को डिब्बे के खुले भाग पर तानकर लगाइए। अब उसे खींचकर छोड़िए और ध्वनि को सुनिए। रबड़ बैंड को ध्यान से देखने पर उसके कंपन दिखाई देंगे।
अब रबड़ बैंड को कंपन करते हुए देखें और उसके कंपन रुकने तक प्रतीक्षा करें। जैसे-जैसे कंपन समाप्त होते हैं, ध्वनि भी समाप्त हो जाती है। रबड़ बैंड का तनाव बदलने पर उत्पन्न ध्वनि में भी परिवर्तन अनुभव किया जा सकता है।
निष्कर्ष:
इस क्रियाकलाप से स्पष्ट होता है कि ध्वनि कंपन द्वारा उत्पन्न होती है।
मानव में ध्वनि का उत्पादन
मनुष्य बोलते या गाते समय अपने गले में कंपन अनुभव कर सकता है। मनुष्य में ध्वनि मुख्यतः वाक्-तंतुओं (Vocal Cords) के कंपन से उत्पन्न होती है। वाक्-तंतु गले में स्थित वाक् यंत्र (Voice Box) या कंठ (Larynx) में कसकर खिंची हुई पेशीय पट्टियों के समान होते हैं।
जब वाक्-तंतु कंपन करते हैं, तो ध्वनि उत्पन्न होती है। मनुष्य के जीभ, होंठ, मुँह और नासा-गुहा जैसे अंग इस ध्वनि को वाणी या गीत के रूप में बदलने में सहायता करते हैं।
जंतुओं में ध्वनि का उत्पादन
कुछ जंतुओं में भी ध्वनि कंपन के कारण उत्पन्न होती है। कुछ जंतु अपने शरीर के अंगों को आपस में टकराकर या रगड़कर ध्वनि उत्पन्न करते हैं। उदाहरण के लिए, टिड्डे और झींगुर अपने पंखों या टाँगों को रगड़कर ध्वनि उत्पन्न करते हैं।
परिभाषा:
स्वरित्र द्विभुज (Tuning Fork) ध्वनि से संबंधित प्रयोगों में प्रयुक्त एक ऐसा उपकरण है जिसमें आधार-स्तंभ से जुड़ी U-आकार की धात्विक छड़ होती है। इसकी दोनों शाखाएँ कंपन करके ध्वनि उत्पन्न करती हैं।
संरचना:
स्वरित्र द्विभुज सामान्यतः स्टील या एल्युमिनियम से बनाया जाता है। इसके U-आकार के दोनों पार्श्व भागों को इसकी भुजाएँ कहा जाता है। इसे कंपन कराने के लिए इसकी भुजा को रबड़ पैड से टकराया जाता है।
स्वरित्र द्विभुज से ध्वनि का प्रदर्शन
जब स्वरित्र द्विभुज की एक भुजा को रबड़ पैड से टकराया जाता है, तो उसकी भुजाएँ कंपन करने लगती हैं और ध्वनि उत्पन्न होती है। कंपन करता हुआ स्वरित्र द्विभुज कान के पास लाने पर ध्वनि सुनाई देती है।
जब कंपन करती हुई स्वरित्र द्विभुज की भुजा को जल की सतह से धीरे से स्पर्श कराया जाता है, तो जल की सतह पर तरंगें दिखाई देती हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि स्वरित्र द्विभुज की भुजाएँ वास्तव में कंपन कर रही हैं।
निष्कर्ष:
स्वरित्र द्विभुज का प्रयोग यह प्रदर्शित करता है कि ध्वनि कंपन करने वाली वस्तुओं द्वारा उत्पन्न होती है।
ध्वनि उत्पादन के प्रमुख उदाहरण
| ध्वनि स्रोत | कंपन करने वाला भाग |
|---|---|
| तनी हुई डोरी | डोरी |
| धातु की वस्तु | धातु का कंपन करता भाग |
| बाँसुरी | वायु-स्तंभ |
| मानव वाणी | वाक्-तंतु |
| स्वरित्र द्विभुज | धातु की भुजाएँ |
| टिड्डा/झींगुर | शरीर के रगड़ने वाले अंग |
ध्वनि उत्पादन के बारे में मुख्य बातें
- ध्वनि कंपन करने वाली वस्तुओं द्वारा उत्पन्न होती है।
- कंपन किसी वस्तु की आगे-पीछे होने वाली आवर्ती गति है।
- कंपन रुकने पर ध्वनि भी रुक जाती है।
- तार, पतले पटल, वायु-स्तंभ और अन्य कंपनशील वस्तुएँ ध्वनि उत्पन्न कर सकती हैं।
- ध्वनि उत्पन्न करने वाली वस्तु को ध्वनि का स्रोत कहते हैं।
- मनुष्य में ध्वनि वाक्-तंतुओं के कंपन से उत्पन्न होती है।
- जीभ, होंठ, मुँह और नासा-गुहा ध्वनि को वाणी या गीत में बदलने में सहायता करते हैं।
- स्वरित्र द्विभुज ध्वनि से संबंधित प्रयोगों में प्रयुक्त महत्वपूर्ण उपकरण है।
- स्वरित्र द्विभुज की कंपन करती भुजाएँ ध्वनि उत्पन्न करती हैं।
Our Concept Builder
इस पूरे Topic को एक सरल क्रम से समझिए—किसी वस्तु में कंपन → कंपन से ध्वनि का उत्पादन → कंपन करने वाली वस्तु ध्वनि का स्रोत। यदि कंपन बंद हो जाए, तो ध्वनि भी बंद हो जाती है। रबड़ बैंड और स्वरित्र द्विभुज के प्रयोग इस संबंध को प्रत्यक्ष रूप से समझाते हैं।
Exam Booster
- ध्वनि किससे उत्पन्न होती है? — कंपन करने वाली वस्तुओं से।
- कंपन क्या है? — वस्तु की आगे-पीछे होने वाली आवर्ती गति।
- ध्वनि का स्रोत क्या है? — ध्वनि उत्पन्न करने वाली वस्तु।
- मनुष्य में ध्वनि किसके कंपन से उत्पन्न होती है? — वाक्-तंतुओं के कंपन से।
- स्वरित्र द्विभुज क्या है? — U-आकार की धात्विक छड़ वाला उपकरण, जिसका प्रयोग ध्वनि संबंधी प्रयोगों में किया जाता है।
- स्वरित्र द्विभुज की भुजाएँ क्यों महत्वपूर्ण हैं? — वे कंपन करके ध्वनि उत्पन्न करती हैं।
- कंपन रुकने पर क्या होता है? — ध्वनि भी रुक जाती है।
- बाँसुरी में कौन कंपन करता है? — बाँसुरी के भीतर का वायु-स्तंभ।
ध्वनि तरंगें अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
अध्याय 10. ध्वनि तरंगें—अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
ध्वनि कंपन करती हुई वस्तुओं द्वारा उत्पन्न होती है। अब प्रश्न यह है कि ध्वनि अपने स्रोत से हमारे कानों तक कैसे पहुँचती है। ध्वनि वायु के साथ-साथ ठोस और द्रव माध्यमों से भी संचरित हो सकती है। इस भाग में हम ध्वनि के संचरण तथा इसके लिए माध्यम की आवश्यकता को समझेंगे।
ध्वनि का संचरण
परिभाषा: ध्वनि का अपने स्रोत से किसी माध्यम के द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचना ध्वनि का संचरण (Propagation of Sound) कहलाता है।
ध्वनि अपने स्रोत से हमारे कान तक पहुँचने के लिए किसी भौतिक माध्यम का उपयोग करती है। यह माध्यम ठोस, द्रव या गैस हो सकता है।
माध्यम (Medium)
परिभाषा: वह पदार्थ जिसके माध्यम से ध्वनि संचरित होती है, माध्यम (Medium) कहलाता है।
ध्वनि के संचरण के लिए तीन प्रकार के माध्यम हो सकते हैं—
- गैस: जैसे वायु।
- द्रव: जैसे जल।
- ठोस: जैसे लकड़ी, धातु या डेस्क।
ध्वनि ठोसों से होकर संचरित होती है
एक डेस्क के एक सिरे पर हल्का आघात या खरोंच करने पर ध्वनि वायु के माध्यम से दूसरे व्यक्ति के कान तक पहुँचती है। यदि दूसरा व्यक्ति अपना एक कान डेस्क पर रखकर और दूसरा कान बंद करके सुने, तो वह डेस्क के माध्यम से भी ध्वनि सुन सकता है।
निष्कर्ष: ध्वनि ठोस पदार्थों से होकर भी संचरित हो सकती है।
ध्वनि द्रवों से होकर संचरित होती है
एक पानी से भरे पात्र में दो धातु के चम्मचों को जल के भीतर आपस में टकराने पर उत्पन्न ध्वनि सुनी जा सकती है। इससे पता चलता है कि ध्वनि जल जैसे द्रव माध्यम से होकर भी संचरित होती है।
निष्कर्ष: ध्वनि द्रवों से होकर भी गमन कर सकती है।
ध्वनि गैसों से होकर संचरित होती है
हम अपने दैनिक जीवन में अधिकांश ध्वनियाँ वायु के माध्यम से सुनते हैं। वायु एक गैसीय माध्यम है। ध्वनि स्रोत से उत्पन्न होकर वायु के माध्यम से हमारे कानों तक पहुँचती है।
ध्वनि संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता
परिभाषा: ध्वनि के संचरण के लिए आवश्यक भौतिक पदार्थ को माध्यम कहा जाता है।
ध्वनि स्रोत और श्रोता के बीच यदि कोई भौतिक माध्यम उपस्थित नहीं है, तो ध्वनि एक स्थान से दूसरे स्थान तक संचरित नहीं हो सकती।
निर्वात (Vacuum)
परिभाषा: ऐसा स्थान जहाँ कोई भौतिक माध्यम या पदार्थ उपस्थित नहीं होता, निर्वात (Vacuum) कहलाता है।
ध्वनि निर्वात में संचरित नहीं हो सकती क्योंकि वहाँ ध्वनि के संचरण के लिए कोई माध्यम उपलब्ध नहीं होता।
निरवात बेलजार प्रयोग
ध्वनि के संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता को प्रदर्शित करने के लिए निरवात बेलजार प्रयोग किया जाता है। इसमें एक विद्युत घंटी को बेलजार के अंदर रखकर उसका स्विच चालू किया जाता है।
जब निर्वात पंप की सहायता से बेलजार के अंदर की वायु बाहर निकाली जाती है, तो घंटी की ध्वनि धीरे-धीरे कम होती जाती है। लगभग निर्वात की स्थिति में घंटी को बजते हुए देखा जा सकता है, लेकिन उसकी ध्वनि सुनाई नहीं देती।
जब बेलजार में धीरे-धीरे वायु पुनः प्रवेश कराई जाती है, तो घंटी की ध्वनि फिर सुनाई देने लगती है और धीरे-धीरे पहले जैसी प्रबल हो जाती है।
निष्कर्ष: यह प्रयोग सिद्ध करता है कि ध्वनि निर्वात में संचरित नहीं हो सकती। ध्वनि के संचरण के लिए ठोस, द्रव या गैस के रूप में किसी माध्यम की आवश्यकता होती है।
अंतरिक्ष में ध्वनि क्यों नहीं सुनाई देती?
बाह्य अंतरिक्ष लगभग निर्वातित होता है। इसलिए वहाँ ध्वनि सामान्य रूप से संचरित नहीं हो सकती। अंतरिक्ष यात्री अपने अंतरिक्ष परिधान में लगे विशेष संचार उपकरणों की सहायता से एक-दूसरे से संवाद करते हैं।
ध्वनि के संचरण का सार
| माध्यम | ध्वनि का संचरण | उदाहरण |
|---|---|---|
| गैस | हाँ | वायु |
| द्रव | हाँ | जल |
| ठोस | हाँ | डेस्क, धातु |
| निर्वात | नहीं | बाह्य अंतरिक्ष |
महत्वपूर्ण निष्कर्ष
- ध्वनि स्रोत से श्रोता तक माध्यम द्वारा संचरित होती है।
- ध्वनि ठोस, द्रव और गैस तीनों माध्यमों से होकर गमन कर सकती है।
- ध्वनि के संचरण के लिए भौतिक माध्यम आवश्यक है।
- ध्वनि निर्वात में संचरित नहीं हो सकती।
- वायु ध्वनि के संचरण का सामान्य गैसीय माध्यम है।
- जल ध्वनि के संचरण का द्रव माध्यम है।
- डेस्क जैसे ठोस पदार्थ के माध्यम से भी ध्वनि सुनी जा सकती है।
- निरवात बेलजार प्रयोग ध्वनि के संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता को प्रदर्शित करता है।
Our Concept Builder
ध्वनि स्रोत → माध्यम → श्रोता — ध्वनि को स्रोत से श्रोता तक पहुँचने के लिए माध्यम चाहिए। माध्यम ठोस, द्रव या गैस हो सकता है, लेकिन निर्वात में ध्वनि का संचरण नहीं होता।
Exam Booster
- ध्वनि के संचरण के लिए क्या आवश्यक है? — भौतिक माध्यम।
- ध्वनि किन माध्यमों में संचरित हो सकती है? — ठोस, द्रव और गैस में।
- माध्यम किसे कहते हैं? — जिस पदार्थ से होकर ध्वनि संचरित होती है।
- निर्वात क्या है? — ऐसा स्थान जहाँ कोई माध्यम या पदार्थ उपस्थित नहीं होता।
- क्या ध्वनि निर्वात में संचरित हो सकती है? — नहीं।
- निरवात बेलजार प्रयोग क्या सिद्ध करता है? — ध्वनि के संचरण के लिए माध्यम आवश्यक है।
- क्या ध्वनि जल में संचरित हो सकती है? — हाँ।
- क्या ध्वनि ठोस पदार्थ में संचरित हो सकती है? — हाँ।
- अंतरिक्ष में ध्वनि क्यों नहीं सुनाई देती? — क्योंकि बाह्य अंतरिक्ष लगभग निर्वातित है और वहाँ ध्वनि का संचरण नहीं हो सकता।
ध्वनि तरंगें अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
अध्याय 10. ध्वनि तरंगें—अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
ध्वनि के संचरण के लिए भौतिक माध्यम की आवश्यकता होती है। अब हम समझेंगे कि माध्यम के भीतर ध्वनि किस प्रकार आगे बढ़ती है, माध्यम के कण किस प्रकार कंपन करते हैं, संपीडन और विरलन कैसे बनते हैं तथा ध्वनि तरंगों में ऊर्जा का स्थानांतरण किस प्रकार होता है।
ध्वनि तरंगें (Sound Waves)
परिभाषा: माध्यम में उत्पन्न होने वाला वह विक्षोभ जो ऊर्जा को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाता है, तरंग कहलाता है। ध्वनि का संचरण माध्यम में तरंग के रूप में होता है।
जब कोई ध्वनि स्रोत कंपन करता है, तो उसके आसपास के माध्यम के कण भी कंपन करने लगते हैं। ये कण अपने निकट के कणों को प्रभावित करते हैं और इस प्रकार विक्षोभ एक स्थान से दूसरे स्थान तक आगे बढ़ता है।
ध्वनि तरंग यांत्रिक तरंग है
परिभाषा: जिस तरंग के संचरण के लिए किसी भौतिक माध्यम की आवश्यकता होती है, उसे यांत्रिक तरंग (Mechanical Wave) कहते हैं।
ध्वनि एक यांत्रिक तरंग है क्योंकि इसके संचरण के लिए ठोस, द्रव या गैस जैसे भौतिक माध्यम की आवश्यकता होती है। निर्वात में ध्वनि संचरित नहीं हो सकती।
ध्वनि तरंग में माध्यम के कणों की गति
ध्वनि तरंग के संचरण के दौरान माध्यम के कण तरंग के साथ लगातार आगे नहीं बढ़ते। वे अपनी माध्य स्थिति के आसपास कंपन करते हैं और अपने निकट के कणों को यह विक्षोभ प्रदान करते हैं। इस प्रकार ऊर्जा आगे बढ़ती है, जबकि माध्यम के कण अपने स्थान के आसपास ही दोलन करते हैं।
महत्त्वपूर्ण: ध्वनि तरंग के संचरण में ऊर्जा का स्थानांतरण होता है, माध्यम के कणों का स्थायी स्थानांतरण नहीं होता।
माध्यम के कण और ध्वनि का संचरण
माध्यम के कण सामान्य परिस्थितियों में भी तापीय ऊर्जा के कारण यादृच्छिक गति करते रहते हैं। जब ध्वनि तरंग माध्यम से गुजरती है, तो इन कणों के कंपन में अस्थायी वृद्धि होती है। तरंग के गुजर जाने के बाद कण अपनी सामान्य यादृच्छिक गति की ओर लौट आते हैं।
संपीडन और विरलन
संपीडन (Compression)
परिभाषा: ध्वनि तरंग के उस क्षेत्र को संपीडन कहते हैं जहाँ माध्यम के कण एक-दूसरे के अपेक्षाकृत पास होते हैं और वहाँ माध्यम का घनत्व औसत घनत्व से अधिक होता है।
जब ध्वनि स्रोत आगे की ओर कंपन करता है, तो वह अपने सामने के माध्यम के कणों को पास-पास कर देता है। इससे उच्च घनत्व वाला क्षेत्र बनता है, जिसे संपीडन कहते हैं। इसे सामान्यतः C से प्रदर्शित किया जाता है।
विरलन (Rarefaction)
परिभाषा: ध्वनि तरंग के उस क्षेत्र को विरलन कहते हैं जहाँ माध्यम के कण एक-दूसरे से अपेक्षाकृत दूर होते हैं और वहाँ माध्यम का घनत्व औसत घनत्व से कम होता है।
जब ध्वनि स्रोत पीछे की ओर गति करता है, तो उसके आसपास के माध्यम के कणों के बीच दूरी बढ़ जाती है। इससे निम्न घनत्व वाला क्षेत्र बनता है, जिसे विरलन कहते हैं। इसे सामान्यतः R से प्रदर्शित किया जाता है।
संपीडन और विरलन का क्रम
ध्वनि तरंग के संचरण के दौरान संपीडन और विरलन एक के बाद एक बनते रहते हैं। इस प्रकार माध्यम में उच्च और निम्न घनत्व वाले क्षेत्रों का क्रम बनता है। यही क्रम ध्वनि तरंग के आगे बढ़ने का आधार है।
सरल क्रम:
संपीडन → विरलन → संपीडन → विरलन → संपीडन
संपीडन और विरलन में अंतर
| आधार | संपीडन | विरलन |
|---|---|---|
| कणों की स्थिति | कण पास-पास होते हैं | कण दूर-दूर होते हैं |
| घनत्व | औसत घनत्व से अधिक | औसत घनत्व से कम |
| दाब | अधिक | कम |
| प्रतीक | C | R |
ध्वनि तरंगों के प्रकार
यांत्रिक तरंगों को माध्यम के कणों के कंपन की दिशा और तरंग के संचरण की दिशा के आधार पर मुख्यतः दो प्रकारों में समझा जाता है—अनुदैर्ध्य तरंगें और अनुप्रस्थ तरंगें।
अनुदैर्ध्य तरंग (Longitudinal Wave)
परिभाषा: जिस तरंग में माध्यम के कणों का कंपन तरंग के संचरण की दिशा के समानांतर होता है, उसे अनुदैर्ध्य तरंग कहते हैं।
ध्वनि तरंग अनुदैर्ध्य तरंग का उदाहरण है। इसमें माध्यम के कण तरंग के आगे बढ़ने की दिशा के समानांतर आगे-पीछे कंपन करते हैं। संपीडन और विरलन इसी प्रकार की तरंग में बनते हैं।
अनुप्रस्थ तरंग (Transverse Wave)
परिभाषा: जिस तरंग में माध्यम के कणों का कंपन तरंग के संचरण की दिशा के लंबवत होता है, उसे अनुप्रस्थ तरंग कहते हैं।
अनुप्रस्थ तरंग में माध्यम के कण ऊपर-नीचे या दाएँ-बाएँ कंपन कर सकते हैं, जबकि तरंग आगे की दिशा में संचरित होती है। इसमें शिखर (Crest) और गर्त (Trough) जैसे क्षेत्र दिखाई देते हैं।
अनुदैर्ध्य और अनुप्रस्थ तरंगों में अंतर
| आधार | अनुदैर्ध्य तरंग | अनुप्रस्थ तरंग |
|---|---|---|
| कणों के कंपन की दिशा | तरंग की दिशा के समानांतर | तरंग की दिशा के लंबवत |
| मुख्य क्षेत्र | संपीडन और विरलन | शिखर और गर्त |
| उदाहरण | ध्वनि तरंग | उपयुक्त माध्यम में अनुप्रस्थ यांत्रिक तरंग |
ध्वनि अनुदैर्ध्य तरंग क्यों है?
ध्वनि के संचरण के दौरान माध्यम के कण तरंग के संचरण की दिशा के समानांतर आगे-पीछे कंपन करते हैं। इस कारण माध्यम में क्रमशः संपीडन और विरलन उत्पन्न होते हैं। इसलिए ध्वनि को अनुदैर्ध्य तरंग कहा जाता है।
भूकंपीय तरंगें
भूकंप के कारण पृथ्वी के भीतर से होकर चलने वाली तरंगों को भूकंपीय तरंगें (Seismic Waves) कहते हैं। ये अनुदैर्ध्य या अनुप्रस्थ दोनों प्रकार की हो सकती हैं। अनुदैर्ध्य भूकंपीय तरंगें भूकंप-लेखी द्वारा सबसे पहले पहचानी जाने वाली तरंगें होती हैं।
ध्वनि तरंगों की ऊर्जा
ध्वनि ऊर्जा का रूप है
परिभाषा: कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा कहते हैं। ध्वनि भी ऊर्जा का एक रूप है क्योंकि ध्वनि अपने संचरण के दौरान माध्यम में ऊर्जा का स्थानांतरण कर सकती है।
जब कोई ध्वनि स्रोत कंपन करता है, तो वह अपने आसपास के माध्यम में ऊर्जा स्थानांतरित करता है। माध्यम के कण कंपन करते हैं और अपने निकट के कणों से संपर्क के माध्यम से ऊर्जा को आगे स्थानांतरित करते हैं।
क्रियाकलाप — ध्वनि से अनाज के दानों की गति
एक चौड़े मुँह वाले पात्र पर सेलोफेन या रबड़ की पतली शीट को तानकर बाँधिए। शीट पर कुछ अनाज के दाने समान रूप से फैला दीजिए। अब शीट को छुए बिना उसके पास किसी धातु की प्लेट पर प्रहार करके तेज ध्वनि उत्पन्न कीजिए।
ध्वनि उत्पन्न होने पर शीट पर रखे अनाज के दाने गति करने या उछलने लगते हैं। इसका कारण यह है कि ध्वनि वायु के माध्यम से शीट तक पहुँचकर उसमें कंपन उत्पन्न करती है और शीट के कंपन के कारण अनाज के दाने गति करते हैं।
निष्कर्ष: इस क्रियाकलाप से स्पष्ट होता है कि ध्वनि ऊर्जा का एक रूप है और ध्वनि स्रोत अपने आसपास के माध्यम में ऊर्जा स्थानांतरित करता है।
ध्वनि के संचरण में ऊर्जा का स्थानांतरण
ध्वनि के संचरण के दौरान माध्यम के कण अपने निकट के कणों से संपर्क करते हैं। एक कण में उत्पन्न कंपन उसके पड़ोसी कणों को प्रभावित करता है और इस प्रकार ऊर्जा एक कण से दूसरे कण तक आगे बढ़ती जाती है।
इस प्रक्रिया में माध्यम के कण ध्वनि स्रोत से श्रोता तक लगातार आगे नहीं जाते। वे अपनी माध्य स्थिति के आसपास कंपन करते हैं और ऊर्जा को आगे स्थानांतरित करते हैं।
ध्वनि स्रोत और माध्यम के बीच ऊर्जा का संबंध
ध्वनि स्रोत जितनी अधिक ऊर्जा माध्यम को प्रदान करता है, माध्यम के कणों में उतने ही अधिक कंपन उत्पन्न हो सकते हैं। इसलिए ध्वनि के उत्पादन में स्रोत के कंपन और ऊर्जा का महत्वपूर्ण संबंध होता है।
माइक्रोफोन और स्पीकर
माइक्रोफोन: माइक्रोफोन ध्वनि ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलने में सहायता करता है। जब हम माइक्रोफोन के सामने बोलते या गाते हैं, तो उसमें लगी पतली झिल्ली, जिसे डायफ्राम (Diaphragm) कहते हैं, ध्वनि तरंगों के अनुरूप कंपन करती है। ये कंपन विद्युत संकेतों में परिवर्तित हो जाते हैं।
स्पीकर: स्पीकर माइक्रोफोन के विपरीत कार्य करता है। विद्युत संकेत स्पीकर के भीतर लगे शंकु या डायफ्राम को कंपन कराते हैं, जिससे ध्वनि उत्पन्न होती है।
ऊर्जा रूपांतरण:
माइक्रोफोन: ध्वनि ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा
स्पीकर: विद्युत ऊर्जा → ध्वनि ऊर्जा
ध्वनि तरंग के बारे में मुख्य बातें
- ध्वनि एक यांत्रिक तरंग है।
- ध्वनि के संचरण के लिए भौतिक माध्यम आवश्यक है।
- ध्वनि तरंग अनुदैर्ध्य तरंग का उदाहरण है।
- ध्वनि में माध्यम के कण तरंग के संचरण की दिशा के समानांतर कंपन करते हैं।
- ध्वनि तरंग में संपीडन और विरलन बनते हैं।
- संपीडन में माध्यम का घनत्व औसत घनत्व से अधिक होता है।
- विरलन में माध्यम का घनत्व औसत घनत्व से कम होता है।
- ध्वनि के संचरण में ऊर्जा का स्थानांतरण होता है, माध्यम के कणों का स्थायी स्थानांतरण नहीं।
- अनुप्रस्थ तरंग में कणों का कंपन तरंग के संचरण की दिशा के लंबवत होता है।
- ध्वनि ऊर्जा का एक रूप है।
- माइक्रोफोन ध्वनि ऊर्जा को विद्युत संकेतों में बदलता है।
- स्पीकर विद्युत संकेतों के आधार पर ध्वनि उत्पन्न करता है।
Our Concept Builder
ध्वनि तरंग को समझने का सबसे आसान तरीका है—कंपन → माध्यम के कणों में कंपन → संपीडन और विरलन → ऊर्जा का स्थानांतरण। कण स्वयं ध्वनि स्रोत से श्रोता तक नहीं जाते; वे अपनी स्थिति के आसपास कंपन करते हैं और ऊर्जा को आगे के कणों तक पहुँचाते हैं।
Exam Booster
- ध्वनि किस प्रकार की तरंग है? — यांत्रिक तथा अनुदैर्ध्य तरंग।
- अनुदैर्ध्य तरंग में कण किस दिशा में कंपन करते हैं? — तरंग के संचरण की दिशा के समानांतर।
- संपीडन क्या है? — अधिक घनत्व वाला क्षेत्र जहाँ माध्यम के कण पास-पास होते हैं।
- विरलन क्या है? — कम घनत्व वाला क्षेत्र जहाँ माध्यम के कण दूर-दूर होते हैं।
- ध्वनि तरंग में कौन-से क्षेत्र बनते हैं? — संपीडन और विरलन।
- अनुप्रस्थ तरंग में कण किस दिशा में कंपन करते हैं? — तरंग के संचरण की दिशा के लंबवत।
- ध्वनि के संचरण में क्या स्थानांतरित होता है? — ऊर्जा।
- क्या माध्यम के कण ध्वनि के साथ आगे बढ़ते हैं? — नहीं, वे अपनी माध्य स्थिति के आसपास कंपन करते हैं।
- ध्वनि ऊर्जा का कौन-सा रूप है? — ऊर्जा का एक रूप।
- माइक्रोफोन का मुख्य कार्य क्या है? — ध्वनि ऊर्जा को विद्युत संकेतों में बदलना।
- स्पीकर का मुख्य कार्य क्या है? — विद्युत संकेतों से ध्वनि उत्पन्न करना।
ध्वनि तरंगें अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
अध्याय 10. ध्वनि तरंगें—अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
ध्वनि के भौतिक गुण जैसे आवर्तकाल, तरंगदैर्ध्य, आवृत्ति, आयाम और चाल को परिभाषित तथा मापा जा सकता है। लेकिन ध्वनि को अनुभव करने का तरीका व्यक्ति के अनुसार अलग हो सकता है। मानव द्वारा ध्वनि के अनुभव को मुख्यतः तारत्व (Pitch) और प्रबलता (Loudness) जैसे शब्दों से समझाया जाता है।
मानव द्वारा ध्वनि-बोध
तारत्व (Pitch)
परिभाषा: ध्वनि की आवृत्ति का मानवीय बोध तारत्व कहलाता है।
- सीटी या सायरन जैसी तीक्ष्ण और कर्णभेदी ध्वनि का तारत्व सामान्यतः अधिक होता है।
- बादलों की गरज या विमान की गड़गड़ाहट जैसी गंभीर ध्वनि का तारत्व सामान्यतः कम होता है।
- उच्च तारत्व वाली ध्वनियों की आवृत्ति सामान्यतः अधिक होती है।
- कम तारत्व वाली ध्वनियों की आवृत्ति सामान्यतः कम होती है।
- तारत्व और आवृत्ति के बीच सटीक गणितीय संबंध सरल नहीं है।
मानव की श्रवण सीमा
मनुष्य सभी आवृत्तियों की ध्वनियाँ नहीं सुन सकता। सामान्यतः मनुष्य के लिए श्रवण सीमा लगभग 20 Hz से 20,000 Hz (20 kHz) तक होती है। यह सीमा व्यक्ति-विशेष के अनुसार बदल सकती है और आयु बढ़ने के साथ सामान्यतः घटती है।
| ध्वनि का प्रकार | आवृत्ति सीमा | मानव द्वारा श्रवण |
|---|---|---|
| अवश्रव्य (Infrasonic) | 20 Hz से कम | मनुष्य नहीं सुन सकता |
| श्रव्य सीमा | 20 Hz से 20 kHz | मनुष्य सुन सकता है |
| पराश्रव्य (Ultrasonic) | 20 kHz से अधिक | मनुष्य नहीं सुन सकता |
कुछ जानवर पराश्रव्य ध्वनि सुन सकते हैं। कुत्ते, बिल्लियाँ, चमगादड़ और डॉल्फिन पराश्रव्य तरंगों को सुन सकते हैं, जबकि हाथी अवश्रव्य तरंगों को सुन सकते हैं।
प्रबलता (Loudness)
परिभाषा: मनुष्य द्वारा ध्वनि तरंग के आयाम का अनुभव प्रबलता के रूप में किया जाता है।
- अधिक आयाम वाली ध्वनि अधिक तेज सुनाई देती है।
- कम आयाम वाली ध्वनि धीमी सुनाई देती है।
- ध्वनि स्रोत से दूरी बढ़ने पर ध्वनि की प्रबलता सामान्यतः कम होती जाती है।
- प्रबलता श्रोता की श्रवण क्षमता पर निर्भर करती है।
- प्रबलता को सामान्यतः डेसिबेल (dB) में व्यक्त किया जाता है।
तीव्रता और प्रबलता में अंतर
तीव्रता (Intensity) एक मापन योग्य भौतिक राशि है, जबकि प्रबलता (Loudness) ध्वनि के बारे में श्रोता के अनुभव से संबंधित है। इसलिए दोनों शब्दों का सामान्य बातचीत में समान रूप से उपयोग होने पर भी वैज्ञानिक दृष्टि से इनमें अंतर है।
ध्वनि प्रदूषण
अवांछित या हानिकारक ध्वनि को शोर (Noise) कहा जाता है। अत्यधिक ध्वनि स्तर के संपर्क में विशेषकर लंबे समय तक रहने से स्वास्थ्य, नींद और श्रवण क्षमता प्रभावित हो सकती है। लंबे समय तक तेज ध्वनि सुनने से सुनने की क्षमता कम हो सकती है।
श्रवण सहायक यंत्र
श्रवण क्षमता कम होने वाले व्यक्ति श्रवण सहायक यंत्र का उपयोग कर सकते हैं। इसमें सामान्यतः माइक्रोफोन, प्रवर्धक (Amplifier) और स्पीकर जैसे घटक होते हैं, जो सुनने में सहायता करते हैं।
मानव कान ध्वनि को कैसे सुनता है?
जब ध्वनि कान में प्रवेश करती है, तो वह कर्णपटल (Eardrum) नामक पतली झिल्ली में कंपन उत्पन्न करती है। कान की छोटी अस्थियाँ इन कंपनों को बढ़ाती हैं। इसके बाद कर्णावर्त (Cochlea) इन कंपनों को विद्युत संकेतों में बदलता है। ये संकेत मस्तिष्क तक पहुँचते हैं और मस्तिष्क इन्हें ध्वनि के रूप में अनुभव करता है।
दो कान होने का लाभ
दोनों कान मस्तिष्क को ध्वनि के स्रोत की दिशा निर्धारित करने में सहायता करते हैं। मस्तिष्क यह तुलना करता है कि किस कान तक ध्वनि पहले पहुँची और दोनों कानों तक पहुँचने वाली ध्वनि के बीच अत्यंत छोटे समयांतर के आधार पर ध्वनि के स्रोत की दिशा का अनुमान लगाता है।
स्वर, मूल आवृत्ति और ध्वनि-गुणता
स्वर (Tone)
एकल आवृत्ति-मान वाली ध्वनि को स्वर कहा जाता है। उदाहरण के लिए, स्वरित्र द्विभुज या सीटी से लगभग एकल आवृत्ति की ध्वनि प्राप्त की जा सकती है।
संगीत का स्वर और मूल आवृत्ति
तानपुरे के तार को छेड़ने या गाने से उत्पन्न संगीत के स्वर में निम्नतम आवृत्ति के साथ उच्चतर आवृत्तियों का संयोजन होता है। निम्नतम आवृत्ति को मूल आवृत्ति (Fundamental Frequency) तथा उच्चतर आवृत्तियों को अधिस्वरक (Overtones) कहा जाता है। इनके संयोजन से समृद्ध और सुखद ध्वनि उत्पन्न होती है।
ध्वनि-गुणता (Timbre)
परिभाषा: अलग-अलग वाद्ययंत्रों द्वारा समान प्रबलता और समान स्वर बजाने पर भी उनकी ध्वनियाँ अलग और विशिष्ट सुनाई देती हैं। ध्वनि की इस विशेषता को ध्वनि-गुणता (Timbre) कहते हैं।
ध्वनि-गुणता वाद्ययंत्र के आकार, पदार्थ और संरचना पर निर्भर करती है। ये कारक अधिस्वरकों के प्रतिरूप और तीव्रता को प्रभावित करते हैं।
अष्टक (Octave)
परिभाषा: ऐसे दो सम स्वरों के बीच का अंतराल जिनमें एक की मूल आवृत्ति दूसरे की मूल आवृत्ति की दो गुनी होती है, अष्टक कहलाता है।
उदाहरण: 200 Hz और 400 Hz की मूल आवृत्तियाँ एक अष्टक का उदाहरण हैं।
भारतीय वाद्ययंत्र और ध्वनि
सारंगी, सितार और वीणा जैसे भारतीय तार वाद्ययंत्रों में विभिन्न आवृत्तियों के संयोजन को समृद्ध बनाने के लिए अतिरिक्त तारों का उपयोग किया जाता है। तबला और मृदंगम जैसे ताल वाद्ययंत्र भी विशिष्ट और समृद्ध ध्वनियाँ उत्पन्न करते हैं।
‘स्याही’ और तबले की ध्वनि
तबला या मृदंगम के ढोल-शीर्ष पटल के केंद्र पर लगाया जाने वाला काला धब्बा ‘स्याही’ कहलाता है। यह पटल के कंपनों को बदलता है और वाद्ययंत्र को विभिन्न प्रकार की समृद्ध ध्वनियाँ उत्पन्न करने में सहायता करता है।
ध्वनि का परावर्तन
परिभाषा: जब ध्वनि तरंगें किसी ठोस या द्रव जैसी बाधा से टकराकर वापस लौटती हैं, तो इस घटना को ध्वनि का परावर्तन (Reflection of Sound) कहते हैं।
ध्वनि का परावर्तन भी प्रकाश के परावर्तन के समान नियमों का पालन करता है। आपतित ध्वनि, परावर्तित ध्वनि और अभिलंब एक ही तल में होते हैं तथा आपतन और परावर्तन की दिशाएँ अभिलंब के साथ समान कोण बनाती हैं।
ध्वनि के परावर्तन के नियम
- आपतित ध्वनि, परावर्तित ध्वनि और अभिलंब एक ही तल में होते हैं।
- आपतन कोण और परावर्तन कोण समान होते हैं।
- कठोर और चिकनी सतहें ध्वनि को अच्छी तरह परावर्तित करती हैं।
- मुलायम सतहें ध्वनि को अधिक मात्रा में अवशोषित कर सकती हैं।
- खुरदरी सतहें ध्वनि को विभिन्न दिशाओं में प्रकीर्णित कर सकती हैं।
प्रतिध्वनि (Echo)
परिभाषा: किसी दूर स्थित कठोर सतह से परावर्तित होकर वापस आने वाली ध्वनि, जो मूल ध्वनि से अलग सुनाई देती है, प्रतिध्वनि कहलाती है।
यदि मूल ध्वनि और परावर्तित ध्वनि के कान तक पहुँचने के बीच कम-से-कम 0.1 सेकंड का समयांतर हो, तो मनुष्य दोनों ध्वनियों को अलग-अलग सुन सकता है।
प्रतिध्वनि के लिए न्यूनतम दूरी
वायु में ध्वनि की चाल 340 m/s मानने पर 0.1 s में ध्वनि द्वारा तय दूरी:
दूरी = चाल × समय
= 340 × 0.1 = 34 m
यह 34 m ध्वनि द्वारा परावर्तक सतह तक जाकर वापस आने की कुल दूरी है। इसलिए परावर्तक सतह की न्यूनतम दूरी लगभग:
34 ÷ 2 = 17 m
अर्थात स्पष्ट प्रतिध्वनि सुनने के लिए परावर्तक सतह लगभग 17 m या उससे अधिक दूर होनी चाहिए, यदि वायु में ध्वनि की चाल 340 m/s ली जाए।
प्रतिध्वनि का उदाहरण
यदि किसी गलियारे में ताली बजाने के 0.5 s बाद प्रतिध्वनि सुनाई देती है और ध्वनि की चाल 340 m/s है, तो दीवार से दूरी:
दूरी = (v × t) ÷ 2
= (340 × 0.5) ÷ 2 = 85 m
अतः दीवार लगभग 85 m दूर है।
अनुरणन (Reverberation)
परिभाषा: बड़े हॉल या सभागार में ध्वनि का दीवारों और अन्य सतहों से बार-बार परावर्तन होने के कारण स्रोत के बंद होने के बाद भी कुछ समय तक ध्वनि सुनाई देती रहती है। इस घटना को अनुरणन कहते हैं।
जब विभिन्न सतहों से परावर्तित ध्वनियाँ बहुत कम समयांतराल में, लगभग 0.05 सेकंड से कम अंतर में, कान तक पहुँचती हैं, तब अनुरणन का अनुभव होता है।
अनुरणन को नियंत्रित करना
अधिक अनुरणन से भाषण, संगीत और अन्य ध्वनियाँ अस्पष्ट एवं विकृत हो सकती हैं। इसलिए सभागारों में ध्वनि-अवशोषक पैनल, गद्देदार कुर्सियाँ, पर्दे तथा अन्य मुलायम और छिद्रयुक्त सतहों का उपयोग किया जाता है। ये अनावश्यक परावर्तन को कम करती हैं।
पराश्रव्य और अवश्रव्य तरंगें तथा उनके अनुप्रयोग
अवश्रव्य तरंगें (Infrasonic Waves)
परिभाषा: 20 Hz से कम आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों को अवश्रव्य तरंगें कहते हैं।
- भूकंप और ज्वालामुखी विस्फोट जैसी प्राकृतिक घटनाओं का पता लगाने में उपयोगी।
- तीव्र झंझावातों का पता लगाने में उपयोगी।
- इन तरंगों की आवृत्ति मानव श्रवण सीमा से कम होती है।
पराश्रव्य तरंगें (Ultrasonic Waves)
परिभाषा: 20 kHz से अधिक आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों को पराश्रव्य तरंगें कहते हैं।
पराश्रव्य तरंगों के अनुप्रयोग
- अल्ट्रासोनोग्राफी: बिना शल्यक्रिया के शरीर के आंतरिक अंगों की छवि प्राप्त करने में उपयोग।
- गुर्दे की पथरी: पथरी को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ने में उपयोग।
- अल्ट्रासोनिक वेल्डिंग: उद्योगों में उपयोग।
- सफाई: संवेदनशील मशीन के भागों की सफाई में उपयोग।
- औद्योगिक परीक्षण: धातु के खंडों के भीतर छिपे दोषों का पता लगाने में उपयोग।
- स्थान निर्धारण: परावर्तित ध्वनि के आधार पर वस्तुओं का स्थान पता करने में उपयोग।
प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण (Echolocation)
परिभाषा: परावर्तित ध्वनि तरंगों की सहायता से वस्तुओं का स्थान ज्ञात करने की क्षमता को प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण (Echolocation) कहते हैं।
चमगादड़ में प्रतिध्वनि स्थान निर्धारण
चमगादड़ अंधेरे में उड़ते समय पराश्रव्य तरंगों के छोटे-छोटे स्पंद उत्सर्जित करते हैं। ये तरंगें आसपास की वस्तुओं से परावर्तित होकर वापस आती हैं। चमगादड़ इन प्रतिध्वनियों की सहायता से बाधाओं और शिकार की स्थिति का पता लगाते हैं।
डॉल्फिन, व्हेल तथा कुछ पक्षी भी दिशा-निर्धारण और शिकार के लिए प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण का उपयोग करते हैं।
सोनार (SONAR)
SONAR का अर्थ Sound Navigation and Ranging है। मनुष्यों ने प्रतिध्वनि स्थान निर्धारण के सिद्धांत का उपयोग जल के भीतर वस्तुओं की खोज के लिए सोनार में किया है।
सोनार में पराश्रव्य तरंगों को जल में भेजा जाता है। किसी वस्तु से परावर्तित होकर लौटने वाली तरंगों का विश्लेषण करके वस्तु की दूरी, दिशा और गति का पता लगाया जा सकता है। इसका उपयोग पनडुब्बियों और जहाजों के अवशेषों का पता लगाने में किया जाता है।
सोनार से दूरी ज्ञात करने का सूत्र
सोनार तरंग वस्तु तक जाकर वापस आती है, इसलिए दी गई दूरी ज्ञात करने के लिए कुल समय का आधा समय लिया जाता है।
वस्तु की दूरी = (ध्वनि की चाल × कुल समय) ÷ 2
सोनार का उदाहरण
यदि समुद्री जल में ध्वनि की चाल 1530 m/s है और सोनार संकेत 0.90 s में वापस आता है, तो वस्तु तक पहुँचने का समय:
0.90 ÷ 2 = 0.45 s
अतः दूरी:
दूरी = 1530 × 0.45 = 688.5 m
इसलिए वस्तु की दूरी 688.5 m है।
ध्वनि के आधुनिक अनुप्रयोग
- सोनार द्वारा समुद्र के भीतर वस्तुओं की खोज।
- चमगादड़ द्वारा शिकार और बाधाओं का पता लगाना।
- चिकित्सा में अल्ट्रासोनोग्राफी।
- गुर्दे की पथरी को छोटे टुकड़ों में तोड़ना।
- औद्योगिक वेल्डिंग और सफाई।
- धातु के भीतर छिपे दोषों की पहचान।
- दूरस्थ स्थानों और प्राकृतिक घटनाओं के अध्ययन में ध्वनि का उपयोग।
- दूर से आने वाले विमानों और ड्रोन की ध्वनि पहचानकर निगरानी में सहायता।
परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु
- तारत्व: आवृत्ति का मानवीय बोध।
- प्रबलता: ध्वनि के आयाम का मानवीय बोध।
- श्रव्य सीमा: लगभग 20 Hz से 20 kHz।
- अवश्रव्य: 20 Hz से कम।
- पराश्रव्य: 20 kHz से अधिक।
- ध्वनि-गुणता: समान स्वर और प्रबलता वाली ध्वनियों में अंतर पहचानने का गुण।
- अष्टक: ऐसी दो मूल आवृत्तियाँ जिनमें एक दूसरी की दो गुनी हो।
- परावर्तन: बाधा से टकराकर ध्वनि का वापस लौटना।
- प्रतिध्वनि: परावर्तित ध्वनि का मूल ध्वनि से अलग सुनाई देना।
- प्रतिध्वनि के लिए न्यूनतम समयांतर: 0.1 s।
- 340 m/s पर प्रतिध्वनि के लिए न्यूनतम दूरी: लगभग 17 m।
- अनुरणन: अनेक परावर्तनों के कारण ध्वनि का स्रोत बंद होने के बाद भी कुछ समय तक सुनाई देना।
- SONAR: Sound Navigation and Ranging।
- SONAR में प्रयुक्त तरंग: पराश्रव्य तरंग।
- SONAR दूरी सूत्र: दूरी = (चाल × कुल समय) ÷ 2।
- Echolocation: परावर्तित ध्वनि की सहायता से वस्तु का स्थान ज्ञात करना।
ध्वनि तरंगें अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
अध्याय 10. ध्वनि तरंगें—अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
इस भाग में ध्वनि तरंग के प्रमुख अभिलक्षणों—तरंगदैर्ध्य, आवृत्ति, आवर्तकाल, आयाम, तीव्रता और ध्वनि की चाल—को समझेंगे। इनके बीच के संबंधों को सूत्रों और उदाहरणों की सहायता से समझना परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।
ध्वनि तरंगों के प्रमुख अभिलक्षण
ध्वनि तरंग का वर्णन करने के लिए कुछ भौतिक राशियों का उपयोग किया जाता है। इनमें मुख्य रूप से तरंगदैर्ध्य, आवृत्ति, आवर्तकाल, आयाम और चाल शामिल हैं।
तरंगदैर्ध्य (Wavelength)
परिभाषा: दो क्रमागत संपीडनों अथवा दो क्रमागत विरलनों के बीच की दूरी को ध्वनि तरंग का तरंगदैर्ध्य कहते हैं।
- तरंगदैर्ध्य को λ (लैम्ब्डा) से दर्शाया जाता है।
- इसका SI मात्रक मीटर (m) है।
- अधिक तरंगदैर्ध्य वाली तरंग में संपीडन और विरलन एक-दूसरे से अधिक दूरी पर होते हैं।
- कम तरंगदैर्ध्य वाली तरंग में संपीडन और विरलन पास-पास होते हैं।
आवृत्ति (Frequency)
परिभाषा: किसी निश्चित बिंदु पर एक इकाई समय में होने वाले पूर्ण घनत्व दोलनों की संख्या को ध्वनि तरंग की आवृत्ति कहते हैं।
- आवृत्ति को सामान्यतः ν (न्यू) से दर्शाया जाता है।
- इसका SI मात्रक हर्ट्ज (Hz) है।
- 1 Hz का अर्थ है—प्रति सेकंड 1 पूर्ण दोलन।
- आवृत्ति अधिक होने पर प्रति सेकंड अधिक दोलन होते हैं।
आवर्तकाल (Time Period)
परिभाषा: किसी निश्चित बिंदु पर घनत्व के एक पूर्ण दोलन को पूरा करने में लगने वाले समय को आवर्तकाल कहते हैं।
- आवर्तकाल को T से दर्शाया जाता है।
- इसका SI मात्रक सेकंड (s) है।
- आवृत्ति और आवर्तकाल एक-दूसरे के व्युत्क्रम होते हैं।
सूत्र:
T = 1/ν
अर्थात आवृत्ति अधिक होने पर आवर्तकाल कम होता है और आवृत्ति कम होने पर आवर्तकाल अधिक होता है।
आवृत्ति और आवर्तकाल का संबंध
| आवृत्ति | आवर्तकाल |
|---|---|
| अधिक | कम |
| कम | अधिक |
उदाहरण: आवृत्ति और आवर्तकाल
यदि किसी निश्चित स्थान पर 2 सेकंड में 10 घनत्व दोलन होते हैं, तो:
आवृत्ति = दोलनों की संख्या / समय
ν = 10/2 = 5 Hz
अब,
T = 1/ν = 1/5 = 0.2 s
अतः ध्वनि तरंग की आवृत्ति 5 Hz और आवर्तकाल 0.2 s है।
ध्वनि तरंग का आयाम और तीव्रता
आयाम (Amplitude)
परिभाषा: ध्वनि तरंग के संपीडन या विरलन में वायु के औसत घनत्व की तुलना में होने वाला अधिकतम घनत्व परिवर्तन आयाम कहलाता है।
- घनत्व में परिवर्तन अधिक होने पर तरंग का आयाम अधिक होता है।
- घनत्व में परिवर्तन कम होने पर आयाम कम होता है।
- अधिक आयाम वाली ध्वनि तरंग अधिक ऊर्जा वहन करती है।
- ध्वनि स्रोत को अधिक बल से कंपन कराने पर सामान्यतः आयाम बढ़ता है।
तीव्रता (Intensity)
परिभाषा: ध्वनि के संचरण की दिशा के लंबवत प्रति इकाई क्षेत्रफल से प्रति इकाई समय में संचारित होने वाली ध्वनि ऊर्जा की मात्रा को ध्वनि की तीव्रता कहते हैं।
अधिक आयाम वाली ध्वनि तरंग अधिक ऊर्जा वहन करती है, इसलिए सामान्यतः उसका ऊर्जा-संचरण भी अधिक होता है।
दूरी बढ़ने पर ध्वनि की तीव्रता
ध्वनि स्रोत से दूर जाने पर ध्वनि तरंग अधिक बड़े क्षेत्रफल में फैलती जाती है। ऊर्जा संरक्षित रहने के कारण समान ऊर्जा बड़े क्षेत्र में वितरित हो जाती है। इसलिए स्रोत से दूरी बढ़ने पर ध्वनि की तीव्रता कम होती जाती है।
ध्वनि की चाल
परिभाषा: ध्वनि तरंग का कोई बिंदु, जैसे शिखर या गर्त, एकांक समय में जितनी दूरी तय करता है, उसे ध्वनि की चाल कहते हैं।
ध्वनि की चाल यह बताती है कि ध्वनि तरंग या उसमें उत्पन्न घनत्व-विक्षोभ माध्यम में कितनी तेजी से आगे बढ़ता है।
ध्वनि की चाल, तरंगदैर्ध्य और आवृत्ति का संबंध
एक आवर्तकाल में ध्वनि तरंग द्वारा तय दूरी एक तरंगदैर्ध्य के बराबर होती है। इसलिए:
चाल = दूरी / समय
v = λ/T
क्योंकि:
T = 1/ν
अतः:
v = λν
महत्वपूर्ण सूत्र: v = λν
अर्थात ध्वनि की चाल = तरंगदैर्ध्य × आवृत्ति।
माध्यम के अनुसार ध्वनि की चाल
ध्वनि की चाल उस माध्यम पर निर्भर करती है जिसमें वह संचरित हो रही है। सामान्यतः ध्वनि ठोसों में सबसे तेज, द्रवों में उससे कम और गैसों में सबसे धीमी गति से चलती है।
| माध्यम | लगभग ध्वनि की चाल |
|---|---|
| स्टील | 5000 m/s |
| जल | 1500 m/s |
| वायु | 340 m/s |
उदाहरण के लिए, जल में ध्वनि की चाल वायु की तुलना में लगभग 4 से 5 गुनी अधिक तथा ठोसों में सामान्यतः वायु की तुलना में 15 से 20 गुनी अधिक हो सकती है।
तापमान और आर्द्रता का प्रभाव
वायु में ध्वनि की चाल तापमान और आर्द्रता पर भी निर्भर करती है। तापमान या आर्द्रता बढ़ने पर वायु में ध्वनि की चाल सामान्यतः बढ़ती है।
उदाहरण:
- 0°C पर शुष्क वायु में ध्वनि की चाल लगभग 331 m/s होती है।
- 22°C पर ध्वनि की चाल लगभग 344 m/s होती है।
अधिकांश सामान्य माध्यमों में ध्वनि की चाल स्रोत की आवृत्ति पर निर्भर नहीं करती। यदि स्रोत की आवृत्ति बदली जाए, तो उसी माध्यम में तरंगदैर्ध्य बदलता है, जबकि ध्वनि की चाल नियत रह सकती है।
श्रव्य सीमा और तरंगदैर्ध्य का संबंध
वायु में ध्वनि की चाल 344 m/s लेते हुए मनुष्य की लगभग 20 Hz से 20 kHz की श्रवण सीमा के लिए तरंगदैर्ध्य ज्ञात किया जा सकता है।
20 Hz की ध्वनि
λ = v/ν
λ = 344/20 = 17.2 m
अतः 20 Hz की ध्वनि का तरंगदैर्ध्य लगभग 17.2 m है।
20 kHz की ध्वनि
20 kHz = 20,000 Hz
λ = 344/20,000 = 0.0172 m = 1.72 cm
अतः 20 kHz की ध्वनि का तरंगदैर्ध्य लगभग 1.72 cm है।
तड़ित और गर्जन में समयांतर
बिजली चमकने के बाद गर्जन की ध्वनि कुछ समय बाद सुनाई देती है क्योंकि प्रकाश की चाल ध्वनि की चाल से बहुत अधिक होती है। इसलिए प्रकाश लगभग तुरंत दिखाई देता है, जबकि ध्वनि को हमारे कानों तक पहुँचने में समय लगता है।
यदि बिजली की चमक और गर्जन के बीच समयांतर 5 s हो और वायु में ध्वनि की चाल 340 m/s हो, तो:
दूरी = चाल × समय
= 340 × 5 = 1700 m = 1.7 km
अतः तड़ित-पात का स्थान लगभग 1.7 km दूर है।
ध्वनि की चाल और तरंगदैर्ध्य से आवृत्ति ज्ञात करना
यदि किसी माध्यम में ध्वनि की चाल और तरंगदैर्ध्य ज्ञात हो, तो आवृत्ति ज्ञात करने के लिए:
ν = v/λ
और आवर्तकाल:
T = 1/ν
उदाहरण
यदि स्टील में ध्वनि की चाल 5000 m/s और तरंगदैर्ध्य 50 m है, तो:
ν = 5000/50 = 100 Hz
अब:
T = 1/100 = 0.01 s
अतः आवृत्ति 100 Hz और आवर्तकाल 0.01 s है।
Concept Builder
- तरंगदैर्ध्य: दो क्रमागत संपीडनों या दो क्रमागत विरलनों के बीच की दूरी।
- आवृत्ति: प्रति सेकंड होने वाले पूर्ण दोलनों की संख्या।
- आवर्तकाल: एक पूर्ण दोलन में लगने वाला समय।
- आयाम: औसत घनत्व की तुलना में अधिकतम घनत्व परिवर्तन।
- तीव्रता: प्रति इकाई क्षेत्रफल और प्रति इकाई समय संचारित ध्वनि ऊर्जा।
- चाल: तरंग द्वारा एकांक समय में तय की गई दूरी।
- आवृत्ति और आवर्तकाल: एक-दूसरे के व्युत्क्रम हैं।
- मुख्य संबंध: v = λν
- आवर्तकाल का संबंध: T = 1/ν
- आवृत्ति का संबंध: ν = v/λ
- तरंगदैर्ध्य का संबंध: λ = v/ν
Exam Booster
- प्रश्न: आवृत्ति बढ़ने पर आवर्तकाल पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर: आवर्तकाल घटेगा। - प्रश्न: ध्वनि की चाल किस माध्यम में सबसे अधिक होती है?
उत्तर: सामान्यतः ठोसों में। - प्रश्न: ध्वनि की चाल का मुख्य सूत्र क्या है?
उत्तर: v = λν - प्रश्न: 1 Hz का क्या अर्थ है?
उत्तर: प्रति सेकंड एक पूर्ण दोलन। - प्रश्न: ध्वनि स्रोत से दूर जाने पर तीव्रता क्यों घटती है?
उत्तर: ध्वनि ऊर्जा अधिक बड़े क्षेत्रफल में फैल जाती है। - प्रश्न: क्या माध्यम के कण ध्वनि तरंग के साथ आगे बढ़ते हैं?
उत्तर: नहीं। वे अपनी माध्य स्थिति के आसपास कंपन करते हैं; ऊर्जा और विक्षोभ आगे बढ़ते हैं। :contentReference[oaicite:15]{index=15} - प्रश्न: 20 Hz की ध्वनि का 344 m/s की चाल पर तरंगदैर्ध्य कितना होगा?
उत्तर: 17.2 m - प्रश्न: 20 kHz की ध्वनि का उसी चाल पर तरंगदैर्ध्य कितना होगा?
उत्तर: 1.72 cm
ध्वनि तरंगें अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
अध्याय 10. ध्वनि तरंगें—अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
ध्वनि के भौतिक गुणों को मापा जा सकता है, लेकिन ध्वनि का अनुभव प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है। इस भाग में हम समझेंगे कि मनुष्य ध्वनि को किस प्रकार अनुभव करता है और ध्वनि की आवृत्ति तथा आयाम का हमारे श्रवण-बोध पर क्या प्रभाव पड़ता है।
मानव द्वारा ध्वनि-बोध
ध्वनि के आवर्तकाल, तरंगदैर्ध्य, आवृत्ति, आयाम और चाल जैसे भौतिक गुणों को मापा जा सकता है। लेकिन किसी ध्वनि को सुनने और अनुभव करने की प्रक्रिया व्यक्ति के अनुसार अलग हो सकती है। ध्वनि के मानवीय बोध को सामान्यतः तारत्व (Pitch) और प्रबलता (Loudness) जैसे शब्दों से व्यक्त किया जाता है।
तारत्व (Pitch)
परिभाषा: ध्वनि की आवृत्ति का मानव द्वारा किया जाने वाला बोध तारत्व कहलाता है।
जिस ध्वनि की आवृत्ति अधिक होती है, उसका तारत्व सामान्यतः अधिक अनुभव होता है। इसी प्रकार कम आवृत्ति वाली ध्वनि का तारत्व कम अनुभव होता है।
- सीटी और सायरन जैसी तीखी ध्वनियों का तारत्व सामान्यतः अधिक होता है।
- बादलों की गरज और विमान की गर्जना जैसी गंभीर ध्वनियों का तारत्व कम होता है।
- उच्च तारत्व वाली ध्वनि की आवृत्ति सामान्यतः अधिक होती है।
- कम तारत्व वाली ध्वनि की आवृत्ति सामान्यतः कम होती है।
- तारत्व और आवृत्ति के बीच संबंध है, लेकिन दोनों को पूरी तरह समान नहीं माना जाता क्योंकि तारत्व मानव का श्रवण-बोध है।
मनुष्य की आवाज में भी अंतर केवल आवृत्ति के कारण नहीं होता। गले, मुँह और नासा-गुहा से ध्वनि उत्पन्न होने की प्रक्रिया भी आवाज को प्रभावित करती है। किशोरावस्था में लड़कों के स्वर-तंतु लंबे और मोटे हो जाते हैं और सामान्यतः कम कंपन करते हैं, इसलिए उनकी आवाज में अधिक गहराई आ जाती है।
श्रव्यता परिसर
परिभाषा: मनुष्य जिन आवृत्तियों की ध्वनियों को सुन सकता है, उन आवृत्तियों के पूरे परिसर को श्रव्यता परिसर कहते हैं।
मनुष्य सभी प्रकार की ध्वनियों को नहीं सुन सकता। सामान्यतः मनुष्य के लिए श्रव्यता परिसर लगभग 20 Hz से 20,000 Hz (20 kHz) तक होता है। हालांकि यह सीमा प्रत्येक व्यक्ति में थोड़ी अलग हो सकती है और उम्र बढ़ने के साथ सामान्यतः कम होती जाती है।
अवश्रव्य तरंगें
परिभाषा: 20 Hz से कम आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों को अवश्रव्य तरंगें (Infrasonic Waves) कहते हैं।
- मनुष्य सामान्यतः अवश्रव्य तरंगों को नहीं सुन सकता।
- हाथी जैसे कुछ जानवर ऐसी निम्न आवृत्ति वाली तरंगों को अनुभव कर सकते हैं।
- इन तरंगों का उपयोग प्राकृतिक घटनाओं के अध्ययन में किया जा सकता है।
पराश्रव्य तरंगें
परिभाषा: 20 kHz से अधिक आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों को पराश्रव्य तरंगें (Ultrasonic Waves) कहते हैं।
- मनुष्य सामान्यतः पराश्रव्य तरंगों को नहीं सुन सकता।
- कुत्ते, बिल्लियाँ, चमगादड़ और डॉल्फिन जैसी कुछ प्रजातियाँ पराश्रव्य तरंगों को सुन सकती हैं।
- पराश्रव्य तरंगों का विज्ञान, चिकित्सा और तकनीकी क्षेत्रों में अनेक उपयोग हैं।
| ध्वनि का प्रकार | आवृत्ति सीमा | मनुष्य द्वारा श्रवण |
|---|---|---|
| अवश्रव्य | 20 Hz से कम | नहीं |
| श्रव्य | 20 Hz से 20 kHz | हाँ |
| पराश्रव्य | 20 kHz से अधिक | नहीं |
मनुष्य की श्रव्य सीमा आयु और व्यक्ति के अनुसार बदल सकती है। उम्र बढ़ने के साथ उच्च आवृत्तियों को सुनने की क्षमता कम हो सकती है।
प्रबलता (Loudness)
परिभाषा: ध्वनि तरंग के आयाम का मानव द्वारा किया जाने वाला बोध प्रबलता कहलाता है।
ध्वनि का आयाम जितना अधिक होता है, ध्वनि उतनी ही अधिक प्रबल सुनाई देती है। कम आयाम वाली ध्वनि धीमी सुनाई देती है।
- अधिक आयाम → अधिक प्रबल ध्वनि
- कम आयाम → कम प्रबल ध्वनि
- ध्वनि स्रोत से दूर जाने पर ध्वनि की प्रबलता कम होती जाती है।
- प्रबलता श्रोता की श्रवण क्षमता पर भी निर्भर करती है।
ध्यान दें: सामान्य बोलचाल में प्रबलता और तीव्रता शब्दों का अक्सर समान अर्थ में प्रयोग कर लिया जाता है, लेकिन विज्ञान में दोनों अलग हैं। तीव्रता एक मापी जा सकने वाली भौतिक राशि है, जबकि प्रबलता ध्वनि का मानव द्वारा किया गया अनुभव है।
ध्वनि का डेसिबेल स्तर
ध्वनि की प्रबलता को सामान्यतः डेसिबेल (dB) में व्यक्त किया जाता है। ध्वनि का डेसिबेल स्तर बढ़ने पर ध्वनि अधिक प्रबल अनुभव हो सकती है।
- पत्तियों की सरसराहट जैसी बहुत धीमी ध्वनियाँ कुछ dB की हो सकती हैं।
- सामान्य वार्तालाप लगभग 60 dB के आसपास हो सकता है।
- पटाखों जैसी बहुत तेज ध्वनि 100 dB से अधिक हो सकती है।
डेसिबेल स्तर में थोड़ी-सी वृद्धि भी ध्वनि की तीव्रता में बहुत अधिक वृद्धि कर सकती है। इसलिए अत्यधिक तेज ध्वनि से बचना आवश्यक है।
शोर और ध्वनि प्रदूषण
परिभाषा: ऐसी अवांछित या हानिकारक ध्वनि जिसे हम नहीं सुनना चाहते, शोर (Noise) कहलाती है।
ध्वनि प्रदूषण एक गंभीर समस्या है। निर्धारित सीमाओं से अधिक ध्वनि स्तर के संपर्क में विशेष रूप से लंबे समय तक रहने से स्वास्थ्य, नींद और श्रवण क्षमता प्रभावित हो सकती है।
- लंबे समय तक तेज ध्वनि सुनने से सुनने की क्षमता कम हो सकती है।
- लगातार तेज ध्वनि नींद और सामान्य स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।
- श्रवण क्षमता की जाँच के लिए श्रवण आलेख का उपयोग किया जा सकता है।
- श्रवण ह्रास वाले व्यक्ति श्रवण सहायक यंत्र का उपयोग कर सकते हैं।
मानव कान द्वारा ध्वनि का बोध
जब ध्वनि हमारे कान में प्रवेश करती है, तो वह कान के अंदर उपस्थित विभिन्न संरचनाओं के माध्यम से विद्युत संकेतों में बदलती है और अंततः मस्तिष्क तक पहुँचती है। मस्तिष्क इन संकेतों को ध्वनि के रूप में अनुभव करता है।
कर्णपटल का कार्य
कर्णपटल (Eardrum): ध्वनि तरंग कान में प्रवेश करने पर कर्णपटल में कंपन उत्पन्न करती है।
कान की छोटी अस्थियों का कार्य
कान की छोटी अस्थियाँ कर्णपटल से प्राप्त कंपनों को आगे पहुँचाती हैं और उन्हें प्रभावी रूप से बढ़ाती हैं।
कर्णावर्त का कार्य
कर्णावर्त (Cochlea) इन कंपनों को विद्युत संकेतों में परिवर्तित करता है। ये विद्युत संकेत मस्तिष्क तक पहुँचते हैं और मस्तिष्क इन्हें ध्वनि के रूप में अनुभव करता है।
इस प्रकार ध्वनि के सुनाई देने की प्रक्रिया में कर्णपटल → कान की छोटी अस्थियाँ → कर्णावर्त → विद्युत संकेत → मस्तिष्क का महत्वपूर्ण योगदान होता है।
दोनों कानों का महत्त्व
दो कान होने से मस्तिष्क को ध्वनि के स्रोत की दिशा निर्धारित करने में सहायता मिलती है। मस्तिष्क यह तुलना करता है कि ध्वनि किस कान तक पहले पहुँची और दोनों कानों तक पहुँचने वाली ध्वनियों के बीच कितना सूक्ष्म समयांतर है। इसी जानकारी के आधार पर ध्वनि के आने की दिशा का अनुमान लगाया जाता है।
विभिन्न जीवों में ध्वनि का बोध
सभी जीव ध्वनि को मनुष्य की तरह नहीं सुनते। कुछ जीव अपने शरीर के माध्यम से कंपन को अनुभव करते हैं, जबकि कुछ कीटों के शरीर के विशेष भागों पर श्रवण अंग पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, साँप और मछलियाँ अपने शरीर के माध्यम से कंपन का अनुभव कर सकती हैं।
Concept Builder
- तारत्व: आवृत्ति का मानव द्वारा किया गया बोध।
- प्रबलता: आयाम का मानव द्वारा किया गया बोध।
- तीव्रता: ध्वनि ऊर्जा के संचरण से संबंधित मापनीय भौतिक राशि।
- श्रव्य सीमा: लगभग 20 Hz से 20 kHz।
- अवश्रव्य: 20 Hz से कम।
- पराश्रव्य: 20 kHz से अधिक।
- अधिक आवृत्ति: सामान्यतः अधिक तारत्व।
- अधिक आयाम: सामान्यतः अधिक प्रबल ध्वनि।
- प्रबलता की इकाई: डेसिबेल (dB)।
- कर्णपटल: ध्वनि के कारण कंपन करता है।
- कर्णावर्त: कंपन को विद्युत संकेतों में बदलने में सहायता करता है।
Exam Booster
- प्रश्न: तारत्व किस भौतिक राशि से संबंधित है?
उत्तर: आवृत्ति से। - प्रश्न: प्रबलता किससे संबंधित है?
उत्तर: ध्वनि तरंग के आयाम से। - प्रश्न: मनुष्य की सामान्य श्रव्य सीमा क्या है?
उत्तर: लगभग 20 Hz से 20 kHz। - प्रश्न: 20 Hz से कम आवृत्ति वाली तरंगों को क्या कहते हैं?
उत्तर: अवश्रव्य तरंगें। - प्रश्न: 20 kHz से अधिक आवृत्ति वाली तरंगों को क्या कहते हैं?
उत्तर: पराश्रव्य तरंगें। - प्रश्न: ध्वनि की प्रबलता सामान्यतः किस इकाई में व्यक्त की जाती है?
उत्तर: डेसिबेल (dB)। - प्रश्न: अत्यधिक तेज ध्वनि को लंबे समय तक सुनने से क्या प्रभाव पड़ सकता है?
उत्तर: श्रवण क्षमता, नींद और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। - प्रश्न: कान में ध्वनि के कारण सबसे पहले कौन-सी प्रमुख झिल्ली कंपन करती है?
उत्तर: कर्णपटल। - प्रश्न: कर्णावर्त का क्या कार्य है?
उत्तर: यह कंपन को विद्युत संकेतों में बदलने में सहायता करता है, जिन्हें मस्तिष्क ध्वनि के रूप में अनुभव करता है। - प्रश्न: क्या प्रबलता और तीव्रता एक ही हैं?
उत्तर: नहीं। तीव्रता मापी जा सकने वाली भौतिक राशि है, जबकि प्रबलता ध्वनि का मानव द्वारा किया गया अनुभव है।
ध्वनि तरंगें अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
अध्याय 10. ध्वनि तरंगें—अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
ध्वनि तरंगें विभिन्न सतहों से टकराकर वापस लौट सकती हैं। ध्वनि के इस परावर्तन के कारण प्रतिध्वनि और अनुरणन जैसी घटनाएँ उत्पन्न होती हैं। इस भाग में हम ध्वनि के परावर्तन, प्रतिध्वनि तथा अनुरणन को समझेंगे और यह जानेंगे कि अलग-अलग सतहें ध्वनि को किस प्रकार प्रभावित करती हैं।
ध्वनि का परावर्तन
परिभाषा: जब ध्वनि तरंगें किसी ठोस या द्रव जैसी बाधा से टकराकर वापस लौटती हैं, तो इस घटना को ध्वनि का परावर्तन (Reflection of Sound) कहते हैं।
ध्वनि तरंगें किसी परावर्तक सतह से टकराने के बाद वापस उसी माध्यम में लौट सकती हैं। ध्वनि का परावर्तन प्रकाश के परावर्तन के समान नियमों का पालन करता है।
ध्वनि के परावर्तन के नियम
ध्वनि के परावर्तन में आपतित ध्वनि और परावर्तित ध्वनि की दिशाएँ परावर्तक सतह के अभिलंब के साथ समान कोण बनाती हैं।
- आपतित ध्वनि, अभिलंब और परावर्तित ध्वनि एक ही तल में स्थित होते हैं।
- आपतन कोण = परावर्तन कोण।
- आपतन कोण और परावर्तन कोण दोनों को अभिलंब के सापेक्ष मापा जाता है।
- ध्वनि का परावर्तन किसी उपयुक्त कठोर सतह से स्पष्ट रूप से देखा और सुना जा सकता है।
परावर्तक सतह का प्रभाव
सभी सतहें ध्वनि को समान प्रकार से परावर्तित नहीं करतीं। सतह की प्रकृति के अनुसार ध्वनि का परावर्तन, अवशोषण या प्रकीर्णन अलग-अलग हो सकता है।
- कठोर और चिकनी सतहें: ध्वनि को अच्छी तरह परावर्तित करती हैं।
- मुलायम सतहें: ध्वनि को अधिक मात्रा में अवशोषित कर सकती हैं।
- खुरदरी सतहें: ध्वनि को विभिन्न दिशाओं में प्रकीर्णित कर सकती हैं।
इसी कारण कठोर और चिकनी सतहों से उत्पन्न परावर्तित ध्वनि अधिक स्पष्ट सुनाई देती है, जबकि मोटे कपड़े के पर्दे जैसी मुलायम सतहें ध्वनि को अवशोषित कर लेती हैं।
प्रतिध्वनि (Echo)
परिभाषा: किसी दूर स्थित वस्तु की कठोर सतह से परावर्तित होकर वापस आने वाली ध्वनि, जो मूल ध्वनि से अलग सुनाई देती है, प्रतिध्वनि (Echo) कहलाती है।
जब हम किसी पर्वत, खड़ी चट्टान या लंबे मार्ग के पास चिल्लाते हैं, तो कुछ समय बाद अपनी आवाज फिर सुनाई दे सकती है। यह परावर्तित ध्वनि प्रतिध्वनि कहलाती है।
प्रतिध्वनि हर जगह क्यों नहीं सुनाई देती?
प्रतिध्वनि तभी स्पष्ट रूप से सुनाई देती है जब मूल ध्वनि और परावर्तित ध्वनि के कान तक पहुँचने के बीच पर्याप्त समयांतर हो। यदि परावर्तित ध्वनि बहुत जल्दी वापस आ जाए, तो मस्तिष्क उसे मूल ध्वनि से अलग नहीं कर पाता।
मनुष्य सामान्यतः दो ध्वनियों को अलग-अलग तभी सुन सकता है जब उनके बीच का समयांतर कम-से-कम 0.1 सेकंड हो। यदि समयांतर 0.1 सेकंड से कम हो, तो दोनों ध्वनियाँ स्पष्ट रूप से अलग नहीं पहचानी जातीं।
प्रतिध्वनि के लिए न्यूनतम दूरी
यदि वायु में ध्वनि की चाल 340 m/s हो और प्रतिध्वनि सुनने के लिए न्यूनतम समयांतर 0.1 s हो, तो इस समय में ध्वनि द्वारा तय कुल दूरी होगी:
दूरी = चाल × समय
= 340 × 0.1
= 34 m
यह 34 m ध्वनि द्वारा परावर्तक सतह तक जाने और वापस आने की कुल दूरी है। इसलिए परावर्तक सतह की न्यूनतम दूरी:
न्यूनतम दूरी = 34 ÷ 2 = 17 m
अतः वायु में 340 m/s की ध्वनि की चाल मानने पर स्पष्ट प्रतिध्वनि सुनने के लिए परावर्तक सतह लगभग 17 m या उससे अधिक दूर होनी चाहिए।
प्रतिध्वनि से दूरी ज्ञात करने का सूत्र
ध्वनि परावर्तक सतह तक जाकर वापस आती है, इसलिए ध्वनि द्वारा तय कुल दूरी वास्तविक दूरी की दोगुनी होती है।
परावर्तक सतह से दूरी = (ध्वनि की चाल × समय) ÷ 2
d = vt/2
जहाँ:
- d = परावर्तक सतह की दूरी
- v = ध्वनि की चाल
- t = प्रतिध्वनि सुनाई देने में लगा कुल समय
उदाहरण
एक खाली गलियारे में ताली बजाने के 0.5 सेकंड बाद प्रतिध्वनि सुनाई देती है। यदि वायु में ध्वनि की चाल 340 m/s है, तो दीवार से दूरी ज्ञात कीजिए।
दिया गया:
v = 340 m/s
t = 0.5 s
सूत्र:
d = vt/2
हल:
d = (340 × 0.5)/2
d = 170/2
d = 85 m
अतः दीवार की दूरी 85 m है।
प्रतिध्वनि और सतह की प्रकृति
कठोर और चिकनी सतहें ध्वनि को अधिक प्रभावी ढंग से परावर्तित करती हैं। इसलिए ऐसी सतहों से परावर्तित ध्वनि स्पष्ट सुनाई देती है। इसके विपरीत मोटे कपड़े के पर्दे जैसी मुलायम सतहें ध्वनि को अवशोषित कर लेती हैं, इसलिए स्पष्ट प्रतिध्वनि कम सुनाई देती है। खुरदरी सतहें ध्वनि को कई दिशाओं में प्रकीर्णित कर सकती हैं।
अनुरणन (Reverberation)
परिभाषा: किसी बड़े हॉल या सभागार में ध्वनि के दीवारों और अन्य सतहों से अनेक बार परावर्तित होने के कारण स्रोत के बंद हो जाने के बाद भी कुछ समय तक ध्वनि सुनाई देती रहती है। इस घटना को अनुरणन (Reverberation) कहते हैं।
अनुरणन में अलग-अलग सतहों से परावर्तित ध्वनियाँ बहुत कम समयांतर में हमारे कानों तक पहुँचती हैं। यदि इन परावर्तित ध्वनियों के बीच का समयांतर लगभग 0.05 सेकंड से कम हो, तो वे अलग-अलग प्रतिध्वनियों के रूप में स्पष्ट सुनाई नहीं देतीं, बल्कि ध्वनि कुछ समय तक बनी हुई महसूस होती है।
प्रतिध्वनि और अनुरणन में अंतर
| आधार | प्रतिध्वनि | अनुरणन |
|---|---|---|
| ध्वनि | परावर्तित ध्वनि अलग से सुनाई देती है। | परावर्तित ध्वनियाँ लगातार बनी हुई प्रतीत होती हैं। |
| समयांतर | लगभग 0.1 s या अधिक | परावर्तित ध्वनियों के बीच बहुत कम समयांतर |
| मुख्य कारण | दूर स्थित परावर्तक सतह से ध्वनि का लौटना | कई सतहों से ध्वनि का बार-बार परावर्तन |
| उदाहरण | पर्वत के पास चिल्लाने पर आवाज का वापस सुनाई देना | बड़े हॉल में ध्वनि का कुछ समय तक बने रहना |
अनुरणन का प्रभाव
उचित मात्रा में अनुरणन सभागार में संगीत और भाषण को प्रभावी बना सकता है। लेकिन यदि अनुरणन बहुत अधिक हो जाए, तो अलग-अलग ध्वनियाँ आपस में मिल जाती हैं और भाषण या संगीत अस्पष्ट तथा विकृत सुनाई दे सकता है।
सभागारों में अनुरणन को नियंत्रित करना
आधुनिक सभागारों और बड़े कॉन्सर्ट हॉलों को वास्तुकला के अनुसार इस प्रकार बनाया जाता है कि उनमें उपयुक्त ध्वनि-परावर्तन और अनुरणन बना रहे। इससे श्रोता विभिन्न स्थानों से भाषण, संगीत तथा अन्य ध्वनियों को स्पष्ट रूप से सुन सकते हैं।
अनावश्यक अनुरणन को कम करने के लिए निम्नलिखित वस्तुओं का उपयोग किया जाता है:
- ध्वनि-अवशोषक पैनल
- गद्देदार कुर्सियाँ
- मोटे पर्दे
- मुलायम सतहें
- छिद्रयुक्त ध्वनि-अवशोषक सामग्री
ये वस्तुएँ अनावश्यक परावर्तन को कम करके ध्वनि को अधिक स्पष्ट बनाने में सहायता करती हैं।
वास्तुकला और ध्वनि
सभागारों और संगीत कक्षों की संरचना ध्वनि की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। दीवारों और छतों की उचित बनावट तथा ध्वनि-अवशोषक सामग्री का उपयोग करके ध्वनि को इस प्रकार नियंत्रित किया जाता है कि श्रोताओं तक स्पष्ट और संतुलित ध्वनि पहुँच सके।
गोल गुम्बद और ध्वनि
भारत सहित विश्व के कई पुराने वास्तुकारों ने ध्वनि के परावर्तन और अनुरणन को ध्यान में रखकर भवनों का निर्माण किया। कर्नाटक के बीजापुर स्थित गोल गुम्बज की मरमर श्रावी गैलरी इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण है। इसकी विशेष संरचना के कारण धीमी फुसफुसाहट भी विशाल गुंबद में कई बार सुनाई दे सकती है।
ध्वनि परावर्तन के दैनिक जीवन में उपयोग
- पर्वतों और बड़ी चट्टानों से आने वाली प्रतिध्वनि ध्वनि परावर्तन का उदाहरण है।
- बड़े सभागारों में ध्वनि की गुणवत्ता नियंत्रित करने के लिए परावर्तन और अनुरणन का उपयोग किया जाता है।
- ध्वनि के परावर्तन के सिद्धांत का उपयोग वस्तुओं का स्थान ज्ञात करने में किया जाता है।
- परावर्तित ध्वनि का उपयोग आगे चलकर प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण और सोनार जैसी तकनीकों में किया जाता है।
Concept Builder
ध्वनि का परावर्तन → परावर्तक सतह → ध्वनि का वापस लौटना → प्रतिध्वनि या अनुरणन।
यदि परावर्तित ध्वनि पर्याप्त समय बाद अलग से सुनाई दे, तो प्रतिध्वनि होती है। यदि अनेक परावर्तित ध्वनियाँ बहुत कम समयांतर में कान तक पहुँचती रहें, तो अनुरणन का अनुभव होता है।
Exam Booster
- ध्वनि का परावर्तन क्या है? — ध्वनि तरंगों का किसी बाधा से टकराकर वापस लौटना।
- ध्वनि परावर्तन के नियम क्या हैं? — आपतित ध्वनि, अभिलंब और परावर्तित ध्वनि एक ही तल में होते हैं तथा आपतन कोण और परावर्तन कोण समान होते हैं।
- प्रतिध्वनि क्या है? — परावर्तित ध्वनि का मूल ध्वनि से अलग सुनाई देना।
- प्रतिध्वनि सुनने के लिए न्यूनतम समयांतर कितना होना चाहिए? — लगभग 0.1 सेकंड।
- 340 m/s की चाल पर प्रतिध्वनि के लिए न्यूनतम दूरी कितनी होगी? — लगभग 17 m।
- प्रतिध्वनि से दूरी का सूत्र क्या है? — d = vt/2
- कठोर और चिकनी सतहें कैसी होती हैं? — वे ध्वनि को अच्छी तरह परावर्तित करती हैं।
- मुलायम सतहों का क्या प्रभाव होता है? — वे ध्वनि को अवशोषित कर सकती हैं।
- अनुरणन क्या है? — अनेक परावर्तनों के कारण स्रोत बंद होने के बाद भी कुछ समय तक ध्वनि का सुनाई देते रहना।
- अनुरणन कब होता है? — जब विभिन्न सतहों से परावर्तित ध्वनियाँ बहुत कम समयांतर में कान तक पहुँचती हैं।
- अत्यधिक अनुरणन का क्या प्रभाव होता है? — ध्वनि अस्पष्ट और विकृत सुनाई दे सकती है।
- सभागारों में ध्वनि-अवशोषक पैनल क्यों लगाए जाते हैं? — अनावश्यक ध्वनि परावर्तन और अनुरणन को कम करने के लिए।
ध्वनि तरंगें अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
अध्याय 10. ध्वनि तरंगें—अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
मानव कान केवल एक निश्चित सीमा की आवृत्ति वाली ध्वनि को ही सुन सकता है। इस सीमा से कम या अधिक आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों के भी विज्ञान, चिकित्सा, उद्योग और प्राकृतिक घटनाओं में महत्वपूर्ण उपयोग हैं।
पराश्रव्य तथा अवश्रव्य तरंगें
परिभाषा: मानव की श्रवण सीमा से बाहर की आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों को अवश्रव्य (Infrasonic) और पराश्रव्य (Ultrasonic) तरंगों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
मानव की श्रवण सीमा
सामान्य मानव कान लगभग 20 Hz से 20 kHz तक की आवृत्ति वाली ध्वनि को सुन सकता है। इस सीमा को मानव श्रव्य परिसर (Human Audible Range) कहते हैं।
- 20 Hz से कम: अवश्रव्य तरंगें
- 20 Hz से 20 kHz: मानव के लिए श्रव्य ध्वनि
- 20 kHz से अधिक: पराश्रव्य तरंगें
अवश्रव्य तरंगें
परिभाषा: 20 Hz से कम आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों को अवश्रव्य तरंगें (Infrasonic Waves) कहते हैं। मनुष्य सामान्यतः इन तरंगों को सुन नहीं सकता।
अवश्रव्य तरंगों की आवृत्ति बहुत कम होती है, लेकिन वे लंबी दूरी तक गमन कर सकती हैं। इसी कारण प्राकृतिक घटनाओं और वायुमंडलीय गतिविधियों के अध्ययन में इनका उपयोग किया जाता है।
अवश्रव्य तरंगों के प्रमुख उपयोग
- भूकंप जैसी प्राकृतिक घटनाओं का पता लगाने में उपयोग किया जाता है।
- ज्वालामुखी विस्फोट से संबंधित गतिविधियों का अध्ययन करने में उपयोगी हैं।
- तेज झंझावातों का पता लगाने में इनका उपयोग किया जा सकता है।
- इनकी लंबी दूरी तक यात्रा करने की क्षमता के कारण वायुमंडल और पृथ्वी से संबंधित घटनाओं की निगरानी में उपयोगी हैं।
पराश्रव्य तरंगें
परिभाषा: 20 kHz से अधिक आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों को पराश्रव्य तरंगें (Ultrasonic Waves) कहते हैं। मनुष्य सामान्यतः इन्हें सुन नहीं सकता।
पराश्रव्य तरंगों की उच्च आवृत्ति और वस्तुओं से परावर्तित होने की क्षमता के कारण इनका उपयोग चिकित्सा, उद्योग और तकनीकी उपकरणों में किया जाता है।
पराश्रव्य तरंगों के प्रमुख उपयोग
- चिकित्सा में: शरीर के अंदर के अंगों का प्रतिबिंब प्राप्त करने के लिए अल्ट्रासोनोग्राफी में उपयोग किया जाता है।
- गुर्दे की पथरी: गुर्दे की पथरी को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ने में पराश्रव्य तरंगों का उपयोग किया जाता है, जिससे उन्हें शरीर से बाहर निकालना आसान हो सके।
- उद्योग में: अल्ट्रासोनिक वेल्डिंग में उपयोग किया जाता है।
- सफाई में: संवेदनशील मशीनों के छोटे या कठिन भागों की सफाई के लिए उपयोग किया जाता है।
- औद्योगिक परीक्षण: धातु के खंडों के अंदर छिपे दोषों का पता लगाने में उपयोग किया जाता है।
- स्थान निर्धारण: परावर्तित पराश्रव्य तरंगों की सहायता से वस्तुओं की स्थिति और दूरी ज्ञात की जा सकती है।
प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण
परिभाषा: परावर्तित ध्वनि तरंगों की सहायता से किसी वस्तु की स्थिति, दूरी या दिशा का पता लगाने की क्षमता को प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण (Echolocation) कहते हैं।
इस प्रक्रिया में ध्वनि तरंगें किसी वस्तु से टकराकर वापस आती हैं। वापस आने वाली ध्वनि के आधार पर वस्तु की स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
चमगादड़ द्वारा प्रतिध्वनि स्थान निर्धारण
चमगादड़ निशाचर जीव हैं और अंधेरे में उड़ते समय पराश्रव्य तरंगों का उपयोग करके अपने आसपास की वस्तुओं तथा शिकार का पता लगा सकते हैं।
चमगादड़ पराश्रव्य तरंगों के छोटे-छोटे स्पंद उत्सर्जित करते हैं। ये तरंगें आसपास की वस्तुओं से टकराकर परावर्तित होती हैं। चमगादड़ इन परावर्तित तरंगों को ग्रहण करके बाधाओं और शिकार की स्थिति का अनुमान लगाते हैं।
ध्वनि का उत्सर्जन → वस्तु से टकराना → ध्वनि का परावर्तन → परावर्तित ध्वनि का ग्रहण → वस्तु की स्थिति का पता
अन्य जीवों में उपयोग
चमगादड़ों के अतिरिक्त डॉल्फिन, व्हेल तथा कुछ पक्षी भी दिशा-निर्धारण और शिकार के लिए प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण का उपयोग करते हैं।
सोनार (SONAR)
पूरा नाम: Sound Navigation and Ranging
परिभाषा: सोनार एक ऐसी तकनीक है जिसमें पराश्रव्य तरंगों को जल में भेजकर उनके परावर्तन का विश्लेषण किया जाता है और जल के भीतर स्थित वस्तुओं की दूरी, दिशा तथा स्थिति का पता लगाया जाता है।
सोनार की कार्यप्रणाली
सोनार उपकरण जल में पराश्रव्य तरंगों का संकेत भेजता है। ये तरंगें जल के भीतर किसी वस्तु से टकराकर वापस लौटती हैं। वापस आने में लगे समय और ध्वनि की चाल की सहायता से वस्तु की दूरी ज्ञात की जाती है।
पराश्रव्य तरंग भेजना → वस्तु से परावर्तन → संकेत वापस आना → समय मापना → दूरी ज्ञात करना
सोनार के उपयोग
- समुद्र के भीतर पनडुब्बियों का पता लगाने में।
- डूबे हुए जहाजों के अवशेषों का पता लगाने में।
- समुद्र के भीतर स्थित वस्तुओं की दूरी ज्ञात करने में।
- समुद्र की गहराई मापने में।
- जल के भीतर वस्तुओं की दिशा और स्थिति का पता लगाने में।
सोनार से दूरी ज्ञात करने का सूत्र
सोनार संकेत वस्तु तक जाकर वापस लौटता है, इसलिए मापे गए समय में संकेत द्वारा तय की गई दूरी वस्तु की वास्तविक दूरी की दोगुनी होती है।
वस्तु की दूरी = (ध्वनि की चाल × कुल समय) ÷ 2
d = vt/2
जहाँ d वस्तु की दूरी, v माध्यम में ध्वनि की चाल तथा t संकेत के जाने और वापस आने का कुल समय है।
उदाहरण
समुद्री जल में भेजा गया एक सोनार संकेत 0.90 सेकंड के बाद वापस लौटता है। समुद्री जल में ध्वनि की चाल 1530 m/s है। वस्तु की दूरी ज्ञात कीजिए।
दिया गया:
v = 1530 m/s
t = 0.90 s
सूत्र:
d = vt/2
हल:
d = (1530 × 0.90)/2
d = 1377/2
d = 688.5 m
अतः वस्तु की दूरी 688.5 m है।
ध्वनि आधारित चौकसी
दूरनियंत्रित यान और विमान अपने मोटरों तथा इंजनों से विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न करते हैं। जब वे दिखाई नहीं देते, तब भी उनके द्वारा उत्पन्न विशिष्ट ध्वनि को ध्वनि संवेदकों की सहायता से पहचाना जा सकता है।
इस प्रकार की विधि को ध्वनि आधारित चौकसी कहा जाता है। इसका उपयोग रक्षा और बचाव के लिए वाय क्षेत्र के पर्यवेक्षण में किया जा सकता है।
Concept Builder
20 Hz से कम → अवश्रव्य → प्राकृतिक घटनाओं का अध्ययन
20 Hz–20 kHz → मानव श्रव्य परिसर → सामान्य श्रव्य ध्वनि
20 kHz से अधिक → पराश्रव्य → चिकित्सा, उद्योग, सोनार और स्थान निर्धारण
Echolocation: परावर्तित ध्वनि की सहायता से वस्तु की स्थिति ज्ञात करना।
SONAR: जल में पराश्रव्य तरंगों के परावर्तन से वस्तुओं की दूरी और स्थिति ज्ञात करना।
Exam Booster
- मानव की श्रवण सीमा क्या है? — लगभग 20 Hz से 20 kHz।
- अवश्रव्य तरंगें किसे कहते हैं? — 20 Hz से कम आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों को।
- पराश्रव्य तरंगें किसे कहते हैं? — 20 kHz से अधिक आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों को।
- पराश्रव्य तरंगों का चिकित्सा में एक उपयोग लिखिए। — अल्ट्रासोनोग्राफी तथा गुर्दे की पथरी को छोटे टुकड़ों में तोड़ने में।
- Echolocation क्या है? — परावर्तित ध्वनि तरंगों की सहायता से वस्तु का स्थान ज्ञात करना।
- चमगादड़ अंधेरे में वस्तुओं का पता कैसे लगाते हैं? — पराश्रव्य तरंगें भेजकर उनकी परावर्तित तरंगों का उपयोग करते हैं।
- SONAR का पूरा नाम क्या है? — Sound Navigation and Ranging।
- SONAR में किस प्रकार की तरंगों का उपयोग होता है? — पराश्रव्य तरंगों का।
- SONAR का मुख्य सिद्धांत क्या है? — ध्वनि तरंगों के परावर्तन का सिद्धांत।
- SONAR से दूरी ज्ञात करने का सूत्र क्या है? — d = vt/2
- SONAR का उपयोग कहाँ किया जाता है? — समुद्र में पनडुब्बियों, डूबे जहाजों, समुद्र की गहराई और अन्य जलमग्न वस्तुओं का पता लगाने में।
- डॉल्फिन और व्हेल किस प्रकार ध्वनि का उपयोग करती हैं? — दिशा-निर्धारण और शिकार का पता लगाने के लिए प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण में।
ध्वनि तरंगें अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
अध्याय 10. ध्वनि तरंगें—अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
ध्वनि की पहचान केवल उसकी आवृत्ति और आयाम से ही नहीं होती। अलग-अलग स्रोतों से उत्पन्न ध्वनियाँ समान आवृत्ति और प्रबलता होने पर भी अलग सुनाई दे सकती हैं। ध्वनि के इस अंतर को समझने के लिए स्वर, मूल आवृत्ति, अधिस्वरक, ध्वनि-गुणता और अष्टक जैसे concepts को समझना आवश्यक है।
स्वर (Tone)
परिभाषा: लगभग एकल आवृत्ति वाली ध्वनि को स्वर (Tone) कहते हैं।
हमारे दैनिक जीवन में सुनाई देने वाली अधिकांश ध्वनियाँ केवल एक आवृत्ति की नहीं होतीं, बल्कि अनेक आवृत्तियों का मिश्रण होती हैं। लगभग एकल आवृत्ति की ध्वनि प्राप्त करने के लिए स्वरित्र द्विभुज (Tuning Fork) या सीटी का उपयोग किया जा सकता है।
स्वरित्र द्विभुज और स्वर
स्वरित्र द्विभुज एक U-आकार की धातु की छड़ होती है, जिसमें दो शाखाएँ होती हैं। इसे रबड़ के पैड से हल्के से टकराने पर इसकी शाखाएँ कंपन करने लगती हैं और एक लगभग एकल आवृत्ति की ध्वनि उत्पन्न होती है।
स्वरित्र द्विभुज की अलग-अलग आवृत्तियों वाले मॉडल अलग-अलग स्वर उत्पन्न करते हैं। इसलिए किसी स्वर की पहचान उसकी आवृत्ति से की जा सकती है।
संगीत का स्वर
संगीत में प्रयुक्त ध्वनि सामान्यतः केवल एक आवृत्ति की नहीं होती। किसी वाद्ययंत्र या मानव आवाज से उत्पन्न संगीत के स्वर में एक मूल आवृत्ति के साथ अन्य उच्च आवृत्तियाँ भी उपस्थित हो सकती हैं।
मूल आवृत्ति (Fundamental Frequency)
परिभाषा: किसी संगीत स्वर में उपस्थित सबसे कम आवृत्ति को मूल आवृत्ति (Fundamental Frequency) कहते हैं।
मूल आवृत्ति स्वर की मुख्य आवृत्ति होती है और स्वर के तारत्व से इसका महत्वपूर्ण संबंध होता है।
अधिस्वरक (Overtones)
परिभाषा: मूल आवृत्ति के अतिरिक्त उपस्थित उच्चतर आवृत्तियों को अधिस्वरक (Overtones) कहते हैं।
किसी संगीत स्वर में मूल आवृत्ति के साथ विभिन्न अधिस्वरकों का मिश्रण होता है। इनकी संख्या और सापेक्ष तीव्रता ध्वनि की प्रकृति को प्रभावित करती है।
ध्वनि-गुणता (Timbre)
परिभाषा: समान स्वर और समान प्रबलता वाली दो ध्वनियों को अलग-अलग पहचानने में सहायता करने वाले ध्वनि के विशिष्ट गुण को ध्वनि-गुणता (Timbre) कहते हैं।
उदाहरण के लिए, यदि एक ही स्वर को सितार और बाँसुरी दोनों से समान प्रबलता के साथ बजाया जाए, तब भी दोनों की ध्वनियाँ अलग सुनाई देंगी। इसका कारण उनकी ध्वनि-गुणता में अंतर है।
ध्वनि-गुणता मुख्यतः ध्वनि में उपस्थित मूल आवृत्ति और विभिन्न अधिस्वरकों के मिश्रण पर निर्भर करती है। वाद्ययंत्र का आकार, उसका पदार्थ और उसकी संरचना अधिस्वरकों के प्रतिरूप को प्रभावित करते हैं।
ध्वनि-गुणता का महत्त्व
- यह अलग-अलग स्रोतों की ध्वनियों को पहचानने में सहायता करती है।
- इसी कारण समान स्वर वाले अलग-अलग वाद्ययंत्रों की ध्वनि अलग सुनाई देती है।
- मानव आवाज को पहचानने में भी ध्वनि-गुणता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- संगीत में अलग-अलग वाद्ययंत्रों की विशिष्ट ध्वनि उनके अधिस्वरकों के कारण बनती है।
तारत्व, प्रबलता और ध्वनि-गुणता
| विशेषता | मुख्य संबंध | सरल अर्थ |
|---|---|---|
| तारत्व (Pitch) | आवृत्ति | ध्वनि कितनी तीखी या गंभीर सुनाई देती है |
| प्रबलता (Loudness) | आयाम | ध्वनि कितनी तेज या धीमी सुनाई देती है |
| ध्वनि-गुणता (Timbre) | मूल आवृत्ति और अधिस्वरकों का मिश्रण | दो ध्वनियों को अलग पहचानने का गुण |
अष्टक (Octave)
परिभाषा: ऐसे दो समान स्वरों के बीच का अंतराल जिनकी मूल आवृत्तियों में 2 : 1 का अनुपात हो, अष्टक (Octave) कहलाता है।
यदि किसी स्वर की मूल आवृत्ति 200 Hz है, तो उसकी दो गुनी अर्थात 400 Hz की आवृत्ति वाला समान स्वर उससे एक अष्टक ऊपर होगा।
उदाहरण:
200 Hz → 400 Hz
400 Hz → 800 Hz
अर्थात जब मूल आवृत्ति दो गुनी हो जाती है, तो एक अष्टक का अंतर प्राप्त होता है।
संगीत में आवृत्ति का महत्त्व
संगीत के प्रत्येक स्वर की एक विशिष्ट आवृत्ति होती है। अलग-अलग स्वरों की आवृत्तियाँ अलग होने के कारण वे अलग सुनाई देते हैं। सामान्यतः ‘सा’ स्वर की आवृत्ति अन्य क्रमिक स्वरों की तुलना में कम होती है और आगे के स्वरों में आवृत्ति बढ़ती जाती है।
किसी स्वर की आवृत्ति को मापने के लिए ध्वनि की आवृत्ति पहचानने वाले उपकरण या मोबाइल ऐप का उपयोग किया जा सकता है। ऐसे उपकरण ध्वनि के आवृत्ति घटकों को Hz में प्रदर्शित कर सकते हैं।
वाद्ययंत्रों से ध्वनि का निर्माण
विभिन्न वाद्ययंत्रों में अलग-अलग भाग कंपन करके ध्वनि उत्पन्न करते हैं। वाद्ययंत्र की संरचना और कंपन करने वाले भागों के कारण उससे उत्पन्न ध्वनि की विशेषताएँ अलग होती हैं।
तार वाद्ययंत्र
तार वाद्ययंत्रों में तने हुए तार कंपन करके ध्वनि उत्पन्न करते हैं। सितार, वीणा और सारंगी जैसे वाद्ययंत्रों में तारों के कंपन को उपयोगी ध्वनि में परिवर्तित किया जाता है।
वायु वाद्ययंत्र
वायु वाद्ययंत्रों में वायु के स्तंभ के कंपन से ध्वनि उत्पन्न होती है। बाँसुरी इसका एक उदाहरण है। वाद्ययंत्र की लंबाई और उसके अंदर वायु के कंपन से उत्पन्न आवृत्तियाँ ध्वनि को प्रभावित करती हैं।
ताल वाद्ययंत्र
ताल वाद्ययंत्रों में खिंची हुई झिल्ली या अन्य भाग के कंपन से ध्वनि उत्पन्न होती है। तबला और मृदंगम इसके उदाहरण हैं।
तबला और ‘स्याही’
तबले के ढोल-शीर्ष पटल के मध्य भाग में लगाया गया काला पदार्थ ‘स्याही’ कहलाता है। यह पटल के कंपन को प्रभावित करता है और वाद्ययंत्र को विशिष्ट तथा समृद्ध ध्वनि उत्पन्न करने में सहायता करता है।
तबले की ध्वनि केवल एक आवृत्ति की नहीं होती। इसके कंपन से अनेक आवृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं और इनके उचित संयोजन से विशिष्ट संगीत स्वर प्राप्त होता है।
भारतीय वाद्ययंत्रों में ध्वनि की समृद्धता
सारंगी, सितार और वीणा जैसे भारतीय तार वाद्ययंत्रों में विभिन्न आवृत्तियों के संयोजन को समृद्ध बनाने के लिए अतिरिक्त तारों का उपयोग किया जाता है। इनसे उत्पन्न मूल आवृत्ति और अधिस्वरकों का मिश्रण वाद्ययंत्र की विशिष्ट ध्वनि-गुणता प्रदान करता है।
ध्वनि की आवृत्ति का प्रयोगात्मक अध्ययन
ध्वनि की आवृत्ति का अध्ययन करने के लिए मोबाइल में उपलब्ध ऑडियो स्पेक्ट्रम जैसे उपकरणों का उपयोग किया जा सकता है। ऐसे उपकरण ध्वनि में उपस्थित विभिन्न आवृत्तियों को पहचानकर उन्हें ग्राफ या Hz के रूप में प्रदर्शित कर सकते हैं।
इस प्रकार अलग-अलग वाद्ययंत्रों, मानव आवाज और विभिन्न स्वरों की आवृत्तियों की तुलना की जा सकती है।
ध्वनि की विशेषताओं का आपसी संबंध
किसी ध्वनि की पहचान केवल एक ही भौतिक राशि से नहीं होती। आवृत्ति, आयाम और ध्वनि में उपस्थित विभिन्न आवृत्तियों के मिश्रण से ध्वनि का अनुभव निर्धारित होता है।
- आवृत्ति ध्वनि के तारत्व से संबंधित है।
- आयाम ध्वनि की प्रबलता से संबंधित है।
- मूल आवृत्ति और अधिस्वरकों का मिश्रण ध्वनि-गुणता को प्रभावित करता है।
- इसी कारण अलग-अलग स्रोतों से उत्पन्न ध्वनियाँ एक-दूसरे से अलग पहचानी जा सकती हैं।
Concept Builder
आवृत्ति → तारत्व
आयाम → प्रबलता
मूल आवृत्ति + अधिस्वरक → ध्वनि-गुणता
मूल आवृत्ति का 2 गुना → एक अष्टक ऊपर
यही चार संबंध ध्वनि के मानवीय अनुभव को समझने की सबसे आसान कुंजी हैं।
Exam Booster
- स्वर क्या है? — लगभग एकल आवृत्ति वाली ध्वनि को स्वर कहते हैं।
- मूल आवृत्ति क्या है? — संगीत स्वर में उपस्थित सबसे कम आवृत्ति को मूल आवृत्ति कहते हैं।
- अधिस्वरक क्या हैं? — मूल आवृत्ति के अतिरिक्त उपस्थित उच्चतर आवृत्तियाँ अधिस्वरक कहलाती हैं।
- ध्वनि-गुणता क्या है? — समान स्वर और प्रबलता वाली ध्वनियों को अलग पहचानने में सहायता करने वाला ध्वनि का गुण।
- समान स्वर वाले दो वाद्ययंत्र अलग क्यों सुनाई देते हैं? — उनके अधिस्वरकों के मिश्रण और ध्वनि-गुणता में अंतर के कारण।
- अष्टक क्या है? — ऐसी दो समान स्वर वाली ध्वनियों के बीच का अंतराल जिनकी मूल आवृत्तियों का अनुपात 2 : 1 हो।
- 200 Hz और 400 Hz की ध्वनियों में क्या संबंध है? — 400 Hz की ध्वनि 200 Hz की ध्वनि से एक अष्टक ऊपर है।
- सितार और बाँसुरी की ध्वनि अलग क्यों होती है? — दोनों में कंपन करने वाले भाग और उत्पन्न अधिस्वरकों का मिश्रण अलग होता है।
- तबले की स्याही क्या है? — तबले के ढोल-शीर्ष पटल के मध्य भाग में लगाया गया काला पदार्थ, जो पटल के कंपन और ध्वनि को प्रभावित करता है।
- ध्वनि की आवृत्ति किसमें मापी जाती है? — हर्ट्ज (Hz) में।
- तारत्व किससे संबंधित है? — आवृत्ति से।
- प्रबलता किससे संबंधित है? — आयाम से।
- ध्वनि-गुणता किससे प्रभावित होती है? — मूल आवृत्ति तथा अधिस्वरकों के मिश्रण से।
ध्वनि तरंगें अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
Chapter 10. ध्वनि तरंगें—अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
ध्वनि केवल सुनने और संचार का माध्यम ही नहीं है, बल्कि आधुनिक विज्ञान में इसका उपयोग छिपी हुई वस्तुओं, प्राकृतिक घटनाओं, जीव-जंतुओं और दूर स्थित स्थानों का अध्ययन करने के लिए भी किया जाता है। पराश्रव्य तरंगों तथा विशेष ध्वनि-संवेदकों की सहायता से उन चीजों का भी अध्ययन किया जा सकता है जिन्हें सीधे देखना या सुनना संभव नहीं होता।
सोनार के अनुप्रयोग
सोनार में पराश्रव्य तरंगों को जल के भीतर भेजा जाता है। ये तरंगें किसी वस्तु से टकराकर वापस लौटती हैं। संकेत के जाने और वापस आने में लगे समय तथा जल में ध्वनि की चाल की सहायता से वस्तु की दूरी ज्ञात की जाती है।
सोनार का उपयोग समुद्र की गहराई मापने, पनडुब्बियों का पता लगाने तथा जल के भीतर स्थित वस्तुओं का पता लगाने में किया जाता है। पुस्तक में सोनार द्वारा भेजे गए पराश्रव्य संकेत के पनडुब्बी से परावर्तित होकर वापस आने की प्रक्रिया को उदाहरण के रूप में दिखाया गया है।
समुद्र की गहराई ज्ञात करना
उदाहरण: किसी समुद्री स्थान पर सोनार संकेत भेजने के 4 सेकंड बाद वापस प्राप्त होता है। समुद्री जल में ध्वनि की चाल 1500 m/s है। उस स्थान पर समुद्र की गहराई ज्ञात कीजिए।
दिया गया:
ध्वनि की चाल, v = 1500 m/s
कुल समय, t = 4 s
सोनार संकेत समुद्र की सतह से नीचे जाकर वापस आता है। इसलिए 4 सेकंड में तय की गई कुल दूरी समुद्र की गहराई की दोगुनी होगी।
कुल दूरी = चाल × समय
= 1500 × 4 = 6000 m
अतः समुद्र की गहराई:
गहराई = 6000/2 = 3000 m
उत्तर: समुद्र की गहराई 3000 m या 3 km है।
ध्वनि आधारित चौकसी
परिभाषा: विशिष्ट ध्वनियों को ध्वनि संवेदकों की सहायता से पहचानकर किसी वस्तु या गतिविधि की निगरानी करने की विधि को ध्वनि आधारित चौकसी कहा जाता है।
ड्रोन और विमान अपने मोटरों तथा इंजनों से विशेष प्रकार की ध्वनियाँ उत्पन्न करते हैं। जब कोई ड्रोन या विमान दिखाई नहीं देता, तब भी उसके द्वारा उत्पन्न विशिष्ट ध्वनि को संवेदकों की सहायता से पहचाना जा सकता है।
इस विधि का उपयोग रक्षा और बचाव के लिए वायु क्षेत्र के पर्यवेक्षण में किया जा सकता है।
ध्वनि द्वारा छिपी दुनिया का अध्ययन
आधुनिक तकनीक ने ध्वनि को मानव श्रवण सीमा से आगे जाकर विभिन्न स्थानों और प्राकृतिक घटनाओं की जानकारी प्राप्त करने का साधन बना दिया है। वैज्ञानिक विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न ध्वनियों और कंपन का अध्ययन करके ऐसी घटनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त कर रहे हैं जिन्हें सीधे देखना कठिन है।
मंगल ग्रह की ध्वनियाँ
अंतरिक्ष अन्वेषी यंत्रों द्वारा मंगल ग्रह पर उत्पन्न ध्वनियों को रिकॉर्ड किया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि उन्नत उपकरणों की सहायता से पृथ्वी से बहुत दूर स्थित ग्रहों पर होने वाली ध्वनि-संबंधी घटनाओं का भी अध्ययन किया जा सकता है।
दूरस्थ भूकंपों का अध्ययन
वैज्ञानिक दूरस्थ भूकंपों से संबंधित ध्वनियों के समय का अध्ययन करके महासागर के तापमान में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों को मापने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे अध्ययन पृथ्वी की बदलती जलवायु को समझने में सहायता कर सकते हैं।
मच्छरों की पहचान
जीवविज्ञानी मच्छरों की भनभनाहट का अध्ययन करके रोग फैलाने वाले मच्छरों की पहचान करने का प्रयास कर रहे हैं। विभिन्न मच्छरों की उड़ान और पंखों की गति से उत्पन्न ध्वनि में अंतर हो सकता है, जिसका उपयोग उनकी पहचान में किया जा सकता है।
मिट्टी के स्वास्थ्य का अध्ययन
शोधकर्ता सूक्ष्म जीवों द्वारा मिट्टी में उत्पन्न बहुत हल्की ध्वनियों का अध्ययन कर रहे हैं। इन ध्वनियों से मिट्टी के स्वास्थ्य और जैव विविधता के बारे में जानकारी प्राप्त करने की संभावना है।
ध्वनि एक वैज्ञानिक अन्वेषण का साधन
ध्वनि का उपयोग अब केवल मनुष्य के श्रवण अनुभव तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिक उपकरण ध्वनि और कंपन को रिकॉर्ड तथा विश्लेषित करके ग्रहों, समुद्रों, जीव-जंतुओं और प्राकृतिक प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
जैसे-जैसे तकनीक विकसित हो रही है, ध्वनि ग्रहों, जीवित प्राणियों और प्रकृति की छिपी गतिविधियों के अध्ययन का अधिक शक्तिशाली साधन बनती जा रही है।
ध्वनि के प्रमुख अनुप्रयोग
- SONAR: जल के भीतर वस्तुओं की स्थिति और दूरी ज्ञात करने के लिए।
- समुद्र की गहराई: पराश्रव्य तरंगों के परावर्तन से समुद्र की गहराई ज्ञात करने के लिए।
- पनडुब्बी का पता लगाना: परावर्तित पराश्रव्य तरंगों की सहायता से।
- ध्वनि आधारित चौकसी: ड्रोन और विमानों की विशिष्ट ध्वनियों की पहचान के लिए।
- ग्रहों का अध्ययन: अंतरिक्ष यानों द्वारा रिकॉर्ड की गई ध्वनियों के अध्ययन के लिए।
- भूकंपीय अध्ययन: दूरस्थ भूकंपों से संबंधित ध्वनियों के अध्ययन के लिए।
- मच्छरों की पहचान: उनकी भनभनाहट के आधार पर पहचान में सहायता के लिए।
- मिट्टी का अध्ययन: सूक्ष्म जीवों द्वारा उत्पन्न ध्वनियों से मिट्टी के स्वास्थ्य और जैव विविधता का अध्ययन।
Concept Builder
SONAR → पराश्रव्य तरंग → वस्तु से परावर्तन → समय का मापन → दूरी/गहराई का पता
ध्वनि आधारित चौकसी → विशिष्ट ध्वनि → सेंसर → पहचान → निगरानी
आधुनिक ध्वनि विज्ञान → ध्वनि रिकॉर्डिंग → ध्वनि विश्लेषण → छिपी जानकारी का अध्ययन
इसलिए ध्वनि को केवल सुनाई देने वाली घटना समझना पर्याप्त नहीं है। इसकी सहायता से समुद्र की गहराई से लेकर ग्रहों, जीव-जंतुओं और मिट्टी की गतिविधियों तक का अध्ययन किया जा सकता है।
Exam Booster
- प्रश्न: सोनार का उपयोग किस लिए किया जाता है?
उत्तर: समुद्र की गहराई तथा जल के भीतर स्थित वस्तुओं की दूरी और स्थिति ज्ञात करने के लिए। - प्रश्न: सोनार में किस प्रकार की तरंगों का उपयोग किया जाता है?
उत्तर: पराश्रव्य तरंगों का। - प्रश्न: सोनार संकेत द्वारा तय कुल दूरी को दो से क्यों भाग दिया जाता है?
उत्तर: क्योंकि संकेत वस्तु तक जाकर वापस आता है, इसलिए मापी गई कुल दूरी वास्तविक दूरी की दोगुनी होती है। - प्रश्न: ध्वनि आधारित चौकसी क्या है?
उत्तर: विशिष्ट ध्वनियों को ध्वनि संवेदकों द्वारा पहचानकर निगरानी करने की विधि। - प्रश्न: ड्रोन की पहचान ध्वनि से कैसे की जा सकती है?
उत्तर: उसके मोटर से उत्पन्न विशिष्ट ध्वनि को ध्वनि संवेदकों की सहायता से पहचानकर। - प्रश्न: ध्वनि का उपयोग ग्रहों के अध्ययन में कैसे हो रहा है?
उत्तर: अंतरिक्ष अन्वेषी यंत्रों द्वारा ग्रहों पर उत्पन्न ध्वनियों को रिकॉर्ड और उनका अध्ययन किया जा रहा है। - प्रश्न: मच्छरों की भनभनाहट का वैज्ञानिक उपयोग क्या है?
उत्तर: उनकी ध्वनि का अध्ययन करके रोग फैलाने वाले मच्छरों की पहचान में सहायता ली जा सकती है। - प्रश्न: मिट्टी की ध्वनियों से क्या जानकारी प्राप्त की जा सकती है?
उत्तर: सूक्ष्म जीवों द्वारा उत्पन्न हल्की ध्वनियों के अध्ययन से मिट्टी के स्वास्थ्य और जैव विविधता के बारे में जानकारी मिल सकती है। - प्रश्न: यदि सोनार संकेत 4 s में वापस आता है और जल में ध्वनि की चाल 1500 m/s है, तो समुद्र की गहराई कितनी होगी?
उत्तर: 3000 m या 3 km।
ध्वनि तरंगें अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
Chapter 10. ध्वनि तरंगें—अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
इस अभ्यास कार्य के माध्यम से ध्वनि की प्रकृति, उसके संचरण, तरंग के अभिलक्षण, ध्वनि की चाल, मानव श्रवण सीमा, ध्वनि का परावर्तन, प्रतिध्वनि, अनुरणन, पराश्रव्य तरंगों, SONAR तथा ध्वनि के आधुनिक अनुप्रयोगों की समझ को जाँचा जाएगा।
Assignment – What Have You Learned?
भाग A – बहुत छोटे उत्तर वाले प्रश्न
- ध्वनि किस प्रकार की तरंग है?
- ध्वनि के संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता क्यों होती है?
- ध्वनि निर्वात में क्यों नहीं चल सकती?
- ध्वनि तरंग में संपीडन किसे कहते हैं?
- विरलन किसे कहते हैं?
- तरंगदैर्ध्य की परिभाषा लिखिए।
- आवृत्ति का SI मात्रक क्या है?
- आवर्तकाल किसे कहते हैं?
- आवृत्ति और आवर्तकाल में क्या संबंध है?
- ध्वनि की चाल का सूत्र लिखिए।
- ध्वनि का तारत्व किस भौतिक राशि से संबंधित है?
- ध्वनि की प्रबलता किससे संबंधित है?
- मनुष्य की सामान्य श्रवण सीमा क्या है?
- अवश्रव्य तरंगें किसे कहते हैं?
- पराश्रव्य तरंगें किसे कहते हैं?
- ध्वनि का परावर्तन क्या है?
- प्रतिध्वनि किसे कहते हैं?
- अनुरणन किसे कहते हैं?
- SONAR का पूरा नाम लिखिए।
- SONAR में किस प्रकार की तरंगों का उपयोग किया जाता है?
भाग B – रिक्त स्थान भरिए
- ध्वनि एक ________ तरंग है।
- ध्वनि के संचरण के लिए ________ की आवश्यकता होती है।
- दो क्रमागत संपीडनों के बीच की दूरी को ________ कहते हैं।
- प्रति सेकंड होने वाले पूर्ण कंपनों की संख्या को ________ कहते हैं।
- आवृत्ति का SI मात्रक ________ है।
- आवर्तकाल और आवृत्ति एक-दूसरे के ________ होते हैं।
- ध्वनि की चाल का सूत्र ________ है।
- 20 Hz से कम आवृत्ति वाली तरंगें ________ कहलाती हैं।
- 20 kHz से अधिक आवृत्ति वाली तरंगें ________ कहलाती हैं।
- ध्वनि तरंगों के किसी सतह से टकराकर वापस लौटने की घटना को ________ कहते हैं।
- परावर्तित ध्वनि के अलग से सुनाई देने को ________ कहते हैं।
- SONAR में ________ तरंगों का उपयोग किया जाता है।
भाग C – सही या गलत बताइए
- ध्वनि निर्वात में संचरित हो सकती है।
- ध्वनि ठोस, द्रव और गैस तीनों माध्यमों में संचरित हो सकती है।
- ध्वनि तरंगों में माध्यम के कण तरंग के साथ आगे बढ़ते रहते हैं।
- ध्वनि की आवृत्ति बढ़ने पर उसका तारत्व सामान्यतः बढ़ता है।
- ध्वनि का आयाम बढ़ने पर उसकी प्रबलता सामान्यतः बढ़ती है।
- 20 Hz से कम आवृत्ति वाली ध्वनि मनुष्य सामान्यतः सुन सकता है।
- 20 kHz से अधिक आवृत्ति वाली ध्वनि को पराश्रव्य कहते हैं।
- ध्वनि का परावर्तन प्रकाश के परावर्तन के समान नियमों का पालन करता है।
- प्रतिध्वनि सुनने के लिए मूल और परावर्तित ध्वनि के बीच पर्याप्त समयांतर आवश्यक है।
- SONAR में ध्वनि के परावर्तन का सिद्धांत उपयोग किया जाता है।
भाग D – मिलान कीजिए
| स्तंभ A | स्तंभ B |
|---|---|
| 1. आवृत्ति | a. d = vt/2 |
| 2. ध्वनि की चाल | b. डेसिबेल |
| 3. प्रबलता | c. हर्ट्ज |
| 4. SONAR | d. पराश्रव्य तरंगें |
| 5. प्रतिध्वनि से दूरी | e. v = fλ |
| 6. 20 Hz से कम | f. अवश्रव्य |
भाग E – लघु उत्तरीय प्रश्न
- ध्वनि को यांत्रिक तरंग क्यों कहा जाता है?
- संपीडन और विरलन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
- ध्वनि तरंग में माध्यम के कणों और विक्षोभ की गति में क्या अंतर है?
- आवृत्ति और आवर्तकाल के बीच संबंध समझाइए।
- ध्वनि की चाल विभिन्न माध्यमों में अलग-अलग क्यों होती है?
- तापमान बढ़ने पर वायु में ध्वनि की चाल पर क्या प्रभाव पड़ता है?
- तारत्व और प्रबलता में अंतर स्पष्ट कीजिए।
- अवश्रव्य और पराश्रव्य तरंगों में अंतर लिखिए।
- कठोर सतहों से ध्वनि का परावर्तन अधिक स्पष्ट क्यों होता है?
- प्रतिध्वनि सुनाई देने के लिए मूल और परावर्तित ध्वनि के बीच पर्याप्त समयांतर क्यों आवश्यक है?
- प्रतिध्वनि और अनुरणन में अंतर बताइए।
- अत्यधिक अनुरणन सभागार में समस्या क्यों उत्पन्न करता है?
- ध्वनि-अवशोषक पदार्थों का सभागारों में उपयोग क्यों किया जाता है?
- चमगादड़ पराश्रव्य तरंगों का उपयोग किस प्रकार करते हैं?
- SONAR किस सिद्धांत पर कार्य करता है?
- SONAR द्वारा समुद्र की गहराई कैसे ज्ञात की जाती है?
- ध्वनि आधारित चौकसी क्या है?
- ध्वनि का उपयोग प्राकृतिक घटनाओं के अध्ययन में किस प्रकार किया जा सकता है?
भाग F – संख्यात्मक प्रश्न
-
एक ध्वनि तरंग की आवृत्ति 500 Hz है और उसका आवर्तकाल ज्ञात कीजिए।
-
किसी माध्यम में ध्वनि की चाल 340 m/s और आवृत्ति 170 Hz है। ध्वनि का तरंगदैर्ध्य ज्ञात कीजिए।
-
किसी ध्वनि तरंग का तरंगदैर्ध्य 2 m और आवृत्ति 200 Hz है। उसकी चाल ज्ञात कीजिए।
-
एक ध्वनि तरंग की चाल 1500 m/s और तरंगदैर्ध्य 3 m है। उसकी आवृत्ति ज्ञात कीजिए।
-
किसी परावर्तक सतह से प्रतिध्वनि 0.4 s बाद सुनाई देती है। यदि ध्वनि की चाल 340 m/s है, तो सतह की दूरी ज्ञात कीजिए।
-
एक सोनार संकेत समुद्र की सतह से भेजने के 2 s बाद वापस लौटता है। समुद्री जल में ध्वनि की चाल 1500 m/s है। समुद्र की गहराई ज्ञात कीजिए।
-
एक सोनार संकेत 4 s में वापस लौटता है। समुद्री जल में ध्वनि की चाल 1500 m/s है। उस स्थान पर समुद्र की गहराई ज्ञात कीजिए।
-
वायु में ध्वनि की चाल 344 m/s है। 20 Hz की ध्वनि का तरंगदैर्ध्य ज्ञात कीजिए।
-
वायु में ध्वनि की चाल 344 m/s है। 20,000 Hz की ध्वनि का तरंगदैर्ध्य ज्ञात कीजिए।
भाग G – दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
-
ध्वनि तरंग की प्रकृति समझाइए। संपीडन और विरलन की सहायता से बताइए कि ध्वनि माध्यम में किस प्रकार संचरित होती है।
-
ध्वनि तरंग के प्रमुख अभिलक्षणों—आयाम, तरंगदैर्ध्य, आवृत्ति, आवर्तकाल और चाल—को परिभाषित करते हुए उनके बीच के संबंध लिखिए।
-
ध्वनि की चाल विभिन्न माध्यमों में अलग-अलग क्यों होती है? ठोस, द्रव और गैस में ध्वनि की चाल की तुलना कीजिए।
-
मानव की श्रवण सीमा समझाइए। श्रव्य, अवश्रव्य और पराश्रव्य तरंगों को उदाहरण सहित समझाइए।
-
ध्वनि के परावर्तन को समझाइए। इसके नियम लिखिए और प्रतिध्वनि बनने की आवश्यक परिस्थितियाँ बताइए।
-
प्रतिध्वनि और अनुरणन को उदाहरण सहित समझाइए। दोनों में अंतर स्पष्ट कीजिए तथा अनुरणन को नियंत्रित करने के उपाय लिखिए।
-
पराश्रव्य तरंगों के विभिन्न उपयोगों का वर्णन कीजिए। चिकित्सा, उद्योग और जल के भीतर वस्तुओं की खोज में इनके उपयोग समझाइए।
-
SONAR की कार्यप्रणाली को क्रमबद्ध रूप से समझाइए। SONAR की सहायता से समुद्र की गहराई कैसे ज्ञात की जाती है?
-
ध्वनि के आधुनिक वैज्ञानिक अनुप्रयोगों पर टिप्पणी लिखिए। ध्वनि आधारित चौकसी, ग्रहों के अध्ययन, मच्छरों की पहचान तथा मिट्टी के स्वास्थ्य के अध्ययन में ध्वनि की भूमिका बताइए।
भाग H – सोचिए और उत्तर दीजिए
- यदि ध्वनि तरंग की आवृत्ति बढ़ा दी जाए और माध्यम वही रहे, तो उसकी तरंगदैर्ध्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा? कारण सहित बताइए।
- यदि किसी ध्वनि की आवृत्ति समान रहे लेकिन उसका आयाम बढ़ा दिया जाए, तो उसके तारत्व और प्रबलता में क्या परिवर्तन होगा?
- यदि किसी स्थान पर ध्वनि की प्रतिध्वनि 0.1 s से पहले वापस आ जाए, तो क्या वह अलग से सुनाई देगी? कारण बताइए।
- यदि SONAR संकेत वस्तु तक जाकर वापस लौटता है, तो केवल v × t से वस्तु की दूरी क्यों नहीं निकाली जा सकती?
- किसी कमरे में मोटे पर्दे, कालीन और गद्देदार फर्नीचर लगाने से ध्वनि की गुणवत्ता क्यों बदल जाती है?
- यदि दो ध्वनियों की आवृत्ति समान हो लेकिन उनके स्रोत अलग हों, तो क्या दोनों ध्वनियाँ समान सुनाई देंगी? कारण बताइए।
- चमगादड़ के लिए पराश्रव्य तरंगें उपयोगी क्यों हैं जबकि मनुष्य उन्हें सुन नहीं सकता?
- यदि समुद्री जल में ध्वनि की चाल बढ़ जाए और सोनार का समय समान रहे, तो ज्ञात गहराई पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
भाग I – गतिविधि आधारित प्रश्न
-
एक स्वरित्र द्विभुज को कंपन कराकर ध्वनि उत्पन्न कीजिए। उसके कंपन और उत्पन्न ध्वनि के बीच संबंध का निरीक्षण कीजिए।
-
एक मोबाइल या उपलब्ध ध्वनि-विश्लेषण उपकरण की सहायता से अलग-अलग ध्वनियों की आवृत्ति की तुलना कीजिए। कौन-सी ध्वनि का तारत्व अधिक है, यह निर्धारित कीजिए।
-
एक खुले स्थान पर किसी दीवार के सामने ताली बजाकर प्रतिध्वनि का समय मापने का प्रयास कीजिए। ध्वनि की चाल ज्ञात होने पर दीवार की दूरी का अनुमान लगाइए।
-
अपने घर या विद्यालय में उन वस्तुओं की सूची बनाइए जो ध्वनि को परावर्तित करती हैं और उन वस्तुओं की भी जो ध्वनि को अवशोषित करती हैं।
-
किसी सभागार या कक्षा में ध्वनि की स्पष्टता का निरीक्षण कीजिए। यह पता लगाइए कि वहाँ पर्दे, कालीन, गद्देदार कुर्सियाँ या ध्वनि-अवशोषक पदार्थ क्यों लगाए गए हैं।
Assignment Challenge
एक पनडुब्बी समुद्र की सतह से सोनार संकेत भेजती है। संकेत 3.2 सेकंड में वापस लौटता है। समुद्री जल में ध्वनि की चाल 1500 m/s है।
- सोनार संकेत द्वारा तय की गई कुल दूरी ज्ञात कीजिए।
- समुद्र की गहराई ज्ञात कीजिए।
- समझाइए कि प्राप्त समय को 2 से भाग क्यों दिया जाता है।
Answer Key – Objective Questions
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| 1 | यांत्रिक/अनुदैर्ध्य तरंग |
| 2 | माध्यम |
| 3 | तरंगदैर्ध्य |
| 4 | आवृत्ति |
| 5 | हर्ट्ज (Hz) |
| 6 | व्युत्क्रम |
| 7 | v = fλ |
| 8 | अवश्रव्य |
| 9 | पराश्रव्य |
| 10 | परावर्तन |
| 11 | प्रतिध्वनि |
| 12 | पराश्रव्य |
Assignment Challenge – Answer
दिया गया:
v = 1500 m/s
t = 3.2 s
कुल दूरी = v × t
= 1500 × 3.2
= 4800 m
यह दूरी समुद्र की गहराई की दोगुनी है।
समुद्र की गहराई = 4800 ÷ 2 = 2400 m
उत्तर: समुद्र की गहराई 2400 m या 2.4 km है।
2 से इसलिए भाग दिया जाता है क्योंकि सोनार संकेत समुद्र की सतह से वस्तु तक जाता है और फिर उसी वस्तु से परावर्तित होकर वापस आता है।
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