NCERT Solutions for Class 12 – Complete Chapter-wise Study Material
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Chapter 4. भारत के विदेश सम्बन्ध - Class 12 Political Science-II Hindi NCERT Solutions
Chapter 4. भारत के विदेश सम्बन्ध
अध्याय-समीक्षा
- भारत बड़ी विकट और चुनौतीपूर्ण अन्तराष्ट्रीय परिस्थितियों में आजाद हुआ था दुनिया महायुद की तबाही से अभी बाहर निकली थी और उसके सामने पुननिर्माणों का सवाल प्रमुख था एक अंतराष्टीय संस्था बनाने के प्रयास हो रहे थे और उपनिवेशवाद की समाप्ति के फलस्वरूप दुनिया के नक्शे पर नए देश नमूदार हो रहे थे | नए देशो सामने लोकतंत्र कायम करने और अपनी जनता की भलाई कने की दोहरी चुनैती थी | स्वतन्त्रता के तुरंत बाद भारत ने जो विदेश नीति अपनाई उनमे हम इन सरे सरोकारों की झलक पते है |
- एक राष्ट्र के रूप में भारत का जन्म विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में हुआ था | ऐसे में भारत ने अपनी विदेश नीति में अन्य सभी देशी की संप्रभुता का सम्मान करने और शांति कायम करके अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने का लक्ष्य सामने रखा | इस लक्ष्य की प्रतिध्वनी संविधान के नीति- निर्देशक सिदान्तो में सुनाई देती है |
- क्या 1950 और 1960 के दशक की विश्व राजनीति में भारत इन दोनों में से किसी खेमे में शामिल था ? क्या भारत अपनी विदेशी नीति को शांतिपूर्ण ढंग से लागु करने और अंतराष्टीय झगड़ो से बचे रहने में सफल रहा ?
- भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन अपने आप में कोई स्वतंत्र घटना नही है | पूरी दुनिया में उपनिवेशवाद और समर्ज्यवाद के विरूद संघर्ष चल रहे थे और भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन भी इसी विश्वव्यापी संघर्ष का हिंसा था | इस आन्दोलन का असर एशिया और अफ्रीका के कई मिक्त आंदोलनों पर हुआ | आजादी मिलाने से पहले भी भारत के राष्ट्रीवादी नेता दुनिया के थे | नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान इडियन नेशनल आर्मी '(आई.एन.ए.) का गठन किया था |इससे साफ-साफ जाहिर होता है |
- भारती के पहले प्रधनमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय एजेंडा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाई | वे प्रधनमंत्री के साथ -साथ विदेश मंत्री भी थे | प्रधनमंत्री और मंत्री के रूप में 1946 से 1964 तक उन्होंने भारत की विदेश नीति की रचना और किर्यान्वयन पर गहरा प्रभाव डाला | नेहरू की विदेश नीति के तीन बड़े उदेश्य थे - कठिन संघर्ष से प्राप्त संप्रभुता को बचाए रखना, क्षेत्रीय अखण्डता को बनाए रखना और तेज रफ्तार से आर्थिक विकास करना |
- 1956 में जब ब्रिटेन ने स्वेज नहर के मामले को लेकर मिस्र पर आक्रमण किया तो भारत ने इस नव - ओप्निवेशिक हमले के विरूद विश्वव्यापी विरोध की अगुवाई की | इसी साल सोवियत संघ ने हंगरी पा आक्रमण किया था |
- भारत अभी बाकी विकासशील देशो को गुटनिरपेक्षता की नीति के बारे में आश्वस्त करने में लगा था कि पाकिस्तान अमरीकी नेत्रित्व वाले सैन्य-गठबंधन में शामिल हो गया | इस वजह से 1950 के दशक में भारत - अमरीकी संबंधो में खटास पैदा हो गई |
- नेहरू के दौर में भारत ने एशिया और अर्फीका के नव-स्वतंत्र देशो के साथ संपर्क बनाए |1940 और 1950 के दशको में नेहरू बड़े मुखर स्वर में एशियाई एकता की पैरोकारी करते रहे |नेहरू की अगुवाई में भारत ने 1947 के मार्च में ही एशियाई संबंध सम्मेलन (एशियन रिलेशंस कंफेड्स ) का आयोजन कर डाला था जबकि अभी भारत को आजादी मिलाने में पांचमहेने शेष थे भारत ने इडोनेशिया की आजादी के लिए भरपूर प्रयास किए | भारत चाहता था कि इंडोनेशिया डच ओप्निवेशिक शासन से यथासंभव शीर्घ मुक्त हो जाए |
- पाकिस्तान के साथ अपने संबंधो के विपरीत आजाद भारत ने चीन के साथ अपने रिश्तो की शुरूआत बड़े दोस्ताना ढंग से की | चीन क्रांति 1949 में हुई थी | इस क्रांति के बाद भारत चीन की कम्युनिस्ट सरकार को मान्यता देने वाले देशो में था | पश्चिमी प्रभुत्व के चंगुल से निकालने वाले इस देश को लेकर नेहरू के ह्दय में गहरे भाव थे और उन्होंने अन्तराष्ट्रीय फलक पर इस सरकार की मदद की |
- 1957 से 1959 के बीच चीन ने अक्साई -चीन इलाके पर कब्जा कर लिया और इस इलाके में उसने रणनीतिक बढत हासिल करने के लिए एक सडक बनाई | ठीक उसी समय चीन ने 1962 के अक्टूबर में दोनों विवादित क्षेत्रों पर तेजी तथा व्यापक स्टार हमला किया |
- चीन -युद्ध से भारत की छवि को देश विदेश दोनों ही जगह धक्का लगा | इस संकट से उबरने के लिए भारत को अमरीकी और और ब्रिटेन दोनों से सैन्य मदद की गुहार लगानी पड़ी | नेहरू के नजदीकी सहयोगी और तत्कालीन रक्षामन्त्री वी.के. किष्णमेनन को भी मंत्रीमंडल छोड़ना पड़ा |
- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 1964 में टूट गई | इस पार्टी के भीतर जो खेमा चीन का पक्षधर था उसने मार्कवादी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सी.पी.आई.एम्. माकपा) बनाई | चीन युद्ध के कर्म में माकपा के कई नेताओ को चीन का पक्ष लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया |
- कश्मीर मसले को लेकर पाकिस्तान के साथ बंटवारे के तुरंत बाद ही संघर्ष छिड़ गया था | 1947 में ही कश्मीर में भारत और पाकिस्तान की सेनाओ के बीच एक छायुद्धछिड़ गया था | बहरहाल ,यह संघर्ष पूर्णव्यापी युद्ध का रूप न ले सका | नेहरू और जनरल अयूब खान ने सिधु नदी जल संधि पर 1960 में हस्ताक्षर किए |
- दोनों देशों के बीच 1965 में कही ज्यादा गभीर किस्म के सैन्य- संघर्ष की शूरूआत हुई | आप अगले अध्याय में पढेगे कि इस वक्त लालबहादूर शास्त्री भारत के प्रधानमंत्री थे |1965 के अप्रैल में पकिस्तान ने गुजरात के कच्छ इलाके के रन में सैनिक हमला बोला|
- संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तक्षेप से इस लड़ाई का अंत हुआ | बाद में भारतीय प्रधानमंत्री लालबहादूर शास्त्री और पाकिस्तान के जनरल अयूब खान के बीच 1966 में ताशकंद - समझौता हुआ | हालाँकि 1965 की लड़ाई में भारत ने पाकिस्तान को बहुत ज्यादा सैन्य क्षति पहुँचाई लिकिन इस युद्ध से भारत की कठिन आर्थीक स्थिति पर और ज्यादा बोझ पड़ा |
- 1970 में पाकिस्तान के सामने एक गहरा अंदरुनी संकट आ हुआ | पाकिस्तान के पहले आम चुनाव में खंडित जनादेश आया | जूल्फ्कार अली भुट्टो की पार्टी पश्चिमी पाकिस्तान में विजयी रही जबकि मुजीबुर्रहमान की पार्टी अवामी लीग ने पूर्वी पाकिस्तान में जोरदार कामयाबी हासिल की |
- इसकी जगह पाकिस्तान सेना ने 1971 में शेख मुजीब को गिरफ्तार कर और पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर जुल्म ढाने शुरू किए |1971 में पूरे साल भारत को 80 लाख शरणार्थियों का बोझ वहन करना पड़ा |
- पाकिस्तान को अमरीका और चीन ने मदद की 1960 के दशक में अमरीका और चीन के बीच संबंधो को सामान्य करने की कोशिश चल रही थी और इससे एशिया में सता - समीकरण नया रूप ले रहा था | अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के सलाहकार हेनरी किसीजर ने 1971 के जुलाई में पाकिस्तान होते हुई गुपचुप चीन का दौरा किया |
- अमरीकी- पाकिस्तान-चीन की धुरी बनती देख भारत ने इसके जवाब में सोवियत संघ के साथ 1971 में शांति और मित्रता की एक 20 - वर्षीय संधि पर दस्तखत किए |महीने राजनयित तनाव और सैन्य तैनाती के बाद 1971के दिसंबर में भारत और पाकिस्तान के बीच एक पूर्णव्यापी युद्ध छिड़ गया | पाकिस्तान के लड़ाकू विमानों ने पंजाब और राजस्थान पर हमले किए जबकि उसकी सेना ने जम्मू-कश्मीर में अपना मोर्चा खोला |
- दिनों के अन्दर भारतीय सेना ने ढाका को तीन तरफ से घेर लिया और अपने 90,000 सैनिको के साथ पाकिस्तानी सेना को आत्मा-समर्पण करना पड़ा |बांग्लादेश के रूप में एक स्वतंत्र राष्ट्र के उदय के साथ भारतीय सेना ने अपनी तरफ से एकतरफा युद्ध-विराम घोषित कर दिया बाद में 3 जुलाई 1972 को इदिरा गांधी और जुल्फकार अली भुट्टो के बीच शिमला- समझौता पर दस्तखत हुए और इससे अमन की बहाली हुई |
- भारत ने अपने सीमित संसाधनो के साथ नियोजित विकास की शुरूआत की थी | पड़ोसी देशो के साथ संघर्ष के कारण पंचवर्षीय योजना पटरी से उतर गई 1962 के बाद भारत को अपने सीमित संसाधन खासतौर से रक्षा क्षेत्र में लगाने पड़े | भारत को अपने सैन्य ढाँचे का आधुनिकीकरण करना पड़ा |1962 में रक्षा -उत्पाद और 1965 में रक्षा आपूर्ति विभाग की स्थापना हुई | तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961-66) पर असर पड़ा और इसके बाद लगातार तीन एक - वर्षीय योजना पर अम्ल हुआ | चौथा पंचवर्षीययोजना 1969 में ही शुरू हो सकी |
- भारत 1974 के मई में परमाणु परीक्षण किया |इसकी शुरूआत 1940 के दशक के अंतिम सालो में होमी जहांगीर भाभा के निर्देशन में हो चुकी थी | सम्यवादी शासन वाले चीन ने 1964 के अक्टूबर में परमाणु परीक्षण किया | 1973 में अरब-इजरायल युद्ध हुआ था
Chapter 4. भारत के विदेश सम्बन्ध
Q1.इन बयानों के आगे सही या गलत का निशान लगाएँ :
(क) गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने के कारण भारत , सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमरीका दोनों
की सहायता हासिल का सका |
(ख) अपने पड़ोसी देशी के साथ भारत के संबंध शुरूआत से ही तनावपूर्ण रहे |
(ग) शीतयुद्ध का असर भारत -पाक संबंधो पर भी पड़ा |
(घ) 1971 की शांति और मैत्री की संधि संयुक्त राज्य अमरीका से भारत की निकटता का परिणाम थी|
उत्तर :
(क) सही (ख) गलत (ग) सही (घ) गलत |
Q2. निम्नलिखित का सही जोड़ा मिलाएँ :
| (क) 1950-६४के दौरान भारत की विदेश नीति का लक्ष्य | (i) तिब्बत के धार्मिक नेता जो सीमा पार करके भारत चले आए | |
| (ख) पंचशील | (ii) क्षेत्रीय अखण्डता और संप्रभुता की रक्षा थी थी आर्थिक विकाश | |
| (ग) बांडुंग सम्मेलन |
(iii) शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिदांत |
| (घ) दलाई लामा | (iv) इसकी परिणति गुटनिरपेक्ष आन्दोलन में हुई | |
उत्तर :
(क) 1950-64 के दौरान भारत की 2. क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की रक्षा तथा आर्थिक विदेश नीति का लक्ष्य विकास
(ख) पंचशील 3. शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धान्त |
(ग) बांडुंग सम्मलेन 4. इसकी परिणति गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में हुई |
(घ) दलाईलामा 1. तिब्बत के धार्मिक नेता जो सीमा-पार करके भारत चले गए
Q3. नेहरू विदेश नीति के संचालन को स्वतंत्रता का एक अनिवार्य संकेतक क्यों मानते थे ? अपने
उतर में दो कारण बताएं और उनके पक्ष में उदहारण भी दे |
उत्तर :
नेहरु विदेश नीति के संचालन को स्वतंत्रता का एक अनिवार्य संकेतक इसलिए मानते थे, क्योंकि विदेश नीति का संचालन व्ही देश क्र सकता है, जो स्वतंत्र हो | एक पराधीन देश अपनी विदेश नीति का संचालन नहीं कर सकता क्योंकि वह दूसरे देश के अधीन होता है | जैसे 1947 से पहले भारत स्वमं अपनी विदेश नीति का संचालन नहीं करता था, बल्कि ब्रिटिश सरकार करती थी |
Q4. विदेश नीति का निर्धरण घरेलू जरूरत और अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के दोहरी दबाव में होता है
'' 1960 के दशक में भारत द्वारा अपनाई गई विदेश नीति से एक उदहारण देता हुआ अपने उतर
की पुष्ठी करे |
उत्तर :
किसी भी देश की विदेश नीति का निर्धारक घरेलू और अन्तर्रष्ट्रीय परिस्थितियों के अंतर्गत होता है | प्रत्येक राष्ट्र विदेश नीति बनाते समय अपनी घरेलू जरूरतों एवं अन्तर्रष्ट्रीय परिस्थितियों को ध्यान में रखता है | उदहारण के लिए, भारत ने 1960 के दशक में जो विदेश नीति अपनाई उस पर चीन एवं पाकिस्तान के युद्द, अकाल, रजनीतिक परिस्थितियां तथा शीतयुद्ध का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है |
Q5. अगर आपके भारत की विदेश नीति के बारे में फैसला लेने को कहा जाए तो आप इसकी किन
दो बातो को बदलना चाहेगे | ठीक इसी तरह यह भी बताएं कि भारत की विदेश नीति के किन दो
पहलूओं को आप बरकरार रखता चाहेगे | अपने उतर के समर्थन में तर्क दीजिए |
उत्तर :
भारत की विदेश नीति में चीन एवं पाकिस्तान के साथ जिस प्रकार की नीति अपनाई जा रही है, उसमे बदलाव की आवश्कता है, क्योंकि उसमे वांछित परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं | इसी प्रकार वर्तमान समय में भारत को शीतयुद्ध का अब कोई अस्तित्व नहीं रह गया है | जहां तक विदेश नीति के दो पहलुओं को बरकरार रखने की बात है, तो प्रथम गुट- निरपेक्षता के अस्तित्व को बनाए रखना चाहिए, क्योंकि यह भारत की विदेश नीति का मूल आधार है | दिवतीय भारत को संयुक्त राष्ट्र- संघ के साथ सहयोग जारी रखना चाहिए, क्योंकि इससे अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा को बढावा मिलता है |
Q6. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए :
(क) भारत का परमाणु नीति
(ख) विदेश नीति के मामलो पर सर्व-सहमति
उत्तर :
(क) भारत की परमाणु नीति - अनुच्छेद 51 के अनुसार राज्य को अंतर्राष्ट्रीय झगड़ों को निपटाने के लिए मध्यस्थ का रास्ता अपनाने सम्बन्धी निर्देश दिए गए है |
(ख) विदेश नीति के मामलों में सर्व- सहमती आवश्यक है, क्योंकि यदि एक देश की विदेश नीति के मामलों में सर्व-सहमती नही होगी, तो वह देश अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर अपना पक्ष प्रभावशाली ढंग से नहीं रख पाएगा | भारत की विदेश नीति के महत्वपूर्ण बिन्दुओं जैसे गुट- निरपेक्षता, साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद का विरोध, दूसरे देशों से मित्रतापूर्ण सम्बन्ध बनाना तथा अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा को बढ़ावा देना, इत्यादि पर सदैव सर्व- सहमती रही है |
Q7. भारत की विदेश नीति का निर्माण शांति और सहयोग के सिदान्तो को आधार मानकर हुआ
लेकिन , 1962-1972 की अवधि यानी महज दस सालो में भारत को तीन युधो का सामना करना
परा | क्या आपको लगता है कि यह भारत की विदेशी नीति की असफलता है अथवा , आप ऐसे
अंतराष्टीय परिस्थितियों का परिणामो मंनेगे ? अपने मन्तव्य के पक्ष में तर्क दीजिए |
उत्तर :
आजादी के समय भारत ने अपनी विदेश नीति का निर्माण शांति और सहयोग के सिद्धांतो के आधार पर किया अर्थात भारत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सभी देशों के साथ शांति एवं सहयोग चाहता था, परन्तु 1962 से लेकर 1972 तक भारत को तीन युद्द लड़ने पड़े तो इसमें कुछ हद तक भारत की विदेश नीति की असफलता भी मणि जाती है तथा अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का परिणाम थी | भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरु ने अपनी विदेश नीति के अंतर्गत सभी पड़ोसी देशों पर विश्वास जताया, परन्तु चीन एवं पाकिस्तान ने उस विश्वास को तोड़ दिया | इसी तरह अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों जैसे शीतयुद्ध ने पाकिस्तान को भारत पर आक्रमण करने के लिए उकसाया |
Q8. क्या भारत की विदेशी नीति से यह झलकता है कि भारत क्षेत्रीय स्तर की महाशक्ति बनना
चाहता है ? 1971 के बांग्लादेश युद्ध के सन्दर्भ में इस प्रश्न पर विचार करे |
उत्तर :
भारत भारतीय उप- महाद्वीप का सबसे महत्वपूर्ण एवं शक्तिशाली देश है | अतः भारत की विदेश नीति का संचालन इस प्रकार से किया गया कि भारत भारतीय उपमहाद्वीप में एक महाशक्ति बनकर उभरें, क्योंकि यदि भारत इस क्षेत्र में एक महाशक्ति बनकर उभरता है, तो इससे इस क्षेत्र के सभी देशों को लाभ पहुचेगा तथा 1971 के युद्द से यह बात स्पष्ट हो गई कि भारत एक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है |
Q9. किसी राष्ट्र का राजनीतिक नेत्रित्व किस तरह उस राष्ट्र की विदेश नीति पर असर डालता है
भारत की विदेशी नीति के उदारण देते हुए इस प्रश्न पर विचार कीजिए |
उत्तर :
विदेश नीति के निर्माण में उस देश के रजनीतिक नेत्रत्व का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है | रजनीतिक नेत्रत्व की विचारधारा के आधार पर ही देश की विदेश नीति का निर्माण होता है | उदाहरण के लिए, भारतीय विदेश नीति पर इस राष्ट्र के महान नेताओं के वैयक्तिक तत्वों का भी प्रभाव पड़ा | पण्डित नेहरु के विचरों से हमारी विदेश नीति पर्याप्त प्रभावित हुई | पण्डित नेहरु साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद व फासिस्टवाद के घोर विरोधी थे और वे समस्याओं का समाधान करने के लिए शान्तिपूर्ण मार्ग के समर्थक थे | वह मैत्री, सहयोग व सह-अस्तित्व के पोषक थे | साथ ही अन्याय का विरोध करने के लिए शक्ति प्रयोग के समर्थक थे | पण्डित जवाहरलाल नेहरु ने अपने विचारो द्वारा हमारी विदेश नीति के ढांचे को ढाला | पानीक्कर जैसे महान नेताओ के विचारों ने भी हमारी विदेश नीति को प्रभावित किया | शास्त्री जी व भूतपूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमती इंदिरा गांधी के कल में हमनें अपनी विदेश नीति के मूल तत्त्वों को कायम रखते हुए इसमें व्यावहारिक तत्त्वों का भी प्रयोग किया |
Q10. निम्नलिखित अवतरण को पढ़े और इसके आधार पर [पूछे गए प्रश्नों के उतर दीजिए :
गुटनिरपेक्षता का व्यापक अर्थ है अपने को किशी भी सैन्य गुट में शमिल नही करने ...इसका अर्थ
होता है चीजो को यथासंभव सैन्य द्रिस्टीकोण से न देखना और इसकी कभी जरूरत आन पड़े तक भी
कीसी सैन्य गुट के नजरिए को अपनाने की जगह स्वतंत्र रूप से विचार करना तथा सभी देशो के
साथ दोस्ताना रिश्ते कायम करना ........
(क) नेहरू सैन्य गुटों से दूरी क्यों बनाना चाहता थे ?
(ख) क्या आप मानते है कि भरत-सोवियत मैत्री की संधि से गुटनिरपेक्षता के सिदान्तो का उल्लंघन
हुआ ? अपने उतर के समर्थन में तर्क दीजिए |
(ग) अगर सैन्य - गुट न होता तो क्या गुटनिरपेक्षता की नीति बेमानी होती ?
उत्तर :
(क) पं. नेहरु सैन्य गुटों से इसलिए दूरी बनाना चाहते थे क्योंकि किसी सैन्य गुट में शामिल होकर एक देश स्वतंत्र नीति का निर्माण नहीं कर पाता | इसके साथ- साथ सैन्य गुट युद्दों को भी बढ़ावा देते हैं |
(ख) भारत- सोवियत मैत्री की सन्धि से गुट- निरपेक्षता का सिद्दांतों का उलंघन नहीं हुआ, क्योंकि इस सन्धि के पश्चात भी भारत गुट- निरपेक्षता के मौलिक सिद्धांतो पर कायम रहा तथा जब सोवियत संघ की सेनाएं अफगानिस्तान में पहुंची, तो भारतने उसकी आलोचना की |
(ग) यदि विश्व में सैन्य- गुट नहीं होते तो भी गुट- निरपेक्षता की प्रासंगिकता बनी रहती, क्योंकि गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की स्थापना शांति एवं विकास के लिए की गई थी तथा शांति एवं विकास के लिए चलाया गया कोई भी आन्दोलन कभी भी अप्रासंगिक नहीं हो सकता |
Chapter 4. भारत के विदेश सम्बन्ध
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