Chapter 1. ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ - Class 12 History Part-1 Hindi CBSE Notes

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CBSE Notes for Class 12 – Chapter-wise Revision Notes

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Chapter 1. ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ - Class 12 History Part-1 Hindi CBSE Notes

Chapter 1. ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ

Class 12 History Part-1 Hindi Updated : 14 March 2026

Chapter 1. ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ 


संस्कृति शब्द का अर्थ : पुरातत्वविद ‘संस्कृति’ शब्द का प्रयोग पुरावस्तुओं के ऐसे समूह के लिए करते हैं जो एक विशिष्ट शैली के होते हैं और सामान्यतया एक साथ, एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र तथा काल-खंड से संबद्ध पाए जाते हैं।

हड़प्पा सभ्यता का नामकरण : हड़प्पा नामक स्थान जहाँ यह संस्कृति पहली बार खोजी गई थी उसी के नाम पर किया गया है। इसका काल निर्धरण लगभग 2600 और 1900 ईसा पूर्व के बीच किया गया है।

हड़प्पा संस्कृति काल : 2600 से 1900 ईसा पूर्व 

हड़प्पा संस्कृति के भाग/चरण : 

(i) आरंभिक हड़प्पा संस्कृति 

(ii) विकसित हड़प्पा संस्कृति 

(iii) परवर्ती हड़प्पा संस्कृति 

B.C. (Before Christ) - ईसा पूर्व 

A.D (Ano Dominy) - ईसा मसीह के जन्म वर्ष 

B.P (Before Present) - आज से पहले 

सिन्धु घाटी सभ्यता की सबसे, विशिष्ट पुरावस्तु : मुहर - यह सेलखड़ी नामक पत्थर से बनाई
जाती थी।

हड़प्पा संस्कृति के खुदाई स्थल से मिले भोजन अवशेष : 

(i) अनाज - गेंहूँ, जौ, दाल,सफ़ेद चना तथा तिल और बाजरे के दाने गुजरात के स्थलों से प्राप्त हुए हैं | 

(ii) जानवरों की हड्डियाँ - भेड़, बकरी, भैंस, सूअर और वृषभ (बैल) आदि का प्रयोग कृषि कार्यों के लिए किया जाता था | 

(iii) मछलियाँ और पक्षी के अवशेष मिले हैं |

हड़प्पा संस्कृति के पुरातात्विक साक्ष्य : 

या 

हड़प्पा सभ्यता की जानकारी के प्रमुख स्रोत :

(i) आवास (ii) मृदभांड  (iii) आभूषण, (iv) औजार और (v) मुहरें (vi) इमारतें और खुदाई से मिले सिक्के | 

हड़प्पाई संस्कृति के प्रमुख क्षेत्र : अफगानिस्तान, जम्मू, ब्लूचिस्तान (पाकिस्तान), गुजरात,
राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश।

कृषि के अवशेष :

(i) चोलिस्तान के कई स्थलों और बनावली (हरियाणा) से मिटटी से बने हल के प्रतिरूप मिले हैं।

(ii) इसके अतिरिक्त पुरातत्वविदों को कालीबंगन (राजस्थान) नामक स्थान पर जुते हुए खेत का साक्ष्य मिला है जो आरंभिक हड़प्पा स्तरों से संबद्ध है।

(iii) अफगानिस्तान में शोर्तुघई नामक हड़प्पा स्थल से नहरों के कुछ अवशेष मिले हैं |

(iv) धौलावीरा (गुजरात) में मिले जलाशयों का प्रयोग संभवतः कृषि के लिए जल संचयन हेतु किया जाता था।

भारतीय पुरातत्व का जनक :  जनरल अलेक्जेंडर कर्निघम 

हड़प्पा सभ्यता की बस्तियाँ : 

हड़प्पा सभ्यता की बस्तियाँ दो भागों में विभाजित थी -

(i) दुर्ग : ये कच्ची इंटों की चबूतरे पर बनी होती थी | दुर्ग को दीवारों से घेरा गया था | दुर्ग पर बनी संरचनाओं का प्रयोग संभवत: विशिष्ट सार्वजानिक प्रयोग के लिए किया जाता था | 

(ii) निचला शहर : निचला शहर आवासीय भवनों के उदाहरण प्रस्तुत करता है | निचला शहर भी दीवार से घेरा गया था। इसके अतिरिक्त कई भवनों को ऊँचे चबूतरों पर बनाया गया था जो नींव का कार्य करते थे। 

हड़प्पा सभ्यता की सडकों और गलियों की विशेषताएँ : 

(i) हड़प्पा सभ्यता में सडकों तथा गलियों को लगभग एक ग्रिड, पद्धति पर बनाया गया था |

(ii) ये एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं।

(iii) जल निकास प्रणाली अनूठी थी घरो के गन्दे पानी की नालियों को गली की नालियों से जोड़ा गया था।

(iv) सडकों के साथ-साथ नालियों को बनाया गया था |

(v) सडकों और गलियों के अगल-बगल आवासों को बनाया गया था | 

हड़प्पा सभ्यता में सिंचाई के प्रमुख स्रोत : 

(i) नहरें 

(ii) कुएँ

(iii) जलाशय 

विशाल स्नानागर की विशेषताएँ : एक आयताकार जलाशय है। जो चारों ओर से एक गलियारे से घिरा हुआ है। जलाशय के तल तक जाने के लिए सीढि़यां बनी थीं।

मानकों के निर्माण में प्रयुक्त पदार्थ : कार्नीलियन (सुन्दर लाल रंग का) जैस्परर, स्पफटिक, क्वार्टज्
तथा सेलखड़ी जैसे पत्थर - तांबा, काँसा तथा सोने जैसी, धतुएँ तथा शंख फयॉन्स और पकी मिट्टी, सभी का प्रयोग मनके बनाने में होता था। इनके आकार जैसे - चक्राकार, बेलनाकार, गोलाकार तथा खंडित होते थे।

बस्ती के नियोजन कार्य की विशेषताएँ : बस्ती का नियोजन किया गया था और फिर उसके अनुसार कार्यान्वयन किया गया था जिसका उदाहरण हमें यहाँ की बनी ईंटों से पता चलता है |

(i) जो धूप में सुखाकर अथवा भट्टी में पकाकर बनाई गई थी |

(ii) एक निश्चित अनुपात की होती थीं, जहाँ लंबाई और चौड़ाई, ऊँचाई की क्रमशः चार गुनी और दोगुनी होती थी।

(ii) इस प्रकार की ईंटें सभी हड़प्पा बस्तियों में प्रयोग में लाई गई थीं।

हड़प्पा संस्कृति की जल निकासी प्रणाली की विशेषताएँ : 

(i) नालियां पक्की ईटो से बनाई गयी थी।

(ii) सडकों के साथ-साथ नालियाँ बनाई गयी थी |

(iii) यदि घरों के गंदे पानी को गलियों की नालियों से जोड़ना था तो प्रत्येक घर की कम से कम एक दीवार का गली से सटा होना आवश्यक था।

(iv) नालियों को ऐसे ईंटों से ढका गया था जिसे नाली सफाई के समय आसानी से हटाया जा सके | 

(v) कुछ स्थानों पर ढँकने के लिए चूना पत्थर की पट्टिका का प्रयोग किया गया था | 

(vi) घरों की नालियाँ पहले एक हौदी या मलकुंड में खाली होती थीं जिसमें ठोस पदार्थ जमा हो जाता था और गंदा पानी गली की नालियों में बह जाता था।

(vii) बहुत लंबे नालों में कुछ अंतरालों पर सफाई के लिए हौदियाँ बनाई गई थीं।

आवासीय वयवस्था की विशेषताएँ / गृह स्थाप्य कला की विशेषताएँ: 

(i) कई आवास एक आँगन पर केन्द्रित थे जिसके चारों ओर कमरे बने थे। संभवतः आँगन, खाना पकाने और कताई करने जैसी गतिविधियों का केंद्र था। 

(ii) भूमि तल पर बनी दीवारों में खिड़कियाँ नहीं हैं।

(iii) इसके अतिरिक्त मुख्य द्वार से आंतरिक भाग अथवा आँगन को सीधा नहीं देख सकते थे।

(iv) हर घर का ईंटों के फर्श से बना अपना एक स्नानघर होता था जिसकी नालियाँ दीवार के माध्यम से सड़क की नालियों से जुड़ी हुई थीं।

(v) कुछ घरों में दूसरे तल या छत पर जाने हेतु बनाई गई सीढि़यों के अवशेष मिले थे।

(vi) कई आवासों में कुएँ थे जो अधिकांशतः एक ऐसे कक्ष में बनाए गए थे जिसमें बाहर से आया जा सकता था और जिनका प्रयोग संभवतः राहगीरों द्वारा किया जाता था।

मोहनजोदड़ों में कुओं की संख्या : 
मोहनजोदड़ो में कुओं की कुल संख्या लगभग 700 थी।

Chapter 1. ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ

Class 12 History Part-1 Hindi Updated : 25 March 2026

 

शिल्प-उत्पादन में शामिल कार्य : मनके बनाना, शंख की कटाई, धातुकर्म, मुहर निर्माण तथा बाट बनाना इत्यादि | 

चन्हुदडो : यह छोटी 7 हेक्टेयर में फैली बस्ती जो शिल्पकार्य में संलग्न थी | 

मनकों के आकार : जैसे - चक्राकार, बेलनाकार, गोलाकार, ढोलाकार तथा खंडित आकार के होते है | 

उत्पादन केन्द्रों की पहचान : शिल्प-उत्पादन के केन्द्रों की पहचान के लिए पुरातत्वविद सामान्यतः
निम्नलिखित को ढूँढ़ते हैंः

(i) प्रस्तर पिंड, (ii) पूरे शंख तथा (iii) ताँबा-अयस्क जैसा कच्चा माल, इसके अलावा

(iv) औजार, अपूर्ण वस्तुएँ त्याग दिया गया माल तथा कूड़ा-करकट।

पुरातात्विक अध्ययन के लिए कूड़ा-करकट एक अच्छा संकेतक माना जाता है : कभी-कभी बड़े बेकार टुकड़ों को छोटे आकार की वस्तुएँ बनाने के लिए प्रयोग किया जाता था परंतु बहुत छोटे टुकड़ों को कार्यस्थल पर ही छोड़ दिया जाता था। ये टुकड़े इस ओर संकेत करते हैं कि छोटे, विशिष्ट केन्द्रों के अतिरिक्त मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा जैसे बड़े शहरों में भी शिल्प उत्पादन का कार्य किया जाता था।

माल प्राप्त करने के तरीके : 

(i) शिल्प उत्पादन के लिए कई प्रकार के कच्चे माल जैसे - मिटटी, पत्थर, लकड़ी, धातु आदि बाहर के क्षेत्रों से मँगाने पड़ते थे | 

(ii) इन वस्तुओं के मँगाने के परिवहन साधन में बैलगाड़ी स्थल मार्ग के लिए जबकि सिन्धु तथा उसके उपनदियों के बगल में बने नदी मार्गों तथा तटीय मार्गों का प्रयोग होता था | 

(iii) हड़प्पावासी नागेश्वर और बालाकोट में जहाँ शंख आसानी से उपलब्ध था, बस्तियाँ स्थापित कीं।

(iv) अन्य पुरस्थालों सुदूर अफगानिस्तान में शोर्तुघई, जो अत्यंत कीमती माने जाने वाले नीले रंग के पत्थर लाजवर्द मणि के सबसे अच्छे स्रोत के निकट स्थित था

(v) लोथल जो कार्नीलियन (गुजरात में भड़ौच), सेलखड़ी (दक्षिणी राजस्थान तथा उत्तरी गुजरात से) और धातु (राजस्थान से) के स्रोत के निकट स्थित था।

(vi) ताम्बे के लिए राजस्थान के खेतड़ी अंचल तथा सोने के लिए दक्षिण भारत जैसे क्षेत्रों में अभियान भेजा जाता था जो स्थानीय समुदाय से संपर्क स्थापित करते थे | 

सुदूर क्षेत्रो से संपर्क के सबुत : 

(i) हाल ही में हुई पुरातात्विक खोजें इंगित करती हैं कि ताँबा संभवतः अरब प्रायद्वीप के दक्षिण-पश्चिमी छोर पर स्थित ओमान से भी लाया जाता था। रासायनिक विश्लेषण दर्शाते हैं कि ओमानी ताँबे तथा हड़प्पाई पुरावस्तुओं, दोनों में निकल के अंश मिले हैं जो दोनों के साझा उद्भव की ओर
संकेत करते हैं। 

(ii) बड़ा हड़प्पाई मर्तबान जिसवेफ ऊपर काली मिटटी की एक मोटी परत चढ़ाई गई थी, ओमानी स्थलों से मिला है। ऐसी मोटी परतें तरल पदार्थों के रिसाव को रोक देती हैं। ऐसा माना जाता है कि हड़प्पा सभ्यता के लोग इनमें रखे सामान का ओमानी ताँबे से विनिमय करते थे।

(iii) मेसोपोटामिया के स्थलों से मिले ताँबे में भी निकल के अंश मिले हैं। लंबी दूरी के संपर्कों की ओर संकेत करने वाली अन्य पुरातात्विक खोजों में हड़प्पाई मुहरें, बाट, पासे तथा मनके शामिल हैं।

मुहरें तथा मुद्रांकन का प्रयोग : मुहरों और मुद्रांकनों का प्रयोग लंबी दूरी के संपर्कों को सुविधाजनक बनाने के लिए होता था। सुदूर भेजे जाने वाले वस्तुओं के थैलों को बाँधकर उसकी रस्सी को मिटटी लगाकर मुहरों से मुद्रांकित कर दिया जाता था | जिससे प्रेषक (भेजने वाला) की पहचान हो जाती थी और वस्तुएँ सुरक्षित अन्य स्थानों तक पहुँचा दिया जाता था | 

हड़प्पाई मुहरों की विशेषताएँ : 

(i) इस पर एक रहस्यमयी लिपि अंकित होती है जो संभवत: मालिक के नाम और पदवी को दर्शाता था |  

(ii) इस पर बने चित्र अनपढ़ लोगों को सांकेतिक रूप से इसका अर्थ बताता था |

(iii) यह लिपि दाई से बाई ओर लिखी जाती थी | 

(iv) इस लिपि को अबतक पढ़ा नहीं जा सका है इसलिए इन्हें रहस्यमयी लिपि कहते हैं |

अबतक प्राप्त लिखावट वाली वस्तुएँ : 

मुहरें, ताँबें के औजार, मर्तबान के अंवाठ, ताँबें तथा मिटटी की लघु पट्टिकाएं, आभूषण, अस्थि छड़ें तथा प्राचीन सूचना पट | 

बाट की विशेषताएँ : 

(i) विनिमय बाटों की एक सूक्ष्म या परिशुद्ध प्रणाली द्वारा नियंत्रित थे।

(ii) ये बाट सामान्यतः चर्ट नामक पत्थर से बनाए जाते थे और आमतौर पर ये किसी
भी तरह के निशान से रहित घनाकार होते थे।

(iii) इन बाटों के निचले मानदंड द्विआधारी (1, 2, 4, 8, 16, 32 इत्यादि 12,800
तक) थे जबकि ऊपरी मानदंड दशमलव प्रणाली का अनुसरण करते थे।

(iv) छोटे बाटों का प्रयोग संभवतः आभूषणों और मनकों को तौलने के लिए किया जाता था।

हड़प्पा सभ्यता का अंत : 

हड़प्पा सभ्यता का अंत लगभग 1800 ईसा पूर्व हुआ था | 

(i) जलवायु परिवर्तन : कुछ विद्वानों का तर्क है कि हड़प्पा सभ्यता अंत जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, अत्यधिक बाढ़ नदियों का सुख जाना या उनका मार्ग बदल लेना है | 

(ii) शहरों का पतन तथा परित्याग : कुछ विद्वानों के इस तर्क को बल मिलता है कि इस सभ्यता में आए विषम परिस्थियों के कारण यहाँ के निवासी शहरों को त्याग दिये या शहरों का पतन हो गया |

(iii) 

कनिंघम का भ्रम अथवा कनिंघम द्वारा हड़प्पा के महत्व को समझने में चुक : 

(i) कनिंघम उत्खनन के समय ऐसी पुरावस्तुओं खोजने का प्रयास करते थे जो उनके विचार से सांस्कृतिक महत्व की थी |

(ii) हड़प्पा जैसे पुरास्थल कनिंघम के खोज कार्य की प्रकृति से बिलकुल अलग था क्योंकि हड़प्पा जैसा पूरास्थल चीनी यात्रियों के यात्रा-कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था और न कोई आरंभिक ऐतिहासिक शहर था | 

(iii) हड़प्पा कनिंघम के खोज के ढाँचें में उपयुक्त नहीं बैठता था | 

(iv) हड़प्पाई पुरावस्तुएँ उन्नीसवीं शताब्दी में कभी-कभी मिलती थीं और इनमें से कुछ तो कनिंघम तक पहुँची भी थीं, फिर भी वह समझ नहीं पाए कि ये पुरावस्तुएँ कितनी प्राचीन थीं।

(v) कनिंघम का मानना था कि भारतीय इतिहास का आरम्भ गंगा की घाटी में पनपे पहले शहरों के साथ ही हुआ था | चूँकि उनकी अवधारणा सुनिश्चित थी इसलिए वे हड़प्पा के महत्व को समझने में चुक गए | 

Chapter 1. ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ

Class 12 History Part-1 Hindi Updated : 27 March 2026

ईंटें, मनके और अस्थियाँ — त्वरित पुनरावृति

इतिहास कक्षा 12 (पाठ्यपुस्तक 1) — सिंधु घाटी सभ्यता

परिचय

यह अध्याय सिंधु घाटी सभ्यता के पुरातात्त्विक स्रोतों पर आधारित है। ईंटें (Bricks), मनके (Beads) और अस्थियाँ (Bones) हमें इस सभ्यता के नगर-योजना, अर्थव्यवस्था, धार्मिक मान्यताओं और जीवन शैली के बारे में जानकारी देते हैं।

मुख्य नगर केन्द्र

  • हड़प्पा — पंजाब (1921 में खोज)।
  • मोहनजोदड़ो — सिंध (1922 में खोज)।
  • अन्य केन्द्र: कालीबंगन, लोथल, धौलावीरा, राखीगढ़ी, बनावली।

नगर योजना

  • सड़कें ग्रिड प्रणाली पर बनी हुई थीं।
  • गढ़ीला भाग (Citadel) — शासकों, सार्वजनिक भवन और अन्नागार।
  • निचला भाग — आवासीय क्षेत्र।
  • नालियाँ पक्की ईंटों से बनी और ढकी हुई।
  • ईंटें समान आकार की — उन्नत तकनीक का प्रमाण।

कृषि और अर्थव्यवस्था

  • मुख्य फसलें: गेहूँ, जौ, चावल (लोथल), कपास, तिल।
  • पशुपालन: गाय, भैंस, भेड़, बकरी।
  • व्यापार:
    • आंतरिक — कपास, मनके, मिट्टी के बर्तन।
    • बाहरी — मेसोपोटामिया, ओमान, अफगानिस्तान।

शिल्प उत्पादन (मनके और अन्य वस्तुएँ)

  • मनके: कार्नेलियन, स्टियाटाइट, लैपिस लाजुली।
  • धातु कार्य: ताँबा, कांसा, सोना, चाँदी।
  • मिट्टी के बर्तन, खिलौने और मूर्तियाँ।

धार्मिक मान्यताएँ

  • मातृ देवी की मूर्तियाँ।
  • पशुपति (Proto-Shiva) मुद्राएँ
  • पीपल वृक्ष और पशु पूजा।
  • कालीबंगन से अग्नि वेदी।

समाज और शासन

  • नगरों की सुव्यवस्थित योजना → किसी केंद्रीकृत सत्ता का संकेत।
  • समाज में किसान, व्यापारी, कारीगर, श्रमिक आदि।

लिपि और भाषा

  • हड़प्पा लिपि चित्रलिपि थी।
  • अब तक अपठनीय (Undeciphered)।

समाधि प्रथा (अस्थियाँ)

  • समाधि में वस्तुएँ रखी जाती थीं → मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास।
  • अस्थियों से आहार और स्वास्थ्य का ज्ञान।

पतन के कारण

  • जलवायु परिवर्तन और सूखा।
  • नदियों का मार्ग बदलना।
  • बाढ़ या भूकंप।
  • आर्य आक्रमण (कम मान्य)।
  • सबसे मान्य कारण: पारिस्थितिक असंतुलन + नदियों का बदलना।

त्वरित पुनरावृति बिंदु

  • हड़प्पा और मोहनजोदड़ो — प्रमुख नगर।
  • ग्रिड पैटर्न + उन्नत जल निकासी।
  • मुख्य फसलें: गेहूँ, जौ, कपास।
  • व्यापार — मेसोपोटामिया से संबंध।
  • धर्म — मातृ देवी, पशु पूजा, पशुपति मुहर।
  • लिपि अभी तक अपठनीय।
  • पतन — जलवायु व नदी परिवर्तन।

कर्निन्घम का भ्रम

परिचय

अलेक्ज़ेंडर कर्निन्घम भारत के पहले पुरातत्व सर्वेक्षक (Archaeological Survey of India – ASI) थे। उन्होंने 19वीं शताब्दी में कई पुरातात्विक स्थलों की खुदाई करवाई।

भ्रम क्या था?

हड़प्पा स्थल से प्राप्त मुहरों और अवशेषों को देखकर कर्निन्घम ने यह माना कि ये गुप्तकालीन या उत्तरवर्ती काल (लगभग 1000 ई.पू. के आसपास) के हैं। उन्होंने यह नहीं समझा कि यह स्थल वास्तव में अत्यंत प्राचीन है।

भ्रम का कारण

उस समय विद्वानों को यह कल्पना ही नहीं थी कि भारत में भी मेसोपोटामिया जैसी प्राचीन नगरीय सभ्यता रही होगी। इस कारण कर्निन्घम ने हड़प्पा को नए युग का स्थल मान लिया।

सत्य का उद्घाटन

1920 के दशक में दयाराम साहनी और आर.डी. बनर्जी की खुदाई से यह स्पष्ट हुआ कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो विश्व की सबसे प्राचीन नगरीय सभ्यताओं (सिंधु घाटी सभ्यता, 2600–1900 ई.पू.) में से हैं। इस प्रकार कर्निन्घम का भ्रम दूर हुआ।

परीक्षा के लिए उत्तर

संक्षिप्त उत्तर: कर्निन्घम का भ्रम यह था कि हड़प्पा से प्राप्त मुहरें और अवशेष गुप्तकालीन या उत्तरवर्ती काल के थे। वास्तव में यह स्थल सिंधु घाटी सभ्यता (2600–1900 ई.पू.) का था।

कर्निन्घम का भ्रम

उत्तर: कर्निन्घम ने हड़प्पा से प्राप्त मुहरों और अवशेषों को गुप्तकालीन या उत्तरवर्ती काल का माना। वास्तव में ये अवशेष सिंधु घाटी सभ्यता (2600–1900 ई.पू.) के थे।

नगर योजना की विशेषताएँ

प्रश्न:

हड़प्पा सभ्यता की नगर योजना की मुख्य विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर:

  • सड़कें ग्रिड पैटर्न पर बनी थीं।
  • नगर दो भागों में विभाजित था – गढ़ीला भाग (Citadel) और निचला नगर।
  • पक्की ईंटों से मकान व भवन बनाए जाते थे।
  • उन्नत जल निकासी प्रणाली थी।
  • सार्वजनिक भवन जैसे स्नानागार और अन्नागार पाए गए।

धार्मिक मान्यताएँ

प्रश्न:

हड़प्पावासियों की धार्मिक मान्यताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

  • मातृ देवी की पूजा।
  • ‘पशुपति महादेव’ जैसी आकृति की मुहरें।
  • पीपल वृक्ष और पशु पूजा।
  • कालीबंगन से अग्नि वेदी के प्रमाण।

लिपि

प्रश्न:

हड़प्पा सभ्यता की लिपि के बारे में क्या ज्ञात होता है?

उत्तर:

हड़प्पा सभ्यता की लिपि चित्रलिपि (pictographic) थी, जो अब तक अपठनीय (undeciphered) है।

अर्थव्यवस्था

प्रश्न:

हड़प्पा सभ्यता की अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं?

उत्तर:

  • खेती – गेहूँ, जौ, तिल, चावल, कपास।
  • पशुपालन – गाय, भैंस, भेड़, बकरी।
  • आंतरिक एवं बाहरी व्यापार – मेसोपोटामिया, अफगानिस्तान, ओमान से संबंध।
  • हस्तशिल्प – मनके, आभूषण, धातु व मिट्टी के बर्तन।

अस्थियाँ एवं समाधि

प्रश्न:

हड़प्पावासियों की समाधि पद्धति से क्या ज्ञात होता है?

उत्तर:

हड़प्पावासी मृतकों के साथ वस्तुएँ (गहने, बर्तन आदि) रखते थे, जिससे प्रतीत होता है कि वे मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास करते थे। अस्थियों से उनके भोजन एवं स्वास्थ्य की जानकारी मिलती है।

पतन के कारण

प्रश्न:

हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारणों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर:

  • जलवायु परिवर्तन एवं सूखा।
  • नदियों का मार्ग बदलना।
  • भूकंप या बाढ़।
  • पारिस्थितिक असंतुलन।
  • कुछ इतिहासकारों के अनुसार आर्यों का आक्रमण।

 

Chapter 1. ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ

Class 12 History Part-1 Hindi Updated : 27 March 2026

महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर — ईंटें, मनके और अस्थियाँ

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Questions)

प्रश्न 1: हड़प्पा सभ्यता का प्रथम खोज स्थल कौन-सा था?

उत्तर: हड़प्पा (1921, पंजाब)।

प्रश्न 2: मोहनजोदड़ो कहाँ स्थित है और इसकी खोज कब हुई?

उत्तर: सिंध (पाकिस्तान) में स्थित, खोज 1922 में हुई।

प्रश्न 3: हड़प्पावासी मुख्य रूप से कौन-कौन सी फसलें उगाते थे?

उत्तर: गेहूँ, जौ, कपास, तिल और चावल।

प्रश्न 4: हड़प्पा सभ्यता की लिपि कैसी थी?

उत्तर: चित्रलिपि (Pictographic), जो अब तक अपठनीय है।

प्रश्न 5: हड़प्पावासी किस वृक्ष की पूजा करते थे?

उत्तर: पीपल वृक्ष।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Questions)

प्रश्न 1: हड़प्पा सभ्यता की नगर योजना की मुख्य विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर:

  • सड़कें ग्रिड प्रणाली पर बनी हुई थीं।
  • नगर दो भागों में विभाजित — गढ़ीला भाग (Citadel) और निचला भाग।
  • पक्की ईंटों से निर्मित मकान।
  • उन्नत जल निकासी प्रणाली।
  • सार्वजनिक भवन जैसे अन्नागार और स्नानागार।

 

प्रश्न 2: हड़प्पा सभ्यता की धार्मिक मान्यताओं पर प्रकाश डालिए।

उत्तर:

  • मातृ देवी की पूजा।
  • पशुपति महादेव (Proto-Shiva) की मूर्तियाँ।
  • पीपल वृक्ष और पशु पूजा।
  • कालीबंगन से अग्नि वेदी की खोज।

 

प्रश्न 3: हड़प्पा सभ्यता के पतन के प्रमुख कारणों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर:

  • जलवायु परिवर्तन और सूखा।
  • नदियों का मार्ग बदलना।
  • बाढ़ या भूकंप।
  • पारिस्थितिक असंतुलन।
  • कुछ इतिहासकारों के अनुसार आर्य आक्रमण।

प्रश्न 4: कर्निन्घम का भ्रम क्या था ? उसके भ्रम का क्या कारण था ? उसका भ्रम कैसे टूटा ? 

उत्तर: 

कर्निन्घम का भ्रम (Cunningham’s Misconception):

  • अलेक्ज़ेंडर कर्निन्घम (Alexander Cunningham) भारत के पहले पुरातत्व सर्वेक्षक (Archaeological Survey of India – ASI) थे।

  • 19वीं शताब्दी में उन्होंने कई स्थलों की खुदाई करवाई।

  • जब उन्हें हड़प्पा स्थल से मुहरें (seals) मिलीं, जिन पर अजीब-सी आकृतियाँ और लिखावट थी, तो उन्होंने मान लिया कि ये 1000 ई.पू. के आसपास की "शक" (Saka) युग या फिर गुप्तकालीन अवशेष हैं।

  • उनका यह मानना इस वजह से था कि उन्हें इन स्थलों का असली प्राचीन महत्व (2600–1900 BCE) समझ में नहीं आया।

👉 भ्रम का कारण: उस समय कोई भी यह सोच ही नहीं पाया था कि भारत में मेसोपोटामिया जैसी एक प्राचीन नगरीय सभ्यता भी रही होगी।

👉 बाद में 1920 के दशक में आर.डी. बनर्जी और दयाराम साहनी की खुदाई से यह साबित हुआ कि ये स्थल हड़प्पा सभ्यता के थे, जो कर्निन्घम की सोच से कहीं अधिक प्राचीन निकले।

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Chapter Chapter 3. बधुत्व, जाति तथा वर्ग (CBSE NOTES)

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Chapter Chapter 4. विचारक, विश्वास और इमारतें (CBSE NOTES)

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Success in examinations depends on regular practice, conceptual understanding, and effective revision. Our Class 12 CBSE Notes are designed to help students study smarter instead of studying longer. By revising chapter-wise notes regularly, learners can improve their understanding, remember important concepts for a longer period, and write better answers during examinations.

Along with these notes, students can also explore NCERT Solutions, MCQ Questions, Online Tests, Important Questions, Study Materials, and other learning resources available on ATP Education. Together, these resources provide complete academic support for effective learning and better examination preparation.

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Benefits of Studying with Our CBSE Notes

  • Chapter-wise Coverage: Every chapter is explained in a structured and easy-to-follow format.
  • Latest CBSE Syllabus: Notes are prepared according to the latest CBSE curriculum and NCERT guidelines.
  • Quick Revision: Revise important concepts, formulas, definitions, and key points in less time.
  • Simple Language: Difficult topics are explained in clear and student-friendly language for better understanding.
  • Concept-Based Learning: Focus on understanding concepts instead of memorizing answers.
  • Exam-Oriented Preparation: Helps students prepare effectively for class tests, unit tests, half-yearly, annual, and board examinations.
  • Subject-wise Organization: Easily access notes for Mathematics, Science, English, Hindi, Social Science, Physics, Chemistry, Biology, Economics, and more.
  • Time-Saving Study Material: Well-organized notes reduce study time and improve learning efficiency.
  • Improves Answer Writing: Learn important points and present answers in a better and more organized manner.
  • Boosts Confidence: Regular revision strengthens concepts and increases confidence before examinations.
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