Chapter 2. भारत में राष्ट्रवाद - Class 10 History Hindi CBSE Notes
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Chapter 2. भारत में राष्ट्रवाद - Class 10 History Hindi CBSE Notes
Chapter 2. भारत में राष्ट्रवाद
Chapter 2. भारत में राष्ट्रवाद
भारत में राष्ट्रवाद का विकास ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विभिन्न आंदोलनों, जनभागीदारी और महात्मा गांधी के नेतृत्व में हुए स्वतंत्रता संघर्ष के माध्यम से हुआ। इस अध्याय में राष्ट्रीय आंदोलन की प्रमुख घटनाओं, नेताओं तथा आंदोलनों का अध्ययन किया जाता है।
CBSE Notes – Key Points
इस भाग में अध्याय के सभी महत्वपूर्ण तथ्य, घटनाएँ, व्यक्तित्व तथा परीक्षा की दृष्टि से आवश्यक बिंदुओं का संक्षिप्त अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।
महत्वपूर्ण व्यक्तित्व (Important Personalities)
- महात्मा गांधी
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
- सुभाष चन्द्र बोस
- सरदार वल्लभभाई पटेल
- खान अब्दुल गफ्फार खान
- अली बंधु
- सी. आर. दास
- बाल गंगाधर तिलक
महत्वपूर्ण घटनाएँ (Important Events)
- 1915 – गांधीजी का भारत आगमन
- 1917 – चम्पारण सत्याग्रह
- 1918 – खेड़ा सत्याग्रह
- 1918 – अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन
- 1919 – रॉलेट एक्ट
- 1919 – जलियाँवाला बाग हत्याकांड
- 1920 – असहयोग आंदोलन
- 1930 – दांडी यात्रा एवं सविनय अवज्ञा आंदोलन
- 1931 – गांधी-इरविन समझौता
- 1942 – भारत छोड़ो आंदोलन
महत्वपूर्ण तथ्य (Important Facts)
- राष्ट्रवाद को जन-आंदोलन का स्वरूप महात्मा गांधी ने दिया।
- सत्याग्रह का आधार सत्य और अहिंसा था।
- रॉलेट एक्ट को काला कानून कहा गया।
- जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा दी।
- दांडी यात्रा नमक कानून के विरोध में निकाली गई।
- भारत छोड़ो आंदोलन का नारा था – "करो या मरो".
महत्वपूर्ण शब्दावली (Important Keywords)
- सत्याग्रह
- असहयोग
- सविनय अवज्ञा
- स्वराज
- स्वदेशी
- बहिष्कार
- खिलाफत आंदोलन
- पूर्ण स्वराज
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु (Exam Important Points)
- चम्पारण, खेड़ा और अहमदाबाद आंदोलनों के कारण एवं परिणाम।
- रॉलेट एक्ट और जलियाँवाला बाग हत्याकांड।
- असहयोग आंदोलन की विशेषताएँ।
- सविनय अवज्ञा आंदोलन और दांडी यात्रा।
- भारत छोड़ो आंदोलन के कारण एवं प्रभाव।
- राष्ट्रीय आंदोलन में विभिन्न सामाजिक वर्गों की भूमिका।
त्वरित पुनरावृत्ति (Quick Revision)
- 1915 → गांधीजी भारत आए।
- 1917 → चम्पारण सत्याग्रह।
- 1919 → रॉलेट एक्ट, जलियाँवाला बाग।
- 1920 → असहयोग आंदोलन।
- 1930 → दांडी यात्रा।
- 1942 → भारत छोड़ो आंदोलन।
परीक्षा टिप्स (Exam Tips)
- वर्ष (Years) अवश्य याद रखें।
- आंदोलन, कारण और परिणाम को साथ में पढ़ें।
- गांधीजी के तीन प्रारंभिक आंदोलनों में अंतर याद रखें।
- असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन में अंतर लिखने का अभ्यास करें।
- मानचित्र एवं स्रोत-आधारित प्रश्नों का अभ्यास करें।
Chapter 2. भारत में राष्ट्रवाद
Chapter 2. भारत में राष्ट्रवाद
भारत में राष्ट्रवाद का विकास ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष, जन-जागरण और महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाए गए आंदोलनों के माध्यम से हुआ। इस भाग में गांधीजी के भारत आगमन, प्रारम्भिक सत्याग्रहों तथा सत्याग्रह की अवधारणा का अध्ययन करेंगे।
Part 1A – गांधीजी का आगमन और प्रारम्भिक राष्ट्रीय आंदोलन
महात्मा गांधी के भारत आगमन के बाद राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा मिली। उन्होंने सत्य और अहिंसा के आधार पर जनता को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा।
भारत में राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि
20वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक भारत में राष्ट्रीय चेतना तेजी से विकसित हो रही थी।
- ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों से जनता असंतुष्ट थी।
- शिक्षा के प्रसार से राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ।
- समाचार-पत्रों और साहित्य ने राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस राष्ट्रीय आंदोलन का प्रमुख मंच बनी।
- जनता में स्वशासन (Self Rule) की मांग बढ़ने लगी।
महात्मा गांधी का भारत आगमन
महात्मा गांधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे और भारतीय राजनीति में सक्रिय हुए।
- गांधीजी जनवरी 1915 में भारत आए।
- उन्होंने गोपाल कृष्ण गोखले को अपना राजनीतिक गुरु माना।
- देश की वास्तविक स्थिति जानने के लिए उन्होंने व्यापक यात्राएँ कीं।
- उन्होंने जनता की समस्याओं को निकट से समझा।
- उन्होंने संघर्ष के लिए सत्य और अहिंसा का मार्ग अपनाया।
सत्याग्रह की अवधारणा
सत्याग्रह गांधीजी द्वारा विकसित एक अहिंसक संघर्ष की पद्धति थी।
- सत्याग्रह का अर्थ है सत्य के लिए आग्रह करना।
- इसका आधार सत्य, अहिंसा और आत्मबल था।
- इसमें हिंसा का पूर्णतः विरोध किया गया।
- अन्यायपूर्ण कानूनों का शांतिपूर्ण विरोध किया जाता था।
- सत्याग्रह ने स्वतंत्रता आंदोलन को जन-आंदोलन बना दिया।
चम्पारण सत्याग्रह (1917)
चम्पारण सत्याग्रह गांधीजी का भारत में पहला सफल सत्याग्रह था।
- यह आंदोलन बिहार के चम्पारण जिले में हुआ।
- किसानों को जबरन नील की खेती करने के लिए बाध्य किया जाता था।
- गांधीजी ने किसानों की समस्याओं का अध्ययन किया।
- ब्रिटिश सरकार को किसानों की मांगें स्वीकार करनी पड़ीं।
- इस आंदोलन से गांधीजी को राष्ट्रीय पहचान मिली।
खेड़ा सत्याग्रह (1918)
खेड़ा सत्याग्रह किसानों के कर संबंधी अधिकारों के लिए चलाया गया आंदोलन था।
- यह आंदोलन गुजरात के खेड़ा जिले में हुआ।
- फसल खराब होने के बावजूद सरकार कर वसूल रही थी।
- गांधीजी ने किसानों से कर न देने का आग्रह किया।
- सरकार ने अंततः कर वसूली में राहत दी।
- इस आंदोलन ने किसानों का आत्मविश्वास बढ़ाया।
अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन (1918)
यह आंदोलन मजदूरों के उचित वेतन की मांग को लेकर किया गया था।
- यह आंदोलन गुजरात के अहमदाबाद में हुआ।
- मजदूर वेतन वृद्धि की मांग कर रहे थे।
- गांधीजी ने शांतिपूर्ण हड़ताल का समर्थन किया।
- उन्होंने आमरण अनशन भी किया।
- मिल मालिकों ने मजदूरों की मांग स्वीकार कर ली।
गांधीजी के प्रारम्भिक आंदोलनों का महत्व
इन आंदोलनों ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा प्रदान की।
- किसानों और मजदूरों का राष्ट्रीय आंदोलन पर विश्वास बढ़ा।
- गांधीजी राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित हुए।
- सत्याग्रह की प्रभावशीलता सिद्ध हुई।
- जनता में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध साहस बढ़ा।
- आगे के राष्ट्रीय आंदोलनों की मजबूत नींव तैयार हुई।
Chapter 2. भारत में राष्ट्रवाद
प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार ने दमनकारी नीतियाँ अपनाईं, जिससे पूरे देश में असंतोष फैल गया। रॉलेट एक्ट, जलियाँवाला बाग हत्याकांड और खिलाफत आंदोलन जैसी घटनाओं ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक नया मोड़ दिया तथा महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन की शुरुआत हुई।
Part 1B – रॉलेट एक्ट से असहयोग आंदोलन तक
इस भाग में रॉलेट एक्ट, जलियाँवाला बाग हत्याकांड, खिलाफत आंदोलन तथा असहयोग आंदोलन का अध्ययन करेंगे।
रॉलेट एक्ट (1919)
1919 में ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट लागू कर नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगा दिए।
- रॉलेट एक्ट को काला कानून (Black Act) कहा गया।
- बिना मुकदमा चलाए किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जा सकता था।
- प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नियंत्रण लगाया गया।
- देशभर में इस कानून का विरोध किया गया।
- महात्मा गांधी ने इसके विरुद्ध सत्याग्रह शुरू किया।
जलियाँवाला बाग हत्याकांड (1919)
13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में निहत्थी जनता पर गोलियाँ चलाई गईं।
- यह घटना बैसाखी के दिन हुई।
- सभा में हजारों लोग उपस्थित थे।
- जनरल रेजिनाल्ड डायर ने बिना चेतावनी गोली चलाने का आदेश दिया।
- सैकड़ों लोग मारे गए तथा अनेक घायल हुए।
- इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया।
- ब्रिटिश शासन के प्रति जनता का विश्वास समाप्त हो गया।
खिलाफत आंदोलन
खिलाफत आंदोलन तुर्की के खलीफा के समर्थन में भारतीय मुसलमानों द्वारा चलाया गया आंदोलन था।
- इस आंदोलन का नेतृत्व अली बंधुओं ने किया।
- महात्मा गांधी ने इस आंदोलन का समर्थन किया।
- हिन्दू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा मिला।
- खिलाफत और असहयोग आंदोलन साथ-साथ चलाए गए।
- इससे राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिला।
असहयोग आंदोलन (1920–1922)
महात्मा गांधी ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध असहयोग आंदोलन प्रारम्भ किया।
- आंदोलन की शुरुआत सितंबर 1920 में हुई।
- उद्देश्य ब्रिटिश शासन के साथ सहयोग समाप्त करना था।
- यह आंदोलन सत्य और अहिंसा पर आधारित था।
- देशभर में विद्यार्थियों, वकीलों, किसानों और व्यापारियों ने भाग लिया।
- यह पहला राष्ट्रव्यापी जन आंदोलन था।
असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम
इस आंदोलन के अंतर्गत ब्रिटिश शासन का शांतिपूर्ण बहिष्कार किया गया।
- सरकारी विद्यालयों और महाविद्यालयों का बहिष्कार।
- सरकारी नौकरियों से त्यागपत्र देना।
- विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार।
- विदेशी कपड़ों की होली जलाना।
- स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग बढ़ाना।
- खादी और चरखे को अपनाना।
- सरकारी उपाधियों और सम्मान लौटाना।
असहयोग आंदोलन में विभिन्न वर्गों की भागीदारी
इस आंदोलन में समाज के विभिन्न वर्गों ने सक्रिय रूप से भाग लिया।
किसान
- किसानों ने करों का विरोध किया।
- उन्होंने स्थानीय आंदोलनों में भाग लिया।
- राष्ट्रीय आंदोलन को गाँवों तक पहुँचाया।
मजदूर
- मजदूरों ने हड़तालें कीं।
- उन्होंने ब्रिटिश नीतियों का विरोध किया।
- राष्ट्रीय आंदोलन को समर्थन दिया।
विद्यार्थी और शिक्षक
- सरकारी शिक्षण संस्थानों का बहिष्कार किया।
- राष्ट्रीय विद्यालयों में प्रवेश लिया।
- स्वदेशी शिक्षा को बढ़ावा दिया।
व्यापारी वर्ग
- विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया।
- स्वदेशी उद्योगों को प्रोत्साहन दिया।
- राष्ट्रीय आंदोलन के लिए आर्थिक सहयोग दिया।
चौरी-चौरा घटना (1922)
चौरी-चौरा की हिंसक घटना के कारण असहयोग आंदोलन समाप्त कर दिया गया।
- यह घटना 5 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा में हुई।
- उग्र भीड़ ने पुलिस थाने में आग लगा दी।
- कई पुलिसकर्मियों की मृत्यु हो गई।
- महात्मा गांधी ने हिंसा का विरोध किया।
- उन्होंने असहयोग आंदोलन वापस लेने का निर्णय लिया।
- उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता का संघर्ष अहिंसा के आधार पर ही चलेगा।
Chapter 2. भारत में राष्ट्रवाद
Chapter 2. भारत में राष्ट्रवाद
असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद भी स्वतंत्रता की लड़ाई रुकी नहीं। महात्मा गांधी ने अंग्रेजों की अन्यायपूर्ण नीतियों के विरुद्ध सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया। नमक कानून का विरोध, दांडी यात्रा तथा देशभर में हुए आंदोलनों ने भारतीय राष्ट्रवाद को नई ऊर्जा प्रदान की।
Part 2 – सविनय अवज्ञा आंदोलन और राष्ट्रवाद का विस्तार
इस भाग में सविनय अवज्ञा आंदोलन, दांडी यात्रा, गांधी-इरविन समझौता तथा विभिन्न सामाजिक वर्गों की भागीदारी का अध्ययन करेंगे।
सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930)
सविनय अवज्ञा आंदोलन ब्रिटिश कानूनों का शांतिपूर्ण उल्लंघन करने के उद्देश्य से प्रारम्भ किया गया।
- इस आंदोलन की शुरुआत 1930 में हुई।
- महात्मा गांधी ने इसका नेतृत्व किया।
- मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश शासन का विरोध करना था।
- अन्यायपूर्ण कानूनों का शांतिपूर्ण उल्लंघन किया गया।
- यह आंदोलन पूरे देश में तेजी से फैल गया।
दांडी यात्रा (Dandi March)
दांडी यात्रा सविनय अवज्ञा आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी।
- दांडी यात्रा 12 मार्च 1930 को प्रारम्भ हुई।
- यात्रा साबरमती आश्रम से दांडी तक निकाली गई।
- कुल दूरी लगभग 240 मील (390 किमी) थी।
- 6 अप्रैल 1930 को गांधीजी ने नमक कानून तोड़ा।
- यह आंदोलन ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जन-आंदोलन बन गया।
नमक कानून का महत्व
गांधीजी ने नमक को आंदोलन का प्रतीक बनाया क्योंकि यह प्रत्येक भारतीय के जीवन से जुड़ा था।
- नमक प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यक वस्तु थी।
- ब्रिटिश सरकार ने नमक पर कर लगाया था।
- गरीब और अमीर सभी इस कर से प्रभावित थे।
- नमक कानून तोड़कर ब्रिटिश शासन को चुनौती दी गई।
- इससे आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिला।
सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रमुख कार्यक्रम
इस आंदोलन के दौरान अनेक प्रकार से ब्रिटिश शासन का विरोध किया गया।
- नमक कानून का उल्लंघन।
- विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार।
- स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग।
- करों का भुगतान न करना।
- सरकारी संस्थाओं का विरोध।
- शांतिपूर्ण धरने और प्रदर्शन।
गांधी-इरविन समझौता (1931)
1931 में महात्मा गांधी और लॉर्ड इरविन के बीच समझौता हुआ।
- मार्च 1931 में गांधी-इरविन समझौता हुआ।
- सरकार ने कई राजनीतिक कैदियों को रिहा किया।
- गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित कर दिया।
- गांधीजी ने द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने की सहमति दी।
- नमक बनाने की सीमित अनुमति दी गई।
गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conference)
भारत के संवैधानिक भविष्य पर चर्चा के लिए लंदन में गोलमेज सम्मेलन आयोजित किए गए।
- प्रथम गोलमेज सम्मेलन 1930 में हुआ।
- द्वितीय गोलमेज सम्मेलन 1931 में आयोजित हुआ।
- महात्मा गांधी ने द्वितीय सम्मेलन में भाग लिया।
- सम्मेलन से कोई ठोस परिणाम नहीं निकला।
- इसके बाद आंदोलन पुनः प्रारम्भ कर दिया गया।
महिलाओं की भूमिका
सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी उल्लेखनीय रही।
- महिलाओं ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया।
- धरनों और जुलूसों में सक्रिय भाग लिया।
- खादी के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- अनेक महिलाओं ने जेल यात्राएँ भी कीं।
किसानों की भूमिका
ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों ने आंदोलन को व्यापक समर्थन दिया।
- किसानों ने करों का विरोध किया।
- कई स्थानों पर लगान देने से इंकार किया।
- राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई।
- ग्रामीण क्षेत्रों में राष्ट्रवाद का प्रसार हुआ।
व्यापारी और औद्योगिक वर्ग की भूमिका
व्यापारियों और उद्योगपतियों ने भी राष्ट्रीय आंदोलन का समर्थन किया।
- विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का समर्थन किया।
- स्वदेशी उद्योगों को प्रोत्साहन दिया।
- राष्ट्रीय आंदोलन को आर्थिक सहायता प्रदान की।
- स्वदेशी व्यापार के विस्तार में योगदान दिया।
सविनय अवज्ञा आंदोलन का महत्व
इस आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष को एक नई दिशा प्रदान की।
- राष्ट्रवाद पूरे देश में और अधिक मजबूत हुआ।
- ब्रिटिश शासन की नीतियों का व्यापक विरोध हुआ।
- जनता का स्वतंत्रता आंदोलन पर विश्वास बढ़ा।
- महिलाओं, किसानों और व्यापारियों की भागीदारी बढ़ी।
- भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।
Chapter 2. भारत में राष्ट्रवाद
Chapter 2. भारत में राष्ट्रवाद
सविनय अवज्ञा आंदोलन के बाद भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष एक नए चरण में प्रवेश कर गया। इस अवधि में विभिन्न सामाजिक वर्गों की भागीदारी, भारत छोड़ो आंदोलन तथा राष्ट्रीय एकता ने स्वतंत्रता प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त किया।
Part 3 – भारत छोड़ो आंदोलन और राष्ट्रीय एकता
इस भाग में विभिन्न सामाजिक वर्गों की भूमिका, भारत छोड़ो आंदोलन तथा भारतीय राष्ट्रवाद के प्रभाव का अध्ययन करेंगे।
राष्ट्रीय आंदोलन में उद्योगपतियों की भूमिका
भारतीय उद्योगपतियों ने राष्ट्रीय आंदोलन को आर्थिक और नैतिक समर्थन प्रदान किया।
- स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा दिया।
- विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का समर्थन किया।
- राष्ट्रीय नेताओं को आर्थिक सहायता प्रदान की।
- ब्रिटिश आर्थिक नीतियों का विरोध किया।
- भारतीय उद्योगों के विकास की मांग की।
राष्ट्रीय आंदोलन में मजदूरों की भूमिका
मजदूर वर्ग ने भी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भाग लिया।
- अनेक स्थानों पर हड़तालें की गईं।
- ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रदर्शन किए गए।
- राष्ट्रीय आंदोलनों को समर्थन दिया।
- स्वतंत्रता की मांग को मजबूत बनाया।
राष्ट्रीय आंदोलन में किसान वर्ग की भूमिका
किसानों ने विभिन्न आंदोलनों के माध्यम से राष्ट्रीय संघर्ष को व्यापक बनाया।
- कई क्षेत्रों में लगान का विरोध किया।
- राष्ट्रीय आंदोलनों में सक्रिय भाग लिया।
- गांधीजी के नेतृत्व का समर्थन किया।
- ग्रामीण क्षेत्रों में राष्ट्रवाद का प्रसार किया।
राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की भूमिका
महिलाओं ने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
- धरनों और जुलूसों में भाग लिया।
- विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया।
- खादी के प्रचार में योगदान दिया।
- अनेक महिलाओं ने जेल यात्राएँ कीं।
- राष्ट्रीय आंदोलन को जन-आंदोलन बनाने में सहयोग दिया।
राष्ट्रीय आंदोलन में सम्पन्न किसान (Rich Peasants)
सम्पन्न किसानों ने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए आंदोलन का समर्थन किया।
- लगान में कमी की मांग की।
- ब्रिटिश कर नीतियों का विरोध किया।
- कुछ क्षेत्रों में आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की।
- आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार उनका समर्थन बदलता रहा।
राष्ट्रीय आंदोलन में गरीब किसान (Poor Peasants)
गरीब किसानों की समस्याएँ सम्पन्न किसानों से अलग थीं।
- वे लगान और ऋण के बोझ से परेशान थे।
- जमींदारी प्रथा का विरोध करते थे।
- राष्ट्रीय आंदोलन से सामाजिक और आर्थिक सुधारों की अपेक्षा रखते थे।
- हर क्षेत्र में उनकी भागीदारी समान नहीं थी।
राष्ट्रीय आंदोलन में व्यावसायिक वर्ग (Business Class)
व्यापारियों ने स्वदेशी आंदोलन और राष्ट्रीय संघर्ष को समर्थन दिया।
- स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग को बढ़ावा दिया।
- विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का समर्थन किया।
- राष्ट्रीय संगठनों को आर्थिक सहयोग दिया।
- भारतीय उद्योगों के संरक्षण की मांग की।
भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement)
1942 में महात्मा गांधी ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने का आह्वान किया।
- यह आंदोलन 8 अगस्त 1942 को प्रारम्भ हुआ।
- अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने प्रस्ताव पारित किया।
- महात्मा गांधी ने "करो या मरो" का नारा दिया।
- देशभर में व्यापक प्रदर्शन और हड़तालें हुईं।
- ब्रिटिश सरकार ने अनेक नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।
- आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष को निर्णायक दिशा दी।
भारत छोड़ो आंदोलन का महत्व
भारत छोड़ो आंदोलन स्वतंत्रता संघर्ष का अंतिम बड़ा जन-आंदोलन था।
- स्वतंत्रता की मांग पूरे देश की आवाज बन गई।
- ब्रिटिश शासन की नींव कमजोर हुई।
- जनता की भागीदारी अभूतपूर्व रही।
- स्वतंत्रता प्राप्ति का मार्ग और अधिक स्पष्ट हुआ।
- 1947 में भारत की स्वतंत्रता का आधार मजबूत हुआ।
भारत में राष्ट्रवाद का प्रभाव
राष्ट्रीय आंदोलन ने भारतीय समाज और राजनीति में व्यापक परिवर्तन किए।
- राष्ट्रीय एकता की भावना मजबूत हुई।
- स्वतंत्रता आंदोलन जन-आंदोलन बन गया।
- सत्य और अहिंसा को विश्व स्तर पर पहचान मिली।
- विभिन्न धर्मों, वर्गों और क्षेत्रों के लोग एक मंच पर आए।
- 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ।
अध्याय के प्रमुख तथ्य (Quick Facts)
- 1915 – महात्मा गांधी भारत लौटे।
- 1917 – चम्पारण सत्याग्रह।
- 1918 – खेड़ा सत्याग्रह एवं अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन।
- 1919 – रॉलेट एक्ट एवं जलियाँवाला बाग हत्याकांड।
- 1920 – असहयोग आंदोलन।
- 1930 – दांडी यात्रा एवं सविनय अवज्ञा आंदोलन।
- 1931 – गांधी-इरविन समझौता।
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