Chapter 9. व्यावसायिक वित्त - Class 12 Business Study Hindi CBSE Notes
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CBSE Notes for Class 12 – Chapter-wise Revision Notes
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Chapter 9. व्यावसायिक वित्त - Class 12 Business Study Hindi CBSE Notes
Chapter 9. व्यावसायिक वित्त
अध्याय - 9
वित्तीय प्रबंधन
व्यवसायिक वित - व्यावसायिक गतिविधिओ को चलाने के लिए जिस धन की आवश्यकता होती है, उसे व्यावसायिक वित कहते है |
व्यवसायिक वित की आवश्यकता -
1. व्यवसाय के स्थापन के लिए |
2. व्यवसाय के संचालन के लिए |
3. व्यवसाय के आधुनिकीकरण के लिए |
4. व्यवसाय के विस्तार के लिए |
5. व्यवसाय के विविधिकरण के लिए |
वित्तीय प्रबंध
वित्तीय प्रबन्ध का अर्थ :- वित्तीय प्रबन्ध को व्यवसाय में प्रयोग किये जाने वाले कोषों का नियोजन करने , प्राप्त करने , नियंत्रण करने एवं प्रशासन करने से सम्बन्धित गतिविधि कहा जा सकता है| इसका उद्देश्य आवश्यता के समय पयाप्त कोषों को उपलब्ध कराने का विश्वास दिलाना भी होता है तथा अनावश्यक वित्त सा बचाकर रखना होता है | यह धन की लागत का भी काम करता है | संक्षिप्त में, इसका अभिप्राय प्रबंध की उस शाखा से है जिसका संबंध धन की प्रभावी प्राप्ति व उपयोग से है |
वित्तीय प्रबंध के महत्व -
1. स्थाई संपत्तियों का निर्धारण : वित्तीय प्रबंध के अंतर्गत स्थाई संपत्तियों में कुल विनियोग तथा प्रत्येक स्थाई संपत्ति में किए जाने वाले विनियोग का निर्धारण किया जाता है |
2. चालू संपत्तियों का निर्धारण : वित्तीय प्रबंध के अंतर्गत चालू संपत्तियों में कुल विनियोग तथा प्रत्येक चालू संपत्ति पर विनियोग का निर्धारण किया जाता है |
3. दीर्घकालीन व अल्पकालीन वित के अनुपात का निर्धारण : व्यवसाय की कुल वित्तीय आवश्यकता को दीर्घकालीन व अल्पकालीन स्त्रोतों से पूरा किया जाता है | दीर्घकालीन स्त्रोत व्यवसाय में लम्बे समय तक धन उपलब्ध करवाते है जिसके प्रयोग से तरलता बढती है | जिसके कारण दीर्घकालीन स्त्रोतों को अल्पकालीन स्त्रोतों से अधिक लागते सहनी पड़ती है | वित्तीय प्रबंध में तरलता व लागत विश्लेषण करके दोनों वित्तीय स्त्रोतों के अनुपात का निर्धारण किया जाता है |
4. दीर्घकालीन वित्त के विभिन्न स्त्रोतों के अनुपात का निर्धारण : दीर्घकालीन वित्तीय स्त्रोतों में समता अंश पूंजी, पूर्वाधिकार अंश पूंजी, संचित लाभ, ऋणपत्र, दीर्घकालीन ऋण आदि मुख्य है | वित्तीय प्रबंध के अंतर्गत इन विभिन्न दीर्घकालीन वित्तीय स्त्रोतों का अनुपात निश्चित किया जाता है |
5. लाभ - हानि खाते की विहिन्न मदों का निर्धारण : विभिन्न वित्तीय निर्णयों से लाभ - हानि में सम्मिलित मदे प्रभावित होती है | उदाहरण के लिए, ब्याज का संबंध ऋणों की राशि से है |
वित्तीय प्रबंध के उद्देश्य -
1. धन संपदा को अधिकतम करना : धन संपदा को अधिकतम करने का अभिप्राय अंशधारियो द्वारा व्यवसाय में विनियोजित पूंजी में वृद्धि करना |धन संपदा को अधिकतम करने के लिए अनुकूलतम पूंजी संरचना तथा कोषो का उचित प्रयोग आवश्यक है |
2. तरलता बनाए रखना : कोषो को उचित एवं नियमित आपूर्ति को उचित लागत पर बनाए रखना |
3. कोषो का उचित उपयोग : कोषो का उचित उपयोग ताकि उपव्यय से बचा जा सके |
4. जोखिम को न्यूनतम करना : कोषों को व्यवसाय में इस प्रकार लगाया जाना चाहिए जिससे निवेश में जोंखिम की संभावना यथा संभव कम से कम होनी चाहिए|
वित्त सम्बन्धी निर्णय :-
1. कुल आवश्यक कोषों का अनुमान लगाना |
2. वित् के विभिन्न श्रोतो की पहचान करना |
3. यह निर्णय लेना की वित् के किस स्रोत से कितना वित्त लेना है |
Chapter 9. व्यावसायिक वित्त
वित्तीय निर्णय
आधुनिक विचारकों ने वित्तीय प्रबंधक द्वारा लिए जाने वाले तीन महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया है जो की निम्नलिखित है :
(1) वित सम्बन्धी निर्णय (2) निवेश निर्णय (3) लाभांश निर्णय
1. वित संबंधी निर्णय - वित संबंधी निर्णय का अभिप्राय यह सुनिश्चित करने से है कि आवश्यक वित को विभिन्न दीर्घकालीन स्त्रोतों से कितनी - कितनी मात्र में प्राप्त किया जाए |
वित व्यवसाय निर्णय को प्रभावित करने वाले घटक -
वित व्यवस्था निर्णय को निम्निखित घटक प्रभावित करते है :
1. लागत : विभिन्न स्त्रोतों से कोष प्राप्त करने की लागत भिन्न होती है | मितव्ययी स्त्रोत से ही कोष प्राप्त करने चाहिए |
2. जोखिम : विभिन्न स्त्रोतों में संबंधित जोखिम भिन्न होते है | उधार लिए गये कोष में स्वामित्व कोष की अधिक जोखिम होता है क्योंकि ऋण पर ब्याज देना पड़ता है और इसे लौटना पड़ता है |
3. नियंत्रण : यदि वर्तमान अंशधारी कंपनी पर अपना नियंत्रण रखना चाहते है तो ऋणों के माध्यम से कोष प्राप्त किए जा सकते है |परन्तु समता अंशो के निर्गमन से व्यवसाय पर प्रबंध का नियंत्रण ढीला हो जाता है |
4. रोकड़ प्रवाह स्थिति : यदि कंपनी की रोकड़ प्रवाह स्थिति अच्छी होती है तो वह आसानी से ऋण के माध्यम से कोष प्राप्त कर सकती है, जिसे वापस किया जा सकता है |
5. निवेश पर आय : यदि ब्याज की दर से निवेश पर प्राप्त आय की दर अधिक होती है तो ऋणों के माध्यम से कोष प्राप्ति अधिक लाभदायक होती है |
6. प्रवर्तन लागते : यह वे लागते होती है जो अंशो या ऋणों या ऋणपत्रों को निर्गमित किये जाने पर आती है जैसे विज्ञापन व्यय, प्रविवरण छपाई , अभिगोपन आदि| कोशो के लिए प्रयोग किये जाने वाली प्रतिभूतियो का चुनाव करते समय प्रवर्तन लागतो का ध्यान देना चाहिए |
7. ब्याज आवरण अनुपात : इससे यह ज्ञात किया जाता है की ब्याज के भुगतान के लिए उपलब्ध राशि ब्याज की राशि का कितना अनुपात है |
8. कर दर : कर की दर जितनी अधिक होगी ऋण की लागत उतनी ही कम हो जाती है क्योंकि ऋण पर याज को कंपनी का खर्च मानकर लाभों में से घटाया जाता है|
2. निवेश निर्णय - इसका अभिप्राय उन संपत्तियों के चयन करने से है जिनमे एक व्यवसाय द्वारा धन का विनियोग किया जाता है |
निवेश निर्णय को प्रभावित करने वाले कारक -
निवेश निर्णय को निम्नलिखित घटक प्रभावित करते है :
1. परियोजना का रोकड़ प्रवाह : विभिन्न परियोजना के जीवन काल के दौरान उनसे क्रम अनुसार प्राप्त होने वाली रोकड़ तथा उन पर किये जाने वाले रोकड़ व्ययों के आधार पर उत्तम परियोजना का चुनाव किया जाना चाहिए|
2. आय की दर : किसी परियोजना की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी उससे होने वाली आय तथा उसमे निहित जोखिम होता है | अतः परियोजना का चुनाव करते समय इनका ध्यान रखना आवश्यक होता है |
3. शामिल निवेश कसौटी : विभिन्न प्रस्तावों का मूल्यांकन बजटिंग तकनीक के आधार पर किया जाता है | निवेश की राशि , ब्याज की दर , जोखिम , रोकड़ प्रवाह तथा आय की दर आदि की गड़ना करना |
लाभांश निर्णय - कर का भुगतान करने के बाद अंशधारियो में लाभ के वितरण संबंधी निर्णय को लाभांश निर्णय कहते है |
लाभांश निर्णय को प्रभावित करने वाले घटक
लाभांश निर्णय को निम्नलिखित घटक प्रभावित करते है :
(1) उपार्जन (आय) : लाभांश का भुगतान वर्तमान व संचित लाभों में से किया जाता है |अतः लाभों की कुल राशि जितनी अधिक होगी उतना ही अधिक लाभांश दिया जाएगा |
(2) लाभांश की स्थिरता : प्रायः कंपनिया स्थायी लाभांश नीति अपनाती है| यदि कोई कम्पनी लगातार लाभांश दती आ रही है तो वह भविष्य में भी लाभांश देगी |
(3) विकास की संभावनाए : यदि निकट भविष्य में कम्पनी के विकास की संभावना होती है तो उपार्जन के अधिकांश भाग को वह अपने पास प्रतिधारित राशि के रोप में रख लेती है | अतः लाभांश कम दिया जाएगा |
(4) रोकड़ प्रवाह स्थिति : लाभांश के कारण रोकड़ का बहिगर्मन होता है, अतः पर्याप्त रोकड़ की उपलब्धता होने पर ही लाभांश दिया जा सकता है |
(5) अंशधारी प्राथमिकता : लाभांश निति का निर्धारण करते समय अंशधारियो की प्राथमिकता को भी ध्यान में रखा जाता है | यदि अंशधारी लाभांश की अपेक्षा रखते है तो कम्पनी उन्हें लाभांश दे सकती है |
(6) करारोपण नीति : कम्पनी द्वारा दिए जाने वाले लाभांश पर उन्हें कर देना पड़ता है | अतः कर की दर अधिक होने पर कम्पनी कम लाभांश देती है , जबकि कर की दर कम होने पर कम्पनी अधिक लाभांश दे सकती है |
(7) पूंजी बाजार प्रतिक्रिया : लाभांश बढ़ना अंशधारियो के लिए अच्छी खबर है| ज्यादा लाभांश होने से अंशो का बाजार मूल्य बढ़ता है और कम लाभांश होने से बाजार का मूल्य घटता है |
(8) कानूनी बाधाएँ : कम्पनी अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत लाभ की सम्पूर्ण मात्रा को लाभांश के रूप में बांटा नही जा सकता और कई वैधानिक संचयो के लिए प्रावधान करना अनिवार्य है इससे लाभांश घोषित करने में कम्पनी की क्षमता सीमित हो जाती है |
Chapter 9. व्यावसायिक वित्त
वित्तीय नियोजन
व्यवसाय के लिए कोषो की आवश्यकता का अनुमान लगाने तथा कोषो के स्त्रोतों को निर्धारित करने की प्रक्रिया को वित्तीय नियोजन कहते है |
वित्तीय नियोजन प्रक्रिया -
1. वित्तीय उद्देश्यों का निर्धारण करना |
2. वित्तीय नीतियों व नियमो का निर्माण करना |
3. वित्तीय आवश्यकता का पूर्वानुमान लगाना |
4. वित के वैकल्पिक स्रोतों का विकास करना |
5. सर्वोत्तम विकल्प का चयन करना |
6. वित्तीय योजनाओ एवं नीतियों का क्रियान्वयन करना |
वित्तीय नियोजन के महत्व -
वित्तीय नियोजन के महत्व अथवा भूमिका
1. संभावित परिस्थितियो का सामना करने में सहायक : वित्तीय नियोजन के अंतर्गत विभिन्न व्यावसायिक परस्थितियो का पूर्वानुमान लगाया जाता है | इसी आधार पर विभिन्न वित्तीय योजनाए तैयार की जाती है |
2. समन्वय में सहायक : यह विभिन्न व्यावसायिक क्रियाओ , जैसे - विक्रय , क्रय, उत्पादन, वित, आदि से समन्वय स्थापित करने में सहायक है |
3. वित की बर्बादी पर रोक में सहायता : वितीय नियोजन के आभाव में वित्तीय संसाधनों की बर्बादी हो सकती है |इसका कारण व्यावसायिक व्यवहारों की पेचीदगी है, किसी विशेष व्यावसायिक व्यवहार के लिए आवश्यकता से बहुत अधिक अथवा बहुत कम अनुमान लगाना | इस तरह की बर्बादी को वित्तीय नियोजन के माध्यम से रोका जा सकता है |
4. वर्तमान को भविष्य से जोड़ने में सहायक : यह वर्तमान को भविष्य से जोड़ने में प्रयत्न करता है | ऐसा करके , भावी अनिश्चितताओ के जोखिम को कम करने में सहायता प्राप्त होती है |
5. विनियोग तथा वित निर्णयों में संबंध स्थापित करने में सहायक : इसके अंतर्गत अंशपूंजी व ऋणपूंजी का मिश्रण इस ढंग से किया जाता है पूंजी लागत न्यूनतम आए |
6. वित्तीय नियंत्रण : वित्तीय नियोजन में सभी वित्तीय क्रियाओ पर पूर्ण नियंत्रण रखा जाता है | इसके अंतर्गत वित्तीय निष्पादन के प्रमाप निर्धारित किये जाते है ;वास्तविक निष्पादन की प्रमाप से तुलना की जाती है; विचलन व उसके कारणों की खोज की जाती है |
वित्तीय नियोजन के उद्देश्य -
वित्तीय नियोजन निम्नलिखित उद्देश्य प्राप्ति के लिए किया जाता है :-
1. समय पर वित उपलब्धि को सुनिश्चित करना : वित्तीय नियोजन का प्रथम उद्देश्य समय पर वित उपलब्ध करवाना है | इसके अंतर्गत दीर्घकालीन व अल्पकालीन वित्तीय अवश्यकताओ का अनुमान लगाया जाता है | तथा इसके बाद देखा जाता है की किन स्त्रोतों से वित प्राप्त किया जा सकता है |
2. वित का उपयुक्त शेष सुनिश्चित करना : यह सुनिश्चित किया जाता है की कभी भी रोकड़ शेष आवश्यकताओ से बहुत अधिक अथवा कम न हो | रोकड़ शेष का आवश्यकता से अधिक व कम होना हानिकारक है |
Chapter 9. व्यावसायिक वित्त
पूंजी ढांचा :- पूंजी ढाचे से अभिप्राय दीर्घकालीन वित्त के विभिन्न स्त्रोतों के पारस्परिक अनुपात से है |
पूंजी संरचना को प्रभावित करने वाले कारक :-
(1) समता पूंजी की लागत : समता पूंजी की लागत ऋण पूंजी के प्रयोग से प्रभावित होती हैं | यही कोई कंपनी अधिक मात्रा में ऋण पूंजी का उपयोग करती है तो कंपनी को उतना ही अधिक समता पूंजी की लागत को वहन करना पड़ेगा | जिससें अंशों की बाज़ार कीमतों में विपरीत प्रभाव पड़ेगा | कंपनी को इस स्थिति से बचाना चाहिए |
(2) रोकड़ प्रवाह स्थिति : पूंजी संरचना का चयन करते समय कंपनी का भावी रोकड़ प्रवाह भी ध्यान में रखना चाहिए | यदि कोई कंपनी ऋण पूंजी का उपयोग करना चाहती हैं तो उसे अपने रोकड़ प्रवाह को अवश्य ही जाँच लेना चाहिए क्योंकि ऋण पर ब्याज के साथ-साथ निश्चित समय के अंदर मूल राशि की भी वापसी करनी होती हैं |
(3) ब्याज आवरण अनुपात : यह वह अनुपात है जो यह बतलाता हैं की ब्याज के भुगतान के लिए उपलब्ध राशि ब्याज की राशि से कितना अधिक हैं | यह अनुपात जितना अधिक होगा कंपनी उतना ही अधिक ऋण पूंजी का उपयोग का सकती हैं | यह निम्न प्रकार से ज्ञात किया जाता हैं ;
(4) निवेश पर आय : यदि किसी कंपनी की निवेश पर आय जितनी अधिक होगी कम्पनी उतना ही अधिक ऋण पूंजी का उपयोग का पाएगी | निवेश पर आय को ज्ञात करने का सूत्र ;
(5) ऋण की लागत : किसी कंपनी की ऋण लेने की क्षमता ऋण की लागत पर भी निर्भर करती हैं | यदि ऋण पूंजी पर ब्याज की दर कम हैं तो कंपनी ऋण का चयन का कर सकती है और इसकी विपरीत स्थिति में किसी अन्य विकल्प का चयन कर सकती हैं |
(6) कर की दर : एक कंपनी के पूंजी ढाँचे को कर की दर भी प्रभावित करती है | यदि कर की दर अधिक होगी तो ऋण की लागत ही कम होगी | क्योकि ऋण पर ब्याज को कंपनी के खर्चे मान कर लाभ में से घटा दिया जाता है जिससें कर की बचत होती है |
(7) नियंत्रण : यदि कोई कंपनी अपनी कंपनी पर अधिक स्वामित्व नियंत्रण नहीं चाहती है तो उसे ऋण पूंजी पर निवेश करना चाहिए | और यदि कंपनी नियंत्रण की अनुमति के साथ अधिक मात्रा पूंजी की भी प्राप्ति करना चाहती हैं तो उसे समता अंशों में निवेश करना चाहिए |
(8) स्टॉक बाज़ार की स्थिति : स्टॉक बाज़ार की स्थिति से अभिप्राय मंदीकाल व तेजीकाल से हैं | मंदी काल में अधिक जोखिम के डर से निवेशक प्रायः समता अंशों में निवेश करने से बचते हैं जबकि तेजी काल में निवेशक समता अंशों में अधिक निवेश करते हैं ताकि अनुकूल स्थिति का लाभ उठाया जा सकें |
(9) निर्गमन लागत : निर्गमन लागत से अभिप्राय उस लागत से है | जो प्रतिभूतियों को जारी करने में खर्च होती हैं | ऋण पूंजी की लागत समता अंश से कम होती हैं इसलिए निर्गमन लागत के परिपेक्ष में ऋण पूंजी का उपयोग करना बेहतर हैं |
वित्तीय ढांचा - इसका अभिप्राय चिट्ठे के दायित्व पक्ष की रचना से है अर्थात इसके अंतर्गत दीर्घकालीन व अल्पकालीन दोनों प्रकार की पूंजी स्त्रोतों को सम्मिलित किया जाता है |
पूंजीकरण - इसका अभिप्राय दीर्घकालीन पूंजी स्त्रोतों के योग से है अर्थात् यदि वित्तीय ढांचे में से अल्पकालीन पूंजी स्त्रोतों को कम कर दिया जाए तो शेष पूंजीकरण बचता है |
ऋणपूंजी व पूर्वाधिकार अंश पूंजी : समानता व असमानता
समानता
1. कम्पनी को ऋणपूंजी पर निश्चित दर से ब्याज तथा पूर्वाधिकार अंश पूंजी पर निश्चित दर से लाभांश का भुगतान करना पड़ता है | अतः यह दोनों पूंजी स्त्रोत स्थाई पूंजी लागत वाले है |
2. ये दोनों पूंजी स्त्रोत समता अंश पूंजी से सस्ते होते है |
असमानता
1. कम्पनी को ऋण पूंजी पर ब्याज का भुगतान करना होता है चाहे उसे लाभ हो अथवा हानि | लेकिन पूर्वाधिकार अंश पूंजी पर लाभांश का भुगतान केवल पर्याप्त लाभ उपलब्ध होने की स्थिति में ही किया जाता है |
2. ऋण पूंजी पर ब्याज के भुगतान पर कर लाभ प्राप्त होता है | जबकि पूर्वाधिकार अंश पूंजी पर दी जाने वाले लाभांश से पहले ही कर की गणना हो चुकी होती है इसीलिए इस पर कर लाभ प्राप्त नही होता है |
स्थायी तथा कार्यशील पूंजी
स्थायी पूंजी - स्थायी पूंजी का अभिप्राय ऐसी पूंजी से है जिसका प्रयोग स्थायी सम्पत्तिया (भूमि, भवन, मशीनरी, फर्नीचर आदि) क्रय करने के लिए किया जाता है |
स्थायी पूंजी की आवश्यकता को प्रभावित करने वाले घटक -
1. व्यवसाय की प्रकृति : एक निर्माणी उपक्रम को स्थाई सम्पन्त्तियो, संयंत्र, मशीनों आदि की आवश्यकता होती है | जबकि व्यापारिक उपक्रम को स्थाई सम्पतियो, संयंत्रो, मशीनों आदि की आवश्यकता नही होता है | अतः निर्माणी उपक्रम में स्थाई पूंजी की आवश्यकता अधिक होता है |
2. व्यवसाय का आकार : बड़े स्तर पर कार्य करने वाले संगठनो को छोटे स्तर पर कार्य करने वाले संगठनों के मुकाबले अधिक स्थाई पूंजी की आवश्यकता होती है | क्योंकि उन्हें बड़े - बड़े मशीनों की आवश्यकता होती है |
3. तकनीक का विकल्प : पूंजी प्रधान तकनीक का प्रयोग करने वाले संगठनों को श्रम प्रधान तकनीक का प्रयोग करने वाले संगठनों से स्थाई पूनी की आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि उन्हें बड़ी - बड़ी मशीने लेनी पड़ती है |
4. विकास प्रत्याशा : ऐसी संस्थाएं जिनके पास उच्च विकास योजना होती है उन्हें अधिक स्थाई पूँजी की आवश्यकता होती है, क्योंकि उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए नई मशीने आदि क्रय करने होते है |
5. विविधिकरण : यदि कोई कंपनी विविधिकरण प्रक्रिया को अपनाती है तो संयंत्रो व मशीनों के लिए उसे अधिक स्थाई पूंजी की आवश्यकता होती है |
6. माध्यमो का चयन : उन संगठनों को, जो अपनी वस्तुए मध्यस्थों यानी की थोक एवं फूटकर व्यापारीयों द्वारा बेचते है, स्थाई पूंजी की आवश्यकता कम पड़ती है |
7. सहयोग का स्तर : यदि कुछ व्यवसाय संगठन आपस में मिलकर एक दुसरे के सूविधाओ की साझेदारी करने पर सहमत हो तो स्थायी पूंजी की कम मात्रा में आवश्यकता होगी |
(i) व्यवसाय की प्रकृति : किसी व्यवसाय में स्थाई पूंजी की आवश्यक उस व्यवसाय की प्रकृति पर निर्भर करती है | प्रायः व्यवसाय दो प्रकार के होते हैं (a) निर्माण व्यवसाय और (b) व्यापारिक व्यवसाय | निर्माण व्यवसाय में अधिक मात्रा में स्थाई पूंजी की आवश्यकता होती हैं | जबकि व्यापारिक व्यवसाय में कम स्थाई पूंजी की आवश्यकता होती हैं |
(ii) क्रियाओं का पैमान : जिस व्यवसाय में जितना अधिक क्रियाओं का फैलाव होगा उस व्यवसाय में उतना ही अधिक स्थाई पूंजी की आवश्यकता होगी | जबकि छोटे व्यवसाय में कम स्थाई पूंजी की आवश्यकता होती हैं |
(iii) विविधिकरण : विविधिकरण से अभिप्राय एक से अधिक उत्पाद में व्यापार करना | जो संगठन विविधिकरण को अपनाती हैं उस व्यवसाय में अधिक स्थाई पूंजी की आवश्यकता होती हैं | जैसे - यदि एक कंपनी कपडे के व्यापार के साथ कागज का भी व्यवसाय करना चाहता हैं तो उसे विभिन्न साधनों (जैसे मशीन, भूमि व भवन आदि ) की आवश्यकता होगी हैं |
(iv) पद्धति का चयन : जो कंपनी आधुनिकता व स्वचालित मशीनों के द्वारा उत्पादन का कार्य करती हैं उन कंपनियों को अधिक स्थाई पूंजी की आवश्यकता होती हैं | जबकि जो कंपनी मानवीय श्रम का अधिक उपयोग करती हैं उसे कम स्थाई पूंजी की आवश्यकता होगी |
(v) विकास सम्भावनाएँ : विकास की संभावना से व्यवसाय दो प्रकार के होते हैं | (i) वे व्यवसाय जिनके विकास की संभावना नहीं होती हैं इनके लिए स्थाई पूंजी की कम आवश्यकता होती हैं | जबकि वे व्यवसाय जिनकी विकास की संभावना अधिक होती हैं उन्हें अधिक स्थाई पूंजी की आवश्यकता होती हैं |
कार्यशील पूंजी - कार्यशील पूंजी से अभिप्राय उस पूंजी से हैं जो व्यवसाय की अल्पकालीन संपत्तियों में विनियोग की जाती हैं | जैसे - रोकड़ शेष, प्राप्ति बिल, देनदार और कच्चा माल आदि |
कार्यशील पूंजी की आवश्यकता को प्रभावित करने वाले घटक
(i) व्यवसाय की प्रकृति : कार्यशील पूंजी की आवश्यकता व्यवसाय की प्रकृति पर निर्भर करता हैं | निर्माणी व्यवसाय में अधिक कच्चे माल व अर्द्ध कच्चे माल और तैयार माल की आवश्यकता होती हैं इसलिए अधिक मात्रा में कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती हैं | जबकि सेवा क्षेत्र में कम कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती हैं |
(ii) कच्चे माल की उपलब्धता : किसी कंपनी में कार्यशील पूंजी की आवश्यकता कंपनी में कच्चे माल की उपलब्धता पर भी निर्भर करता हैं | यदि किसी कंपनी द्वारा ऐसे कच्चे माल का उपयोग करता है जो पुरे साल आसानी से उपलब्ध हो तो कंपनी को कम कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती हैं | जबकि यदि कंपनी के द्वारा आसानी से न उपलब्ध होने वाले कच्चे माल का उपयोग किया जाता हैं तो अधिक कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होगी |
(iii) व्यावसायिक चक्र : कार्यशील पूंजी की आवश्यकता व्यावसायिक चक्र पर निर्भर करती हैं | तेजी काल में मांग के बढ़ने पर अधिक कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती हैं | जबकि मंदी काल में बिक्री कम होने के कारण कम कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती हैं |
(iv) उत्पादन चक्र : उत्पादन चक्र से अभिप्राय कच्चे माल को तैयार माल में परिवर्तित करने में लिए गाए समय से हैं | जिस व्यवसाय का उत्पादन चक्र जितना अधिक होगा उस व्यवसाय में कार्यशील पूंजी की आवश्यकता उतनी ही अधिक होगी | जबकि छोटी उत्पादन चक्र वाले व्यवसाय में कम कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होगी |
(v) उधार बिक्री : जो व्यवसाय अधिक उधार बिक्री करती हैं उसे अधिक मात्रा में कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती हैं | जबकि जो व्यवसाय अधिक नकद बिक्री करती हैं उसे कम कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती हैं |
(vi) मौसमी घटक : हर व्यवसाय द्वारा अलग-अलग वस्तुओं का उत्पादन किया जाता हैं जैसे कुछ व्यवसाय द्वारा पुरे साल मांग वाली वस्तुओं का उत्पादन किया जाता हैं तो उन्हें अधिक कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती हैं तथा जो व्यवसाय द्वारा कुछ विशेष मौसम में मांग वाली वस्तुओं का उत्पादन करती हैं तो उन्हें कम कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती हैं |
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