Chapter 4. विचारक, विश्वास और इमारतें - Class 12 History Part-1 Hindi CBSE Notes
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CBSE Notes for Class 12 – Chapter-wise Revision Notes
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Chapter 4. विचारक, विश्वास और इमारतें - Class 12 History Part-1 Hindi CBSE Notes
Chapter 4. विचारक, विश्वास और इमारतें
अध्याय 4 – बौद्ध धर्म : उत्पत्ति, विचार और विस्तार
1. बौद्ध धर्म के प्रमुख स्रोत
बुद्ध और उनके अनुयायियों के विचारों की जानकारी मुख्यतः निम्नलिखित स्रोतों से मिलती है:
- बौद्ध ग्रंथ – त्रिपिटक, जातक कथाएँ, अशोक के अभिलेख आदि।
- भौतिक साक्ष्य – स्तूप, विहार, मूर्तियाँ और अभिलेख।
- महत्वपूर्ण स्थल – साँची, अमरावती, बोधगया, सारनाथ आदि।
2. स्तूप : अर्थ और महत्व
स्तूप का अर्थ है टीला या गोलाकार स्मारक। इन स्तूपों में बुद्ध के अवशेष या उनसे सम्बद्ध वस्तुएँ संरक्षित की जाती थीं। आरम्भ में ये मिट्टी के टीले थे जो बाद में पत्थर के भव्य स्मारकों में बदल गए।
2.1 स्तूप की संरचना
- अंड (Dome) – मुख्य गोलार्द्ध भाग, जहाँ अवशेषों का प्रतीक रखा जाता है।
- हर्मिका (Harmika) – ऊपर का छज्जा-सदृश भाग, देवताओं के निवास का प्रतीक।
- यष्टि और छत्र – मस्तूल व छत्री जो आकाश की ओर उठते हैं।
- वेदिका – पवित्र क्षेत्र को घेरने वाली दीवार या रेलिंग।
- तोरणद्वार – नक्काशीदार प्रवेश द्वार (जहाँ उपस्थितियों के लिए दृश्य कथाएँ होती थीं)।
3. साँची का स्तूप
साँची मंदिर समूह मध्य प्रदेश के साँची गाँव की पहाड़ी पर स्थित है (भोपाल से लगभग 20 मील उत्तर-पूर्व)। यह गोलार्धाकार स्तूप स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है।
3.1 महत्व
- बौद्ध धर्म का प्रमुख तीर्थ केंद्र।
- प्रारम्भिक बौद्ध विचार और कला के अध्ययन का अमूल्य स्रोत।
- 1818 में पुन: खोज के बाद दुनिया के पुरातत्व-विदों के लिए महत्वपूर्ण ठहरा।
4. पवित्र स्थल और चैत्य
प्राचीन काल में कुछ प्राकृतिक या ऐतिहासिक स्थानों को पवित्र माना जाता था। ऐसे स्थलों पर छोटी वेदियाँ, जिसे चैत्य कहा जाता था, बनती थीं।
4.1 बुद्ध से जुड़े मुख्य चैत्य-स्थल
- लुम्बिनी – बुद्ध का जन्म स्थल।
- बोधगया – बुद्ध को ज्ञान (बोध) प्राप्त हुआ।
- सारनाथ – जहाँ पहले उपदेश दिए गए।
- कुशीनगर – महापरिनिर्वाण का स्थान।
5. बुद्ध का जीवन और ज्ञान प्राप्ति
सिद्धार्थ गौतम शाक्य कुल के राजकुमार थे। जीवन के दुःख देखकर उन्होंने गृहत्याग किया और कठोर साधना तथा अंत में मध्यम मार्ग अपनाकर बोधगया में ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद वे 'बुद्ध' कहलाए।
6. बौद्ध धर्म की मुख्य शिक्षाएँ
6.1 चार आर्य सत्य
- संसार दुःखों से भरा है।
- दुःख का कारण तृष्णा (लालसा) है।
- तृष्णा के दमन से दुःख से मुक्ति मिलती है।
- मुक्ति का मार्ग अष्टांग मार्ग है।
6.2 अष्टांग मार्ग
- सम्यक दृष्टि
- सम्यक संकल्प
- सम्यक वचन
- सम्यक कर्म
- सम्यक आजीविका
- सम्यक प्रयत्न
- सम्यक स्मृति
- सम्यक समाधि
मुख्य सिद्धांत: अहिंसा, आत्म-संयम, समता और करुणा।
7. संघ की स्थापना और भिक्खु-भिक्खुनियाँ
बुद्ध ने अपने अनुयायियों का संघ स्थापित किया जो धन, अनुशासन और धर्म-प्रसार के लिए जिम्मेदार था। वे सादा जीवन जीते और दान पर निर्भर रहते थे। प्रारम्भ में संघ में केवल पुरुष होते थे; बाद में महिलाएँ भी शामिल हुईं।
महाप्रजापति गौतमी पहली भिक्खुनी मानी जाती हैं।
8. बौद्ध ग्रंथ और भाषा
बुद्ध के उपदेशों का लेखन उनके जीवनकाल में नहीं हुआ; उनकी मृत्यु के बाद शिष्यों ने वैशाली (वेसली) में सभा करके शिक्षाएँ संहिताबद्ध कीं। यह संग्रह त्रिपिटक कहलाता है:
- विनय पिटक – संघ के नियम।
- सुत्त पिटक – बुद्ध के उपदेश।
- अभिधम्म पिटक – दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक विवेचनाएँ।
प्रारम्भिक ग्रंथ पालि भाषा में लिखे गए; बाद में कई ग्रन्थ संस्कृत में भी उपलब्ध हुए।
9. बौद्ध धर्म का विस्तार
बुद्ध के संदेश ने भारत से बाहर भी तीव्रता से प्रसार किया — श्रीलंका, म्याँमार, थाईलैंड, चीन, कोरिया और जापान तक। सम्राट अशोक का योगदान इस विस्तार में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।
9.1 विस्तार के कारण
- लोक-धार्मिक प्रथाओं से असंतोष और सामाजिक परिवर्तन।
- नैतिकता और अच्छे आचरण को महत्व देने वाला सन्देश।
- समानता व करुणा का संदेश — विशेषकर निचले तबके, महिलाओं और दीन-दुखियों के लिए आकर्षक।
10. बौद्ध धार्मिक परम्पराएँ
- हीनयान (स्थविरवाद) – पारम्परिक साधना और वैयक्तिक मुक्ति पर केन्द्रित।
- महायान – बोधिसत्त्व की अवधारणा, सामाजिक कल्याण और व्यापक पूजा पद्धतियाँ।
बोधिसत्त्व: दयालु वह जीव जो स्वयं का मोक्ष त्याग कर दूसरों की मुक्ति के लिए काम करता है।
11. स्तूपों का निर्माण और दान
स्तूप बनाने के लिए विभिन्न स्रोतों से धन मिलता था — राजा, व्यापारी, शिल्पकार, भिक्खु-भिक्खुनियाँ और साधारण लोगों के दान अभिलेखों में दर्ज मिलते हैं। कई बार दानदाताओं ने अपना नाम, गाँव और पेशा अभिलेख में लिखा है।
12. अमरावती का स्तूप
अमरावती का स्तूप विशाल और भव्य था। 18–19वीं शताब्दी में इसकी मूर्तियाँ निकाली गई और विभिन्न संग्रहालयों में पहुंचीं; संरक्षण की कमी कारणों से कई कलाकृतियाँ बिखर गईं।
13. संरक्षण के प्रयास और विचार
पुरातत्ववेत्ता एच. एच. कोल का मानना था कि असली कलाकृतियाँ स्थल पर ही रखी जानी चाहिए और संग्रहालयों में उनकी प्रतिकृतियाँ रखी जानी चाहिए। उन्होंने प्राचीन कलाकृतियों की लूट को तीव्र शब्दों में निंदा की।
14. साँची के संरक्षित रहने के कारण
- 19वीं सदी तक विद्वानों ने इसकी महत्ता समझ ली थी।
- स्थानीय शासकों (जैसे शाहजहाँ बेगम और सुल्तानजहाँ बेगम) ने संरक्षण के लिए धन और समर्थन दिया।
- विदेशी अधिकारियों द्वारा प्लास्टर प्रतिकृतियाँ बनवाना और मूल कृतियों को स्थल पर रखना भी सहायक सिद्ध हुआ।
15. ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दी का वैश्विक महत्व
इस काल में कई महत्त्वपूर्ण विचारकों का उदय हुआ — जरथुस्त्र (ईरान), कन्फ्यूशियस (चीन), सुकरात-प्लेटो-अरस्तु (यूनान), महावीर और बुद्ध (भारत)। सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन और नए राज्यों का उदय इस युग की प्रमुख विशेषताएँ थीं।
16. वैदिक परम्परा और वाद-विवाद
ऋग्वेद (1500–1000 ई.पू.) में यज्ञीय परम्परा मिलती है। वैदिक युग में शास्त्रार्थ यानी तर्क-वितर्क की परम्परा विकसित हुई थी जहाँ शिक्षक अपने मत का प्रचार-प्रसार करते थे।
17. संक्षिप्त पुनरावृत्ति (Quick Recap)
- बुद्ध का जन्म: लुम्बिनी
- ज्ञान प्राप्ति: बोधगया
- प्रथम उपदेश: सारनाथ
- महापरिनिर्वाण: कुशीनगर
- ग्रंथ: त्रिपिटक (पालि)
- मार्ग: अष्टांग मार्ग
- प्रमुख स्तूप: साँची, अमरावती
- परम्पराएँ: हीनयान और महायान
साँची स्तूप की खोज : 1818 में साँची स्तूप की खोज हुई !
पवित्र स्थल : प्राचीन काल में लोग कुछ जगहों को पवित्र मानते थे | ये जगह निम्नलिखित थे |
(i) जहाँ खास किस्म की वनस्पति होती थी |
(ii) जहाँ की चट्टानें अनूठी पाई जाती थी |
(iii) जहाँ विस्मयकारी प्राकृतिक सौन्दर्य होता था |
चैत्य : कुछ पवित्र स्थलों पर एक छोटी सी वेदी बनी रहती थी जिन्हें कभी-कभी चैत्य कहा जाता था |
बौद्ध धर्म का विस्तार : बुद्ध उस युग के सबसे प्रभावशाली शिक्षकों में से एक थे। सैकड़ों वर्षों के दौरान उनके संदेश पूरे उपमहाद्वीप में और उसके बाद मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया और जापान, श्रीलंका से समुद्र पार कर म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक फैले।
महात्मा बुद्ध और ज्ञान मार्ग :
महात्मा बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था जो शाक्य कबीले के सरदार के बेटे थे | जीवन के कटु यथार्थों से दूर उन्हें महल की चार दिवारी के अन्दर सब सुखों के बीच बड़ा किया गया | एक दिन उन्होंने अपने रथकार को उन्हें शहर घुमाने के लिए मना लिया | बाहरी दुनिया की उनकी पहली यात्रा काफी पीड़ादायक रही | एक वृद्ध व्यक्ति को, एक बीमार को और एक लाश को देखकर उन्हें बड़ा गहरा सदमा पहुँचा | उसी क्षण उन्हें यह अनुभूति हुई कि मनुष्य के शरीर का क्षय और अंत निश्चित है | उन्होंने एक गृह त्यागे एक सन्यासी को भी देखा उसे मानों बुढ़ापें, बीमारी और मृत्यु से कोई परेशानी नहीं थी और उसने शांति प्राप्त कर ली थी | इस प्रकार सिद्धार्थ ने निश्चय किया कि वे भी सन्यासी का रास्ता अपनाएंगे | कुछ समय बाद वे महल त्यागकर सत्य की खोज में निकल गए |
स्तूप बनाये जाने के कारण : स्तूपों का निर्माण पवित्र अवशेषों को संरक्षित करने के उद्देश्य से बनाये जाते थे |
स्तूपों का निर्माण के लिए धन :
(i) स्तूपों की वेदिकाओं और स्तंभों को बनाने के लिए और सजाने के लिए दान लिए जाते थे ऐसा अभिलेखों से पता चलता है |
(ii) कुछ दान राजाओं द्वारा, कुछ व्यापरियों द्वारा और कुछ शिल्पकारों द्वारा लिए जाते है |
(iii) सैकड़ों महिलाओं और पुरुषों ने दान के अभिलेखों में अपना नाम बताया है। कभी-कभी वे अपने गाँव या शहर का नाम बताते हैं और कभी-कभी अपना पेशा और रिश्तेदारों के नाम भी बताते हैं।
(iv) इन इमारतों को बनाने में भिक्खुओं और भिक्खुनियों ने भी दान दिया।
स्तूप की संरचना का उदभव :
स्तूप (संस्कृत अर्थ टीला) का जन्म एक गोलार्द्ध लिए हुए मिट्टी के टीले से हुआ जिसे बाद में अंड कहा गया। धीरे-धीरे इसकी संरचना ज़्यादा जटिल हो गई जिसमें कई चौकोर और गोल आकारों का संतुलन बनाया गया। अंड के ऊपर एक हखमका होती थी। यह छज्जे जैसा ढाँचा देवताओं के घर का प्रतीक था। हखमका से एक मस्तूल निकलता था जिसे यष्टि कहते थे जिस पर अक्सर एक छत्री लगी होती थी। टीले के चारों ओर वेदिका होती थी जो पवित्र स्थल को दुनिया से अलग करती थी |
स्तूपों की खोज :
1. अमरावती का बौद्ध स्तूप की खोज :
(i) एक स्थानीय राजा को 1796 में जो एक मंदिर बनाना चाहते थे अचानक वहां स्तूप के अवशेष मिल गए |
(ii) कुछ वर्षों के बाद कॉलिन मेकेंजी नामक एक अंग्रेज अधिकारी इस इलाके से गुजरे । हालाँकि उन्होंने कई मूर्तियाँ पाईं और उनका विस्तृत चित्रांकन भी किया, लेकिन उनकी रिपोर्टें कभी छपी नहीं।
(iii) 1854 में गुंटूर (आन्ध्र प्रदेश) के कमिश्नर ने अमरावती की यात्रा की। उन्होंने कई मूर्तियाँ और उत्कीर्ण पत्थर जमा किए और वे उन्हें मद्रास ले गए।
(iv) उन्होंने पश्चिमी तोरणद्वार को भी खोज निकाला और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि अमरावती का स्तूप बौद्धों का सबसे विशाल और शानदार स्तूप था।
2. साँची स्तूप की खोज : 1818 में जब साँची की खोज हुई, इसके तीन तोरणद्वार तब भी खड़े थे। चौथा वहीं पर गिरा हुआ था और टीला भी अच्छी हालत में था।
अमरावती के बौद्ध स्तूप के नष्ट होने के कारण :
(i) भारत में सर्वप्रथम अमरावती के ही स्तूप खोजे गए थे | उस समय लोगों को इन स्तूपों के बारे में अधिक जानकारी नहीं होने के कारण इन्हें संरक्षित नहीं किया जा सका |
(ii) 1850 के दशक में अमरावती के उत्कीर्ण पत्थर अलग-अलग जगहों पर ले जाए जा रहे थे। कुछ पत्थर कलकत्ता में एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल पहुँचा दिए गए, तो कुछ मद्रास में इंडिया ऑफिस। कुछ पत्थर लंदन तक पहुँच गए।
(iii) कई अंग्रेज अधिकारीयों के बागों में अमरावती की मूर्तियाँ पाई गयी थी वस्तुतः इस इलाके का हर नया अधिकारी यह कहकर कुछ मूर्तियाँ उठा ले जाता था कि उसके पहले के अधिकारीयों ने भी ऐसा किया।
भारतीय कला-कृतियों के संरक्षण को लेकर पुरातत्ववेत्ता एच. एच. कोल के विचार :
एच. एच. कोल मानते थे कि संग्रहालयों में मूर्तियों की प्लास्टर प्रतिकृतियाँ रखी जानी चाहिए जबकि असली कृतियाँ खोज की जगह पर ही रखी जानी चाहिए | उन्होंने लिखा "इस देश की प्राचीन कलाकृतियों की लूट होने देना मुझे आत्मघाती और असमर्थनीय नीति लगती है।"
साँची स्तूप के बचे रहने के कारण :
(i) जब साँची स्तूप की खोज हुई तबतक विद्वान और पुरातत्ववेत्ता इसके महत्व हो समझ गए थे ! चूँकि अमरावती का स्तूप भारत में सर्वप्रथम खोजा गया था जिसे संरक्षित नहीं कर पाया गया | लेकिन साँची के समय तक विद्वानों के विचार बदल गए थे |
(ii) विद्वान इस बात के महत्त्व को समझ गए थे कि किसी पुरातात्विक अवशेष को उठाकर ले जाने की बजाय खोज की जगह पर ही संरक्षित करना कितना महत्वपूर्ण है।
(iii) स्थानीय शासकों ने भी इस स्तूप को संरक्षित रखने में मदद की |
(iv) सौभाग्यवश फ्रांसिसी और अंग्रेज दोनों ही बड़ी सावधनी से बनाई प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए। इस प्रकार मूल कृति भोपाल राज्य में अपनी जगह पर ही रही।
(v) भोपाल के शासकों, शाहजहाँ बेगम और उनकी उतराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम, ने इस प्राचीन स्थल के रख-रखाव के लिए धन का अनुदान दिया।
(vi) यदि यह स्तूप समूह बना रहा है तो इसके पीछे कुछ विवेकपूर्ण निर्णयों की बड़ी भूमिका है। शायद हम इस मामले में भी भाग्यशाली रहे हैं कि इस स्तूप पर किसी रेल ठेकेदार या निर्माता की नज़र नहीं पड़ी।
ईसा पूर्व प्रथम सहस्त्रब्दी का काल विश्व इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ :
इस काल को इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। इसके निम्नलिखित कारण हैं : -
(i) इस काल में ईरान में जरथुस्त्र जैसे चिन्तक, चीन में खुंगत्सी, यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तु और भारत में महावीर, बुद्ध और कई अन्य चिंतकों का उद्भव हुआ।
(ii) उन्होंने जीवन के रहस्यों को समझने का प्रयास किया। साथ-साथ वे इंसानों और विश्व व्यवस्था के बीच रिश्ते को समझने की कोशिश कर रहे थे।
(iii) यही वह समय था जब गंगा घाटी में नए राज्य और शहर उभर रहे थे और सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में कई तरह के बदलाव आ रहे थे |
वैदिक परंपरा की जानकारी के स्रोत : 1500 से 1000 ईसा पूर्व में संकलित ऋग्वेद से मिलती है |
यज्ञ की परम्परा की शुरुआत :
इस उपमाहाद्विपीय भूभाग में यज्ञ की परंपरा वैदिक काल से ही रही है जिसकी जानकारी हमें ऋग्वेद से मिलता है |
(i) राजसूय और अश्वमेघ यज्ञ जैसे जटिल यज्ञ सरदार और राजा किया करते थे |
(ii) अग्नि, इंद्रा, सोम आदि कई देवताओं की स्तुति की जाती थी | यज्ञों के समय इन स्रोतों का उच्चारण किया जाता था और लोग मवेशी, बेटे, स्वास्थ्य, लंबी आयु आदि के लिए प्रार्थना करते थे।
वाद-विवाद और चर्चाए (शास्त्रार्थ) :
यह वैदिक काल से चली आ रही एक ऐसी परम्परा है जिसमें वेदों के ज्ञान पर वाद-विवाद हुआ करता था जिससे सामान्य भाषा में शास्त्रार्थ कहा जाता है |
(i) शिक्षक एक जगह से दूसरी जगह घूम-घूम कर अपने दर्शन या विश्व के विषय में अपनी समझ को लेकर एक-दूसरे से तथा सामान्य लोगों से तर्क-वितर्क करते थे।
(ii) ये चर्चाएँ कुटागारशालाओं (विद्वानों या ऋषियों के आश्रमों) या ऐसे उपवनों में होती थीं जहाँ घुमक्कड़ मनीषी ठहरा करते थे।
(iii) यदि एक शिक्षक अपने प्रतिद्वंद्वी को अपने तर्कों से समझा लेता था तो वह अपने अनुयायियों के साथ उसका शिष्य बन जाता था इसलिए किसी भी संप्रदाय के लिए समर्थन समय के साथ बढ़ता-घटता रहता था।
बौद्ध ग्रंथो की भाषा : ज्यादातर बौद्ध ग्रन्थ पालि भाषा में लिखी गई और बाद में संस्कृत में लिखे गए |
बुद्ध के समर्थक जिन सामाजिक वर्गों से आये थे :
(i) राजा (ii) धनवान (iii) गृहपति (vi) समान्य जन जैसे शिल्पी, कर्मकार और दास इत्यादि |
बुद्ध द्वारा संघ की स्थापना और बौद्ध भिक्खु:
बुद्ध के शिष्यों का दल तैयार हो जाने के बाद उन्होंने संघ की स्थापना की, ऐसे भिक्षुओं की एक संस्था जो धम्म के शिक्षक बन गए। ये श्रमण एक सादा जीवन बिताते थे। उनके पास जीवनयापन के लिए अत्यावश्यक चीजों के अलावा कुछ नहीं होता था। जैसे कि दिन में एक बार उपासकों से भोजन दान पाने के लिए वे एक कटोरा रखते थे। चूँकि वे दान पर निर्भर थे इसलिए उन्हें भिक्खु कहा जाता था।
संघ में पुरुषों और महिलाओं की स्थिति :
शुरू-शुरू में सिर्फ पुरुष ही संघ में सम्मिलित हो सकते थे। बाद में महिलाओं को भी अनुमति मिली। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार बुद्ध के प्रिय शिष्य आनंद ने बुद्ध को समझाकर महिलाओं के संघ में आने की अनुमति प्राप्त की। बुद्ध की उपमाता महाप्रजापति गोतमी संघ में आने वाली पहली भिक्खुनी बनीं। कई स्त्रिायाँ जो संघ में आईं, वे धम्म की उपदेशिकाएँ बन गईं। आगे चलकर वे थेरी बनी जिसका मतलब है ऐसी महिलाएँ जिन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया हो।
बौद्ध धर्म के तेजी से फ़ैलने के कारण :
बुद्ध के जीवनकाल में और उनकी मृत्यु के बाद भी बौद्ध धर्म तेजी से फैला | इसका कारण यह था कि -
(i) लोग समकालीन धार्मिक प्रथाओं से असंतुष्ट थे और उस युग में तेजी से हो रहे सामाजिक बदलावों ने उन्हें
उलझनों में बाँध् रखा था।
(ii) बौद्ध शिक्षाओं में जन्म के आधर पर श्रेष्ठता की बजाय जिस तरह अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्त्व दिया गया उससे महिलाएँ और पुरुष इस धर्म की तरफ आकर्षित हुए।
(iii) खुद से छोटे और कमजोर लोगों की तरफ मित्रता और करुणा के भाव को महत्त्व देने के आदर्श काफी लोगों को भा गए।
Chapter 4. विचारक, विश्वास और इमारतें
पौराणिक हिन्दू धर्म : इस उपमहाद्वीप में पौराणिक हिन्दू धर्म का उदय बहुत ही प्राचीन है | बौद्ध धर्म से पहले यहाँ यही मत प्रचलित था | इसमें देवताओं को मुक्तिदाता के रूप में देखा जाता था | इस धर्म में भक्ति का बहुत है जिसमें एक ही देवता को महत्व दिया जाता था | इस प्रकार की आराधना में उपासना और ईश्वर के बीच का रिश्ता प्रेम और समर्पण का रिश्ता माना जाता था, और इसे ही भक्ति कहा जाता था |
इसमें दो मतों के भक्त होते है :
(i) वैष्णव मत: वह हिन्दू परंपरा जिसमें भगवान विष्णु को महत्वपूर्ण अराध्य देव माना जाता था और उन्हें ही मुक्तिदाता के रूप में पूजा जाता था |
(ii) शैशव मत या शैव मत: इस हिन्दू परंपरा में भगवान शिव को प्रमुख अराध्य देव माना जाता था, इसमें यह संकल्पना थी कि शिव परमेश्वर है |
वैष्णववाद : वैष्णववाद में कई अवतारों के इर्द-गिर्द पूजा पद्धतियाँ विकसित हुईं। इस परंपरा के अंदर दस अवतारों की कल्पना है। यह माना जाता था कि पापियों के बढ़ते प्रभाव के चलते जब दुनिया में अव्यवस्था और नाश की स्थिति आ जाती थी तब विश्व की रक्षा के लिए भगवान अलग-अलग रूपों में अवतार लेते थे। संभवतः अलग-अलग अवतार देश के भिन्न-भिन्न हिस्सों में लोकप्रिय थे। इन सब स्थानीय देवताओं को विष्णु का रूप मान लेना एकीकृत धार्मिक परम्परा के निर्माण का एक महत्वपूर्ण तरीका था।
पौराणिक हिन्दू धर्म का उदय / पूजा पद्धतियाँ :
(i) भारतीय उपमहाद्वीप में पौराणिक हिन्दू धर्म का उदय वैष्णववाद के आरम्भ हुई | वैष्णववाद में कई अवतारों के इर्द-गिर्द पूजा पद्धतियाँ विकसित हुईं। इस परंपरा के अंदर दस अवतारों की कल्पना है।
(ii) कई अवतारों को मूर्तियों के रूप में दिखाया गया है। दूसरे देवताओं की भी मूर्तियाँ बनीं। शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में बनाया जाता था। लेकिन उन्हें कई बार मनुष्य के रूप में भी दिखाया गया है।
(iii) ये सारे चित्रण देवताओं से जुड़ी हुई मिश्रित अवधरणाओं पर आधारित थे। उनकी खूबियों और प्रतीकों
को उनके शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुधें ;हथियार और हाथ में धरण किए गए अन्य शुभ अस्त्र और बैठने की शैली से इंगित किया जाता था।
(iv) पुराणों की लोकप्रियता ने भी हिन्दू धर्म के विकास में काफी सहायता की | इनमें बहुत से किस्से ऐसे हैं जो
सैकड़ों वर्ष पहले रचने के बाद सुने-सुनाए जाते रहे थे। इनमें देवी-देवताओं की भी कहानियाँ हैं।
पुराणों की लोकप्रियता के कारण : पुराणों की रचना हिन्दू विद्वानों एवं ऋषियों द्वारा की गई है | जिसमें देवी-देवताओं की कहानियों के साथ-साथ समान्य जन से जुडी हुई ज्ञान पर आधारित है |
(i) इनके प्रचलित होने का प्रमुख कारण यह है कि यह संस्कृत के श्लोकों में लिखी गई है और इनकी रचना के बाद लोगों के बीच अक्सर सुने'-सुनाए जाते रहे थे |
(ii) इन्हें ऊँची आवाज़ में पढ़ा जाता था जिसे कोई भी सुन सकता था। महिलाएँ और शूद्र जिन्हें वैदिक साहित्य पढ़ने-सुनने की अनुमति नहीं थी, पुराणों को सुन सकते थे।
(iii) पुराणों की ज्यादातार कहानियाँ लोगों के आपसी मेल-मिलाप से विकसित हुईं। पुजारी, व्यापारी और सामान्य स्त्री-पुरुष एक से दूसरी जगह आते-जाते हुए अपने विश्वासों और अवधरणाओं का आदान-प्रदान
करते थे।
भक्ति मार्ग की प्रमुख विशेषताएँ : किसी देवी या देवता के प्रति लगाव और समर्पण को भक्ति कहा जाता था | इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ थी |
(i) भक्ति का मार्ग अपनाने वाले लोग आडम्बरों में विश्वास नहीं करते थे | वे ईश्वर के प्रति सच्ची लगन और किसी एक आराध्य पर बल देते थे |
(ii) भक्ति मार्ग अपनाने वालों का यह भी मानना था कि यदि अपने आराध्य देवी या देवता की सच्चे मन से पूजा की जाए तो वह उसी रूप में दर्शन देते है, जिस रूप में भक्त उन्हें देखना चाहता है |
(iii) देवी देवताओं का विशेष स्थान दिया जाता था | इसलिए उनकी मूर्तियाँ मंदिर में रखी जाने लगी |
(iv) भक्ति परम्परा में लोग अपने अराध्य देवी या देवताओं की मूर्तियों का प्रचलन हुआ और उनकी पूजा की जाने लगी | इससे चित्रकला, शिल्पकला और स्थापत्यकला के माध्यम से अभिव्यक्ति की प्रेरणा भी दी | इनसे इन कलाओं के विकास को मदद मिला |
(v) भक्ति का मार्ग सभी के लिए खुला था - चाहे वह धनी हो या निर्धन हो, स्त्री या पुरुष हो, ऊँच जाति का हो यां निम्न जाति का |
आरंभिक मंदिरों का निर्माण एवं उनकी विशेषताएँ :
जिस समय साँची जैसी जगहों में स्तूप अपने विकसित रूप में आ गए थे उसी समय देवी-देवताओं की मूर्तियों को रखने के लिए सबसे पहले मंदिर भी बनाए गए। शुरू के मंदिर एक चौकोर कमरे के रूप में थे जिन्हें गर्भगृह कहा जाता था। इनमें एक दरवाजा होता था जिससे उपासक मूर्ति की पूजा करने के लिए भीतर प्रविष्ट हो सकता था। धीरे-धीरे गर्भगृह के ऊपर एक ऊँचा ढाँचा बनाया जाने लगा जिसे शिखर कहा जाता था | मंदिर की दीवारों पर अक्सर भित्ति चित्र उत्कीर्ण किए जाते थे। बाद के युगों में मंदिरों के स्थापत्य का काफी विकास हुआ।
आरंभिक मंदिरों की निम्नलिखित विशेषताएँ थी |
(i) शुरू के मंदिर एक चौकोर कमरे के रूप में थे जिन्हें गर्भगृह कहा जाता था। इनमें एक दरवाजा होता था जिससे उपासक मूर्ति की पूजा करने के लिए भीतर प्रविष्ट हो सकता था।
(ii) गर्भगृह के ऊपर एक ढाँचा होता था जिसे शिखर कहते थे |
(iii) प्राचीन मंदिर की दीवारों पर अक्सर भित्ति चित्र उत्कीर्ण किए जाते थे।
(iv) मंदिरों के साथ विशाल सभास्थल, ऊँची दीवारें और तोरण भी होती थी | इसके साथ जलआपूर्ति की व्यवस्था भी की जाती थी |
(v) शुरू-शुरू के मंदिरों की एक खास बात यह थी कि इनमें से कुछ पहाडि़यों को काट कर खोखला करके कृत्रिम गुफाओं के रूप में बनाए गए थे।
सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफा : सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ईसा पूर्व तीसरी सदी में असोक के आदेश से आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए बनाई गई थीं।
कैलाश मंदिर एलोरा : सबसे प्राचीन और उत्कृष्ट वस्तुकला और मूर्तिकला का विकसित नमूना हमें आठवीं सदी के कैलाशनाथ मंदिर जो भगवान शिव का एक नाम है इस मंदिर में नजर आता है जिसमें पूरी पहाड़ी काटकर उसे मंदिर का रूप दे दिया गया था।
Chapter 4. विचारक, विश्वास और इमारतें
तीर्थकर : जैन के मूल सिद्धांत वर्धमान महावीर के जन्म से पहले ही उत्तर भारत में प्रचलित थे। जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 शिक्षक हो चुके थे, उन्हें तीर्थंकर कहा जाता है |
जैन साधू तथा साध्वियों द्वारा पालन किया जाने वाला व्रत :
ये व्रत पांच थे -
(i) हत्या न करना
(ii) चोरी न करना
(iii) झूठ न बोलना
(iv) धन इक्कठा न करना
(v) ब्रह्मचर्य का पालन करना
जैन दर्शन की सबसे महत्वपूर्ण अवधरणा :
(i) अहिंसा : संपूर्ण विश्व प्राणवान है। यह माना जाता है कि पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन होता है। जीवों के प्रति अहिंसा - खासकर इंसानों, जानवरों, पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों को न मारना जैन दर्शन का केंद्र बिंदु है। वस्तुतः जैन अहिंसा के सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परम्परा को प्रभावित किया है।
(ii) संन्यास : जैन मान्यता के अनुसार जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म के द्वारा निर्धारित होता है। कर्म के चक्र से मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या की जरूरत होती है। यह संसार के त्याग से ही संभव हो पाता है। इसीलिए
मुक्ति के लिए विहारों में निवास करना एक अनिवार्य नियम बन गया।
वर्धमान महावीर : महावीर अपने युग के एक महान चिंतक थे और वे जैन धर्म के 24 वें तीर्थकर थे | वह एक क्षत्रिय राजकुमार थे | उनका सबंध वज्जि संघ के लिच्छवी कुल से था | 30 वर्ष की आयु में वे घर-बार छोड़कर जंगल में रहने लगे | जहाँ उन्हें 13 वर्ष तपस्या के बाद ज्ञान प्राप्त हुआ |
जैन धर्म की शिक्षाएँ :
(i) जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा यह है कि पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन होता है। जीवों के प्रति अहिंसा - खासकर इंसानों, जानवरों, पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों को नही मारना चाहिए |
(ii) जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म के द्वारा निर्धारित होता है। कर्म के चक्र से मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या की जरूरत होती है। यह संसार के त्याग से ही संभव हो पाता है।
(iii) मुक्ति के लिए संसार को त्यागकर विहारों में निवास करना चाहिए |
(iv) इसके साथ इन पांच व्रतों का पालन करना चाहिए - जैसे हत्या न करना, चोरी न करना, झूठ न बोलना, धन इक्कठा न करना और ब्रह्मचर्य का पालन करना आदि |
Chapter 4. विचारक, विश्वास और इमारतें
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